GSSS BINCHAWA

GSSS BINCHAWA

GSSS KATHOUTI

GSSS KATHOUTI

GSSS BUROD

19. जैव विविधता एवं इसका संरक्षण


  1. भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव कौन सा है
    गंगा डॉल्फिन (2009)
  2. अंतरराष्ट्रीय जैवविधता दिवस कब मनाया जाता है
    22 मई
  3. विश्व में वृहद जैव विविधता वाले देश कितने हैं
    17
  4. वर्तमान विश्व में कितने जैव विविधता तप्त स्थल है
    34
  5. NAB का पूरा नाम लिखो
    राष्ट्रीय जैवविविधता प्राधिकरण
  6. विश्व में सर्वाधिक जैव विविधता कहां पाई जाती है
    भूमध्य रेखा पर
  7. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा किस वर्ष को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष के रूप में मनाया गया
    2010
  8. CBD का पूरा नाम लिखिए
    कन्वेंशन ऑन बायोडायवर्सिटी (जैवविविधता संधि)
  9. पारिस्थितिकीय तंत्र के संतुलन की मापक इकाई क्या है
    प्रजाति विविधता
  10. जैव विविधता के तप्त स्थल की अवधारणा किसने दी ?
    नार्मन मेयर्स
  11. भारत से पूर्ण रूप से विलुप्त जीवों के नाम लिखो
    एशियाई चीता, जावन गैण्डा, गुलाबी सिर वाली बत्तख, पर्वतीय बटैर।
  12. जैव विविधता के स्तरों के नाम लिखिए
    (i) प्रजाति विविधता
    (ii) अनुवांशिक विविधता
    (iii) पारिस्थितिकी तंत्र विविधता
  13. प्रजाति विविधता किसे कहते हैं (2020)
    किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने वाले जीवो की विभिन्न प्रजातियों की कुल संख्या उस क्षेत्र की प्रजाति विविधता कहलाती है
  14. अनुवांशिक विविधता किसे कहते हैं (2019)
    एक ही प्रजाति के विभिन्न सदस्यों में अनुवांशिक इकाई जीन के कारण पाई जाने वाली विभिन्नता अनुवांशिक विविधता कहलाती है
  15. विश्व के प्रमुख जैव विविधता तप्त स्थलों के नाम लिखिए
    1.पूर्वी मलेशियाई द्वीप समूह      2.अटलांटिक वन
    3.मेडागास्कर द्वीप समूह           4.इंडो बर्मा
    5.
    भारत का पश्चिमी घाट           6.पूर्वी हिमालय
  16. पारिस्थितिकी तंत्र विविधता किसे कहते हैं(2020)
    भौगोलिक एवं पर्यावरणीय विभिन्नताओं के कारण विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्रों के जीवों में पायी जाने वाली भिन्नता पारिस्थितिकी तंत्र की विविधता कहलाती है
  17. भारत के जैवविविधता तप्त स्थलों नाम लिखिए
    (i)पूर्वी हिमालय जैव विविधता तप्त स्थल
    (ii) पश्चिमी घाट जैव विविधता तप्त स्थल
    (iii)इंडो बर्मा जैवविविधता तप्त स्थल

  18. प्रजाति किसे कहते हैं
    जीवों का ऐसा समूह जिसके सदस्य एक जैसे दिखाई देते हैं तथा प्राकृतिक परिवेश में प्रजनन कर संतान उत्पन्न करने की क्षमता रखते हो प्रजाति कहलाता है
  19. पारिस्थितिकी तंत्र किसे कहते हैं
    किसी क्षेत्र विशेष के समस्त जीवो तथा पर्यावरण के अजैविक घटकों के मध्य होने वाली अंतः क्रिया से निर्मित तंत्र पारिस्थितिकी तंत्र कहलाता है
    जैसे घास का मैदान, पहाड़, समुद्र, तालाब
  20. किसी क्षेत्र को जैव विविधता तप्त स्थल घोषित करने के लिए आवश्यक शर्ते लिखिए
    (i)उस क्षेत्र में विश्व की कुल स्थानबद्ध प्रजातियों की 0.5% (1500 प्रजातियां )से अधिक प्रजातियां उपस्थित होनी चाहिए
    (ii) उस क्षेत्र के मूल आवास का 70% भाग उजड़ चुका हो

  21. स्थानबद्ध प्रजातियां किसे कहते हैं उदाहरण दीजिए
    ऐसी प्रजातियां जो एक क्षेत्र विशेष में ही पाई जाती है अर्थात जिनका वितरण एक सीमित क्षेत्र में होता है स्थानबद्ध प्रजातियां कहलाती है जैसे लेमूर मेडागास्कर द्वीप पर तथा नीलगिरी तहर व मैकाक बंदर भारत के पश्चिमी घाट में ही पाये जाते हैं (2020) डोडो पक्षी मॉरिशस की एक स्थानबद्ध प्रजाति थी । 
  22. जैव विविधता का आर्थिक महत्व लिखिए
    (i)जैवविविधता हमें प्रत्यक्ष रुप से भोजन, ईंधन, चारा, इमारती लकड़ी एवं उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराती है
    (ii) जैव विविधता कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोग रोधी तथा कीट रोधी फसलों की किस्मों के विकास में सहायक है
    (iii) जेट्रोफा व करंज (बायोडीजल वृक्ष) के बीजों से जैव ईंधन बनाया जा सकता है
  23. जैव विविधता का सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व लिखिए
    1.वनस्पतियों की कुछ प्रजातियां जैसे पीपल, बरगद, तुलसी, आंवला आदि हमारी संस्कृति में विशेष स्थान रखते हैं इन वनस्पतियों की विशेष अवसरों पर पूजा की जाती है
    2.कुछ जंतु जैसे गाय, चूहा आदि भी हमारी संस्कृति में विशेष स्थान रखते हैं इनकी भी विशेष अवसरों पर पूजा की जाती है
    3.हमारे देश में आज भी ऐसे वन क्षेत्र है जिन्हें देववन का जाता है
  24. जैव विविधता का औषधीय महत्व लिखिए
    वनों में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियों का उपयोग अनेक बीमारियों के इलाज में किया जाता है जैसे-
    1.मलेरिया का इलाज सिनकोना की छाल से किया जाता है
    2.विनक्रिस्टीन व विनब्लास्टीन पौधों का उपयोग रक्त कैंसर तथा टैक्सस बकाटा वृक्ष की छाल का उपयोग कैंसर के इलाज किया जाता है
    3.सर्पगंधा से उच्च रक्तचाप का इलाज किया जाता है
    4.तुलसी, ब्राह्मी, अश्वगंधा, शतावरी आदि वनस्पतियों में एड्स रोधी गुण पाए जाते हैं
  25. जैवविविधता का पर्यावरणीय महत्व लिखिए(2020)
    (i)खाद्य श्रंखला का संरक्षण- जब किसी खाद्य श्रंखला में से एक प्रजाति विलुप्त हो जाती है तो पूरी खाद्य श्रंखला के खत्म होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है परंतु यदि जैवविविधता समृद्ध है तो उसमें विभिन्न खाद्य श्रंखलाएं मिलकर खाद्य जाल का निर्माण करती है और किसी खाद्य श्रंखला की एक प्रजाति विलुप्त होने से खाद्य जाल की अन्य प्रजातियां उसकी कमी को पूरा कर देती है
    (ii)पोषक चक्र नियंत्रण - जैव विविधता पोषण चक्र को गतिमान बनाए रखने में सहायक होते हैं मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्मजीव पोधौ व जीवों के मृत भागों को विघटित कर पौधों को पोषक तत्व पुनः उपलब्ध कराने में सहायक है 
    (iii)पर्यावरण प्रदूषण का निस्तारण -कई वनस्पतियां, सूक्ष्मजीव व कवक प्रदूषकों का विघटन और अवशोषण करने का गुण रखती है एवं कई सूक्ष्म जीव औद्योगिक अपशिष्ट में उपस्थित भारी तत्वों को हटाने में सक्षम होते हैं
  26. विश्व प्रजातियों का IUCN वर्गीकरण लिखिए (2020)
    (i) विलुप्त प्रजातियां- ऐसी प्रजातियां जो विश्व में कहीं भी जीवित अवस्था में नहीं मिलती है विलुप्त प्रजातियां कहलाती है जैसे डोडो पक्षी ,डायनासोर
    (ii) संकटग्रस्त प्रजातियां- ऐसी प्रजातियां जो विलुप्त होने के कगार पर है तथा जिनका संरक्षण नहीं किया गया तो शीघ्र ही विलुप्त हो जाएगी । इन्हें संकट ग्रस्त प्रजातियां कहते है जैसे चिता, बाघ, सर्पगंधा, गेंडा
    (iii) अति संवेदनशील प्रजातियां- ऐसी प्रजातियां जिनकी संख्या तेजी से कम हो रही है तथा शीघ्र ही संकटग्रस्त प्रजातियों की श्रेणी में आने की आशंका है संकटग्रस्त प्रजातियां कहलाती हैं जैसे याक, लाल पांडा, कोबरा
    (iv) दुर्लभ प्रजातियां- ऐसी प्रजातियां जो एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में ही रह गई है या जिनकी संख्या बहुत कम है दुर्लभ प्रजातियां कहलाती हैं  जैसे लाल भेड़िया, गिब्बन
    (v)अपर्याप्त रूप से ज्ञात प्रजातियां- ऐसी प्रजातियां जिनके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है
  27. जैव विविधता संरक्षण के प्रकार /विधियां लिखिए
    (i) स्वस्थाने संरक्षण -जीवों का उनके प्राकृतिक आवास में ही अनुकूल परिस्थितियां व सुरक्षा उपलब्ध करा कर किया गया संरक्षण स्वस्थाने संरक्षण कहलाता है इसके तहत राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण, जीवमंडल रिजर्व आदि की स्थापना की जाती है भारत में 14 जैव मंडल रिजर्व, 99 राष्ट्रीय उद्यान, 593 वन्य जीव अभ्यारण तथा 47 संरक्षित रिजर्व घोषित किए जा चुके हैं
    (ii)बहिस्थाने संरक्षण - जब किसी संकटग्रस्त पादप या जंतु प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर कृत्रिम आवास में संरक्षण प्रदान किया जाता है तो इसे बहिस्थाने सरंक्षण कहते हैं इसके तहत वनस्पति प्रजातियों के संरक्षण के लिए वानस्पतिक उद्यान, बीज बैंक, उत्तक संवर्धन प्रयोगशाला आदि की स्थापना की जाती है जंतुओं के संरक्षण के लिए चिड़ियाघर, एक्वेरियम आदि की स्थापना की जाती है बीज बैंक में संकटग्रस्त पौधों एवं जंतुओं के जींस अंकुरणक्षम अवस्था में सुरक्षित रखे जाते हैं
  28. भारत के जैवविविधता तप्त स्थलों का वर्णन कीजिए
    1.पूर्वी हिमालय जैवविविधता तप्त स्थल - यह क्षेत्र असम,अरूणाचल प्रदेश, सिक्किम व पश्चिम बंगाल में फैला हुआ है यहां हिमालय पर्वत श्रंखला में पर्याप्त जैवविविधता पाई जाती है यह 7.5 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है इस क्षेत्र में सुनहरा लंगूर, हिम तेंदुआ, उड़न गिलहरी व गंगा डॉल्फिन जैसे जीव पाए जाते हैं
    2.पश्चिमी घाट जैव विविधता तप्त स्थल - यह क्षेत्र भारत के पश्चिमी घाट के सहारे महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक व तमिलनाडु राज्यों में फैला हुआ है यह क्षेत्र 1.6 लाख वर्ग किमी में फैैला है यहां निलगिरी तहर व मेकाक बंदर जैसी स्थानबद्ध जातियां पायी जाती है 
    3.इंडो बर्मा जैव विविधता तप्त स्थल - यह जैव विविधता तप्त स्थल भारत, चीन, म्यांमार, वियतनाम, थाईलैंड, कंबोडिया, मलेशिया आदि देशों में फैला हुआ है इसका क्षेत्रफल लगभग 23.73 लाख वर्ग किलोमीटर है
  29. जैव विविधता संरक्षण हेतु किए जाने वाले प्रयासों का वर्णन कीजिए
    (अ)अंतर्राष्ट्रीय प्रयास-
    (i) अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ -संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1968 में एक अंतरराष्ट्रीय संस्था "अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN)" की स्थापना की जिसने विभिन्न पादप एवं प्राणी जातियों का अध्ययन कर 1972 में एक पुस्तक रेड डाटा बुक प्रकाशित की इस पुस्तक में विलुप्त हो रही जातियों, उनके आवास तथा वर्तमान में उनकी संख्या को सूचीबद्ध किया गया है अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ ने विश्व प्रजातियों को संरक्षण की दृष्टि से पांच भागों में बांटा है
    (ii) विश्व पृथ्वी सम्मेलन -1992 में रियो डी जेनेरो में विश्व पृथ्वी सम्मेलन हुआ और जैवविविधता संधि (CBD) अस्तित्व में आई जिसे 193 देशों ने स्वीकार कर लिया है इन सभी देशों ने जैवविविधता के संरक्षण के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की
    (ब)राष्ट्रीय प्रयास -
    (i)जैवविविधता एक्ट- भारत सरकार ने 2002 में जैव विविधता एक्ट बनाया जिसके तीन मुख्य उद्देश्य हैं
    ☆जैव विविधता का संरक्षण
    ☆जैव विविधता की दीर्घकालीन उपलब्धता
    ☆जैविक संसाधनों के लाभ का समान वितरण
    इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए जैव विविधता एक्ट 2002 में त्रिस्तरीय संगठन का प्रावधान है
    राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ,राज्य स्तर पर जैव विविधता बोर्ड और स्थानीय स्तर पर प्रबंध समितियां का गठन किया गया है
    (ii) राष्ट्रीय हरित अधिकरण- भारत सरकार ने पर्यावरण, वन, जल, वायु व जैवविविधता विषयों से संबंधित विवादों को निपटाने के लिए 2 जून 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना की जिसका मुख्यालय भोपाल में है
  30. जैवविविधता ह्रास के लिए उत्तरदाई प्रमुख कारण लिखिए (2020)
    (i)प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना- विश्व की बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आबादी व कृषि भूमि में विस्तार के कारण जीवो के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं जिससे कई जंतु एवं वनस्पति प्रजातियां विलुप्त हो रही है
    (ii)प्राकृतिक आवास विखंडन- सड़क मार्ग, रेल मार्ग, गैस पाइपलाइन, नहर आदि के कारण जीवो के प्राकृतिक आवास विखंडित हो जाते हैं जिससे वन्यजीवों के प्राकृतिक क्रियाकलाप प्रभावित होते हैं तथा वे अपने आप को असहज महसूस करते हैं अनेक जीव वाहनों की चपेट में आकर के मर जाते हैं
    (iii)जलवायु परिवर्तन- मानवीय गतिविधियों के कारण आज वैश्विक उष्णता की समस्या उत्पन्न हो गई है जिसके कारण विश्व की जलवायु धीरे-धीरे बदल रही है जलवायु परिवर्तन के कारण कई प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है
    (iv) पर्यावरण प्रदूषण- पर्यावरण प्रदूषण का असर प्राणियों एवं पौधों दोनों पर पड़ता है प्रदूषित जल, प्रदूषित भूमि एवं अम्लीय वर्षा के कारण अनेक सूक्ष्म जीव एवं वनस्पतियां नष्ट हो रही है कृषि में रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के अत्याधिक उपयोग से मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीव विलुप्त जाते हैं
    (v) विदेशी प्रजातियों का आक्रमण- वांछित या अवांछित रूप से कई बार विदेशी प्रजातियों के आने के कारण स्थानीय प्रजातियों के अस्तित्व का खतरा उत्पन्न हो जाता है जिससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है जैसे लैंटाना, जलकुंभी (वाटर लिली) एवं गाजर घास के कारण स्थानीय जैव विविधता के लिए संकट उत्पन्न हो गया है
    (vi)अंधविश्वास व अज्ञानता- अंधविश्वास एवं भ्रामक अवधारणाओं के कारण कई जीव मनुष्य द्वारा मार दिए जाते हैं जिसके कारण जीवो की प्रजाति के लिए संकट उत्पन्न हो जाता है जैसे गागरोनी तोता, गोयरा व गोडावण आदि को भ्रामक अवधारणाओं के कारण मार दिया जाता है 

13.महासागरीय जल संचलन



महासागरीय जल अपनी भौतिक विशेषताओं जैसे- तापमान, खारापन, घनत्व तथा बाह्य बल जैसे- सूर्य चंद्रमा तथा वायु के प्रभाव के कारण सदैव गतिशील रहता हैं। महासागरीय जल में मुख्यतः तीन प्रकार की गतियाँ होती हैं - तरंगे, ज्वार भाटा तथा धाराएं।

तरंगें

जल की सतह पर पवनों के चलने से उसमें दोलन होने लगता है अर्थात्‌ इसमें पानी अस्थिर होकर हिलने-डुलने लगता है, इसी से जल ऊपर उठता एवं नीचे गिरता प्रतीत होता है। इस प्रभाव से पानी लहरदार आकृति की भाँति दिखाई देता है। इसे ही लहर या तरंग कहते हैं। अर्थात  सागरीय जल के क्रमिक रूप से उठाव व गिराव को लहर या तरंग कहा जाता है।  तरंगे महासागरीय जल में क्षैतिज गति से संबंधित हैं। 

तरंगों की विशेषताएँ

तरंग-श्रृंग व तरंग-गर्त -तरंग के ऊपरी उठे भाग को तरंग-श्रृंग कहते हैं। दो तरंग-श्रृंगों के बीच के निचले भाग को तरंग-गर्त कहते हैं।

तरंग की उंचाई- तरंग-श्रृंग तथा तरंग-गर्त के मध्य की ऊर्ध्वाधर दूरी को तरंग की ऊँचाई कहते हैं।

तरंग आयाम ;यह तरंग की उफँचाई का आधा होता है।

आवर्त-काल -किसी भी निश्चित स्थान पर दो लगातार श्रृंगों के गुजरने के बीच की अवधि को तरंग का आवर्त-काल कहते हैं।

तरंगदैर्ध्य - दो तरंग-श्रृंगों अथवा दो तरंग-गर्तों के बीच की क्षैतिज दूरी को तरंग-दैर्ध्य या तरंग की लम्बाई कहते हैं।

तरंग आवृत्ति- यह एक सेकेंड के समयान्तराल में दिए गए बिंदु से गुजरने वाली तरंगों की संख्या तरंग आवृत्ति कहलाती है।

ज्वार-भाटा

चंद्रमा एवं सूर्य के आकर्षण के कारण किसी निश्चित स्थान पर महासागरीय जल के ऊपर उठने और नीचे उतरने को क्रमशः ज्वार-भाटा कहते है ज्वारभाटा महासागरीय जल की उर्ध्वाधर गति से संबंधित है। वास्तव में ज्वार-भाटा सबसे बड़ी तरंगे हैं जो महासागरीय जल को गतिशील रखती हैं। नियमित रूप से प्रतिदिन एक निश्चित अन्तराल पर दो बार समुद्री जल ऊपर उठता है और दो बार नीचे बैठता है। चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण तथा कुछ हद तक सूर्य के गुरुत्वाकर्षण द्वारा ज्वारभाटाओं की उत्पत्ति होती है। विश्व का सबसे उँचा ज्वारभाटा कनाडा के नवास्कोशिया में स्थित फण्डी की खाड़ी में आता है।

ज्वार भाटा के प्रकार

आवृत्ति पर आधारित ज्वार-भाटा

अर्ध -दैनिक ज्वार: यह सबसे सामान्य ज्वारीय प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक दिन दो उच्च एवं दो निम्न ज्वार आते हैं। दो लगातार उच्च एवं निम्न ज्वार लगभग समान उफँचाई की होती हैं।

दैनिक ज्वार: इसमें प्रतिदिन केवल एक उच्च एवं एक निम्न ज्वार होता है। उच्च एवं निम्न ज्वारों की उँचाई समान होती है।

मिश्रित ज्वार: ऐसे ज्वार-भाटा जिनकी उँचाई में भिन्नता होती है, उसे मिश्रित ज्वार-भाटा कहा जाता है।

सूर्य, चंद्रमा एवं पृथ्वी की स्थिति पर आधारित ज्वारभाटा

1. वृहत् ज्वार

अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिन, जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा तीनों एक सीध में होते हैं , तो दोनों ही सूर्य और चन्द्रमा की संयुक्त आकर्षण शक्ति के कारण  जल का उतार-चढ़ाव साधारण उतार-चढ़ाव की अपेक्षा अधिक होता है। इसे वृहत् ज्वार-भाटा कहते हैं। 

2. निम्न ज्वार: शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की अष्ठमी के दिन जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के केंद्र पर समकोण बनाते हैं तो सूर्य और चंद्रमा दोनों ही पृथ्वी के जल को भिन्न दिशाओं में आकर्षित करते हैं. परिणामस्वरूप जल का उतार-चढ़ाव साधारण उतार-चढ़ाव की अपेक्षा कम होता है। इसे लघु ज्वार-भाटा कहते हैं।

ज्वार-भाटा का महत्व

1. वे पत्तन जो समुद्र तट से दूर नदियों के मुहानें पर स्थित हैं। ज्वार-भाटा इन पत्तनों को समुद्र से जोड़ते हैं। ज्वारीय जल इन नदियों में आकर इनमें निक्षेपित तलछट को साफ कर देता है और डेल्टा के विकास को धीमा कर देता है। जिससे समुद्री जहाज सुरक्षित पत्तन तक पहुँच जाते हैं।

2. ज्वारीय बल का प्रयोग विद्युत उत्पादन के स्रोत के रूप में किया गया है।

3. ज्वार-भाटा नदियों को नौसंचालन के योग्य बनाता है, अवसाद को बहा ले जाता है, डेल्टा निर्माण की प्रक्रिया को धीमा करता है

महासागरीय धारा

महासागरीय धारा एक सुस्पष्ट और निश्चित दिशा में काफी लंबी दूरी तक क्षैतिज रूप से बहने वाली महासागरीय जल की एक राशि हैं। ये नियमित रूप से समुद्र में बहती हैं। महासागरीय धारा महासागरों में नदी प्रवाह के समान है। अधिक गति वाली महासागरीय धाराओं को स्ट्रीम कहते हैं तथा कम गति वाली धाराओं को ड्रिफ्ट कहते हैं। महासागरीय धाराएँ तापमान,प्रचलित पवनों, गंरूत्वाकर्षण बल और कोरियालिस बल से प्रभावित होती हैं।

महासागरीय धाराओं के प्रकार

महासागरीय धाराओं को उनकी गहराई के आधार पर दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

उपरी जलधारा - महासागरीय जल का 10 प्रतिशत भाग सतही या उपरी जलधारा है। यह धाराएँ महासागरों में 400 मी॰ की गहराई तक उपस्थित हैं।

गहरी जलधारा- महासागरीय जल का 90 प्रतिशत भाग गहरी जलधारा के रूप में है। उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में, जहाँ तापमान कम होने के कारण घनत्व अधिक होता है, वहाँ गहरी जलधाराएँ बहती हैं, क्योंकि यहाँ अधिक घनत्व के कारण पानी नीचे की तरफ बैठता है।

महासागरीय धाराओं को तापमान के आधार पर पर भी दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

1.  गर्म जल धारा -वे जल धाराएँ जो विषुवतीय क्षेत्रों से ध्रुवों की ओर बहती हैं तथा जिनका सतही तापमान अधिक होता है, गर्म जल धाराएं कहलाती हैं। गर्म जलधाराएँ गर्म जल को ठंडे जल क्षेत्रों में पहुँचाती हैं

2. ठंडी जल धारा- वे जल धाराएँ जो ध्रुवीय क्षेत्र से विषुवतीय क्षेत्रों की ओर बहती हैं तथा जिनका सतही तापमान कम होता है, ठंडी जल धाराएं कहलाती हैं। ठंडी जलधाराएँ, ठंडा जल, गर्म जल क्षेत्रों में लाती है जब जल का तापमान अधिक होता है तो उसका घनत्व कम होता है। इसलिए विषुवतीय क्षेत्र का कम घनत्व वाला जल ध्रुवों की ओर बहता है और धु्रवीय प्रदेशों का अधिक घनत्व वाला ठंडा जल विषुवतीय क्षेत्रों की ओर बहता है। इस प्रकार से ठंडी जल धाराएँ हमेशा ध्रुवीय क्षेत्रों से विषुवतीय क्षेत्रों की ओर तथा गर्म जल धाराएँ विषुवतीय क्षेत्रों से ध्रुवीय प्रदेशों की ओर बहती है।

महासागरीय धाराओं के प्रभाव

(क) जलवायु पर प्रभाव-महासागरीय धाराएँ तापमान, दाब, वायु एवं वर्षण के वितरण को नज़दीकी से प्रभावित करती हैं, जब ये धाराएँ एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहती हैं तो ये उन क्षेत्रों के तापमान को प्रभावित करती हैं। किसी भी जलराशि के तापमान का प्रभाव उसके ऊपर की वायु पर पड़ता है। इसी कारण विषुवतीय क्षेत्रों से उच्च अक्षांशों वाले ठंडे क्षेत्रों की ओर बहने वाली जलधाराएँ उन क्षेत्रों की वायु के तापमान को बढ़ा देती है। जब ठंडी और गर्म जलधाराएँ आपस में मिलती है तो ये कोहरा उत्पन्न कर देती हैं। ये तूफान आने के लिए भी अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।

(ख) समुद्री जीवन का प्रभाव-जहाँ गर्म और ठंडी जल धाराएँ मिलती हैं, वे विश्व के अत्याधिक महत्वपूर्ण मत्स्य ग्रहण क्षेत्र हैं। धाराओं के रूप में महासागरीय जल के संचरण के कारण समुद्री जीव-जन्तु पूरे महासागर में फैल जाते हैं।

(ग) व्यापार पर प्रभाव-जलधाराओं का व्यापार पर भी प्रभाव पड़ता है। उच्च अक्षांशों में स्थित पत्तनों और बन्दरगाहों में जो गर्म, जल धाराओं के प्रभाव में होते हैं, बर्फ नहीं जमती और वहाँ पूरे वर्ष व्यापारिक गतिविधियाँ चलती रहती हैं।




  1. महासागरीय जल की ऊपर एवं नीचे गति किससे संबंधित है?
    (क) ज्वार (ख) तरंग
    (ग) धाराएँ (घ) ऊपर में से कोई नहीं  (क) 
  2. वृहत ज्वार आने का क्या कारण है?
    (क) सूर्य और चन्द्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरूत्वाकर्षण बल
    (ख) सूर्य और चंद्रमा द्वारा एक दूसरे की विपरीत दिशा से पृथ्वी पर गुरूत्वाकर्षण बल
    (ग) तटरेखा का दंतुरित होना
    (घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं (क) 
  3. पृथ्वी तथा चंद्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?
    (क) अपसौर (ख) उपसौर
    (ग) उपभू (घ) अपभू         (ग) 
  4. पृथ्वी उपसौर की स्थिति कब होती है?
    (क) अक्टूबर (ख) जुलाई
    (ग) सितंबर (घ) जनवरी          (घ)
  5. तरंगें क्या हैं?
    तरंगें वास्तव में ऊर्जा हैं, जल नहीं,  तरंगों में जल-कण छोटे वृत्ताकार रूप में गति करते हैं। वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। 
  6. महासागरीय तरंगें ऊर्जा कहाँ से प्राप्त करती हैं?
    वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती हैं, जिससे तरंगे उत्पन्न होती हैं| वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती है
  7. ज्वार-भाटा क्या है?
    चंद्रमा एवं सूर्य के आकर्षण के कारण दिन में एक बार या दो बार समुद्र तल का नियतकालिक ऊपर उठने या गिरने को क्रमशः ज्वारभाटा कहा जाता है|
  8. ज्वार-भाटा उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?
    चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण तथा कुछ हद तक सूर्य के गुरुत्वाकर्षण द्वारा ज्वार-भाटाओं की उत्पत्ति होती है। दूसरा कारक अपकेंद्रीय बल है जो कि गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करता है। गुरुत्वाकर्षण बल तथा अपकेंद्रीय बल दोनों मिलकर पृथ्वी पर दो महत्त्वपूर्ण ज्वार-भाटाओं को उत्पन्न करने के लिए उतरदायी हैं। 
  9. ज्वार-भाटा नौसंचालन से कैसे संबंधित हैं?
    ज्वार-भाटा नौसंचालन एवं मछुआरों को उनके कार्य में सहयोग प्रदान करता है।
    ज्वार के कारण जलस्तर ऊपर उठ जाने से उथले सागर व नदियों के छिछले मुहाने भी नौकगाम्य हो जाते है नदियों के किनारे वाले पोताश्रय पर एवं ज्वारनदमुख के भीतर, जहाँ प्रवेश द्वार पर छिछले रोधिका होते हैं, जो कि नौकाओं एवं जहाजों को पोताश्रय में प्रवेश करने से रोकते हैं वहाँ पर ज्वार-भाटा से जल की आपूर्ति हो जाने पर नौका संचालन अत्यन्त सरल हो जाता है
  10. जल धाराएँ तापमान को कैसे प्रभावित करती हैं? उत्तर पश्चिम यूरोप के तटीय क्षेत्रों के तापमान को ये किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
    जलधाराएँ किसी प्रदेश की जलवायु एवं विशेषकर तापमान को बहुत प्रभावित करती हैं। गर्म जलधाराएँ जिस क्षेत्र में प्रवाहित  होती हैं उस क्षेत्र के तापमान को बढ़ा देती है और ठण्डी जलधाराएँ उस क्षेत्र के तापमान को कम कर देती हैं। ठंडी जलधाराएँ, ठंडा जल, गर्म जल क्षेत्रों में लाती हैं| ये महाद्वीपों के पशिचमी तट पर बहती हैँ| जिससे वहाँ का तापमान घटा देती है गर्म जलधाराएँ, गर्म जल को ठंडे जल क्षेत्रों में पहुंचाती है और प्राय: महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर बहती है और  वहाँ का तापमान बढ़ा देती है  उत्तर पश्चिम यूरोप में, गर्म धाराएँ मौजूद हैं, जो उत्तरी पश्चिमी यूरोप के तटीय क्षेत्रों के तापमान को बढ़ाती हैं|
  11. जल धाराएँ कैसे उत्पन्न होती हैं?
    महासागरीय धारा एक सुस्पष्ट और निश्चित दिशा में काफी लंबी दूरी तक क्षैतिज रूप् से बहने वाली महासागरीय जल की एक राशि हैं। ये नियमित रूप से समुद्र में बहती हैं। महासागरीय धारा महासागरों में नदी प्रवाह के समान है। 
    महासागरीय जलधाराओं की उत्पत्ति के निम्नलिखित कारण हैं
    1. तापमान की भिन्नता - सागरीय जल के तापमान में क्षैतिज एवं लम्बवत् भिन्नताएँ पाई जाती हैं। जल निम्न तापमान के कारण ठण्डा होकर नीचे बैठ जाता है, जिस कारण विषुवत रेखीय क्षेत्रों से जल ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने लगता है। उत्तरी एवं दक्षिणी विषुवत्रेखीय जलधाराएँ इसी प्रकार की हैं।
    2. लवणता की भिन्नता-महासागरीय जल की लवणता में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। लवणता की भिन्नता से सागरीय जल का घनत्व भी परिवर्तित हो जाता है। उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों से जल कम घनत्व या कम लवणता वाले भागों से विषुवत् रेखा की ओर प्रवाहित होने लगता है। इस प्रकार सागरीय जल में लवणता के घनत्व में भिन्नता के कारण जलधाराओं की उत्पत्ति हो जाती है। हिन्द महासागर के जल को लाल सागर की ओर प्रवाह इसका उत्तम उदाहरण है।
    3. प्रचलित पवनों का प्रभाव-प्रचलित पवनें वर्षेभर नियमित रूप से प्रवाहित होती हैं और ये अपने मार्ग में पड़ने वाली जलराशि को पवन की दिशा के अनुकूल धकेलती हुई चलती हैं जिससे जलराशि प्रवाहित होने लगती है। 
    4. वाष्पीकरण व वर्षा-पृथ्वी तल पर वाष्पीकरण व वर्षा में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। जहाँ वाष्पीकरण अधिक होता है वहाँ सागर तल नीचा हो जाता है; अत: उच्च-तल के क्षेत्रों से सागरीय जल निम्न जल-तल की ओर प्रवाहित होने लगता है जिससे जलधाराओं की उत्पत्ति हो जाती है। ठीक इसी प्रकार अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सागरीय जल-तल में वृद्धि हो जाती है। ऐसे क्षेत्रों से जल निम्न वर्षा तथा निम्न जल-तल वाले भागों की ओर एक धारा के रूप में प्रवाहित होने लगता है।
    5. पृथ्वी की दैनिक गति- पृथ्वी अपने अक्ष पर तीव्र गति से घूमती हुई सूर्य के सम्मुख लगभग 24 घण्टे में एक चक्कर पूरा कर लेती है। पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण सागरीय जल उत्तरी गोलार्द्ध में दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बाईं ओर घूम जाता है। पृथ्वी की घूर्णन गति का प्रभाव जलधाराओं के प्रवाह एवं उनकी गति पर भी पड़ता है।
  1. तरंगदैर्ध्य किसे कहते है ? 
    दो तरंग-श्रृंगों अथवा दो तरंग-गर्तों के बीच की क्षैतिज दूरी को तरंग-दैर्ध्य या तरंग की लम्बाई कहते हैं।
  2. विश्व का सबसे उँचा ज्वारभाटा कहाँ आता है ?
    विश्व का सबसे उँचा ज्वारभाटा कनाडा के नवास्कोशिया में स्थित फण्डी की खाड़ी में आता है।
  3. उपभू किसे कहते है ?
    जब चंद्रमा पृथ्वी सबसे नजदीक होता है तो उस स्थिति को उपभू कहते है 
  4. अपभू किसे कहते है ?
    जब चंद्रमा पृथ्वी से अधिकतम दूरी पर होता है तो इस स्थिति को अपभू कहते है
  5. स्ट्रीम एवं ड्रिफ्ट किसे कहते है 
    अधिक गति वाली महासागरीय धाराओं को स्ट्रीम कहते हैं तथा कम गति वाली धाराओं को ड्रिफ्ट कहते हैं।
  6. अपसौर किसे कहते है ?
    जब पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है, तो इस स्थिति को  अपसौर कहते है प्रतिवर्ष 4 जुलाई को अपसौर की स्थिति होती है
  7. उपसौर किसे कहते है ?
    जब पृथ्वी सूर्य के निकटतम होती है तो इस स्थिति को उपसौर कहते है प्रतिवर्ष 3 जनवरी को उपसौर की स्थिति होती है 
  8. महासागरीय जल की तीन गतियाँ कौन-सी हैं?
    महासागरीय जल की तीन गतियाँ निम्नलिखित हैं
    1. तरंग,
    2. धाराएँ,
    3. ज्वार-भाटा
  9. वृहत् ज्वार किसे कहते है ?
    अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिन, जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा तीनों एक सीध में होते हैं , तो दोनों ही सूर्य और चन्द्रमा की संयुक्त आकर्षण शक्ति के कारण  जल का उतार-चढ़ाव साधारण उतार-चढ़ाव की अपेक्षा अधिक होता है। इसे वृहत् ज्वार-भाटा कहते हैं। 
  10. निम्न ज्वार किसे कहते है ?
    शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की अष्ठमी के दिन जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के केंद्र पर समकोण बनाते हैं तो सूर्य और चंद्रमा दोनों ही पृथ्वी के जल को भिन्न दिशाओं में आकर्षित करते हैं. परिणामस्वरूप जल का उतार-चढ़ाव साधारण उतार-चढ़ाव की अपेक्षा कम होता है। इसे लघु ज्वार-भाटा कहते हैं।
  11. ज्वार-भाटा का महत्व लिखिए 
    1. वे पत्तन जो समुद्र तट से दूर नदियों के मुहानें पर स्थित हैं। ज्वार-भाटा इन पत्तनों को समुद्र से जोड़ते हैं। ज्वारीय जल इन नदियों में आकर इनमें निक्षेपित तलछट को साफ कर देता है और डेल्टा के विकास को धीमा कर देता है। जिससे समुद्री जहाज सुरक्षित पत्तन तक पहुँच जाते हैं।
    2. ज्वारीय बल का प्रयोग विद्युत उत्पादन के स्रोत के रूप में किया गया है।
    3. ज्वार-भाटा नदियों को नौसंचालन के योग्य बनाता है, अवसाद को बहा ले जाता है, डेल्टा निर्माण की प्रक्रिया को धीमा करता है
  12. महासागरीय धाराओं के प्रभाव के प्रभाव लिखिए 
    (क) जलवायु पर प्रभाव- महासागरीय धाराएँ तापमान, दाब, वायु एवं वर्षण के वितरण को नज़दीकी से प्रभावित करती हैं, जब ये धाराएँ एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहती हैं तो ये उन क्षेत्रों के तापमान को प्रभावित करती हैं। किसी भी जलराशि के तापमान का प्रभाव उसके ऊपर की वायु पर पड़ता है। इसी कारण विषुवतीय क्षेत्रों से उच्च अक्षांशों वाले ठंडे क्षेत्रों की ओर बहने वाली जलधाराएँ उन क्षेत्रों की वायु के तापमान को बढ़ा देती है। जब ठंडी और गर्म जलधाराएँ आपस में मिलती है तो ये कोहरा उत्पन्न कर देती हैं। ये तूफान आने के लिए भी अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।
    (ख) समुद्री जीवन का प्रभाव-जहाँ गर्म और ठंडी जल धाराएँ मिलती हैं, वे विश्व के अत्याधिक महत्वपूर्ण मत्स्य ग्रहण क्षेत्र हैं। धाराओं के रूप में महासागरीय जल के संचरण के कारण समुद्री जीव-जन्तु पूरे महासागर में फैल जाते हैं।
    (ग) व्यापार पर प्रभाव-जलधाराओं का व्यापार पर भी प्रभाव पड़ता है। उच्च अक्षांशों में स्थित पत्तनों और बन्दरगाहों में जो गर्म, जल धाराओं के प्रभाव में होते हैं, बर्फ नहीं जमती और वहाँ पूरे वर्ष व्यापारिक गतिविधियाँ चलती रहती हैं।



12. महासागरीय जल

जलीय चक्र
जल एक चक्रीय संसाधन है जिसका उपयोग बार बार किया जा सकता है। जल एक चक्र के रूप में महासागर से धरातल पर और धरातल से महासागर तक पहुँचता है। महासागरों, झीलों, नदियों, स्थल भाग, पौधों आदि से जल से वाष्पीकरण एवं वाष्पोत्सर्जन द्वारा वाष्प में बदलकर बादल के रूप वायुमंडल में पहुंचता है तथा बदलती हुई मौसमी दशाओं में सघनन द्वारा यह जलराशि पुनः वर्षण के रूप में जलमण्डल तथा स्थलमण्डल पर पहुँचती है। है फिर यह वर्षा का पानी नदी तथा नालों के द्वारा समुद्र में चला जाता है और यह पुनः समुद्र का जल जलवाष्प बनकर वर्षा कराता है। इस प्रकार यह क्रियाएँ एक चक्र के रूप में चलती रहती है, इसे जलीय चक्र कहा जाता है।
'जलीय चक्र के निम्नलिखित तीन चरण होते हैं-
1. सर्वप्रथम महासागरय भागों, झीलों तथा नदियों का जल सूर्य को गर्मी से वाष्पीकृत होकर जल-वाष्प में परिवर्तित हो जाता है। इसके अतिरिक्त पादप समुदाय के वाष्पोत्सर्जन से भारी मात्रा में जलवाष्प वायुमण्डल में निष्कासित कौ जाती है। यही जलवाष्प संघनित होकर वायुमण्डलीय भागों में बादलों का निर्माण करती है
2.बादलों की जलवाष्प ठण्डी होकर जल कणों के रूप में संघनित हो जाती है तथा अनुकूल परिस्थितियाँ होने पर वर्षण के विभिन्‍न रूपो-वर्षा, हिम तथा ओले आदि के रूप में जलमण्डल तथा स्थलमण्डल पर प्राप्त होती हैं।
3.स्थलीय भागों पर वर्षण के माध्यम से प्राप्त होने वाला जल निम्नलिखित तीन मार्गों में से किसी एक मार्ग का अनुसरण करता है-
(1) कुछ जल भूमि द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।
(2) कुछ जल वाष्पीकरण तथा वाष्पेत्सर्जन क्रिया द्वार पुन; वायुमण्डल में पहुँचा दिया जाता है।
(3) कुछ जल जलधाराओं के माध्यम से स्थलीय भा से प्रवाहित होता हुआ झीलों, सागरों तथा महासागर में पहुँचा दिया जाता है।
स्थलीय भागों द्वार अवशोषित जल भूमिगत जल के रूप मे संगृहित हो जाता है, साथ ही मिट्टी की ऊपरी परतों में जमा हो कर विभिनन प्रकार की वनस्पतियों की वृद्धि के लिये आवश्यक जल की आपूर्ति करता है।
महासागरीय अधस्तल का उच्चावच
महासागर पृथ्वी की बाहरी परत में वृहत गर्तों में स्थित है। पृथ्वी के महासागरीय भाग को पांच महासागरों में बांटा गया है
प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर, हिंद महासागर, दक्षिणी महासागर एवं आर्कटिक महासागर
महसागरीय जल के भीतर अनेक प्रकार की भूआकृतियाँ छिपी हुई हैं जो कि महाद्वीपों की भू-आकृतियों से काफी मिलती-जुलती हैं। महासागरीय जल के नीचे पर्वत, पठार, पहाड़ियाँ, खाइयाँ और गड्ढे हैं। महासागरीय अधस्तल को चार प्रमुख भागों में बाँटा जासकता है
1. महाद्वीपीय शेल्फ / महाद्वीपीय निमग्न तट
महाद्वीपों के किनारे जो महासागरीय जल में डूबे रहते है महाद्वीपीय निमग्न तट या महाद्वीपीय सीमांत या महाद्वीपीय शेल्फ कहलाता है यह महासागर का सबसे उथला भाग होता है जिसकी औसत प्रवणता 1 डिग्री या उससे भी कम होती है। महाद्वीपीय शेल्फ अत्यंत तीव्र ढाल पर समाप्त होता है जिसे शेल्फ अवकाश कहा जाता है। महाद्वीपीय शेल्फ की चौड़ाई व गहराई एक महासागर से दूसरे महासागर में भिन्न होती है। दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर महाद्वीपीय मग्नतट लगभग अनुपस्थित मिलते हैं। जबकि आकर्टिक महासागर में साइबेरियन शेल्फ विश्व में सबसे बड़ा महाद्वीपीय शेल्फ है महाद्वीपीय शेल्फ पर लंबे समय तक प्राप्त स्थूल तलछटी अवसाद जीवाश्मी ईंधनों के स्रोत बनते हैं।
2. महाद्वीपीय ढाल
महाद्वीपीय मग्नतट तथा गहरे सागरीय मैदान के मध्य तीव्र ढाल वाले क्षेत्र को महाद्वीपीय मग्नढाल कहते हैं। इसकी शुरुआत वहाँ होती है, जहाँ महाद्वीपीय शेल्फ की तली तीव्र ढाल में परिवर्तित होती है। इस भाग की औसत ढाल 2 से 5 डिग्री के बीच होती है। ढाल वाले प्रदेश की गहराई 200 मीटर एवं 3,000 मीटर के बीच होती है। ढाल का किनारा महाद्वीपों के समाप्ति को इंगित करता है। इसी प्रदेश में कैनियन एवं खाइयाँ दिखाई देते हैं।
3. गहरे सागरीय मैदान
गहरे सागरीय मैदान महासागरीय नितल के मंद ढाल वाले क्षेत्र होते हैं। ये विश्व के सबसे चिकने तथा सबसे सपाट भाग हैं। इनकी गहराई 3,000 से 6,000 मीटर केबीच होती है। ये मैदान महीन कणों वाले अवसादों जैसे मृत्तिका एवं गाद से ढके होते हैं।
4. महासागरीय गर्त
महासागरीय गर्त महासागरों के सबसे गहरे भाग होते महासागरीय अधस्तल पर लम्बी, तीव्र ढाल वाली, संकरी और चौरस तल की खाइयाँ होती हैं। इन्हें महासागरीय गर्त कहते है अपने चारों ओर की महासागरीय तली की अपेक्षा ये 3 से 5 किमी॰ तक गहरे होते हैं।
महासागरीय गर्त हमेशा महासागरों के बेसिनों के मध्य में नहीं होते है जैसा कि सामान्यतः विश्वास किया जाता है बल्कि ये महाद्वीपीय ढाल के आधार तथा द्वीपीय चापों के पास स्थित होते हैं ये गर्त प्रायः ज्वालामुखी और भूकम्पीय हलचल वाले क्षेत्रों के निकट पाए जाते हैं। ये गर्त सभी प्रमुख महासागरों में पाए जाते हैं। प्रशान्त महासागर में इनकी संख्या सबसे अधिक है। प्रशान्त महासागर में स्थित मेरियाना गर्त विश्व में ज्ञात गर्तों में सबसे गहरा है। अभी तक लगभग 57 गर्तों को खोजा गया है, जिनमें से 32 प्रशांतमहासागर में, 19 अटलांटिक महासागर में एवं 6 हिंदमहासागर में हैं।
उच्चावच की लघु आकृतियाँ
1. मध्य-महासागरीय कटक
एक मध्य-महासागरीय कटक पर्वतों की दो शृंखलाओं से बना होता है, जो एक विशाल अवनमन द्वारा अलग किए गए होते हैं। इन पर्वत शृंखलाओं के शिखर की ऊँचाई 2,500 मीटर तक हो सकती है
2. समुद्री टीला
यह नुकीले शिखरों वाला एक पर्वत है, जो समुद्री तली से ऊपर की ओर उठता है, किंतु महासागरों के सतह तक नहीं पहुँच पाता। समुद्री टीले ज्वालामुखी के द्वारा उत्पन्न होते हैं। ये 3,000 से 4,500 मीटर ऊँचे हो सकते हैं। एम्पेरर समुद्री टीला, जो प्रशांत महासागर में हवाई द्वीप समूहों का विस्तार है इसका एक अच्छा उदाहरण है।
3. सबसे सपाट जलमग्न
कैनियन ये गहरी घाटियाँ होती हैं। कई बार ये बड़ी नदियों के मुहाने से आगे की ओर विस्तृत होकर महाद्वीपीय शेल्फ व ढालों को आर-पार काटती नजर आती है। हडसन कैनियन विश्व का सबसे अधिक जाना माना कैनियन है।
4. निमग्न द्वीप
यह चपटे शिखर वाले समुद्री टीले है। अकेले प्रशांत महासागर में अनुमानतः 10,000 से अधिक समुद्री टीले एवं निमग्न द्वीप उपस्थित हैं।
5. प्रवाल द्वीप
ये उष्ण कटिबंधीय महासागरों में पाए जाने वाले प्रवाल भित्तियों से युक्त निम्न आकार के द्वीप हैं जो कि गहरे अवनमन को चारों ओर से घेरे हुए होते हैं।
महासागरीय जल का तापमान
महासागरीय जल भूमि की तरह सौर ऊर्जा के द्वारा गर्म होते हैं। स्थल की तुलना में जल के तापन व शीतलन की प्रक्रिया धीमी होती है।
तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारक
महासागरीय जल के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारक हैं-
1.अक्षांश - साधारण तौर पर महासागरों के जल का तापमान भूमध्य रेखा से ध्रुवों की तरफ जाने पर घटता जाता है । सूय की किरणे भूमध्य रेखा व आस-पास के क्षेत्रों में सीधी पड़ती है ध्रुवों की तरफ जाने पर किरणों के तिरछेपन एव दूरी दोनो में वृद्धि होती जाती है जिससे महासागरों के सतही जल का तापमान विषुवत् वृत्त से ध्रुवों की ओर घटता चला जाता है
2. स्थल एवं जल का असमान वितरण – उत्तरी गोलार्ध के महासागर दक्षिणी गोलार्ध के महासागरों की अपेक्षा स्थल के बहुत बड़े भाग से जुड़े होने के कारण अधिक मात्रा में ऊष्मा प्राप्त करते हैं। इस कारण उत्तरी गोलार्ध के महासागरों का तापमान दक्षिणी गोलार्ध के महासागरों की अपेक्षा अधिक होता है
3. प्रचलित पवनें -
पवनो की दिशा का महासागरीय सतह के जल के तापमान पर प्रभाव पड़ता है । स्थल से महासागरों की तरफ बहने वाली पवनें अपने साथ तटीय क्षेत्रों के गर्म जल को सागरीय क्षेत्रों की ओर बहाकर ले जाती है। तटीय जल की क्षतिपूर्ति हेतु नीचे का ठंडा जल ऊपर की ओर आ जाता है। जिससे तटीय क्षेत्रों का तापमान कम हो जाता है इसके विपरीत जब पवने सागर से तट की ओर चलती है तो पवनें गर्म जल को तट पर जमा कर देती हैं और इससे तटीय जल का तापमान बढ़ जाता है
4. महासागरीय धाराएँ - गर्म महासागरीय धाराएँ ठंडे क्षेत्रों में तापमान को बढ़ा देती हैं, जबकि ठंडी धाराएँ गर्म महासागरीय क्षेत्रों में तापमान को घटा देती हैं। गल्पफ स्ट्रीम (गर्म धारा) उत्तरी अमरीका के पूर्वी तट तथा यूरोप के पश्चिमी तट के तापमान को बढ़ा देती है, जबकि लेब्रेडोरधरा (ठंडी धारा) उत्तरी अमरीका के उत्तर-पूर्वीतट के नशदीक के तापमान को कम कर देती हैं।
तापमान का उर्ध्वाधर वितरण
महासागरीय जल की सतह पर सर्वाधिक तापमान पाया जाता है सतह से नीचे गहराई में जाने पर तापमान घटता जाता है समुद्र में नीचे जाने पर ताप की तीन परतें पाई जाती है
1. पहली परत गर्म महासागरीय जल की सबसे ऊपरी परत होती है जो लगभग 500 मीटर मोटी होती है और इसका तापमान 20 डिग्री सेंटीग्रेड से 25 डिग्री सेंटीग्रेड के मध्य होता है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में, यह परत पूरे वर्ष उपस्थित होती है, जबकि मध्य अक्षांशों में यह केवल ग्रीष्म ऋतु में विकसित होती है।
2. दूसरी परत जिसे ताप प्रवणता (थर्मोक्लाईन) परत कहा जाता है, पहली परत के नीचे स्थित होती है। इसमें गहराई बढ़ने के साथ ही तापमान में तेज गिरावट आती जाती है। यहाँ ताप प्रवणता की मोटाई 500 से 1000 मीटर तक होती है।
3. तीसरी परत बहुत ज़्यादा ठंडी होती है और गभीर महासागरीय तली तक विस्तृत होती है।
महासागरों का उच्चतम तापमान सदैव उनकी ऊपरी सतहों पर होता है, क्योंकि वे सूर्य की ऊष्मा को प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त करते हैं और यह ऊष्मा महासागरों के निचले भागों में संवहन की प्रक्रिया द्वारा स्थान्तरित होती है। परिणामस्वरूप गहराई के साथ-साथ तापमान में कमी आने लगती है
तापमान का क्षैतिज वितरण
महासागरों की सतह के जल का औसत तापमान लगभग 27 डिग्री से॰ होता है, और यह विषवत् वृत्त से ध्रुवों की ओर क्रमिक ढंग से कम होता जाता है। बढ़ते हुए अक्षांशों के साथ तापमान के घटने की दर सामान्यतः प्रति अक्षांश 0.5 डिग्री से॰ होती है। औसत तापमान 20 डिग्री अक्षांश पर लगभग 22 डिग्री से॰, 40 डिग्री अक्षांश पर 14 डिग्री से॰ तथा ध्रुवों के नजदीक 0 डिग्री से॰ होता है। उत्तरी गोलार्ध के महासागरों का तापमान दक्षिणी गोलार्ध की अपेक्षा अधिक होता है। उच्चतम तापमान विषवत् वृत्त पर नहीं बल्कि, इससे कुछ उत्तर की तरफ दर्ज किया जाता है। उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्ध का औसत वार्षिक तापमान क्रमशः 19 डिग्री से॰ तथा 16 डिग्री से॰ के आस-पास होता है। यह भिन्नता उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्धों में स्थल एवं जल के असमान वितरण के कारण होती है।
महासागरीय जल की लवणता
समुद्री जल में घुले हुए नमक की मात्रा को लवणता कहा जाता है। इसका परिकलन 1,000 ग्राम॰ (एक किलोग्राम) समुद्री जल में घुले हुए नमक (ग्राम में) की मात्रा के द्वारा किया जाता है। इसे प्रायः प्रति 1,000 भाग या PPT (%0) के रूप में व्यक्त किया जाता है। अर्थात 1000 ग्राम (एक किलोग्राम) समुद्री जल में घुले हुए नमक (ग्राम में) की मात्रा को लवणता कहते है 24.7 %0 की लवणता को खारे जल को सीमांकित करने का उच्च सीमा माना गया है।
महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारक
1. वाष्पीकरण की दर
2. नदियों व हिमखंडो के द्वारा लाए गए ताजे जल की आपूर्ति
3. पवन द्वारा समुद्री जल का स्थानान्तरण
उच्चतम लवणता वाले क्षेत्र
1. मृत सागर में 238%0
2. टर्की की वॉन झील 330%0
3. ग्रेट साल्ट झील 220%0
लवणता का क्षैतिज वितरण
✜सामान्य खुले महासागर की लवणता 33%0 से 37%0 के बीच होती है। चारों तरफ स्थल से घिरे लाल सागर में यह 41%0 तक होती हैं, जबकि आर्कटिक एवं ज्वार नद मुख में मौसम के अनुसार लवणता 0%0 से 35%0 के बीच पाई जाती है। गर्म तथा शुष्क क्षेत्रों में, जहाँ वाष्पीकरण उच्च होता है कभी-कभी वहाँ की लवणता 70%0 तक पहुँच जाती है।
प्रशांत महासागर के लवणता में भिन्नता मुख्यतः इसके आकार एवं बहुत अधिक क्षेत्रीय विस्तार के कारण है। उत्तरी गोलार्ध के पश्चिमी भागों में लवणता 35%0 से कम होकर 31 हो जाती है, क्योंकि आर्कटिक क्षेत्र का पिघला हुआ जल वहाँ पहुँचता है।
अटलांटिक महासागर की औसत लवणता 36%0 के लगभग है।
उच्च अक्षांश में स्थित होने के बावजूद उत्तरी सागर में उत्तरी अटलांटिक प्रवाह के द्वारा लाए गए अधिक लवणीय जल के कारण अधिक लवणता पाई जाती है।
बाल्टिक समुद्र की लवणता कम होती है, क्योंकि इसमें बहुत अधिक मात्रा में नदियों का पानी प्रवेश करता है।
भूमध्यसागर की लवणता उच्च वाष्पीकरण के कारण अधिक होती है।
काले सागर की लवणता नदियों के द्वारा अधिक मात्रा में लाए जाने वाले ताजे जल के कारण कम होती है।
हिंद महासागर की औसत लवणता 35%0 है। बंगाल की खाड़ी में गंगा नदी के जल के मिलने से लवणता की प्रवृत्ति कम पाई जाती है। इसके विपरीत, अरब सागर की लवणता उच्च वाष्पीकरण एवं ताजे जल की कम प्राप्ति के कारण अधिक
लवणता का उर्ध्वाधर वितरण
गहराई के साथ लवणता में परिवर्तन आता है, लेकिन इसमें परिवर्तन समुद्र की स्थिति पर निर्भर करता है। सतह की लवणता जल के बर्फ या वाष्प के रूप में परिवर्तित हो जाने के कारण बढ़ जाती है या ताजे जल के मिल जाने से घटती है, जैसा कि नदियों के द्वारा होता है। गहराई में लवणता लगभग नियत होती है, क्योंकि वहाँ किसी प्रकार से पानी का ‘”ह्रास’ या नमक की मात्रा में ‘वृद्धि’ नहीं होती। महासागरों के सतही क्षेत्रों एवं गहरे क्षेत्रों के बीच लवणता में अंतर स्पष्ट होता है। कम लवणता वाला जल उच्च लवणता व घनत्व वाले जल के उफपर स्थित होता है। लवणता साधारणतः गहराई के साथ बढ़ती है तथा एक स्पष्ट क्षेत्र, जिसे हैलोक्लाईन कहा जाता है, में यह तीव्रता से बढ़ती है।

  1. उस तत्व की पहचान करें जो जलीय चक्र का भाग नहीं हैं।
    (क) वाष्पीकरण                       (ख) वर्षण
    (ग) जलयोजन                         (घ) संघनन                       (ग)
  2. महाद्वीपीय ढाल की औसत गहराई निम्नलिखित के बीच होती है।
    (क) 2-20 मीटर                     (ख) 20-200 मीटर
    (ग) 200-2000 मीटर             (घ) 2000-20000 मीटर     (ग) 
  3. निम्नलिखित में से कौन-सी लघु उच्चावच आकृति महासागरों में नहीं पाई जाती है?
    (क) समुद्री टीला                    (ख) महासागरीय गभीर
    (ग) प्रवाल द्वीप                      (घ) निमग्न द्वीप                    (ख) 
  4.  लवणता को प्रति समुद्री जल में घुले हुए नमक (ग्राम) की मात्र से व्यक्त किया जाता है-
    (क) 10 ग्राम                        (ख) 100 ग्राम
    (ग) 1,000 ग्राम                   (घ) 10,000 ग्राम                 (ग) 
  5. निम्न में से कौन-सा सबसे छोटा महासागर है?
    (क) हिंद महासागर             (ख) अटलांटिक महासागर
    (ग) आर्कटिक महासागर     (घ) प्रशांत महासागर                 (ग)
  6. हम पृथ्वी को नीला ग्रह क्यों कहते हैं?
    पृथ्वी के 71% भाग पर जल पाया जाता है अर्थात पृथ्वी का अधिकांश भाग जल से ढका हुआ है जल की प्रचुर मात्रा के कारण पृथ्वी को ऊपर से देखने पर यह एक नीले रंग के पिंड के समान दिखाई देती है  इसलिए पृथ्वी को 'नीला ग्रह' कहा जाता है।
  7. महाद्वीपीय सीमांत क्या होता है?
    महाद्वीपों के किनारे जो महासागरीय जल में डूबे रहते है महाद्वीपीय निमग्न तट या महाद्वीपीय सीमांत या महाद्वीपीय शेल्फ कहलाता है यह  महासागर का सबसे उथला भाग होता है जिसकी औसत प्रवणता 1 डिग्री या उससे भी कम होती है।
  8. विभिन्न महासागरों के सबसे गहरे गर्तों की सूची बनाइए।
    1. मैरियाना गर्त          प्रशांत महासागर
    2. प्यूर्टोरिका गर्त  अटलांटिक महासागर       
    3. सुण्डा गर्त          हिन्द महासागर
    4. यूरेशियन गर्त          आर्कटिक महासागर
  9. ताप प्रवणता क्या है?
    महासागर में वह सीमा क्षेत्र जहाँ तापमान में तीव्र गिरावट आती है, ताप प्रवणता (थर्मोक्लाईन) कहा जाता है।
  10. समुद्र में नीचे जाने पर आप ताप की किन परतों का सामना करेंगे ? गहराई के साथ तापमान में भिन्नता क्यों आती है?
    समुद्र में नीचे जाने पर ताप की तीन परतों का सामना कारण पड़ता है 
    1. पहली परत गर्म महासागरीय जल की सबसे ऊपरी परत होती है जो लगभग 500 मीटर मोटी होती है और इसका तापमान 20 डिग्री सेंटीग्रेड से 25 डिग्री सेंटीग्रेड के मध्य होता है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में, यह परत पूरे वर्ष उपस्थित होती है, जबकि मध्य अक्षांशों में यह केवल ग्रीष्म ऋतु में विकसित होती है।
    2. दूसरी परत जिसे ताप प्रवणता परत कहा जाता है, पहली परत के नीचे स्थित होती है। इसमें गहराई बढ़ने के साथ ही तापमान में तेज गिरावट आती जाती है। यहाँ ताप प्रवणता की मोटाई 500 से 1000 मीटर तक होती है।
    3. तीसरी परत बहुत ज़्यादा ठंडी होती है और गभीर महासागरीय तली तक विस्तृत होती है। 
    महासागरों का उच्चतम तापमान सदैव उनकी ऊपरी सतहों पर होता है, क्योंकि वे सूर्य की ऊष्मा को प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त करते हैं और यह ऊष्मा महासागरों के निचले भागों में संवहन की प्रक्रिया द्वारा स्थान्तरित होती है। परिणामस्वरूप गहराई के साथ-साथ तापमान में कमी आने लगती है
  11. समुद्री जल की लवणता क्या है?
    1000 ग्राम समुद्री जल में घुले हुए लवणों की ग्रामो में मात्रा लवणता कहलाती है। इसे प्रायः प्रति 1000 भाग (%०) या PPT के रूप में व्यक्त किया जाता है।
  12. जलीय चक्र के विभिन्न तत्व किस प्रकार अंतर-संबंधित हैं?
    जल एक चक्रीय संसाधन है जिसका उपयोग बार बार किया जा सकता है। जल एक चक्र के रूप में महासागर से धरातल पर और धरातल से महासागर तक पहुँचता है। महासागरों, झीलों, नदियों, स्थल भाग, पौधों आदि से जल से वाष्पीकरण एवं वाष्पोत्सर्जन द्वारा वाष्प में बदलकर बादल के रूप वायुमंडल में पहुंचता है तथा बदलती हुई मौसमी दशाओं में सघनन द्वारा यह जलराशि पुनः वर्षण के रूप में जलमण्डल तथा स्थलमण्डल पर पहुँचती है। है फिर यह वर्षा का पानी नदी तथा नालों के द्वारा समुद्र में चला जाता है और यह पुनः समुद्र का जल जलवाष्प बनकर वर्षा कराता है। इस प्रकार यह क्रियाएँ एक चक्र के रूप में चलती रहती है, इसे जलीय चक्र कहा जाता है।
    'जलीय चक्र के निम्नलिखित तीन चरण होते हैं-
    1. सर्वप्रधम महासागरय भागों, झीलों तथा नदियों का जल सूर्य को गर्मी से वाष्पीकृत होकर जल-वाष्प में परिवर्तित हो जाता है। इसके अतिरिक्त पादप समुदाय के वाष्पोत्सर्जन से भारी मात्रा में जलवाष्प वायुमण्डल में निष्कासित कौ जाती है। यही जलवाष्प संघनित होकर वायुमण्डलीय भागों में बादलों का निर्माण करती है
    2.बादलों की जलवाष्प ठण्डी होकर जल कणों के रूप में संघनित हो जाती है तथा अनुकूल परिस्थितियाँ होने पर वर्षण के विभिन्‍न रूपो-वर्षा, हिम तथा ओले आदि के रूप में जलमण्डल तथा स्थलमण्डल पर प्राप्त होती हैं। 
    3.स्थलीय भागों पर वर्षण के माध्यम से प्राप्त होने वाला जल निम्नलिखित तीन मार्गों में से किसी एक मार्ग का अनुसरण करता है-
    कुछ जल भूमि द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।
    कुछ जल वाष्पीकरण तथा वाष्पेत्सर्जन क्रिया द्वार पुन; वायुमण्डल में पहुँचा दिया जाता है।
    कुछ जल जलधाराओं के माध्यम से स्थलीय भा से प्रवाहित होता हुआ झीलों, सागरों तथा महासागर में पहुँचा दिया जाता है।
    स्थलीय भागों द्वार अवशोषित जल भूमिगत जल के रूप मे संगृहित हो जाता है, साथ ही मिट्टी की ऊपरी परतों में जमा हो कर विभिनन प्रकार की वनस्पतियों की वृद्धि के लिये आवश्यक जल की आपूर्ति करता है।
  13. महासागरों के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों का परीक्षण कीजिए।
    महासागरीय जल के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारक हैं-
    1.अक्षांश - ध्रुवों की ओर प्रवेशी सौर्य विकिरण की मात्रा घटने के कारण महासागरों के सतही जल का तापमान विषुवत् वृत्त से ध्रुवों की ओर घटता चला जाता है।
    2. स्थल एवं जल का असमान वितरण – उत्तरी गोलार्ध के महासागर दक्षिणी गोलार्ध के महासागरों की अपेक्षा स्थल के बहुत बड़े भाग से जुड़े होने के कारण अधिक मात्रा में ऊष्मा प्राप्त करते हैं।
    3. सनातन पवनें - स्थल से महासागरों की तरफ बहने वाली पवनें महासागरों के सतही गर्म जल को तट से दूर धकेल देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप नीचे का ठंडा जल ऊपर की ओर आ जाता है। परिणामस्वरूप, तापमान में देशांतरीय अंतर आता है। इसके विपरीत, अभितटीय पवनें गर्म जल को तट पर जमा कर देती हैं और इससे तापमान बढ़ जाता है,
    4. महासागरीय धाराएँ - गर्म महासागरीय धाराएँ ठंडे क्षेत्रों में तापमान को बढ़ा देती हैं, जबकि ठंडी धाराएँ गर्म महासागरीय क्षेत्रों में तापमान को घटा देती हैं। गल्फ स्ट्रीम (गर्म धारा) उत्तर अमरीका के पूर्वी तट तथा यूरोप के पश्चिमीतट के तापमान को बढ़ा देती है, जबकि लेब्रेडोरधरा (ठंडी धारा) उत्तरी अमरीका के उत्तर-पूर्वीतट के नजदीक के तापमान को कम कर देती हैं।

  1. विश का सबसे बड़ा महाद्वीपीय शेल्फ कौन-सा है 
    आकर्टिक महासागर में साइबेरियन शेल्फ विश्व में सबसे बड़ा महाद्वीपीय शेल्फ है
  2. महासागर का सबसे उथला भाग कौन -सा  होता है 
    महाद्वीपीय शेल्फ / महाद्वीपीय निमग्न तट
  3. विश्व के किस भाग में महाद्वीपीय मग्नतट की अनुपस्थिति मिलती है?
    विश्व में दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर महाद्वीपीय मग्नतट लगभग अनुपस्थित मिलते हैं।
  4. विश्व का सबसे  गहरा गर्त कौन-सा है?
    विश्व का सबसे  गहरा गर्त मैरियाना गर्त (11,035 मीटर) है जो प्रशान्त महासागर में स्थित है। 
  5. विश्व के सर्वाधिक लवणता किस सागर की है 
    मृत सागर 
  6. खुले महासागर की लवणता कितनी  होती है।
     सामान्य खुले महासागर की लवणता 33%0 से 37%0 के बीच होती है।
  7. महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारको के नाम लिखिए 
    1. वाष्पीकरण की दर
    2. नदियों व हिमखंडो के द्वारा लाए गए ताजे जल की आपूर्ति
    3. पवन द्वारा समुद्री जल का स्थानान्तरण
  8.   विश्व के उच्चतम लवणता वाले क्षेत्रों के नाम लिखिए 
    1. मृत सागर में 238%0
    2. टर्की की वॉन झील 330%0
    3. ग्रेट साल्ट झील 220%0
  9. समुद्री टीले क्या होते है 
    यह नुकीले शिखरों वाला एक पर्वत है, जो समुद्री तली से ऊपर की ओर उठता है, किंतु महासागरों के सतह तक नहीं पहुँच पाता। समुद्री टीले ज्वालामुखी के द्वारा उत्पन्न होते हैं। ये 3,000 से 4,500 मीटर ऊँचे हो सकते हैं। एम्पेरर समुद्री टीला, जो प्रशांत महासागर में हवाई द्वीप समूहों का विस्तार है इसका एक अच्छा उदाहरण है।
  10. महाद्वीपीय  शेल्फ / मग्नतट का क्या अर्थ है? इनकी मुख्य विशेषताएँ बतलाइए।
    महाद्वीपों के किनारे जो महासागरीय जल में डूबे रहते है महाद्वीपीय निमग्न तट या महाद्वीपीय सीमांत या महाद्वीपीय शेल्फ कहलाता है 
    1. यह महासागर का सबसे उथला भाग होता है 
    2.इसकी औसत ढाल  1 डिग्री या उससे भी कम होती है। 
    3. महाद्वीपीय शेल्फ अत्यंत तीव्र ढाल पर समाप्त होता है जिसे शेल्फ अवकाश कहा जाता है। 
    4. महाद्वीपीय शेल्फ की चौड़ाई व गहराई एक महासागर से दूसरे महासागर में भिन्न होती है। दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर महाद्वीपीय मग्नतट लगभग अनुपस्थित मिलते हैं। जबकि आकर्टिक महासागर में साइबेरियन शेल्फ विश्व में सबसे बड़ा महाद्वीपीय शेल्फ है 
    5.महाद्वीपीय शेल्फ पर लंबे समय तक प्राप्त स्थूल तलछटी अवसाद जीवाश्मी ईंधनों के स्रोत बनते हैं।