GSSS BINCHAWA

GSSS BINCHAWA

GSSS KATHOUTI

GSSS KATHOUTI

GSSS BUROD

समकालीन भारत -2 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समकालीन भारत -2 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

7.राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ

परिवहन- यात्रियों व सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने व ले जाने की प्रकिया परिवहन कहलाती है
परिवहन और संचार दो ऐसे क्षेत्र हैं जो एक देश की जीवन रेखाओं को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये साधन लोगों को एक दूसरे के साथ संवाद करने, साथ में रहने, और व्यापारिक गतिविधियों में भाग लेने की सुविधा प्रदान करते हैं।
वस्तुओं तथा सेवाओं के आपूर्ति स्थानों से माँग स्थानों तक ले जाने हेतु परिवहन की आवश्यकता होती है।
जो व्यक्ति उत्पाद को परिवहन द्वारा उपभोक्ताओं तक पहुँचाते हैं उन्हें व्यापारी कहा जाता है।
पहले व्यापार तथा परिवहन सुविधा एक सीमित क्षेत्र तक ही किया जाता था। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के विकास के साथ व्यापार व परिवहन के प्रभाव क्षेत्र में विस्तृत वृद्धि हुई है। सक्षम व तीव्र गति वाले परिवहन से आज संसार एक बड़े गाँव में परिवर्तित हो गया है। परिवहन का यह विकास संचार साधनों के विकास की सहायता से ही संभव हो सका है। इसीलिए परिवहन,संचार व व्यापार एक दूसरे के पूरक हैं।
मानव विभिन्न वस्तुओं और पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए भिन्न विधियों (विधाओं) का प्रयोग करता है। परिवहन की निम्लिखित विधाएं है
1. स्थल परिवहन 2. जल परिवहन 3. वायु परिवहन
स्थल परिवहन
भारत विश्व का दूसरा सर्वाधिक सड़क जाल वाला देश है भारत में सड़क परिवहन, रेल परिवहन से अधिक सुविधाजनक है। रेल परिवहन की अपेक्षा सड़क परिवहन की बढ़ती महत्ता निम्न कारणों से है
रेलवे लाइन की अपेक्षा सड़कों की निर्माण लागत बहुत कम है।
अपेक्षाकृत उबड़-खाबड़ व विच्छिन्न भू-भागों पर सड़कें बनाई जा सकती हैं।
अधिक ढाल प्रवणता तथा पहाड़ी क्षेत्रों में भी सड़कें निर्मित की जा सकती हैं।
अपेक्षाकृत कम व्यक्तियों, कम दूरी व कम वस्तुओं के परिवहन में सड़क मितव्ययी है।
यह घर-घर सेवाएँ उपलब्ध करवाता है तथा सामान चढ़ाने व उतारने की लागत भी अपेक्षाकृत कम है।
सड़क परिवहन, अन्य परिवहन साधनों के उपयोग में एक कड़ी के रूप में कार्य करता है, जैसे सड़कें, रेलवे स्टेशन, वायु व समुद्री पत्तनों को जोड़ती हैं।
भारत में सड़कों की सक्षमता के आधार पर इन्हें निम्न छः वर्गों में वर्गीकृत किया गया है।
स्वर्णिम चतुर्भुज महा राजमार्ग - भारत सरकार ने दिल्ली-कोलकत्ता, चेन्नई-मुंबई व दिल्ली को जोड़ने वाली 6 लेन वाली महा राजमार्गों की सड़क परियोजना प्रारंभ की है। इस परियोजना के तहत दो गलियारे प्रस्तावित हैं प्रथम उत्तर-दक्षिण गलियारा जो श्रीनगर को कन्याकुमारी से जोड़ता है तथा द्वितीय जो पूर्व-पश्चिम गलियारा जो सिलचर (असम) तथा पोरबंदर (गुजरात) को जोड़ता है। इस महा राजमार्ग का प्रमुख उद्देश्य भारत के मेगासिटी के मध्य की दूरी व परिवहन समय को न्यूनतम करना है। यह राजमार्ग परियोजना - भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में है
राष्ट्रीय राजमार्ग - राष्ट्रीय राजमार्ग देश के दूरस्थ भागों को जोड़ते हैं। ये प्राथमिक सड़क तंत्र हैं।
राज्य राजमार्ग - राज्यों की राजधानियों को जिला मुख्यालयों से जोड़ने वाली सड़कें राज्य राजमार्ग कहलाती हैं।
जिला मार्ग - ये सड़कें जिले के विभिन्न प्रशासनिक केंद्रों को जिला मुख्यालय से जोड़ती हैं।
अन्य सड़कें -इस वर्ग के अंतर्गत वे सड़कें आती हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों तथा गाँवों को शहरों से जोड़ती हैं।
‘प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क परियोजना’ के तहत इन सड़कों के विकास को विशेष प्रोत्साहन मिला है। इस
परियोजना में देश के प्रत्येक गाँव को प्रमुख शहरों से पक्की सड़कों द्वारा जोड़ना प्रस्तावित है।
सीमांत सड़कें - भारत सरकार प्राधिकरण के अधीन सीमा सड़क संगठन है जो देश के सीमांत क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण व उनकी देख-रेख करता है। यह संगठन 1960 में बनाया गया जिसका कार्य उत्तर तथा उतरी-पूर्वी क्षेत्रों में सामरिक महत्त्व की सड़कों का विकास करना था।
अटल टनल - विश्व की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग- अटल टनल (9.02 किलोमीटर) सीमा सड़क संगठन द्वारा बनाई गयी है। यह सुरंग पूरे साल मनाली को लाहौल-स्पीति घाटी से जोड़ती है।
रेल परिवहन
भारत में रेल परिवहन, वस्तुओं तथा यात्रियों के परिवहन का प्रमुख साधन है। रेल परिवहन अनेक कार्यों में सहायक है जैसे - व्यापार, भ्रमण, तीर्थ यात्रएँ व लंबी दूरी तक सामान का परिवहन आदि। भारतीय रेलवे देश की अर्थव्यवस्था, उद्योगों व कृषि के तीव्र गति से विकास के लिए उत्तरदायी है।
भारतीय रेल परिवहन देश का सर्वाधिक बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का प्राधिकरण है। देश की पहली रेलगाड़ी 1853 में मुंबई और  थाणे के मध्य चलाई गई जो 34 किमी. की दूरी तय करती थी। भारतीय रेल परिवहन को 17 रेल प्रखंडों में पुनःसंकलित किया गया है।
देश में रेल परिवहन के वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों में भू-आकृतिक, आर्थिक व प्रशासकीय कारक प्रमुख हैं। 
उत्तरी मैदान अपनी विस्तृत समतल भूमि, सघन जनसंख्या घनत्व, संपन्न कृषि व प्रचुर संसाधनों के कारण रेल परिवहन के विकास व वृद्धि में सहायक रहा है, यद्यपि असंख्य नदियों के विस्तृत जल मार्गों पर पुलों के निर्माण में कुछ बाधाएँ आई हैं। 
प्रायद्वीप भारत में, रेलमार्ग उबड़-खाबड़ पहाड़ी क्षेत्रों, छोटी पहाड़ियों और सुरंगों आदि से होकर गुजरते हैं। हिमालय पर्वतीय क्षेत्र भी दुर्लभ उच्चावच, विरल जनसंख्या तथा आर्थिक अवसरों की कमी के कारण रेलवे लाइन के निर्माण में प्रतिकुल परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है। 
पश्चिमी राजस्थान, गुजरात के दलदली भाग, मध्यप्रदेश के वन-क्षेत्र, छत्तीसगढ़, ओडिशा व झारखंड में रेल लाइन निर्माण करना कठिन है। 
सह्याद्रि तथा उससे सन्निध क्षेत्र को भी घाट या दर्रों के द्वारा ही पार कर पाना संभव है। कुछ वर्ष पहले भारत के महत्त्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्र में पश्चिमी तट के साथ कोंकण रेलवे के विकास ने यात्री व वस्तुओं के आवागमन को सुविधाजनक बनाया है। 
रेल परिवहन की समस्याए
भूस्खलन तथा किसी-किसी भाग में रेलवे ट्रैक का धँसना 
बहुत से यात्री बिना टिकट यात्र करते हैं।
रेल संपत्ति की हानि तथा चोरी जैसी समस्याएँ भी पूर्णतया समाप्त नहीं हुई हैं।
जंजीर खींच कर यात्री कहीं भी अनावश्यक रूप से गाड़ीरोकते हैं, जिससे रेलवे को भारी हानि उठानी पड़ती है।
पाइपलाइन
पाइपलाइन एक नया परिवहन का साधन है। पाइपलाइन का उपयोग कच्चा तेल, पेट्रोल उत्पाद तथा तेल से प्राप्त प्राकृतिक गैस गैस शोधनशालाओं, उर्वरक कारखानों व बड़े ताप विद्युत गृहों तक पहुँचाने में किया जाता है। ठोस पदार्थों को तरल अवस्था में परिवर्तित कर पाइपलाइनों द्वारा ले जाया जाता है। सुदूर आंतरिक भागों में स्थित शोधनशालाएँ जैसे बरौनी, मथुरा, पानीपत तथा गैस पर आधारित उर्वरक कारखानों की स्थापना पाइपलाइनों के जाल के कारण ही संभव हो पाई है। पाइपलाइन बिछाने की प्रारंभिक लागत अधिक है लेकिन इसको चलाने की लागत न्यूनतम है। वाहनांतरण देरी तथा हानियाँ इसमें लगभग नहीं के बराबर है।
देश में पाइपलाइन परिवहन के तीन प्रमुख जाल हैं
असम के तेल क्षेत्रों से गुवाहाटी, बरौनी व इलाहाबाद के रास्ते कानपुर (उत्तर प्रदेश) तक। इसकी एक शाखा बरौनी से राजबंध होकर हल्दिया तक है दूसरी राजबंध से मौरी ग्राम तक तथा गुवाहाटी से सिलिगुड़ी तक है।
गुजरात में सलाया से वीरमगाँव, मथुरा, दिल्ली व सोनीपत के रास्ते पंजाब में जालंधर तक। इसकी अन्य शाखा वडोदरा के निकट कोयली को चक्शु व अन्यस्थानों से जोड़ती है।
1,700 किलोमीटर लंबी हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर (एच.वी.जे.) क्रोस कंट्री गैस पाइपलाइन, मुंबई हाई और बेसीन गैस क्षेत्रों को पश्चिमी और उत्तरी भारत के विभिन्न उर्वरक, बिजली और औद्योगिक परिसरों से जोड़ती है।
जल परिवहन
जल परिवहन, परिवहन का सबसे सस्ता साधन है। यह भारी व स्थूलकाय वस्तुएँ ढोने में अनुकूल है। यह परिवहन साधनों में ऊर्जा सक्षम तथा पर्यावरण अनुकूल हैं। भारत में अंतः स्थलीय नौसंचालन जलमार्ग 14500 किमी. लंबा है। इसमें केवल 5685 किमी. मार्ग ही मशीनीकृत नौकाओं द्वारा तय किया जाता है।
राष्ट्रीय जलमार्ग 
हल्दिया तथा इलाहाबाद के मध्य गंगा जलमार्ग जो 1620 किमी. लंबा है - नौगम्य जलमार्ग संख्या-1
सदिया व धुबरी के मध्य 891 किमी. लंबा ब्रह्मपुत्र नदी जल मार्ग - नौगम्य जलमार्ग संख्या-2
केरल में पश्चिम-तटीय नहर (कोट्टापुरम से कोल्लमतक, उद्योगमंडल तथा चंपक्कारा नहरें - 205 किमी.) - नौगम्य जलमार्ग संख्या-3
काकीनाडा और पुदुच्चेरी नहर स्ट्रेच के साथ-साथ गोदावरी और कृष्णा नदी का विशेष विस्तार (1078 किमी.)- राष्ट्रीयजलमार्ग-4.
मातई नदी, महानदी के डेल्टा चैनल, ब्राह्मणी नदी और पूर्वी तटीय नहर के साथ- ब्रह्माणी नदी का विशेष विस्तार- (588 किमी.)-राष्ट्रीय जलमार्ग-5.
प्रमुख समुद्री पत्तन
भारत की 7,516.6 किमी. लंबी समुद्री तट रेखा के साथ 12 प्रमुख तथा 200 मध्यम व छोटे पत्तन हैं। ये प्रमुख पत्तन देश का 95 प्रतिशत विदेशी व्यापार संचालित करते हैं।
प्रमुख समुद्री पत्तन / Major sea ports
मुंबई पत्तन (महाराष्ट्र) - मुंबई वृहत्तम पत्तन है  मुंबई पत्तन के अधिक परिवहन को ध्यान में रखकर इसके सामने जवाहरलाल नेहरू पत्तन विकसित किया गया
कांडला (दीनदयाल पत्तन):
 स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् कच्छ में कांडला पहले पत्तन के रूप में विकसित किया गया। ऐसा देश विभाजन से कराची पत्तन जो पाकिस्तान में शामिल हो गया था उसकी कमी को पूरा करने तथा मुंबई पत्तन से होने वाले व्यापारिक दबाव को कम करने के लिए किया गया था। कांडला जिसे दीनदयाल पत्तन के नाम से भी जाना जाता है। यह एक ज्वारीय पत्तन है। यह जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व गुजरात के औद्योगिकतथा खाद्यान्नों के आयात-निर्यात को संचालित करता है।
मार्मगोवा पत्तन (गोवा) - मार्मगोवा पत्तन लौह-अयस्क के निर्यात के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण पत्तन है। यहाँ से देश के कुल निर्यात का आधा  लौह-अयस्क निर्यात किया जाता है।
 न्यू-मैंगलोर पत्तन (कर्नाटक) - कर्नाटक में स्थित न्यू-मैंगलोर पत्तन कुद्रेमुख खानों से निकले लौह-अयस्क का निर्यात करता है।
कोची पत्तन (केरल) - यह एक लैगून के मुहाने पर स्थित एक प्राकृतिक पोताश्रय है।
तुतीकोरन पत्तन (तमिलनाडु) : यह एक प्राकृतिक पोताश्रय है  यह पत्तन हमारे पड़ोसी देशों जैसे -श्रीलंका, मालदीव आदि तथा भारत के तटीय क्षेत्रों की भिन्न वस्तुओं के व्यापार को संचालित करता है। 
चेन्नई पत्तन (तमिलनाडु) - सबसे पुराना प्राकृतिक पत्तन है।  व्यापार की मात्रा तथा लदे सामान के संदर्भ में इसका मुंबई के बाद दूसरा स्थान है।
विशाखापट्टनम पत्तन(आंध्र प्रदेश) यह स्थल से घिरा, गहरा व सुरक्षित पत्तन है। प्रारम्भ में यह पत्तन लौह-अयस्क निर्यातक के रूप में विकसित किया गया था। 
पारादीप पत्तन (ओडिशा ) :  ओडिशा में स्थित पारादीप पत्तन विशेषतः लौह-अयस्क का निर्यात करता है।
कोलकाता पत्तन (पश्चिम बंगाल) : यह एक अंतः स्थलीय नदीय  पत्तन है।  ज्वारीय पत्तन होने के कारण तथा हुगली के तलछट जमाव से इसे नियमित रूप से साफ करना पड़ता है। 
हाल्दिया (पश्चिम बंगाल)- कोलकाता पत्तन पर बढ़ते व्यापार को कम करने हेतु हल्दिया सहायक पत्तन के रूप में विकसित किया गया है।
वायु परिवहन
वायु परिवहन तीव्रतम, आरामदायक व प्रतिष्ठित परिवहन का साधन है। इसके द्वारा अति दुर्गम स्थानों जैसे ऊँचे पर्वत, मरुस्थलों, घने जंगलों व लंबे समुद्री रास्तों को सुगमता से पार किया जा सकता है।
पवन हंस हेलीकाप्टर लिमिटेड, तेल व प्राकृतिक गैस आयोग को इसकी अपतटीय संक्रियाओं में तथा अगम्य व दुर्लभ भू-भागों जैसे उत्तरी-पूर्वी राज्यों तथा जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखण्ड के आंतरिक क्षेत्रों में हेलीकाप्टर सेवाएँ उपलब्ध करवाता है।
उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) विश्व स्तर पर अपनी तरह की पहली योजना है, जिसे क्षेत्रीय विमानन बाजार में तेजी लाने के लिए डिजाइन किया गया है। आम नागरिक के लिए उड़ान को किफायती बनाकर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के लिए नागर विमानन मंत्रलय, द्वारा क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना (RCS) - उड़ान की कल्पनाकी गई थी। योजना का मुख्य विचार सक्षम नीतियों और प्रोत्साहनों के माध्यम से एयरलाइनों को क्षेत्रीय और दूरस्थ मार्गों पर उड़ानें संचालित करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
संचार सेवाएँ

संदेश प्राप्तकर्ता या संदेश भेजने वाले के गतिविहीन रहते हुए भी लंबी दूरी का संचार बहुत आसान है। निजी दूरसंचार तथा जनसंचार में दूरदर्शन, रेडियो, समाचार-पत्र समूह, प्रेस तथा सिनेमा, आदि देश के प्रमुख संचार साधन हैं। 
डाक-संचार- भारत का डाक-संचार तंत्र विश्व का वृहत्तम है। यह पार्सल, निजी पत्र व्यवहार तथा तार आदि को संचालित करता है। कार्ड व लिफाफा बंद चिट्ठी, पहली श्रेणी की डाक समझी जाती है तथा विभिन्न स्थानों पर वायुयान द्वारा पहुँचाए जाते हैं। द्वितीय श्रेणी की डाक में रजिस्टर्ड पैकेट, किताबें, अखबार तथा मैगशीन शामिल हैं। ये धरातलीय डाक द्वारा पहुँचाए जाते हैं तथा इनके लिए स्थल व जल परिवहन का प्रयोग किया जाता है। बड़े शहरों व नगरों में डाक-संचार में शीघ्रता हेतु, हाल ही में छः डाक मार्ग बनाए गए हैं। इन्हें राजधानी मार्ग, मेट्रो चैनल, ग्रीन चैनल, व्यापार चैनल, भारी चैनल तथा दस्तावेज चैनल के नाम से जाना जाता है। 
दूर संचार-तंत्र में भारत एशिया महाद्वीप में अग्रणी है। नगरीय क्षेत्रों के अतिरिक्त, भारत के दो तिहाई से अधिक गाँव एस टी डी दूरभाष सेवा से जुड़े हैं। सूचनाओं के प्रसार को आधार स्तर से उच्च स्तर तक समृद्ध करने हेतु भारत सरकार ने देश के प्रत्येक गाँव में चौबीस घंटे एस टी डी सुविधा के विशेष प्रबंध किये हैं। जन-संचार, मानव को मनोरंजन के साथ बहुत से राष्ट्रीय कार्यक्रमों व नीतियों के विषय में जागरूक करता है। इसमें रेडियो, दूरदर्शन, समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, किताबें तथा चलचित्र सम्मिलित हैं। 
आकाशवाणी (आल इंडिया रेडियो) राष्ट्रीय, क्षेत्रीय तथा स्थानीय भाषा में देश के विभिन्न भागों में अनेक वर्गों के व्यक्तियों के लिए विविध कार्यक्रम प्रसारित करता है। 
दूरदर्शन, देश का राष्ट्रीय समाचार व संदेश माध्यम है तथा विश्व के बृहत्तम संचार-तंत्र में एक है। यह विभिन्न आयु वर्ग के व्यक्तियों हेतु मनोरंजक, ज्ञानवर्धक, व खेल-जगत संबंधी कार्यक्रम प्रसारित करता है। 
भारत में वर्ष भर अनेक समाचार-पत्र तथा सामयिक पत्रिकाएँ प्रकाशित की जाती हैं। ये पत्रिकाएँ सामयिक होने के नाते (जैसे मासिक, साप्ताहिक आदि) कई प्रकार की हैं। समाचार-पत्र लगभग 100 भाषाओं तथा बोलियों में प्रकाशित होते हैं। हमारे देश में सर्वाधिक समाचार-पत्र हिंदी भाषा में प्रकाशित होते हैं तथा इसके बाद अंग्रेजी व उर्दू के समाचार पत्र आते हैं। 
भारत विश्व में सर्वाधिक चलचित्रों का उत्पादक भी है। यह कम अवधि वाली फिल्में, वीडियो पिक्चर फिल्म तथा छोटी वीडियो फिल्में बनाता है। भारतीय व विदेशी सभी फिल्मों को प्रमाणित करने का अधिकार केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को है।
डिजिटल भारत एक ज्ञान आधरित परिवर्तन के लिए, भारतको तैयार करने के लिए एक विशाल कार्यक्रम है। डिजिटल भारत कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य IT (भारतीय प्रतिभा) + IT(सूचना प्रौद्योगिकी) =IT (कल का भारत) में होने वाले परिवर्तन को समझना है
व्यापार - वस्तुओं और सेवाओं के स्वैच्छिक आदान-प्रदान व्यापार कहलाता है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार -
विभिन्न राष्ट्रों के बीच राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान अंतरराष्ट्रीय व्यापार कहलाता है यह समुद्री, हवाई व स्थलीय मार्गों द्वारा हो सकता है। एक देश के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की प्रगति उसके आर्थिक वैभव का सूचक है। इसीलिए इसे राष्ट्र का आर्थिक बैरोमीटर भी कहा जाता है। 
सभी देश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर निर्भर हैं क्योंकि संसाधनों की उपलब्धता क्षेत्रीय है अर्थात् इनका वितरण असमान है। 
आयात तथा निर्यात व्यापार के घटक हैं। 
आयात व निर्यात का अंतर ही देश के व्यापार संतुलन को निर्धारित करता है। 
यदि  निर्यात मूल्य आयात मूल्य से अधिक हो तो उसे अनुकूल व्यापार संतुलन कहते हैं। 
और यदि  निर्यात की अपेक्षा अधिक आयात असंतुलित व्यापार कहलाता है। 
भारत में निर्यात होने वाली प्रमुख वस्तुएँ रत्न व जवाहरात, रसायन एवं संबंधित उत्पाद तथा कृषि एवं संबंधित उत्पाद हैं। 
भारत मे आयातित वस्तुओं में कच्चा पेट्रोलियम तथा उत्पाद, रत्न व जवाहरात, आधर धतुएँ, मशीनें, कृषि व अन्य उत्पाद शामिल हैं। 
भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक सॉफ्रटवेयर महाशक्ति के रूप में उभरा है तथा सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से अत्यधिक विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहा है।
पर्यटन -एक व्यापार के रूप में पिछले तीन दशकों में भारत में पर्यटन उद्योग में महत्त्वपूर्ण वृद्धि हुई है। पर्यटन  राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करता है तथा स्थानीय हस्तकला व सांस्कृतिक उद्यमों को प्राश्रय देता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह हमें संस्कृति तथा विरासत की समझ विकसित करने में सहायक है। विदेशी पर्यटक भारत में विरासत पर्यटन, पारि-पर्यटन, रोमांचकारी पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन, चिकित्सा पर्यटन तथा व्यापारिक पर्यटन के लिए आते हैं।
  1. स्वर्णिम चतुर्भुज महा राजमार्ग किसके अधिकार क्षेत्र में है   
    भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में 

  2. स्वर्णिम चतुर्भुज महाराजमार्ग की सड़क कितने लेन वाली बनाई गई?
    6
  3. कोलकाता बंदरगाह पर दबाव को कम करने के लिए कौन सा बंदरगाह विकसित किया गया था?
    हल्दिया 
  4. किसी देश के आर्थिक वैभव का सूचक  क्या होता है ?
    अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की प्रगति 
  5. किसी राष्ट्र का आर्थिक बैरोमीटर किसे कहा कहा जाता है ?
    अंतरराष्ट्रीय व्यापार को
  6. परिवहन किसे कहते हैं ?
    यात्रियों व सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने व ले जाने की प्रकिया परिवहन कहलाती है
  7. कौन-से दो दूरस्थ स्थित स्थान पूर्वी-पश्चिमी गलियारे से जुड़े हैं?
    सिलचर तथा पोरबंदर
  8. देश का सबसे पुराना कृत्रिम पत्तन कौन -सा है?
    चेन्नई
  9. भारत में अंत: स्थलीय नौ संचालन जल मार्ग कितना लम्बा है ?
    14,500 किलोमीटर
  10. भारत में कितने रेल मण्डल है ?
    17 रेल मण्डल
  11. भारत में रेल परिवहन [प्रथम रेल] की शुरुआत कब हुई ?
    1853 में मुंबई से ठाणे [34 किलोमीटर]
  12. भारत में परिवहन का सबसे तीव्रतम, आधुनिक व मंहगा साधन कौनसा है ?
    वायु परिवहन
  13. परिवहन का कौनसा साधन दुर्गम व दूरस्थ स्थानों पर पहुंच तथा प्राकृतिक आपदाओं से राहत हेतु उत्तम साधन है ?
    वायु परिवहन
  14. राष्ट्रीय जलमार्ग-2 किन दो स्थानों को जोड़ता है ?
    धुबरी से सादिया तक 891 किलोमीटर [ब्रह्मपुत्र नदी में]
  15. विश्व की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग कौनसी है ?
    अटल टनल
  16. राष्ट्रीय जल मार्ग -1 किस नदी पर किन दो स्थानों को जोड़ता है इसकी लम्बाई कितनी है ?
    गंगा नदी में पर हल्दिया को इलाहाबाद से जोड़ता है इसकी 1620 किलोमीटर है
  17. HBJ/HVJ का पूरा नाम लिखिए
    हजीरा-विजयपुरा-जगदीशपुर
  18. सीमा सङक संगठन की स्थापना किस उद्देश्य से की गई?
    1960 में सीमावर्ती सङको के निर्माण व रखरखाव के उद्देश्य से BRO की स्थापना की गई
  19. परिवहन का कौन-सा साधन वहनांतरण हानियों तथा देरी को घटाता है?
    पाइपलाइन
  20. कौन-सा पत्तन पूर्वी तट पर स्थित है जो अंतः स्थलीय तथा अधिकतम गहराई का पत्तन है तथा पूर्ण सुरक्षित है?
     विशाखापट्नम
  21. भारतीय व विदेशी फिल्मों का सत्यापन करने वाला प्राधिकरण कौन सा हैं ? 
    सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन
  22. भारत का वृहत्तम पत्तन का नाम लिखिए -
     मुम्बई पत्तन
  23. स्वर्णिम चतुर्भुज महा राजमार्ग भारत के किन् शहरों को जोड़ती है 
    दिल्ली-कोलकत्ता, चेन्नई-मुंबई व दिल्ली को 
  24. स्वर्णिम चतुर्भुज महाराजमार्ग का मुख्य उद्देश्य लिखें।
    स्वर्णिम चतुर्भुज महाराजमार्ग का मुख्य उद्देश्य भारत के मेगासिटी के बीच समय और दूरी को कम करना है।
  25. किन सड़कों को प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत विशेष प्रोत्साहन मिला?
     ग्रामीण सड़कों को 
  26. हमारे देश की प्राथमिक सड़क प्रणाली कौन सी हैं?
    राष्ट्रीय राजमार्ग   
  27. भारतीय डाक संचार तंत्र में प्रथम श्रेणी की डाक किसे समझा जाता है।
    कार्ड व लिफाफा बंद चिट्ठी
  28. भारतीय डाक संचार तंत्र में द्वितीय श्रेणी की डाक किसे समझा जाता है।
    रजिस्टर्ड पैकेट, किताबें, अखबार तथा मैगजीन
  29. भारत में विश्व का सड़क जाल में मामले में किस स्थान पर है?
     दूसरा
  30. कौन से राजमार्ग राज्य की राजधानी को विभिन्न जिला मुख्यालयों से जोड़ता हैं?
    राज्य राजमार्ग
  31. कौन सी सड़क जिला मुख्यालय को जिले के अन्य स्थानों से जोड़ता है?
    जिला सड़कें
  32. 2कौन सा पत्तन एक ज्वारीय बंदरगाह  दीनदयाल बंदरगाह के रूप में भी जाना जाता है?
    कांडला








6. विनिर्माण उद्योग

विनिर्माण : कच्चे माल को अधिक मूल्यवान उत्पादों में परिवर्तित कर अधिक मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन विनिर्माण कहलाता है।
विनिर्माण का महत्त्व : 
विनिर्माण उद्योग कृषि के आधुनिकीकरण में मदद करते हैं। 
विनिर्माण उद्योग लोगों को द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों में रोजगार प्रदान करके कृषि आय पर उनकी भारी निर्भरता को कम करते हैं। 
औद्योगिक विकास बेरोजगारी और गरीबी को दूर करने में मदद करता है। 
निर्मित वस्तुओं के निर्यात से व्यापार और वाणिज्य का विस्तार होता है जिससे अपेक्षित विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है।
उद्योगों का वर्गीकरण प्रयुक्त कच्चे माल के स्रोत के आधार पर: 
(i) कृषि आधारित :  वे उद्योग जिनमें कृषि उत्पादों का उपयोग कच्चे माल के रूप में किया जाता है। कपास, ऊनी, जूट, रेशमी वस्त्र, रबड़ और चीनी, चाय, कॉफी, खाद्य तेल। 
(ii) खनिज आधारित उद्योग - ऐसे उद्योग जो कच्चे माल के रूप में खनिजों और धातुओं का उपयोग करते हैं उन्हें खनिज आधारित उद्योग कहा जाता है। लोहा और इस्पात, सीमेंट, एल्युमीनियम, मशीन टूल्स, पेट्रोकेमिकल्स। 
प्रमुख भूमिका केआधार पर
(i) आधारभूत उद्योग - वे उद्योग जो अपने उत्पादों को अन्य वस्तुओं के निर्माण के लिए कच्चे माल के रूप में आपूर्ति करते हैं जैसे लोहा- इस्पात उद्योग  और तांबा प्रगलन व एल्यूमीनियम प्रगलन उद्योग । 
(ii) उपभोक्ता उद्योग - उपभोक्ता उद्योग जो उपभोक्ताओं द्वारा सीधे उपयोग के लिए सामान का उत्पादन करते हैं - चीनी, टूथपेस्ट, कागज, सिलाई मशीन, पंखे आदि। 
पूंजी निवेश के आधार पर : 
(i) लघु उद्योग - यदि किसी उद्योग पर निवेश एक करोड़ रुपये से कम है। 
(ii) बड़े उद्योग - यदि किसी उद्योग पर निवेश एक करोड़ रुपये से अधिक है 
स्वामित्व के आधार पर: 
(i) सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग - वे उद्योग जिनका स्वामित्व, प्रबन्ध एवं नियन्त्रण पूर्णतया सरकार के पास होता है  सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग कहलाते है  उदाहरण - भारत हैवी इलैक्ट्रिकल लिमिटेड ( भेल) तथा स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) आदि।
(ii) निजी क्षेत्र के उद्योग- वे उद्योग जिनका स्वामित्व व्यक्तिगत निवेशकों के पास होता है।निजी क्षेत्र के उद्योग कहलाते है  उदाहरण - टिस्को, बजाज ऑटो लिमिटेड, डाबर इंडस्ट्रीज 
(iii) संयुक्त क्षेत्र के उद्योग- वे उद्योग जिनका संचालन संयुक्त कंपनी के द्वारा या किसी निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के संयुक्त प्रयासों द्वारा किया जाता है। संयुक्त क्षेत्र के उद्योग कहलाते है 
उदाहरण - ऑयल इंडिया लिमिटेड आदि।
(iv) सहकारी  उद्योग - जिनका स्वामित्व कच्चे माल की पूर्ति करने वाले उत्पादकों, श्रमिकों या दोनों के हाथों में होता है। संसाधनों का कोष संयुक्त होता है तथा लाभ-हानि का विभाजन भी अनुपातिक होता है जैसे - महाराष्ट्र के  चीनी उद्योग, केरल के नारियल पर आधारित उद्योग।
कच्चे तथा तैयार माल की मात्रा व भार के आधार पर
(i) भारी उद्योग - ये उद्योग भारी कच्चे माल का उपयोग करते हैं और भारी माल का उत्पादन करते हैं जैसे लोहा और इस्पात उद्योग
(ii) हल्के उद्योग - ये उद्योग हल्के कच्चे माल का उपयोग करते हैं और हल्के माल का उत्पादन करते हैं जैसे विद्युत उद्योग।
कृषि आधारित :
सूती वस्त्र, पटसन, रेशम, ऊनी वस्त्र, चीनी तथा वनस्पति तेल आदि उद्योग कृषि से प्राप्त कच्चे माल पर आधारित हैं।
[अ] 
वस्त्र उद्योग :  कपड़ा उद्योग औद्योगिक उत्पादन, रोजगार सृजन और विदेशी मुद्रा आय में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह देश का एकमात्र उद्योग है, जो मूल्य श्रृंखला में आत्मनिर्भर और पूर्ण है
[i] सूती वस्त्र उद्योग :
प्राचीन भारत में सूती वस्त्र हाथ से कताई और हथकरघा बुनाई तकनीकों से बनाये जाते थे। अठारहवीं शताब्दी के बाद विद्युतीय करघों का उपयोग होने लगा। औपनिवेशिक काल के दौरान हमारे परंपरागत उद्योगों को बहुत हानि हुई क्योंकि हमारे उद्योग इंग्लैंड के मशीन निर्मित वस्त्रों से स्पर्धा नहीं कर पाये।
पहली सूती कपड़ा मिल 1854 में मुंबई में स्थापित की गई थी।
शुरुआती वर्षों में, सूती कपड़ा उद्योग महाराष्ट्र और गुजरात के कपास उगाने वाले बेल्ट में केंद्रित था।
स्थानीयकरण कारक: कच्चे कपास की उपलब्धता, बाजार, परिवहन और सुलभ बंदरगाह सुविधाएं, श्रम, नम जलवायु।
इस उद्योग का कृषि से घनिष्ठ संबंध है और यह किसानों, कपास की फली तोड़ने वालों और ओटने, कताई, बुनाई, रंगाई, डिजाइनिंग, पैकेजिंग, सिलाई और सिलाई में लगे श्रमिकों को आजीविका प्रदान करता है। यह बुनकरों, कपास किसानों, मिल श्रमिकों, सहायक रसायनों, रंग उद्योग और इंजीनियरिंग कार्यों को रोजगार प्रदान करता है। औपनिवेशिक काल के दौरान हमारे पारंपरिक उद्योगों को झटका लगा क्योंकि वे इंग्लैंड से मिल-निर्मित कपड़े के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके। कताई मिलें महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु में केंद्रीकृत हैं। बुनाई हथकरघा, पावरलूम और मिलों में की जाती है। हाथ से बुनी गई खादी कुटीर उद्योग के रूप में बुनकरों को बड़े पैमाने पर रोजगार प्रदान करती है। कताई मिलें महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु में केंद्रीकृत हैं। 
(ii) पटसन वस्त्र - भारत कच्चे जूट और जूट के सामान का सबसे बड़ा उत्पादक है और बांग्लादेश के बाद निर्यातक के रूप में दूसरे स्थान पर है। अधिकांश मिलें पश्चिम बंगाल में, मुख्य रूप से हुगली नदी के किनारे, एक संकीर्ण पट्टी में स्थित हैं। पहली जूट मिल 1855 में कोलकाता के पास रिशरा में स्थापित की गई थी। 1947 में विभाजन के बाद, जूट मिलें भारत में ही रहीं, लेकिन जूट उत्पादन क्षेत्र का तीन-चौथाई हिस्सा बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) में चला गया।
जूट उद्योग के हुगली बेसिन में स्थित होने के लिए जिम्मेदार कारक
जूट उत्पादन क्षेत्रों की निकटता
सस्ता परिवहन
कच्चे जूट के प्रसंस्करण के लिए प्रचुर मात्रा में पानी
पश्चिम बंगाल और आसपास के राज्यों से सस्ते मजदूर
कोलकाता शहर बैंकिंग, बीमा और बंदरगाह सुविधाओं के साथ-साथ अन्य सहायता प्रदान करता है।
(iii) चीनी उद्योग : भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है, लेकिन गुड़ और खांडसारी के उत्पादन में पहले स्थान पर है।
इस उद्योग में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भारी होता है और ढुलाई में इसकी सुक्रोज मात्रा कम हो जाती है।
चीनी मिलें बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश में स्थित हैं।
चीनी मिलों का साठ प्रतिशत हिस्सा उत्तर प्रदेश और बिहार में हैं। यह उद्योग मौसमी प्रकृति का है, इसलिए यह सहकारी क्षेत्र के लिए आदर्श है। हाल के वर्षों में, मिलों के दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों, विशेष रूप से महाराष्ट्र में स्थानांतरित होने की प्रवृत्ति है, ऐसा इसलिए है क्योंकि: यहाँ उत्पादित गन्ने में सुक्रोज की मात्रा अधिक होती है। ठंडी जलवायु भी लंबे समय तक पेराई का मौसम सुनिश्चित करती है। इन राज्यों में सहकारी समितियाँ अधिक सफल हैं 
खनिज आधारित उद्योग -
लोहा और इस्पात उद्योग - लोहा और इस्पात उद्योग आधारभूत  उद्योग है क्योंकि अन्य सभी उद्योग अपनी मशीनरी के लिए इस पर निर्भर हैं। इसे भारी उद्योग भी माना जाता है क्योंकि कच्चा माल और तैयार माल दोनों भारी और भारी होते हैं। इस्पात के उत्पादन और खपत को अक्सर देश के विकास का सूचकांक माना जाता है। 
लौह और इस्पात उद्योग में लौह अयस्क, कोकिंग कोल और चूना पत्थर की आवश्यकता लगभग 4 : 2 : 1 के अनुपात में होती है। 
स्टील को सख्त करने के लिए मैंगनीज की आवश्यकता होती है। छोटानागपुर पठार क्षेत्र में लौह और इस्पात उद्योगों की अधिकतम सांद्रता है। स्थानीयकरण कारक : 
कुशल परिवहन नेटवर्क। 
नज़दीकी उच्च श्रेणी के कच्चे माल। 
सस्ता श्रम। 
घरेलू बाजार में विकास की अपार संभावनाएँ। 
एल्युमिनियम प्रगलन - एल्युमिनियम प्रगलन भारत में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण धातुकर्म उद्योग है। बॉक्साइट एल्युमिनियम का अयस्क है। जो बहुत भारी, गहरे लाल रंग की चट्टान है। एल्युमिनियम हल्का, जंग प्रतिरोधी, ऊष्मा का अच्छा संवाहक, लचीला और अन्य धातुओं के साथ मिश्रित होने पर मजबूत हो जाता है। इसका उपयोग विमान, बर्तन और तार बनाने में किया जाता है। देश में एल्युमिनियम प्रगलन संयंत्र ओडिशा, पश्चिम बंगाल, चंडीगढ़, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, केरल और तमिलनाडु में स्थित हैं  
'एल्युमिनियम प्रगलन' उद्योग के स्थान के लिए दो प्रमुख कारक हैं बिजली की नियमित आपूर्ति और कच्चे माल का सुनिश्चित स्रोत 
रासायनिक उद्योग
भारत में रासायनिक उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और विविधतापूर्ण हो रहा है।
ऑर्गेनिक रासायनिक संयंत्र तेल रिफाइनरियों या पेट्रोकेमिकल संयंत्रों के पास स्थित हैं।
रासायनिक उद्योग अपने आप में सबसे बड़ा उपभोक्ता है।
ऑर्गेनिक रसायनों में पेट्रोकेमिकल शामिल हैं, जिनका उपयोग सिंथेटिक फाइबर, सिंथेटिक रबर, प्लास्टिक, रंग-सामग्री के निर्माण के लिए किया जाता है।
भारत कार्बनिक और अकार्बनिक रसायनों का उत्पादन करता है।
अकार्बनिक रसायनों में सल्फ्यूरिक एसिड (उर्वरक, सिंथेटिक फाइबर, प्लास्टिक, चिपकने वाले पदार्थ, पेंट, रंग-सामग्री के निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है), नाइट्रिक एसिड, क्षार, सोडा ऐश (कांच, साबुन और डिटर्जेंट, कागज बनाने के लिए उपयोग किया जाता है) और कास्टिक सोडा शामिल हैं। ये उद्योग देश भर में व्यापक रूप से फैले हुए हैं।
ऑटोमोबाइल उद्योग
ऑटोमोबाइल अच्छी सेवाओं और यात्रियों के त्वरित परिवहन के लिए वाहन प्रदान करते हैं।
ट्रक, बस, कार, मोटर साइकिल, स्कूटर, तिपहिया और बहुउपयोगी वाहन भारत में विभिन्न केंद्रों पर निर्मित होते हैं।
यह उद्योग दिल्ली, गुरुग्राम, मुंबई, पुणे, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ, इंदौर, हैदराबाद, जमशेदपुर और बेंगलुरु के आसपास स्थित है। उर्वरक उद्योग उर्वरक उद्योग नाइट्रोजन उर्वरकों (यूरिया), फॉस्फेटिक उर्वरकों और अमोनियम फॉस्फेट (DAP) और जटिल उर्वरकों के उत्पादन के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जिसमें नाइट्रोजन (N), फॉस्फेट (P) और पोटाश (K) का संयोजन होता है। पोटाश पूरी तरह से आयात किया जाता है क्योंकि देश में वाणिज्यिक रूप से इसका कोई भंडार नहीं है हरित क्रांति के बाद इस उद्योग का देश के कई अन्य हिस्सों में विस्तार हुआ। हरित क्रांति के बाद इस उद्योग का विस्तार हुआ। प्रमुख उत्पादक गुजरात, तमिलनाडु, यूपी, पंजाब और केरल हैं 
सीमेंट उद्योग - भारत में पहला सीमेंट उद्योग सन् 1904 में चेन्नई में लगाया गया था। सीमेंट निर्माण गतिविधि जैसे कि घर, कारखाने, पुल, सड़क, हवाई अड्डे, बांध और अन्य वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के लिए आवश्यक है। इस उद्योग को चूना पत्थर, सिलिका और जिप्सम जैसे भारी और भारी कच्चे माल की आवश्यकता होती है। रेल परिवहन के अलावा कोयला और बिजली की भी आवश्यकता होती है। सीमेंट उद्योग गुजरात में स्थित हैं, जिनकी खाड़ी देशों के बाज़ार तक उचित पहुँच है।
सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग
इस उद्योग में ट्रांजिस्टर सेट, टेलीविज़न, टेलीफोन, सेलुलर टेलीकॉम, टेलीफोन एक्सचेंज, रडार, कंप्यूटर और कई अन्य उपकरण जैसे उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है।
बेंगलुरु भारत की इलेक्ट्रॉनिक राजधानी है।
हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर में निरंतर वृद्धि भारत में आईटी उद्योग की सफलता की कुंजी है।
इलेक्ट्रॉनिक सामानों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ और कोयंबटूर हैं।
औद्योगिक प्रदूषण और पर्यावरण क्षरण
उद्योग चार प्रकार के प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार हैं: (ए) वायु (बी) जल (सी) भूमि (डी) शोर।
प्रदूषणकारी उद्योगों में थर्मल पावर प्लांट भी शामिल हैं
वायु प्रदूषण
यह हवा में सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड के उच्च अनुपात की उपस्थिति के कारण होता है।
यह रासायनिक और कागज़ कारखानों, ईंट भट्टों, रिफाइनरियों और गलाने वाले संयंत्रों और बड़े और छोटे कारखानों में जीवाश्म ईंधन के जलने से उत्सर्जित होता है।
इससे सांस संबंधी समस्याएं होती हैं
वायु प्रदूषण से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है मानव स्वास्थ्य, पशु, पौधे, इमारतें और समग्र रूप से वातावरण।
जल प्रदूषण:
जल प्रदूषण नदियों में छोड़े जाने वाले कार्बनिक और अकार्बनिक औद्योगिक अपशिष्टों के कारण होता है।
कागज़, लुगदी, रसायन, कपड़ा और रंगाई, पेट्रोलियम रिफाइनरी, टेनरी और इलेक्ट्रोप्लेटिंग उद्योग जल प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार हैं।
भारत में फ्लाई ऐश, फॉस्फो-जिप्सम और लोहा और इस्पात स्लैग प्रमुख ठोस अपशिष्ट हैं।
ऊष्मीय प्रदूषण
पानी का ऊष्मीय प्रदूषण तब होता है जब कारखानों और थर्मल प्लांट से निकलने वाले गर्म पानी को ठंडा होने से पहले नदियों और तालाबों में बहा दिया जाता है।
परमाणु ऊर्जा संयंत्रों, परमाणु और हथियार उत्पादन सुविधाओं से निकलने वाले अपशिष्ट कैंसर, जन्म दोष और गर्भपात का कारण बनते हैं
ध्वनि प्रदूषण
औद्योगिक और निर्माण गतिविधियों, मशीनरी, उपकरणों आदि से निकलने वाला शोर ध्वनि प्रदूषण में योगदान देता है।
इस प्रकार के प्रदूषण के परिणामस्वरूप सुनने में कमी, हृदय गति में वृद्धि, रक्तचाप और शारीरिक प्रभाव होते हैं।
ध्वनि प्रदूषण के परिणामस्वरूप जलन, तनाव, सुनने में कमी, हृदय गति में वृद्धि, रक्तचाप और शारीरिक प्रभाव होते हैं।
पर्यावरणीय निम्नीकरण की रोकथाम
कारखानों द्वारा निष्कासित एक लिटर अपशिष्ट से लगभग आठ गुणा स्वच्छ जल दूषित होता है। औद्योगिक प्रदूषण से स्वच्छ जल को कैसे बचाया जा सकता है, इसके कुछ निम्न सुझाव हैं 
(i) विभिन्न प्रक्रियाओं में जल का न्यूनतम उपयोग तथा जल का दो या अधिक उत्तरोत्तर अवस्थाओं में पुनर्चक्रण द्वारा पुनः उपयोग।
(ii) जल की आवश्यकता पूर्ति हेतु वर्षा जल संग्रहण।
(iii) नदियों व तालाबों में गर्म जल तथा अपशिष्ट पदार्थों को प्रवाहित करने से पहले उनका शोधन
करना। 
औद्योगिक अपशिष्ट का शोधन तीन चरणों में किया जा सकता है 
(a) यांत्रिक तरीकों से प्राथमिक उपचार - इसमें स्क्रीनिंग, पीसना, फ्लोक्यूलेशन और अवसादन शामिल है।
(b) जैविक प्रक्रिया द्वारा द्वितीयक उपचार
(c) जैविक, रासायनिक और भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा तृतीयक उपचार- इसमें अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण शामिल है।
NTPC ने दिखाई राह
NTPC भारत में बिजली उपलब्ध कराने वाली एक प्रमुख कंपनी है। इसके पास EMS (पर्यावरण प्रबंधन तंत्र) 14001 के लिए ISO प्रमाणन है।
निगम के पास उन स्थानों पर प्राकृतिक पर्यावरण और जल, तेल और गैस तथा ईंधन जैसे संसाधनों के संरक्षण के लिए एक सक्रिय दृष्टिकोण है, जहाँ यह बिजली संयंत्र स्थापित कर रहा है।
यह निम्नलिखित के माध्यम से संभव हुआ है
(i) नवीनतम तकनीकों को अपनाकर उपकरणों का इष्टतम उपयोग और मौजूदा उपकरणों को उन्नत करना।
(ii) राख के उपयोग को अधिकतम करके अपशिष्ट उत्पादन को कम करना।
(iii) पारिस्थितिकी संतुलन को पोषित करने के लिए हरित पट्टी प्रदान करना और वनरोपण के लिए विशेष प्रयोजन वाहनों के प्रश्न का समाधान करना।
(iv) राख तालाब प्रबंधन, राख जल पुनर्चक्रण प्रणाली और तरल अपशिष्ट प्रबंधन के माध्यम से पर्यावरण प्रदूषण को कम करना।
(v) अपने सभी बिजलीघरों के लिए पारिस्थितिकी निगरानी, ​​समीक्षा और ऑनलाइन डेटाबेस प्रबंधन।


  1. सीमेंट उद्योग गुजरात में क्यों स्थित हैं, 
    यहाँ से खाड़ी देशों के बाज़ार तक उचित पहुँच है।
  2. पहला पटसन उद्योगकहाँ और कब लगाया गया।
    पहला पटसन उद्योग कोलकाता के निकट रिशरा में 1855 में लगाया गया।
  3. भारत में पहला सीमेंट उद्योग कहाँ और कब लगाया गया था।

    पहला सीमेंट उद्योग सन् 1904 में चेन्नई में लगाया गया था।
  4. स्टील को सख्त करने के लिए उसमे क्या मिलाया जाता  है
    मैंगनीज 
  5. कौन-सा उद्योग दूरभाष, कंप्यूटर आदि संयंत्र निर्मित करते है?
    इलैक्ट्रानिक उद्योग
  6. SAIL का पूरा नाम लिखिए 
    स्टील अथॉरिटी ऑपफ इंडिया लिमिटेड
  7. BHEL का पूरा नाम लिखिए 
    भारत हैवी इलैक्ट्रिकल लिमिटेड
  8. OIL का पूरा नाम लिखिए 
    ऑयल इंडिया लिमिटेड
  9. कौन सा उद्योग कच्चे माल के रूप में बॉक्साइट का उपयोग करता है?
    एल्युमिनियम प्रगलन 
  10. कौन सा शहर भारत की ‘इलेक्ट्रॉनिक राजधानी’ के रूप में उभरा है? 
    बेंगलुरु
  11. लौह और इस्पात उद्योग को किस अनुपात में लौह अयस्क, कोकिंग कोल और चूना पत्थर की आवश्यकता होती है?
    4: 2: 1
  12. भारत की पहली सूती मिल की स्थापना कहाँ हुई थी?
    मुंबई
  13.  भारत की अधिकांश जूट मिलें किसके किनारे स्थित हैं?
    हुगली नदी
  14. एल्युमीनियम उद्योग की अवस्थिति के लिए दो प्रमुख कारक कौन-से हैं?
    बिजली और बॉक्साइट की सस्ती और नियमित आपूर्ति
  15.  भारत में अधिकांश एकीकृत इस्पात संयंत्र कहां स्थित हैं ?
    छोटानागपुर पठार
  16. भिलाई इस्पात संयंत्र किस राज्य में स्थित है?
    छत्तीसगढ़
  17. किसी देश के आर्थिक विकास की रीढ किसे कहा जाता है ? 
    विनिर्माण उद्योग को। 
  18. कृषि आधारित दो उद्योगों के नाम लिखिए। 
    चीनी उद्योग व सूती वस्त्र उद्योग
  19. सीमेण्ट उद्योग में आने वाले कच्चे माल के नाम लिखिए 
    चूना पत्थर, सिलिका और जिप्सम 
  20. NTPC (राष्ट्रीय ताप विद्युतगृह कारपोरेशन) क्या है ?
    NTPC (राष्ट्रीय ताप विद्युतगृह कारपोरेशन) भारत में बिजली उपलब्ध कराने वाली एक प्रमुख कंपनी है
  21. विनिर्माण से क्या अभिप्राय है 
    कच्चे माल को अधिक मूल्यवान उत्पादों में परिवर्तित कर अधिक मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन विनिर्माण कहलाता है।
  22. ध्वनि प्रदूषण के कारण बताइए।
    औद्योगिक और निर्माण गतिविधियों, मशीनरी, उपकरणों आदि से निकलने वाला शोर 
  23. आधारभूत उद्योग क्या है? उदाहरण दीजिए।
     वे उद्योग जो अपने उत्पादों को अन्य वस्तुओं के निर्माण के लिए कच्चे माल के रूप में आपूर्ति करते हैं जैसे लोहा- इस्पात उद्योग  और तांबा प्रगलन व एल्यूमीनियम प्रगलन उद्योग । 
  24. कच्चे माल के स्रोत के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए। 
    (i) कृषि आधारित उद्योग
    (ii) खनिज आधारित उद्योग।
  25. विनिर्माण उद्योगों के महत्व का वर्णन करें।
    विनिर्माण उद्योग कृषि के आधुनिकीकरण में मदद करते हैं। 
    विनिर्माण उद्योग लोगों को द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों में रोजगार प्रदान करके कृषि आय पर उनकी भारी निर्भरता को कम करते हैं। 
    औद्योगिक विकास बेरोजगारी और गरीबी को दूर करने में मदद करता है। 
    निर्मित वस्तुओं के निर्यात से व्यापार और वाणिज्य का विस्तार होता है जिससे अपेक्षित विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है।




 


5. खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

खनिज: खनिज एक प्राकृतिक रूप से विद्यमान समरूप तत्त्व है जिसकी एक निश्चित आंतरिक संरचना होती है।
खनिज प्रकृति में विभिन्न रूपों में पाए जाते हैं, जिनमें सबसे कठोर हीरे से लेकर सबसे मुलायम तालक तक शामिल हैं।
चट्टानें खनिजों के सजातीय पदार्थों का संयोजन हैं।
कुछ चट्टानों में एक ही खनिज होता है, जैसे चूना पत्थर, जबकि अधिकांश चट्टानों में कई खनिज होते हैं।
भौतिक और रासायनिक स्थितियों के कारण खनिजों में रंग, कठोरता, क्रिस्टल रूप, चमक और घनत्व की एक विस्तृत श्रृंखला पाई जाती है।
खनिज हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा हैं
लगभग सभी चीजें जो हम उपयोग करते हैं, एक छोटी सी पिन से लेकर एक ऊंची इमारत तक सभी खनिजों से बनी हैं।
हम जो खाना खाते हैं, उसमें भी खनिज होते हैं।
मानव प्रारंभिक युग से ही सजावट, धार्मिक और औपचारिक अनुष्ठानों के लिए खनिजों का उपयोग करता रहा है।
कार, बस, ट्रेन, हवाई जहाज खनिजों से निर्मित होते हैं।
रेलवे लाइन, सड़कों की पक्की सड़क, उपकरण और मशीनरी खनिजों से बनी हैं।
खनिजों की प्राप्ति का तरीका
अयस्क: खनिज आमतौर पर "अयस्क" के रूप में पाए जाते हैं।
प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पदार्थ जिनसे खनिज को लाभप्रद रूप से निकाला जा सकता है, अयस्क कहलाते हैं।
खनिज विभिन्न रूपों में पाए जाते हैं।
(i) आग्नेय और कायांतरित चट्टानों में खनिज दरारों, जोड़ों, भ्रंशों व विदरों में पाए जाते हैं।
आग्नेय और कायांतरित चट्टानों में खनिज दो रूपों में पाए जाते हैं
छोटे जमाव शिराओं के  रूप में और बृहत् जमाव परत के रूप में पाए जाते हैं। इनका निर्माण भी 
अधिकतर उस समय होता है 
टिन, तांबा, जस्ता और सीसा आदि जैसे प्रमुख धात्विक खनिज शिराओं और परतों से प्राप्त होते हैं।
(ii) अवसादी चट्टानों में कई खनिज संस्तरों या परतों में पाए जाते हैं।
इनका निर्माण क्षैतिज परतों में निक्षेपण, संचयन व जमाव का परिणाम है। 
कोयला तथा कुछ अन्य प्रकार के  लौह अयस्कों का निर्माण लंबी अवधि तक अत्यधिक ऊष्मा व दबाव का परिणाम है। अवसादी चट्टानों में दूसरी श्रेणी के  खनिजों में जिप्सम, पोटाश, नमक व सोडियम सम्मिलित हैं। इनका निर्माण विशेषकर शुष्क प्रदेशों में वाष्पीकरण के फलस्वरूप होता है।
(iii) खनिजों के  निर्माण की एक अन्य विधि धरातलीय चट्टानों का अपघटन है। चट्टानों के घुलनशील
तत्त्वों के अपरदन के पश्चात् अयस्क वाली अवशिष्ट चट्टानें रह जाती हैं। बॉक्साइट का निर्माण इसी प्रकार होता है ।
(iv) पहाड़ियों के आधार तथा घाटी तल की रेत में जलोढ़ जमाव के रूप में भी कुछ खनिज पाए जाते हैं। ये निक्षेप ‘प्लेसर निक्षेप’ के नाम से जाने जाते हैं। इनमें प्रायः ऐसे खनिज होते हैं जो जल द्वारा घर्षित नहीं होते। इन खनिजों में सोना, चाँदी, टिन व प्लेटिनम प्रमुख हैं।
(v) महासागर के पानी में खनिजों की विशाल मात्रा होती है, जैसे, सामान्य नमक, मैग्नीशियम और ब्रोमाइड मुख्य रूप से समुद्री जल से प्राप्त होते हैं। महासागर के तल में मैंगनीज पिंड प्रचुर मात्रा में होते हैं।
रैट होल खनन - जोवाई व चेरापूँजी में कोयले का खनन परिवार के  सदस्य द्वारा एक लंबी संकीर्ण सुरंग के रूप में किया जाता है, जिसे रैट होल खनन कहते हैं। 

[I] लौह खनिज: 
लौह खनिज धात्विक खनिजों के कुल उत्पादन मूल्य के तीन-चौथाई भाग का योगदान करते हैं। ये धातु शोधन उद्योगों के विकास को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। लौह अयस्क और मैंगनीज प्रमुख लौह खनिज हैं। 
लौह अयस्क: लौह अयस्क आधारभूत खनिज है और औद्योगिक विकास की रीढ़ है मैग्नेटाइट सबसे बेहतरीन लौह अयस्क है जिसमें 70% तक लौह की बहुत अधिक मात्रा होती है। इसमें सर्वश्रेष्ठ चुंबकीय गुण होते हैं, जो विद्युत उद्योगों में विशेष रूप से उपयोगी हैं। 
हेमेटाइट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक लौह अयस्क है जिसका अधिकतम मात्रा में उपभोग हुआ है।
इसमें मैग्नेटाइट (50-60%) की तुलना में थोड़ा कम लौह तत्व होता है ओडिशा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और झारखंड प्रमुख लौह अयस्क उत्पादक राज्य हैं। भारत में प्रमुख लौह अयस्क बेल्ट हैं:
ओडिशा-झारखंड बेल्ट: इस बेल्ट में हेमेटाइट अयस्क पाया जाता है
ओडिशा - बादामपहाड़ (जिला: मयूरभंज और केंदुझार)
झारखंड - गुआ और नोवामुंडी (जिला: सिंहभूम)
दुर्ग-बस्तर-चंद्रपुर बेल्ट: (छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र) इस बेल्ट में हेमेटाइट अयस्क पाया जाता है
छत्तीसगढ़ - बैलाडीला पर्वत श्रृंखला (जिला: बस्तर)
इन खदानों से लौह अयस्क विशाखापत्तनम बंदरगाह के माध्यम से जापान और दक्षिण कोरिया को निर्यात किया जाता है।
बल्लारी-चित्रदुर्ग-चिक्कमगलुरु-तुमकुरु बेल्ट - (कर्नाटक)
कर्नाटक के पश्चिमी घाट में स्थित कुद्रेमुख खदानें
अयस्क को पाइपलाइन के माध्यम से घोल के रूप में मंगलुरु बंदरगाह तक पहुँचाया जाता है।
महाराष्ट्र-गोवा बेल्ट - इसमें गोवा राज्य और महाराष्ट्र का रत्नागिरी जिला शामिल है। 
मैंगनीज - मैंगनीज का उपयोग मुख्य रूप से स्टील और फेरो-मैंगनीज मिश्र धातु के निर्माण में किया जाता है। एक टन स्टील बनाने के लिए लगभग 10 किलोग्राम मैंगनीज की आवश्यकता होती है। इसका उपयोग ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक और पेंट बनाने में भी किया जाता है। 
[II] अलौह खनिज: अलौह खनिज वे खनिज हैं जिनमें लोहा नहीं होता है भारत के अलौह खनिजों के भंडार और उत्पादन बहुत संतोषजनक नहीं हैं। ये खनिज धातु विज्ञान, इंजीनियरिंग और विद्युत उद्योगों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदाहरण: बॉक्साइट, सीसा, सोना। 
तांबा: तांबा लचीला, तन्य और एक अच्छा सुचालक है, और इसका उपयोग मुख्य रूप से विद्युत केबल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रासायनिक उद्योगों में किया जाता है। मध्य प्रदेश में बालाघाट की खदानें, राजस्थान में खेतड़ी की खदानें और झारखंड का सिंहभूम जिला तांबे के प्रमुख उत्पादक हैं। 
बॉक्साइटबॉक्साइट एल्युमिनियम का अयस्क है। बॉक्साइट निक्षेपों की रचना एल्यूमिनियम सीलिकेटों से समृद्ध व्यापक भिन्नता वाली चट्टानों के  विघटन से होती है। एल्यूमिनियम एक महत्त्वपूर्ण धातु है क्योंकि यह लोहे जैसी शक्ति के  साथ-साथ अत्यधिक हल्का एवं सुचालक भी होता है। इसमें अत्यधिक घातवर्ध्यताभी पाई जाती है।
भारत के बॉक्साइट जमाव मुख्य रूप से अमरकंटक पठार, मैकाल पहाड़ियों और बिलासपुर-कटनी के पठारी क्षेत्र में पाए जाते हैं। ओडिशा भारत में सबसे बड़ा बॉक्साइट उत्पादक राज्य है।  यहाँ कोरापुट जिले में पंचपतमाली निक्षेप राज्य के सबसे महत्त्वपूर्ण बॉक्साइट निक्षेप हैं।
अ-धात्विक खनिज 
अभ्रक: यह प्लेटों या पत्तियों की एक श्रृंखला से बना होता है। ये परतें इतनी पतली होती है कि अगर हज़ार चादरें एक साथ रखी जाएँ, तो यह केवल कुछ सेंटीमीटर मोटी बनती है। 
इसकी सर्वोच्च परावैद्युत शक्ति, कम विद्युत हानि कारक, इन्सुलेटिंग गुणों और उच्च वोल्टेज की प्रतिरोधिता के कारण अभ्रक विद्युत व इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में प्रयुक्त होने वाले अपरिहार्य खनिजों में से एक है।
 इसके भंडार छोटा नागपुर पठार के उत्तरी किनारे पर पाए जाते हैं। बिहार-झारखंड की कोडरमा- गया-हजारीबाग पेटी अग्रणी उत्पादक हैं।  राजस्थान के मुख्य अभ्रक उत्पादक क्षेत्र अजमेर के आस पास हैं।
आंध्र प्रदेश की नेल्लोर अभ्रक पेटी भी देश की महत्त्वपूर्ण उत्पादक पेटी है।
चूना पत्थर: चूना पत्थर कैल्शियम या कैल्शियम कार्बोनेट तथा मैगनीशियम कार्बोनेट से बनी चट्टानों में पाया जाता है। यह अधिकांशतः अवसादी चट्टानों में पाया जाता है। चूना पत्थर सीमेंट उद्योग का एक आधारभूत कच्चा माल होता है। और लौह-प्रगलन की भट्टियों के लिए अनिवार्य है।
खनन के खतरे 
खनिकों द्वारा साँस में ली गई धूल और हानिकारक धुएं उन्हें फुफ्फुसीय रोगों के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। खनन के कारण क्षेत्र के जल स्रोत दूषित हो जाते हैं। खदानों की छतें गिरने, जलमग्न होने और कोयला खदानों में आग लगने का जोखिम खनिकों के लिए लगातार खतरा बना रहता है।
कचरा और गारा फेंकने से भूमि, मिट्टी का क्षरण होता है और नदी और जलधाराओं का प्रदूषण बढ़ता है।
खनिजों का संरक्षण
खनिज संसाधनों का तेजी से उपभोग किया जा रहा है, जिसके निर्माण और संकेन्द्रण में लाखों वर्ष लगते हैं।
खनिज संसाधन सीमित और गैर-नवीकरणीय हैं।
उद्योग और कृषि खनिजों पर बहुत अधिक निर्भर हैं।
खनिज निर्माण की प्रक्रिया बहुत धीमी है।
खनिजों की पुनःपूर्ति की दर खपत की दर की तुलना में बहुत कम है।
संरक्षण के तरीके:-
खनिजों का उपयोग योजनाबद्ध और टिकाऊ तरीके से किया जाना चाहिए।
कम लागत पर निम्न श्रेणी के अयस्कों के उपयोग की अनुमति देने के लिए बेहतर तकनीकों को विकसित करने की आवश्यकता है।
स्क्रैप धातुओं का उपयोग करके धातुओं का पुनर्चक्रण।
ऊर्जा संसाधन
ऊर्जा का उत्पादन ईंधन खनिजों जैसे  कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, यूरेनियम तथा विद्युत से किया
जाता है। 
ऊर्जा संसाधनों को पारंपरिक और गैर-पारंपरिक स्रोतों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
पारंपरिक स्रोत- जलाऊ लकड़ी, गोबर के उपले, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और बिजली (जलविद्युत और तापीय दोनों)। 
ग्रामीण भारत में जलाऊ लकड़ी और गोबर के उपले सबसे आम हैं। ग्रामीण घरों में 70% से अधिक ऊर्जा की आवश्यकता इन दोनों से पूरी होती है, लेकिन घटते वन क्षेत्र के कारण इनका उपयोग जारी रखना मुश्किल होता जा रहा है। इसके अलावा, गोबर के उपलों के उपयोग को भी हतोत्साहित किया जा रहा है क्योंकि यह सबसे मूल्यवान खाद की खपत करता है जिसका उपयोग कृषि में किया जा सकता है। 
कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस को  फिर से बनने में लाखों साल लगते हैं; इस प्रकार, वे सीमित और गैर-नवीकरणीय हैं। 
गैर-पारंपरिक स्रोत-  सौर, पवन, ज्वारीय, भूतापीय, बायोगैस और परमाणु ऊर्जा। 
वे स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हैं, इसलिए वे नवीकरणीय हैं। 
कोयला: भारत में कोयला सबसे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध जीवाश्म ईंधन है। इसका उपयोग बिजली उत्पादन, औद्योगिक और घरेलू जरूरतों के लिए ऊर्जा की आपूर्ति के लिए किया जाता है। यह लोहा और इस्पात उद्योग के लिए एक अपरिहार्य कच्चा माल है। कोयले के चार प्रकार:
एन्थ्रेसाइट- यह उच्चतम गुणवत्ता वाला कठोर कोयला है। इसमें कार्बन का प्रतिशत सबसे अधिक होता है।
बिटुमिनस- यह वाणिज्यिक उपयोग में सबसे लोकप्रिय कोयला है। उच्च श्रेणी के बिटुमिनस कोयले (धातुकर्म कोयला) का उपयोग धातुकर्म में किया जाता है।
बिटुमिनस कोयले का लोहा गलाने के लिए विशेष महत्व है।
लिग्नाइट- यह निम्न श्रेणी का भूरा कोयला है
यह नरम होता है और इसमें नमी की मात्रा अधिक होती है।
मुख्य लिग्नाइट भंडार तमिलनाडु में नेवेली है।
पीट- इसमें कार्बन की मात्रा कम और नमी की मात्रा अधिक होती है।
इसकी ताप क्षमता कम होती है।
कोयले की उपस्थिति:
भारत में कोयला दो प्रमुख भूगर्भिक युगों के शैल क्रम में पाया जाता है 
एक गोंडवाना जिसकी आयु 200 लाख वर्ष से कुछ अधिक है और दूसरा टरशियरी निक्षेप जो लगभग 55 लाख वर्ष पुराने हैं। 
मुख्य रूप से धातुशोधन कोयला निम्न स्थानों पर पाया जाता है
(i) दामोदर घाटी बेल्ट (पश्चिम बंगाल, झारखंड) जिसमें झरिया, रानीगंज और बोकारो की महत्वपूर्ण कोयला खदानें हैं
(ii) गोदावरी घाटी बेल्ट
(iii) महानदी घाटी बेल्ट
(iv) वर्धा घाटी बेल्ट।
टरशियरी कोयला क्षेत्र उत्तर-पूर्वी राज्यों मेघालय,असम, अरुणाचल प्रदेश व नागालैंड में पाया जाता है।
पेट्रोलियम
पेट्रोलियम या खनिज तेल कोयले के बाद भारत में अगला प्रमुख ऊर्जा स्रोत है
इसे पाइपलाइनों द्वारा आसानी से ले जाया जा सकता है और यह कोई अवशेष नहीं छोड़ता है।
यह गर्मी और प्रकाश के लिए ईंधन, मशीनरी के लिए स्नेहक और कई विनिर्माण उद्योगों के लिए कच्चा माल प्रदान करता है
तेल शोधन शालाएँ -संश्लेषित वस्त्र, उर्वरक तथा असंख्य रासायन उद्योगों में एक नोडीय बिंदु का काम करती हैं।
भारत में अधिकांश पेट्रोलियम की उपस्थिति टरशियरी युग की शैल संरचनाओं के अपनति व भ्रंश ट्रैप में पाई जाती है। वलन, अपनति और गुंबदों वाले प्रदेशों में यह वहाँ पाया जाता है जहाँ उद्ववलन के शीर्ष में तेल ट्रैप हुआ होता है। तेल धारक परत संरध्र चूना पत्थर या बालुपत्थर होता है जिसमें से तेल प्रवाहित हो सकता है। मध्यवर्ती असरंध्र परतें तेल को ऊपर उठने व नीचे रिसने से रोकती हैं। पेट्रोलियम संरध्र और असरंध्र चट्टानों के बीच भ्रंश ट्रैप में भी पाया जाता है। प्राकृतिक गैस हल्की होने के कारण खनिज तेल के ऊपर पाई जाती है।
भारत में मुम्बई हाई, गुजरात और असम प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र हैं। 
अंकलेश्वर गुजरात का सबसे महत्त्वपूर्ण तेल क्षेत्रा है। असम भारत का सबसे पुराना तेल उत्पादक
राज्य है। डिगबोई, नहरकटिया और मोरन-हुगरीजन इस राज्य के  महत्त्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्र हैं।
प्राकृतिक गैस
यह एक स्वच्छ ऊर्जा संसाधन है क्योंकि इसे जलाने पर बहुत कम कार्बन और प्रदूषक निकलते हैं।
प्राकृतिक गैस पेट्रोलियम जमाव के साथ पाई जाती है और जब कच्चे तेल को सतह पर लाया जाता है तो यह
मुक्त हो जाती है।
इसका उपयोग घरेलू और औद्योगिक ईंधन के रूप में, खाना पकाने के ईंधन (पीएनजी) और परिवहन ईंधन (सीएनजी) के रूप में किया जाता है।
इसका उपयोग बिजली क्षेत्र में बिजली पैदा करने के लिए ईंधन के रूप में, उद्योगों में हीटिंग के उद्देश्य से, रासायनिक, पेट्रोकेमिकल और उर्वरक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में, परिवहन ईंधन के रूप में और खाना पकाने के ईंधन के रूप में किया जाता है।
कृष्णा-गोदावरी बेसिन के अपतटीय क्षेत्र में वर्तमान में भारत में उपलब्ध प्राकृतिक गैस की सबसे बड़ी मात्रा है। यह मुंबई हाई, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में भी उपलब्ध है।
गेल द्वारा निर्मित पहली 1,700 किलोमीटर लंबी हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर (HVJ) क्रोस कंट्री गैस
पाइपलाइन ने मुंबई हाई और बसीन गैस क्षेत्रों को पश्चिमी और उत्तरी भारत में विभिन उर्वरक, बिजली
और औद्योगिक परिसरों से जोड़ा है। 
विद्युत
आधुनिक विश्व में विद्युत के अनुप्रयोग इतने ज्यादा विस्तृत हैं कि इसके प्रति व्यक्ति उपभोग को विकास का सूचकांक माना जाता है। विद्युत मुख्यतः दो प्रकार से उत्पन्न कीजाती है 
(i) गैर-पारंपरिक तरीके से प्रवाही जल से हाइड्रो-टरबाइन चलाकर जल विद्युत उत्पन्न करता है 
(ii) पारंपरिक तरीके से कोयला पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस को जलाने से टरबाइन चलाकर ताप विद्युत उत्पन्न की जाती है। 
हाइड्रो बिजली तेज़ बहने वाले पानी से उत्पन्न होती है, जो एक नवीकरणीय संसाधन है।
भारत में भाखड़ा नांगल, दामोदर घाटी निगम, कोपिली हाइडल परियोजना आदि जैसी कई बहुउद्देश्यीय परियोजनाएँ हैं जो पनबिजली का उत्पादन करती हैं।
कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का उपयोग करके थर्मल बिजली उत्पन्न की जाती है। थर्मल पावर स्टेशन बिजली उत्पन्न करने के लिए गैर-नवीकरणीय जीवाश्म ईंधन का उपयोग करते हैं
ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोत
परमाणु या परमाणु ऊर्जा
परमाणु अथवा आणविक ऊर्जा अणुओं की संरचना को बदलने से प्राप्त की जाती है। जब ऐसा परिवर्तन किया जाता है तो ऊष्मा के रूप में काफी ऊर्जा विमुक्त होती है और इसका उपयोग विद्युत उफर्जा उत्पन्न करने में किया जाता है। यूरेनियम और थोरियम जो झारखंड और राजस्थान की अरावली पर्वत श्रृंखला में पाए जाते हैं, का प्रयोग परमाणु अथवा आणविक ऊर्जा के उत्पादन में किया जाता है। केरल की मोनाजाइट रेत भी थोरियम से भरपूर है
सौर ऊर्जा
भारत एक उष्णकटिबंधीय देश है, इसमें सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं।
फोटोवोल्टिक तकनीक सूर्य के प्रकाश को सीधे बिजली में बदल देती है।
सौर ऊर्जा के उपयोग से ग्रामीण परिवारों की जलाऊ लकड़ी और गोबर के उपलों पर निर्भरता कम हो सकेगी।
इससे जीवाश्म ईंधन के संरक्षण में भी मदद मिलेगी।
पवन ऊर्जा
भारत में पवन ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं
ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए बड़ी पवन चक्कियों को घुमाने के लिए पवन का उपयोग किया जाता है।
सबसे बड़ा पवन फार्म क्लस्टर तमिलनाडु में नागरकोइल से मदुरै तक स्थित है।
आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, केरल, महाराष्ट्र और लक्षद्वीप में महत्वपूर्ण पवन फार्म हैं। नागरकोइल और जैसलमेर देश में पवन ऊर्जा के प्रभावी उपयोग के लिए जाने जाते हैं।
बायोगैस
ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू खपत के लिए बायोगैस का उत्पादन करने के लिए झाड़ियों, खेत के कचरे, पशु और मानव अपशिष्ट का उपयोग किया जाता है।
यह केरोसिन, गोबर के उपले और चारकोल से अधिक कुशल है।
बायोगैस संयंत्र नगरपालिका, सहकारी और व्यक्तिगत स्तर पर स्थापित किए जा सकते हैं।
ग्रामीण भारत में मवेशियों के गोबर का उपयोग करने वाले संयंत्रों को 'गोबर गैस संयंत्र' के रूप में जाना जाता है।
ये किसान को ऊर्जा और बेहतर गुणवत्ता वाली खाद के रूप में दोहरा लाभ प्रदान करते हैं।
यह ईंधन की लकड़ी और गोबर के उपलों को जलाने से पेड़ों और खाद के नुकसान को रोकता है।
ज्वारीय ऊर्जा
महासागरीय तरंगों का प्रयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जा सकता है। सँकरी खाड़ी के आर-पार बाढ़ द्वार बना कर बाँध बनाए जाते हैं। उच्च ज्वार में इस सँकरी खाड़ीनुमा प्रवेश द्वार से पानी भीतर भर जाता है और द्वार बन्द होने पर बाँध में ही रह जाता है। बाढ़ द्वार के बाहर ज्वार उतरने पर, बाँध के पानी को इसी रास्ते पाइप द्वारा समुद्र की तरफ बहाया जाता है जो इसे ऊर्जा उत्पादक टरबाइन की ओर ले जाता है।
भारत में खम्भात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी तथा पश्चिमी तट पर गुजरात में और पश्चिम बंगाल में सुंदर
वन क्षेत्रा में गंगा के डेल्टा में ज्वारीय तरंगों द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करने की आदर्श दशाएँ उपस्थित हैं।
भू-तापीय ऊर्जा - 
पृथ्वी के  आंतरिक भागों से ताप का प्रयोग कर उत्पन्न की जाने वाली विद्युत को भू-तापीय ऊर्जा कहते हैं।
हम जानते हैं कि पृथ्वी के अंदर का भाग बहुत गर्म है। कुछ स्थानों पर यह ऊष्मा दरारों के माध्यम से सतह पर निकलती है। ऐसे क्षेत्रों में भूजल गर्म हो जाता है यह इतना तप्त हो जाता है कि यह पृथ्वी की सतह की ओर उठता है तो यह भाप में परिवर्तित हो जाता है। इसी भाप का उपयोग टरबाइन को चलाने और विद्युत उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।
भारत में दो भू-तापीय ऊर्जा परियोजनाएँ स्थापित की गई हैं जो हिमाचल प्रदेश में मणिकम के पास पार्वती घाटी में और लद्दाख में पुगा घाटी में स्थित है।
ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण : 
आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा एक आधारभूत आवश्यकता है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक सेक्टर - कृषि, उद्योग, परिवहन, वाणिज्य व घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऊर्जा के निवेश की आवश्यकता है। स्वतंत्रता के बाद से लागू की गई आर्थिक विकास योजनाओं को चालू को चालू रखने के लिए उफर्जा की बड़ी मात्रा की आवश्यकता थी। परिणामस्वरूप, पूरे देश में सभी रूपों में ऊर्जा की खपत लगातार बढ़ रही है। ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण ऊर्जा विकास का एक स्थायी मार्ग विकसित करने की तत्काल आवश्यकता है। ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा देना और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का बढ़ता उपयोग स्थायी ऊर्जा के दो आधार हैं। हमें सीमित ऊर्जा संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए सतर्क दृष्टिकोण अपनाना होगा।
व्यक्तिगत वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का अधिक उपयोग करना। 
उपयोग में न होने पर बिजली के उपकरणों को बंद करना, बिजली की बचत करने वाले उपकरणों का उपयोग करना। 
सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि जैसे ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोतों का उपयोग करना।
बिजली उपकरणों की नियमित रूप से जाँच करवाना ताकि नुकसान और रिसाव का पता लगाया जा सके।


  1. भारत में किस स्थान पर भूतापीय ऊर्जा के लिए प्रायोगिक परियोजना स्थापित की गई है?
    मणिकरण
  2. भारत में पाए जाने वाले दो प्रकार के लौह अयस्क कौन से हैं ? 
    (i) हेमेटाइट (ii) मैग्नेटाइट
  3. भारत का कौन सा राज्य बॉक्साइट का सबसे बड़ा उत्पादक है ?
    ओडिशा
  4. भारत में सबसे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध जीवाश्म ईंधन कौन सा है ? 
    कोयला
  5. भारत का सबसे पुराना तेल उत्पादक राज्य कौन सा है?
    असम।
  6. 'गोबर गैस प्लांट' किसानों के लिए कैसे फायदेमंद हैं
    'गोबर गैस प्लांट' किसानों के लिए ऊर्जा और बेहतर गुणवत्ता वाली खाद के रूप में फायदेमंद हैं।
  7. बैलाडीला लौह अयस्क क्षेत्र को इसका नाम कैसे मिला? 
    बैलाडीला पहाड़ियाँ बैल के कूबड़ जैसी दिखती हैं, इसलिए इसका नाम बैलाडीला लौह अयस्क क्षेत्र पड़ा।
  8. ईंधन के रूप में मवेशी केक के उपयोग को क्यों हतोत्साहित किया जाना चाहिए?
    (i) यह सबसे मूल्यवान खाद का उपभोग करता है जिसका उपयोग कृषि में किया जा सकता है।
    (ii) यह प्रदूषण पैदा करता है।
  9. गुणवत्ता के आधार पर एन्थ्रेसाइट और बिटुमिनस कोयले के बीच अंतर बताइए।
    एन्थ्रेसाइट
    (i) एन्थ्रेसाइट उच्चतम गुणवत्ता वाला कठोर कोयला है।
    (ii) यह ऊष्मा और कीमत में सबसे मूल्यवान है
    (iii) एन्थ्रेसाइट कोयले में 80% से अधिक कार्बन होता है।
    बिटुमिनस
    (i) यह एन्थ्रेसाइट कोयले की तुलना में निम्न श्रेणी का और नरम होता है।
    (ii) यह वाणिज्यिक उपयोग में सबसे लोकप्रिय कोयला है।
    (iii) बिटुमिनस कोयले का लोहा गलाने के लिए विशेष महत्व है
  10. भारत के सभी छह परमाणु ऊर्जा स्टेशनों के नाम बताएँ।
    (i) नरौरा परमाणु ऊर्जा स्टेशन
    (ii) काकरापारा परमाणु ऊर्जा स्टेशन।
    (iii) तारापुर परमाणु ऊर्जा स्टेशन।
    (iv) कैगा परमाणु ऊर्जा स्टेशन।
    (v) कलपक्कम परमाणु ऊर्जा स्टेशन।
    (vi) रावत भाटा परमाणु ऊर्जा स्टेशन।
  11. खनन गतिविधि खनिकों और पर्यावरण के स्वास्थ्य के लिए कैसे हानिकारक है?
    (i) खननकर्ताओं द्वारा साँस में ली गई धूल और हानिकारक धुएँ उन्हें फुफ्फुसीय रोगों के प्रति संवेदनशील बनाते हैं।
    (ii) खनन के कारण क्षेत्र के जल स्रोत दूषित हो जाते हैं।
    (iii) खदानों की छतों के ढहने, जलमग्न होने और कोयला खदानों में आग लगने का जोखिम खनिकों के लिए लगातार खतरा है।
    (iv) अपशिष्ट और घोल को डंप करने से भूमि, मिट्टी का क्षरण होता है और जलधारा और नदी प्रदूषण में वृद्धि होती है।