GSSS BINCHAWA

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6. भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास



भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास
भारत में 2015 से पहले केंद्र, राज्य तथा जिला स्तर पर योजनाओं को तैयार करने की ज़िम्मेदारी योजना आयोग की थी। परंतु जनवरी 1, 2015 को योजना आयोग का स्थान नीति आयोग ने ले लिया।
केंद्रीय तथा राज्य सरकारों को युक्तिगत तथा तकनीकी सलाह देने के लिए भारत के आर्थिक नीति निर्माण में राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से नीति आयोग स्थापित किया गया है।
नियोजन
देश के आर्थिक संसाधनों का सर्वेक्षण करके देश की आवश्यकताओं के अनुसार उनका सर्वोत्तम उपयोग करना नियोजन कहलाता है
नियोजन के उपागम – नियोजन के दो उपागम (प्रकार) होते है
(1) खण्डीय नियोजन-अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, उद्योग, परिवहन आदि के लिए योजना बना कर लागू करना ऐसा नियोजन जिसमें सभी निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर लिए जाते है तथा उनके क्रियान्वयन के लिए निचले स्तरो का सहारा लिया जाता है खण्डीय नियोजन कहलाता है
(2) प्रादेशिक -किसी प्रदेश के लिए उसके समस्त संसाधनों के उचित उपयोग और विकास के लिए कार्यक्रम बनाकर लागू करना प्रादेशिक नियोजन कहलाता है
लक्ष्य क्षेत्र नियोजन
किसी भी क्षेत्र का आर्थिक विकास उसके संसाधनों पर निर्भर करता है परन्तु आर्थिक विकास तथा नियोजन में घनिष्ठ संबंध होता है कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ संसाधनों की अधिकता होने के बावजूद भी नियोजन की कमी के कारण आर्थिक विकास नहीं हो पाता है। इसके विपरीत कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जहाँ संसाधनों की कमी है फिर भी उस क्षेत्र में नियोजन के कारण आर्थिक विकास होता है। इस प्रकार आर्थिक विकास में एक क्षेत्रीय असन्तुलन दिखायी देता है। इस क्षेत्रीय असन्तुलन को कम करने के लिए योजना आयोग ने ‘लक्ष्य क्षेत्र’ तथा ‘लक्ष्य-समूह’ योजना उपागमों को लागू किया है। ‘कमान नियंत्रित क्षेत्र विकास कार्यक्रम, सूखाग्रस्त क्षेत्र विकास कार्यक्रम, पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम ‘लक्ष्य क्षेत्र’ कार्यक्रम के उदाहरण हैं। तथा लघु कृषक विकास संस्था , सीमांत किसान विकास संस्था आदि लक्ष्य समूह कार्यक्रम के उदाहरण हैं।
पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम
पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रमों को पाँचवीं पंचवर्षीय योजना(1974) में प्रारंभ किया गया। इस विकास कार्यक्रम में उत्तराखण्ड, मिकिर पहाड़, असम की उत्तरी कछारी पहाड़ियाँ, दार्जिलिंग तथा दक्षिण पहाड़ियाँ नीलगिरी सम्मिलित हैं। पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए बनी राष्ट्रीय समिति ने 600 मीटर से अधिक ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र, जिनमें जनजातीय उप-योजना लागू नहीं है को पिछड़े पर्वतीय क्षेत्रों में सम्मिलित करने की सिफारिश की थी। इस समिति ने पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिए निम्नांकित सुझाव प्रस्तुत किए-
1. सभी लोग लाभान्वित हों, केवल प्रभावशाली व्यक्ति ही नहीं
2. पहाड़ी क्षेत्रों के संसाधनों तथा प्रतिभाओं का भरपूर विकास किया जाए।
3. इस क्षेत्र की जीविका-निर्वाह अर्थव्यवस्था को निवेश-उन्मुखी बनाना।
4. आन्तरिक प्रादेशिक व्यापार में पिछड़े क्षेत्रों का शोषण नहीं होना चाहिए।
5. बाजार व्यवस्था में सुधार किया जाए ताकि श्रमिकों का लाभ मिले।
6. पर्वतीय क्षेत्रों में पारिस्थितिकी सनन्‍तुलन बनाए रखने के प्रयास किए जाएँ।
पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम में बागवानी, बागाती कृषि, पशुपालन, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन, लघु तथा ग्रामीण उद्योगों पर बल दिया जाता है झूमिंग कृषि को स्थाई कृषि में बदलने के प्रयास किए जाते हैं
सूखा संभावी क्षेत्र विकास कार्यक्रम
यह कार्यक्रम चौथी पंचवर्षीय योजना के दौरान शुरू किया गया इसका उद्देश्य सूखा संभावी क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाना और सूखे के प्रभाव को कम करना है पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में इसके कार्यक्षेत्र को और विस्तृत किया गया। प्रारंभ में इस कार्यक्रम के अंतर्गत ऐसे सिविल निर्माण कार्यों पर बल दिया गया जिनमें अधिक श्रमिकों की आवश्यकता होती है। परन्तु बाद में इसमें सिंचाई परियोजनाओं , भूमि विकास कार्यक्रमों, चरागाह विकास आदि पर भी विशेष जोर दिया गया।
भारत में सूखा सम्भावी क्षेत्र मुख्यत: राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र का मराठवाड़ा क्षेत्र, आन्ध्र प्रदेश के रायलसीमा और तेलंगाना पठार, कर्नाटक पठार और तमिलनाडु की उच्च भूमि आदि भागों में फैले हैं।
इस कार्यक्रम की समीक्षा के पश्चात्‌ पिछड़े क्षेत्रों की राष्ट्रीय समिति ने यह पाया कि इस कार्यक्रम का प्रभाव कृषि तथा इससे सम्बद्ध क्षेत्रों के विकास तक सीमित है। जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ने के कारण भूमि पर जनसंख्या का भार बढ़ रहा है तथा कृषक सीमांत भूमि का प्रयोग करने के लिए बाध्य है। इससे पारिस्थितिकी सन्तुलन बिगड़ रहा है। अतः सुखा संभावी क्षेत्रों में वैकल्पिक रोजगार अवसर पैदा करने की आवश्यकता है। तथा समन्वित जल सम्भर विकास की रणनीतियों को अपनाकर सूखाग्रस्त क्षेत्र में मानव एवं पारिस्थितिकीय सन्तुलन स्थापित करने का प्रयास करने की आवश्यकता है।
भारत के योजना आयोग ने सन्‌ 1967 में देश के ऐसे 67 जिलों की पहचान की जो सूखा सम्भावी थे। भारत के सिंचाई आयोग ने सन्‌ 1972 में 30 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र के मापदण्ड को आधार मानकर देश के सूखा सम्भावी जिलों को सीमांकित किया।
भरमौर क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम
भरमौर जनजातीय क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले दो तहसीलें, भरमौर और होली शामिल हैं। यह 21 नवंबर, 1975 से अधिसूचित जनजातीय क्षेत्र है। इस क्षेत्र में ‘गद्दी’ जनजातीय समुदाय का आवास है। इस समुदाय की हिमालय क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान है क्योंकि गद्दी लोग ऋतु-प्रवास करते हैं ग्रीष्म ऋतु में ये लोग अपनी भेड़, बकरियों के साथ उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में चले जाते हैं। शीत ऋतु में ये निम्न प्रदेशों में आ जाते हैं। ये लोग गद्दीयाली भाषा में बात करते हैं।
भरमौर जनजातीय क्षेत्र में जलवायु कठोर है, शीत ऋतु में कड़ाके की ठण्ड तथा हिमपात होता है जबकि ग्रीष्म ऋतु सुहावनी होती है। आधारभूत संसाधन कम हैं और पर्यावरण भंगुर है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भरमौर उपमंडल की जनसंख्या 39,113 थी अर्थात् 21 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर। यह हिमाचल प्रदेश के आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है। ऐतिहासिक तौर पर, गद्दी जनजाति ने भौगोलिक और आर्थिक अलगाव का अनुभव किया
है और सामाजिक-आर्थिक विकास से वंचित रही है। इनका आर्थिक आधार मुख्य रूप से कृषि और भेड़ - बकरी पालन हैं। भरमौर का अधिकांश भाग ,500 से 3,700 मीटर की ऊँचाई के बीच स्थित है। भरमौर के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पर्वतों का विस्तार है। इसके उत्तर में पीरपंजाल तथा दक्षिण में धौलाधर पर्वत श्रेणियों का विस्तार है। इस क्षेत्र में रावी तथा इसकी दो सहायक नदियाँ बुढील नदी तथा टुंडेन नदी बहती हैं ये नदियाँ भरमौर को चार खंडो होली, खानी, कुगती तथा दुंडाह में विभक्त करती हैं।
भरमौर क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम 1970 के दशक में शुरू हुआ पाँचवीं पंचवर्षीय योजना के प्रारम्भिक वर्ष 1974 में इस क्षेत्र में जनजातीय विकास परियोजना प्रारम्भ हुई तथा हिमाचल प्रदेश की पाँच समन्वित जनजातीय विकास परियोजनाओं में भरमौर क्षेत्र को जनजातीय विकास परियोजना में भी सम्मिलित किया गया।
इस परियोजना के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
1. गद्दी जनजाति के जीवन स्तर में सुधार लाना।
2. भरमौर तथा हिमाचल प्रदेश के अन्य भागों के विकास के अन्तर को कम करना
3. परिवहन, संचार, कृषि व इससे सम्बन्धित क्रियाएँ तथा सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं का विकास करना।
भरमौर क्षेत्र में लागू किए गए समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम की निम्नलिखित उपलब्धियाँ रहीं-
1. भरमौर क्षेत्र में विद्यालयों, जनस्वास्थ्य सुविधाओं , पेयजल, सड़कों, संचार तथा विद्युत के रूप में अवसंरचनात्मक विकास हुआ है।
2. होली तथा खानी क्षेत्रों में रावी नदी के साथ बसे गाँवों को विकास का सर्वाधिक लाभ मिला है, जबकि तुन्दाह व कुगती क्षेत्र के दूरदराज के ग्राम अभी-भी विकास से अछछूते हैं।
3. भरमौर क्षेत्र की साक्षरता दरों में तीव्र वृद्धि, लिंग असमानता में कमी, लिंगानुपात में सुधार तथा बाल विवाह में कमी अनुभव की गई है।
4. 1970-2000 की अवधि में दालों तथा विभिन्न नकदी फसलों के क्षेत्रफल में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
5. परम्परागत रूप से किए जाने वाले ऋतु प्रवास में संलग्न जनसंख्या में तेजी से कमी आई है। वर्तमान में कुल गद्दी परिवारों का केवल 10 वाँ भाग ही ऋतु प्रवास करता है।
सतत्‌ पोषणीय विकास
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वार स्थापित ‘विश्व पर्यावरण और विकास आयोग (WECD) की रिपोर्ट ‘अवर कॉमन फ्रयूचर’ (जिसे ब्रंटलैंड रिपोर्ट भी कहते हैं) 1987 में सतत पोषणीय विकास की निम्न परिभाषा दी
‘एक ऐसा विकास जिसमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता पूर्ति को प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी द्वारा अपनी आवश्यकता की पूर्ति करना।’
भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संसाधनों का युक्तियुक्त प्रयोग ही सतत विकास कहलाता है
इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र
इंदिरा गांधी नहर को पहले राजस्थान नहर के नाम से जाना जाता था 1948 में कँवर सेन द्वारा संकल्पित यह नहर परियोजना 31 मार्च, 1958 को प्रारंभ हुई। यह नहर पंजाब में हरिके बाँध से निकलती है और राजस्थान के थार मरुस्थल में बहती है। इस नहर तंत्र की कुल नियोजित लंबाई 9060 किमी. है कुल कमान क्षेत्र में से 70 प्रतिशत क्षेत्र प्रवाह नहर तंत्रों और शेष क्षेत्र लिफ्ट तंत्र द्वारा किया जाएगा। नहर का निर्माण कार्य दो चरणों में पूरा किया गया है। चरण-I का कमान क्षेत्र गंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर जिले के उत्तरी भाग में पड़ता है। चरण-II का कमान क्षेत्र बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर और चुरू जिलों में पड़ता है। इसमें स्थानांतरित बालू टिब्बों वाला मरुस्थल भी सम्मिलित है जहाँ स्थानांतरी बालू टिब्बे पाए जाते हैं लिफ्ट नहर में ढाल के विपरीत प्रवाह के लिए जल को बार-बार मशीनों से उपर उठाया जाता है। इंदिरा गांधी नहर तंत्र में सभी लिफ्ट नहरें मुख्य नहर के बाएँ किनारे से निकलती हैं जबकि मुख्य नहर के दाएँ किनारे पर सभी नहरें प्रवाह प्रणाल हैं। नहर सिंचाई प्रसार ने इस शुष्क क्षेत्र की पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था और समाज को रूपांततरित कर दिया है। इससे इस क्षेत्र को पर्यावरणीय परिस्थितियों पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव पड़े हैं। लंबी अवधि तक मृदा नमी उपलब्ध् होने और कमान क्षेत्र विकास के तहत शुरू किए गए वनीकरण और चरागाह विकास कार्यक्रमों से यहाँ भूमि हरी- भरी हो गई है। इससे वायु अपरदन और नहरी तंत्र में बालू निक्षेप की प्रक्रियाएँ भी धीमी पड़ गई हैं। परंतु सघन सिंचाई और जल के अत्यधिक प्रयोग से जल भराव और मृदा लवणता की दोहरी पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो गईं। नहरी सिंचाई के प्रसार से इस प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था प्रत्यक्ष रूप में रूपांतरित हो गई है। इस क्षेत्र में सफलतापूर्वक फसलें उगाने के लिए मृदा नमी सबसे महत्वपूर्ण सीमाकारी कारक रहा यहाँ की पारंपरिक फसलों, चना, बाजरा और ग्वार का स्थान गेहूँ, कपास, मूँगपफली और चावल ने ले लिया है।
सतत पोषणीय विकास को बढ़ावा देने वाले उपाय
कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास को बढ़ावा देने वाले प्रस्तावित सात उपायों में से पाँच उपाय पारिस्थतिकीय संतुलन पुनःस्थापित करने पर बल देते हैं।
1. जल प्रबंधन नीति का कठोरता से कार्यान्वयन करना।
इस नहर परियोजना के चरण-1 में कमान क्षेत्र में फसल रक्षण सिंचाई और चरण-2 में फसल उगाने और चरागाह विकास के लिए विस्तारित सिंचाई का प्रावधान है।
2. इस क्षेत्र के शस्य प्रतिरूप में सामान्यतः जल सघन फसलों को नहीं बोया जाना चाहिए। इसका पालन करते हुए किसानों को बागाती कृषि के अंतर्गत खट्टे फलों की खेती करनी चाहिए।
3. कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम जैसे नालों को पक्का करना, भूमि विकास तथा समतलन और वारबंदी/ओसरा पद्धति (कमान क्षेत्र में नहर के जल का समान वितरण) प्रभावी रूप से कार्यान्वित की जाए ताकि बहते जल की क्षति मार्ग में कम हो सके।
4. जलाक्रांत एवं लवण से प्रभावित भूमि का पुनरूद्धार किया जाएगा।
5. वनीकरण, वृक्षों का रक्षण मेखला का निर्माण और चरागाह विकास।
6. इस प्रदेश में सामाजिक सतत पोषणता का लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है जब निर्धन आर्थिक स्थिति वाले भूआवंटियों को कृषि के लिए पर्याप्त मात्रा में वित्तीय और संस्थागत सहायता उपलब्ध करवाई जाए।
7. मात्र कृषि और पशुपालन के विकास से इस क्षेत्रों में आर्थिक सतत पोषणीय विकास की अवधारणा को साकार नहीं किया जा सकता। कृषि और इससे संबंधित क्रियाकलापों को अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टरों के साथ विकसित करना पड़ेगा।
  1. निति आयोग की स्थापना कब हुई
    [अ] 1 जनवरी 2015               
    [ब] 1 जनवरी 2014
    [स] 1 फ़रवरी 2015                 
    [द] 1 मार्च 2015                     [अ]
  2. भारत में 2015 से पहले केंद्र, राज्य तथा जिला स्तर पर योजनाओं को तैयार करने की ज़िम्मेदारी किसकी की थी ।
    [अ] निति आयोग                     
    [ब] योजना आयोग
    [स] वित्त आयोग                       
    [द] कृषि आयोग                        [ब]
  3. प्रदेशीय नियोजन का संबंध है
    [अ] आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न सेक्टरों का विकास 
    [ब] परिवहन जल तंत्र में क्षेत्रय अंतर
    [स] क्षेत्र विशेष के विकास का उपागम 
    [द] ग्रामीण क्षेत्रों का विकास          [स]
  4. आई.टी.डी.पी. निम्नलिखित में से किस संदर्भ में वर्णित है ?
    [अ] समन्वित पर्यटन विकास प्रोग्राम 
    [ब] समन्वित जनजातीय विकास प्रोग्राम
    [स] समन्वित यात्र विकास प्रोग्राम 
    [द] समन्वित परिवहन विकास प्रोग्राम [ब]
  5. इंदिरा गाँधी नहर कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास के लिए इनमें से कौन-सा सबसे महत्वपूर्ण कारक है ?
    [अ] कृषि विकास                         
    [ब] परिवहन विकास
    [स] पारितंत्र-विकास                     
    [द] भूमि उपनिवेशन                     [अ]
  6. इंदिरा गांधी नहर परियोजना कब प्रारंभ हुई।
    [अ] 1958                                    
    [ब] 1948
    [स] 1968                                    
    [द] 1938                                   [अ]
  7. सामान्यता नियोजन के कितने उपागम (प्रकार) होते है
    [अ] पांच              
    [ब] दो
    [स] तीन               
    [द] चार                                     [ब]
  8. पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम कब प्रारंभ किया गया ?
    [अ] दूसरी पंचवर्षीय योजना में 
    [ब] पांचवी पंचवर्षीय योजना में
    [स] तीसरी पंचवर्षीय योजना में 
    [द] चौथी पंचवर्षीय योजना में         [ब]
  9. सूखा संभावी क्षेत्र विकास कार्यक्रम की शुरूआत किस पंचवर्षीय योजना में की गई ?
    [अ] दूसरी पंचवर्षीय योजना में 
    [ब] पांचवी पंचवर्षीय योजना में
    [स] तीसरी पंचवर्षीय योजना में 
    [द] चौथी पंचवर्षीय योजना में       [द]
  10. भरमोर जनजातीय क्षेत्र में किस जनजाति के लोग रहते हैं ?
    [अ] एस्किमो जनजाति 
    [ब]गद्दी जनजाति
    [स] संथाल जनजाति
    [द] मीना जनजाति                     [ब]
  11. भारत में नीति आयोग से पूर्व नियोजन का कार्य किस संस्था द्वारा किया जाता था
    [अ] योजना आयोग 
    [ब] वन मंत्रालय
    [स] वित्त आयोग 
    [द] कृषि आयोग                        [अ]
  12. इंदिरा गाँधी नहर का पुराना नाम क्या था
    [अ] महात्मा गाँधी नहर 
    [ब] भारत नहर
    [स] राजस्थान नहर 
    [स] सागरमल गौपा नहर             [स]
  13. पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम में कितने जिले सम्मलित है
    [अ] 23 
    [ब] 15
    [स] 17 
    [द] 18                                     [ब]
  14. भरमौर जनजातीय क्षेत्र किस राज्य में स्थित है
    [अ] पंजाब 
    [ब] हिमाचल प्रदेश
    [स] राजस्थान 
    [द] उत्तराखंड                            [ब]
  15. भारत में जनजातीय उपयोजना कब शुरू की गई
    [अ] 1957 
    [ब] 1974
    [स] 1967 
    [द] 1978                                   [ब]
  16. हिमाचल प्रदेश के किस प्रदेश को गद्दियो की आवास भूमि कहा जाता है
    [अ] भरमौर 
    [ब] कांगड़ा
    [स] किनौर 
    [द] कुल्लू                                    [अ]
  17. इंदिरा गाँधी नहर की कुल नियोजित लम्बाई कितनी है
    [अ] 9060 किमी 
    [ब] 9456 किमी
    [स] 9650 किमी 
    [द] 8060 किमी                            [अ]
  18. गद्दी जनजाति के लोग कौनसी भाषा बोलते हैं।
    [अ] गद्दियाली 
    [ब] तेलगू 
    [स] हिंदी 
    [द] कश्मीरी                                   [अ]
  1. निति आयोग क्या है ?
    निति आयोग एक सलाहाकारी निकाय है
  2. योजना आयोग का गठन कब किया गया इसका अध्यक्ष कौन होता है
    15 मार्च 1950 को ! इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है
  3. निति आयोग की स्थापना कब हुई इसका अध्यक्ष कौन होता है
    1 जनवरी 2015 को ,इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है
  4. निति आयोग का पूरा नाम लिखिए
    National Institution for Transforming India
  5. समन्वित जनजातीय विकास परियोजना[ITDP] कब शुरू की गई
    1974 में [पांचवी पंचवर्षीय योजना]
  6. “ द पापुलेशन बम ” नामक पुस्तक कब और किसने लिखी ?
    1968 में एहर लिच ने ।
  7. “ द लिमिट टू ग्रोथ ” कब और किसने प्रकाशित की ?
    1972 में मिडोस ने ।
  8. “अवसर कॉमन फ्युचर ” रिपोर्ट किस आयोग ने प्रकाशित की ?
    विश्व पर्यावरण और विकास आयोग ने ।
  9. इंदिरा गांधी नहर की संकल्पना कब और किसेन की ?
    1984 में कँवर सेने ने ।
  10. इंदिरा गांधी नहर कहाँ से निकलती है ?
    पंजाब से हरिक बाँध से
  11. आर. टी. डी. पी. कार्यक्रम का पूरा नाम क्या है ?
    समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम
  12. भारमौर जनजातीय क्षेत्र में चम्बा जिले की कौन-कौन सी तहसीलें शामिल हैं।
    भरमौर और होली
  13. पर्यावरणीय मुद्दों पर विश्व समुदाय की चिन्ता को ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने किस आयोग की स्थापना की ।
    विश्व पर्यावरण और विकास आयोग
  14. नियोजन के उपागम कौन कौनसे हैं?
     उपागमन (1) खंडीय नियोजन (2) प्रादेषिक नियोजन।
  15. 1967 में सिंचाई आयोग ने कितने जिलों की पहचान सूखा संभावी जिलों के रूप में की?
    67 जिले।
  16. भरमौर को अधिसूचित जनजातीय क्षेत्र कब घोषित किया गया?
    21 नवम्बर 1975
  17. सतत् पोषणीय विकास की संकल्पना को परिभाषित करें।
    ‘एक ऐसा विकास जिसमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता पूर्ति को प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी द्वारा अपनी आवश्यकता की पूर्ति करना।’
  18. लक्ष्य समूह योजना उपागम के अधीन चलाये गए दो कार्यक्रमों के नाम लिखो।
    लघु कृषक विकास संस्था [SFDA]
    सीमांत किसान विकास संस्था [MFDA]
  19. आपकी दृष्टि में इंदिरा गााँधी नहर परियोजना क्षेत्र में पारिस्थतिकीय संतुलन स्थापित किने वाले दो कारको को इंगित कीजिए
    कमान क्षेत्र में किए गए वनीकरण और चरागाह विकास कार्यक्रमों से यहाँ भूमि हरी- भरी हो गई है
    कमान क्षेत्र में वायु अपरदन और नहरी तंत्र में बालू निक्षेप की प्रक्रियाएँ भी धीमी पड़ गई हैं।
  20. सूखा सम्भावी क्षेत्र विकास कार्यक्रम के दो उद्देश्य लिखिए
    1. सूखा संभावी क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाना
    2. सूखे के प्रभाव को कम करना
  21. खण्डीय नियोजन किसे कहते है ?
    अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, उद्योग, परिवहन आदि के लिए योजना बना कर लागू करना ऐसा नियोजन जिसमें सभी निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर लिए जाते है तथा उनके क्रियान्वयन के लिए निचले स्तरो का सहारा लिया जाता है खण्डीय नियोजन कहलाता है
  22. सतत पोषणीय विकास की संकल्पना की परिभाषित करें।
    ‘विश्व पर्यावरण और विकास आयोग (WECD) की रिपोर्ट ‘अवर कॉमन फ्रयूचर’ के अनुसार सतत पोषणीय विकास ‘एक ऐसा विकास जिसमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता पूर्ति को प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी द्वारा अपनी आवश्यकता की पूर्ति करना।’
  23. भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम के सामाजिक लाभ क्या हैं ?
    1. साक्षरता दर में तीव्रता से वृद्धि
    2. लिंग असमानता में कमी व लिंगानुपात में सुधार
    3. बाल-विवाह में कमी
  24. इंदिरा गांधी नहर का कमान क्षेत्र की पर्यावरणीय परिस्थितियों पर सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव लिखिए
    सकारात्मक प्रभाव – 1. कमान क्षेत्र में किए गए वनीकरण और चरागाह विकास कार्यक्रमों से यहाँ भूमि हरी- भरी हो गई है।
    2. कमान क्षेत्र में वायु अपरदन और नहरी तंत्र में बालू निक्षेप की प्रक्रियाएँ भी धीमी पड़ गई हैं।
    नकारात्मक प्रभाव - 1. सघन सिंचाई और जल के अत्यधिक प्रयोग से जल भराव और मृदा लवणता समस्याएँ उत्पन्न हो गईं ।
  25. भरमौर जन जातीय क्षेत्र की अर्थव्यवस्था व समाज को बुरी तरह प्रभावित करने वाले कारक कौन कौन से है ?
    1. भारमौर क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारक हैं -
    2. भारमौर जनजातीय क्षेत्र की जलवायु कठोर है ।
    3. पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण यहाँ संसाधन बहुत कम है ।
    4. पर्यावरण भगुंर है, कमजोर है ।
  26. नियोजन किसे कहते हैं यह कितने प्रकार का होता है
    देश के आर्थिक संसाधनों का सर्वेक्षण करके देश की आवश्यकताओं के अनुसार उनका सर्वोत्तम उपयोग करना नियोजन कहलाता है यह दो प्रकार का होता है
    1) खण्डीय नियोजन-अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, उद्योग, परिवहन आदि के लिए योजना बना कर लागू करना ऐसा नियोजन जिसमें सभी निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर लिए जाते है तथा उनके क्रियान्वयन के लिए निचले स्तरो का सहारा लिया जाता है खण्डीय नियोजन कहलाता है
    2) प्रादेशिक नियोजन -किसी प्रदेश के लिए उसके समस्त संसाधनों के उचित उपयोग और विकास के लिए कार्यक्रम बनाकर लागू करना प्रादेशिक नियोजन कहलाता है
  27. सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें। 
    यह कार्यक्रम चौथी पंचवर्षीय योजना के दौरान शुरू किया गया इसका उद्देश्य सूखा संभावी क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाना और सूखे के प्रभाव को कम करना है 
    प्रारंभ में इस कार्यक्रम के अंतर्गत ऐसे सिविल निर्माण कार्यों पर बल दिया गया जिनमें अधिक श्रमिकों की आवश्यकता होती है। परन्तु बाद में इसमें सिंचाई परियोजनाओं , भूमि विकास कार्यक्रमों, चरागाह विकास आदि पर भी विशेष जोर दिया गया।
    भारत में सूखा सम्भावी क्षेत्र मुख्यत: राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र का मराठवाड़ा क्षेत्र, आन्ध्र प्रदेश के रायलसीमा और तेलंगाना पठार, कर्नाटक पठार और तमिलनाडु की उच्च भूमि आदि भागों में फैले हैं।
    भारत के योजना आयोग ने सन्‌ 1967 में देश के ऐसे 67 जिलों की पहचान की जो सूखा सम्भावी थे। भारत के सिंचाई आयोग ने सन्‌ 1972 में 30 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र के मापदण्ड को आधार मानकर देश के सूखा सम्भावी जिलों को सीमांकित किया।

5. खनिज एवं ऊर्जा संसाधन

खनिज वर्तमान औद्योगिक सभ्यता का मूल आधार हैं। किसी देश के आर्थिक विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान होता है। खनिज सम्पदा की दृष्टि से भारत एक सम्पन्न देश है। यहाँ अनेक प्रकार के खनिज पाये जाते हैं
खनिज:- पृथ्वी से प्राप्त कार्बनिक या अकार्बनिक प्राकृतिक पदार्थ जिनकी एक विशेष परमाण्विक संरचना होती है तथा जिनके निश्चित रासायनिक और भौतिक गुण पाए जाते हैं, उन्हें खनिज कहते है
खनिज संसाधनों के प्रकार
रासायनिक एवं भौतिक गुणधर्मों के आधार पर खनिजों की दो प्रमुख श्रेणियां है
1. धात्विक खनिज - वे खनिज जिनमें धात्विक अंश पाया जाता है धात्विक खनिज कहलाते हैं धात्विक खनिज धातु के स्रोतहोते है धात्विक खनिज दो प्रकार के होते हैं
(i) लौहा धात्विक खनिज- वे धात्विक खनिज जिनमें लौह अंश पाया जाता है लौहा धात्विक खनिज कहलाते है जैसे लौहा, निकल, मैंगनीज
(ii) अलौह धात्विक खनिज- वे धात्विक खनिज जिनमें लौह अंश नहीं पाया जाता है अलौह धात्विक खनिज कहलाते है तांबा, सीसा, जस्ता, एलुमिनियम
2. अधात्विक खनिज- वे खनिज जिनमें धात्विक अंश नहीं पाया जाता है अधात्विक खनिज कहलाते है ये दो प्रकार के होते है
(i) ईंधन खनिज – ये खनिज कार्बनिक उत्पत्ति के होते हैं कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस
(ii) अन्य अधात्विक खनिज- अन्य प्रकार के अधात्विक खनिज अकार्बनिक उत्पत्ति के होते हैं जैसे अभ्रक, चूना-पत्थर तथा ग्रेफाइट आदि।
खनिजों की विशेषताएँ
1. धरातल पर खनिज असमान रूप से वितरित होते हैं।

2. खनिजों की गुणवत्ता और मात्रा के बीच प्रतिलोमी संबंध पाया जाता है अर्थात् अधिक गुणवत्ता वाले खनिज भूगर्भ में कम मात्रा में तथा कम गुणवत्ता वाले खनिज भूगर्भ में अधिक मात्र में पाए जाते हैं।

3. खनिज पदार्थ समाप्य संसाधन हैं अर्थात्‌ कुछ समय बाद ये समाप्त हो जायेंगे जिनकी पुन: पूर्ति सम्भव नहीं है।

4. भूगर्भ में खनिजों का निर्माण एक दीर्घकालीन प्रक्रिया के माध्यम से होता है। चूँकि खनिजों को पुन: निर्मित नहीं किया जा सकता अत: इनका समुचित संरक्षण एवं प्रबन्धन आवश्यक है।
भारत में खनिजों का वितरण
भारत में अधिकांश धात्विक खनिज प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्र की प्राचीन क्रिस्टलीय शैलों में पाए जाते हैं। भारत में खनिज मुख्यतः तीन विस्तृत पट्टियाँ पाई जाती हैं।
1. उत्तर-पूर्वी पठारी प्रदेश
इस पट्टी के अंतर्गत छोटानागपुर (झारखंड), ओडिशा के पठार, पं. बंगाल तथा छत्तीसगढ़ के कुछ भाग आते हैं। यह देश की सर्वाधिक सम्पन खनिज पेटी है यहाँ पर विभिन्न प्रकार के खनिज उपलब्ध हैं जैसे कि लौह अयस्क, कोयला, मैंगनीज, बॉक्साइट व अभ्रक आदि। छोटा नागपुर पठार को भारत का खनिज हृदय स्थल कहा जाता है।
2. दक्षिण-पश्चिमी पठार प्रदेश
यह पट्टी कर्नाटक, गोआ तथा संस्पर्शी तमिलनाडु उच्च भूमि और केरल पर विस्तृत है। यह पट्टी लौह धातुओं तथा बॉक्साइट में समृद्ध है। इसमें उच्च कोटि का लौह अयस्क, मैंगनीश तथा चूना-पत्थर भी पाया जाता है। निवेली लिगनाइट को छोड़कर इस क्षेत्र में कोयला निक्षेपों का अभाव है। केरल में मोनाजाइट, थोरियम और बॉक्साइट क्ले के निक्षेप हैं। गोआ में लौह अयस्क निक्षेप पाए जाते हैं।
3. उत्तर-पश्चिमी प्रदेश
यह पट्टी राजस्थान में अरावली और गुजरात के कुछ भाग पर विस्तृत है इस पट्टी के खनिज धारवाड़ क्रम की शैलों से सम्बंधित हैं। इस पट्टी में प्रमुख रूप से ताँबा व जिंक पाए जाते है। इसके अलावा राजस्थान में बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट, संगमरमर, जिप्सम, व मुल्तानी मिट्टी पाई जाती हैं। गुजरात में पेट्रोलियम निक्षेप पाए जाते है। गुजरात व राजस्थान दोनों में नमक के समृद्ध स्रोत पाए जाते हैं।

लौह अयस्क

अयस्क भारत का एक आधारभूत खनिज है। भारत में प्रतिवर्ष विश्व का लगभग 4 प्रतिशत लौह-अयस्क उत्पादित किया जाता है। भारत में एशिया के विशालतम लौह अयस्क आरक्षित हैं। भारत में लौह अयस्क के दो प्रमुख प्रकार हेमेटाइट तथा मैग्नेटाइट पाए जाते हैं। ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखण्ड तथा कर्नाटक भारत के प्रमुख लौह-अयस्क उत्पादक राज्य हैं। गोआ, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु लौह-अयस्क उत्पादित करने वाले अन्य राज्य हैं।

ओडिशा- गुरु महिसानी व बादाम पहाड़ी (मयूरभंज), किरुबुरू (क्योंझर) बोनाई (सुन्दरगढ़)
छत्तीसगढ़ – बैलाडीला पहाड़ी (बस्तर), डल्ली व राजहरा की खदानें (दुर्ग )
कर्नाटक- बाबा बूदन पहाड़ियों और कुद्रेमुख (चिकमगलूरु) संदूर-होसपेटे (बेल्लारी)
झारखंड - नोआमंडी और गुआ (सिंहभूम)
तमिलनाडु – सेलम
आंध्र प्रदेश - कुरूनूल, कडप्पा , अनंतपुर
मैंगनीज
लौह अयस्क के प्रगलन के लिए मैंगनीज एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है मैंगनीज निक्षेप मुख्य रूप से धारवाड़ क्रम की शैलों में पाए जाते है। भारत में ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश प्रमुख मैंगनीज उत्पादक राज्य है तेलंगाना, गोआ तथा झारखंड गौण, मैंगनीज उत्पादक राज्य है महाराष्ट्र में मैंगनीज खदानें इस्पात संयंत्रों से दूर स्थित हैं। इसलिए ये अलाभकरी है
बॉक्साइट
बॉक्साइट एल्यूमिनियम का अयस्क है। बॉक्साइट मुख्यतः टरश्यरी निक्षेपों में पाया जाता है और लैटराइट चटटानों से संबद्ध है।
ओडिशा बॉक्साइट का सबसे बड़ा उत्पादक है। इसके अलावा झारखंड, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। कर्नाटक, तमिलनाडु, तथा गोआ बॉक्साइट के गौण उत्पादक हैं।
ताँबा
ताम्बे का उपयोग बिजली की मोटरें, ट्रांसफार्मर तथा जेनेरेटर्स आदि बनाने तथा विद्युत उद्योग में किया जाता है। यह एक मिश्रातु योग्य, आघातवर्ध्य तथा तन्य धातु हैं। आभूषणों को सुदृढ़ता प्रदान करने के इसे स्वर्ण के साथ भी मिलाया जाता है। ताँबा निक्षेप मुख्यतः झारखंड के सिंहभूमि जिले में, मध्य प्रदेश के बालाघाट तथा राजस्थान के झंझुनु एवं अलवर जिलों में पाए जाते हैं। ताँबे के गौण उत्पादक आंध्र प्रदेश गुंटूर जिला , कर्नाटक के चित्रदुर्ग तथा हासन जिले और तमिलनाडु का दक्षिण आरकाट जिला हैं।
अभ्रक
अभ्रक का उपयोग मुख्यतः विद्युत एवं इलेक्ट्रोनिक्स उद्योगों में किया जाता है। भारत में अभ्रक मुख्यतः झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना व राजस्थान में पाया जाता है। इसके अलावा तमिलनाडु, पं. बंगाल और मध्य प्रदेश में भी अभ्रक का उत्पादन होता हैं।
झारखंड - हजारीबाग पठार
आंध्र प्रदेश - नेल्लोर
राजस्थान - राजस्थान अभ्रक की पट्टी जयपुर से भीलवाड़ा और उदयपुर के आसपास विस्तृत है।
कर्नाटक - मैसूर व हासन
तमिलनाडु - कोयम्बटूर, तिरुचिरापल्ली, मदुरई तथा कन्याकुमारी
महाराष्ट्र - रत्नागिरी
पश्चिम बंगाल - पुरुलिया एवं बाँकुरा
ऊर्जा संसाधन
भारत में पाए जाने वाले वाले ऊर्जा स्रोत के निम्नलिखित दो वर्ग हैं-
1. परम्परागत ऊर्जा स्रोत - कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस ( इन्हें जीवाश्म ईंधन भी कहा जाता है) के अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा इस वर्ग में सम्मिलित है। यह सभी समाप्त होने वाले ऊर्जा संसाधन होते हैं।
2. अपरम्परागत ऊर्जा स्त्रोत - इस वर्ग में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा तथा जैव ऊर्जा नामक ऊर्जा स्रोत सम्मिलित हैं। यह ऊर्जा स्रोत नवीनीकरण योग्य होने के कारण सततपोषणीय ऊर्जा के स्रोत: होने के साथ पर्यावरण-मित्र ऊर्जा स्रोत होते हैं।
परम्परागत ऊर्जा स्रोत
1. कोयला
भारत में शक्ति संसाधनों में कोयला एक अति महत्वपूर्ण संसाधन है। जिसका मुख्य प्रयोग ताप विद्युत उत्पादन तथा लौह अयस्क के प्रगलन के लिए किया जाता है।भारत में शक्ति संसाधनों में कोयला एक अति महत्वपूर्ण संसाधन है। भारत में इसकी तीन किस्मों-एन्श्रेसाइट ,बिटूमिनस तथा लिग्नाइट का खनन होता है कोयला मुख्य रूप से दो भूगर्भिक कालों की शैल क्रमों में पाया जाता है जिनके नाम हैं गोंडवाना और टर्शियरी निक्षेप।
भारत में कोयला निक्षेपों का लगभग 80 प्रतिशत भाग बिटुमिनियस प्रकार का तथा गैर कोककारी श्रेणी का है। भारत में गोंडवाना युगीन कोयला छत्तीसगढ़, पं. बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में अवस्थित कोयला क्षेत्रों में है। दामोदर घाटी क्षेत्र भारत का सबसे बड़ा गोंडवाना कोयला उत्पादक क्षेत्र है झरिया सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र है जिसके बाद रानीगंज आता है। भारत में टर्शियरी युगीन कोयला असम, मेघालय, जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश व पश्चिमी बंगाल में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त भूरा कोयला या लिगनाइट तमिलनाडु के तटीय भागों पांडिचेरी, गुजरात और जम्मू एवं कश्मीर में भी पाया जाता है।
भारत के प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र निम्न है
1.सिंगरोनी (आंध्रप्रदेश)
2.सिंगरौली (मध्यप्रदेश)
3.झरिया (झारखण्ड)
4.रानीगंज (पश्चिम बंगाल)
5.तलचर (उड़ीसा)
6.कोरबा( छतीसगढ़)
7. नवेली (तमिलनाडु) लिग्नाइट कोयला उत्पादक क्षेत्र
2. पेट्रोलियम
पेट्रोलियम मुख्यतः टर्शियरी काल की अवसादी चट्टानों में पाया जाता है।अपनी दुर्लभता और विविध उपयोगों के लिए पेट्रोलियम को तरल सोना कहा जाता है यह मोटर-वाहनों, रेलवे तथा वायुयानों में ईंधन के लिए ऊर्जा का एक अनिवार्य स्रोत है। पेट्रोलियम से अनेक सह-उत्पाद जैसे उर्वरक, कृत्रिम रबर, कृत्रिम रेशे, दवाइयाँ, वैसलीन, स्नेहकों, मोम , साबनु तथा अन्य सादैंर्य सामग्री पेट्रो-रसायन उद्योगों में बनाये जाते है 1956 में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग की स्थापना के बाद भारत में विस्तृत एवं व्यवस्थित रूप से तेल की खोज एवं उत्पादन की शुरूआत हुई । भारत में मुख्य रूप से निम्न क्षेत्रो में तेल का उत्पादन होता है
1. असम - डिगबोई, नहारकटिया, मोरान तथा सूरमा घाटी
2. गुजरात - अंकलेश्वर, कालोल, मेहसाणा, नवागाम, कोसांबा तथा लुनेज
3. अरब सागर- मुंबई हाई
कूपों से निकाला गया तेल अपरिष्कृत तथा अनेक अशुद्धियों से परिपूर्ण होता है। इसे सीधे प्रयोग में नहीं लाया जा सकता। इसलिए इसे तेल सोधनशालाओं में सोधित किया जाता है भारत में दो प्रकार के तेल शोधन कारखाने हैं: (1) क्षेत्र आधारित (2) बाजार आधारित। डिगबोई तेल शोधन कारखाना क्षेत्र आधारित तथा बरौनी बाजार आधारित तेल शोधन कारखाने के उदाहरण हैं।
3. प्राकृतिक गैस
सामान्यतया प्राकृतिक गैस की उपस्थिति पेट्रोलियम के संचित भण्डारों के साथ-साथ मिलती है भारत में प्राकृतिक गैस के परिवहन, परिशोधन तथा विपणन के लिए 984 में गैस अथॉरिटी ऑफ इण्डिया लिमिटेड (GAIL) का गठन किया गया। प्राकृतिक गैस के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र असम, गुजरात, राजस्थान, त्रिपुरा, तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश राज्यों में हैं। रामानाथपुरम (तमिलनाडु) में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग ने प्राकृतिक गैस के विशाल भंडारों के संकेत मिले है
4. नाभिकीय ऊर्जा
नाभिकीय ऊर्जा के उत्पादन में प्रयुक्त होने वाले महत्वपूर्ण खनिज यूरेनियम और थोरियम हैं। यूरेनियम निक्षेप धारवाड़ शैलों में पाए जाते हैं। यह राजस्थान (उदयपुर, अलवर, झुंझुनू), मध्य प्रदेश (दुर्ग), महाराष्ट्र (भंडारा) तथा हिमाचल प्रदेश ( कुल्लू) में पाया जाता है। भारत में यूरेनियम झारखण्ड (सिंहभूम), राजस्थान (उदयपुर, अलवर, झुंझुनू), मध्य प्रदेश (दुर्ग), महाराष्ट्र (भंडारा) तथा हिमाचल प्रदेश ( कुल्लू) में मिलने वाली धारवाड़ चट्टानों में पाया जाता है और थोरियम छोटा नागपुर पठार (झारखण्ड) तथा केरल की समुद्र तटीय बालू में प्राप्त होता है। भारत में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना 1948 में की गई थी किन्तु इस क्षेत्र में वास्तविक प्रगति 1954 में ट्रांबे परमाणु ऊर्जा संस्थान की स्थापना के बाद हुई 1967 में ट्रांबे परमाणु ऊर्जा संस्थान का नाम भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र कर दिया गया
भारत के निम्नलिखित परमाणु शक्ति केन्द्र है
(1) तारापुरा (महाराष्ट्र)
(2) रावतभाटा(राजस्थान)
(3) काकरापारा(गुजरात)
(4) कैगा(कर्नाटक)
(5) नरौरा(उत्तर प्रदेश)
(6) कलपक्कम (तमिलनाडु)
अपरम्परागत ऊर्जा स्त्रोत
1. सौर ऊर्जा

फोटोवोल्टाइक सेलों में आपतित सूर्य की किरणों को जब ऊर्जा में बदल दिया जाता है तो उसे सौर-ऊर्जा कहा जाता है। फोटोवोल्टाइक तथा सौर तापीय प्रौद्योगिकी सौर-ऊर्जा को काम में लाने वाले दो महत्वपूर्ण एवं प्रभावी प्रक्रम है। अन्य सभी अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की अपेक्षा सौर तापीय प्रौद्योगिकी अधिक लाभप्रद है साथ ही यह कम लागत में प्राप्त होने वाली, पर्यावरण मित्र तथा निर्माण में सरल है। सौर-ऊर्जा का सामान्यतया उपयोग हीटरों, सौर कुकर्स, 'फसल शुष्ककों आदि जैसे उपकरणों में अधिकाधिक हो रहा है। भारत के पश्चिमी भागों गुजरात व राजस्थान में सौर ऊर्जा के विकास की अधिक संभावनाएँ हैं।
2. पवन ऊर्जा
पवन ऊर्जा पूर्णरूपेण प्रदूषण मुक्त और ऊर्जा का असमाप्य स्रोत है। उन भागों में जहाँ वर्ष के अधिकांश दिनों में तीव्र गति से हवाएँ चलती हैं,वहां प्रवाहित पवन की गतिज ऊर्जा को टरबाइन के माध्यम से विद्युत-ऊर्जा में बदला जाता है। भारत में पवन ऊर्जा के लिए राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक में अनुकूल परिस्थितियाँ विद्यमान हैं।
3. ज्वारीय तथा तरंग ऊर्जा
ज्वारीय ऊर्जा अविरल ज्वारीय तरंगों तथा महासागरीय धाराओं से उत्पादित की जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर उठने वाली वृहत ज्वारीय तरंगें इस ऊर्जा के उत्पादन के लिए अनुकूल दशाएँ प्रदान करती हैं। अपरम्परागत ऊर्जा स्रोतों में ज्वारीय ऊर्जा एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत है। भारत में खम्भात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी तथा सुन्दरवन देश के ज्वारीय ऊर्जा उत्पादन के सम्भाव्य क्षेत्र हैं।
4. भूतापीय ऊर्जा
भू-गर्भ में मैग्मा या रेडियोधर्मी तत्वों के विखण्डन से जब वहाँ का तापक्रम अधिक बढ़ जाता है तो भू-सतह के ठीक नीचे स्थित चट्टानें भी गर्म हो जाती हैं। इन चट्टानों द्वारा जो ऊर्जा निकलती है, उसे भूतापीय ऊर्जा कहा जाता है। इसे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। गर्म सोते का गर्म जल तथा इनकी अति गर्म वाष्प का उपयोग भी ऊर्जा उत्पादन हेतु किया जाता है।
भारत में, भूतापीय ऊर्जा संयंत्र हिमाचल प्रदेश के मनीकरण में अधिकृत किया जा चुका है। भूतापीय ऊर्जा सस्ता, स्वस्थ तथा कभी समाप्त न होने वाला ऊर्जा-ख्रोत है। भूगर्भ में उपस्थित तापीय ऊर्जा भविष्य में एक अति-महत्वपूर्ण वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में प्रयुक्त होने की सम्भावना है।
5. जैव-ऊर्जा
जैविक पदार्थों जैसे कृषि अवशेष, नगरपालिका औद्योगिक व अन्य अपशिष्ट से प्राप्त ऊर्जा को जैव ऊर्जा कहा जाता है। इसे विद्युत-ऊर्जा, ताप-ऊर्जा अथवा खाना पकाने के लिए गैस में परिवर्तित किया जा सकता है। इस ऊर्जा के उत्पादन से एक ओर अपशिष्ट व कूड़ा-करकट का सुचारु निपटान होता है तो दूसरी ओर उससे उपयोगी ऊर्जा की भी प्राप्ति होती है। यह ऊर्जा ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक जीवन को बेहतर बनाने में सहयोगी तो होती ही है साथ ही पर्यावरण प्रदूषण घटाने तथा जलाऊ लकड़ी की बचत करने में इसका महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। नगरपालिका कचरे को ऊर्जा में बदलने वाली ऐसी ही एक परियोजना नई दिल्ली के ओखला में स्थित है।
खनिज संसाधनों का संरक्षण
वर्तमान में संसाधन उपयोग के परम्परागत तरीकों के परिणामस्वरूप समस्त विश्व को बड़ी मात्रा में अपशिष्ट के साथ-साथ अनेक गम्भीर पर्यावरणीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। सतत पोषणी विकास व मानव समुदाय की भावी पीढ़ियों के हितों के लिए संसाधनों का संरक्षण अनिवार्य है। संसाधनों के संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपायों को कार्यान्वित करना आवश्यक है-
(1) ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों (सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा तथा भूतापीय ऊर्जा) का अधिकाधिक विकास किया जाना चाहिए।
(2) धात्विक खनिज पदार्थों के संरक्षण के लिए छाजन धातु का पुन: चक्रण कर उपयोग किया जाना चाहिए।
(3) खनिज उत्खनन से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिए ठोस कदम उठने होंगे अर्थात्‌ यह भी प्रयास करना होगा कि खनिजों के उत्खनन से अन्य संसाधनों को कोई हानि न हो।
(4) अति अल्प उपलब्ध धातुओं के स्थान पर उनके प्रतिस्थापनों का उपयोग करना चाहिए।
(5) सामरिक तथा अति अल्प मात्रा में उपलब्ध खनिजों के निर्यात को अतिसीमित कर देना चाहिए जिससे उनके संचित भण्डारों का उपयोग लम्बे समय तक किया जा सके

 

 7.खनिज तथा ऊर्जा संसाधन                         pdf 

 

1.      भारत का सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र कौनसा है?

[अ] झरिया                                                

[ब] बोकारों

[स] रानीगंज                                              

[द] नेवेली                                      [अ]

2.      गैस अथॉरिटी ऑफ इण्डिया लिमिटेड की स्थापना कब हुई?

[अ] 984                                                  

[ब] 1994

[स] 1974                                                            

[द] 964                                        [अ]

3.      निम्न में से कौनसे खनिज का उपयोग विद्युत एवं इलेक्ट्रोनिक्स उद्योगों में किया जाता है?

[अ] बॉक्साइट  

[ब] अभ्रक

[स] डेलोमाइट                                            

[द] लौह                                        [ब]

4.      निम्न में से किस खनिज को तरल सोनाकहा जाता है?

[अ] प्राकृतिक गैस                                       

[ब] कोयला

[स]यूरेनियम                                             

[द] पेट्रोलियम                                 [द]

5.      एल्युमिनियम धातु कौनसे अयस्क से प्राप्त होती है?

[अ] मैग्नेटाइट                                             

[ब]हेमेटाईट

[स] बॉक्साइट                                             

[द] लिगनाइट                                  [स]

6.      भारत में किस किस्म का कोयला सर्वाधिक है?

[अ] एन्श्रोसाइट                                          

[ब] बिटुमिन्स

[स] लिग्नाइट                                              

[द] पीट                                         [ब]

7.      परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना कब हुयी?

[अ] 1948                                                

[ब] 1990

[स] 950                                                  

[द] 1960                                      [अ]

8.      निम्नलिखित में से किस स्थान पर पहला परमाणु ऊर्जा स्टेशन स्थापित किया गया था?

[अ] नरोरा                                                  

[ब] तारापुर

[स] रावतभाटा                                            

[द] राणाप्रताप सागर                         [ब]

9.      निम्नलिखित में से कौनसा खनिज ' भूरा कोयलाके नाम से जाना जाता हे?

[अ] लिग्राइट                                              

[ब] माइका

[स] ताँबा                                                   

[द] पेट्रोलियम                                 [अ]

10.    राजस्थान में किस स्थान पर सौर ऊर्जा शक्तिग्रह स्थापित किया गया है?

[अ] जोधपुर [मथानिया]                                

[ब] बीकानेर

[स] सीकर                                                  

[द] बाड़मेर                                     [अ]

11.    निम्न में से कौनसा ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत है?

[अ] कोयला                                               

[ब] पेट्रोलियम

[स] नाभिकीय ऊर्जा                                      

[द] जैवभार [बायोमास]                     [द]

12.    भारत में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग की स्थापना कब हुई थी?

[अ] 1966                                                

[ब] 1956

[स] 1946                                                 

[द]1976                                       [ब]

13.    हाल ही में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग ने प्राकृतिक गैस के संभावित भण्डार का पता लगाया है?

[अ] मंथानिया [राजस्थान]                              

[ब] रामानाथपुरम [तमिलनाडू]

[स] नवेली [तमिलनाडू]                                 

[द] तारापुर [महाराष्ट्र ]                      [ब]

14.    अंकलेश्वरकालोलमेहसाणानवागामकोसांबा तथा लुनेज महत्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्र कौनसे राज्यमें हैं?

[अ]उत्तर प्रदेश                                            

[ब) गुजरात

[स] राजस्थान                                             

[द] हिमाचल प्रदेश                           [ब]

15.    निम्न में से धात्विक खनिज नहीं है-

[अ] लौहा                                                  

[ब] ताँबा

[स] बॉक्साइट                                            

[द] माइका                                     [द]

16.    निम्न में से कौनसा अधात्विक खनिज नहीं है?

[अ] माइका                                               

[ब] ग्रेफाइड

[स] कोयला                                               

[द] मैंगनीज                                    [द]

17.    हर बाबा बूदन पहाड़ियाँ कौनसे अयस्क के लिए विख्यात है?

[अ] ताँबा                                                  

[ब] लौहा

[स] चाँदी                                                  

[द] सोना                                       [ब]

18.    निम्न में से कौनसा राज्य मैंगनीज/बॉक्साइड उत्पादन में अग्रणी है?

[अ] महाराष्ट्र                                             

[ब] ओडिशा

[स] झारखण्ड                                              

[द] दत्तीसगढ़                                  [ब]

19.    मोनाजाइट रेत में निम्नलिखित में से कौन-सा खनिज पाया जाता है?

[अ]खनिज तेल                                           

[ब] यूरेनियम

[स] थोरियम                                              

[द] कोयला                                    [स]

20.    अंकलेश्वर तेल क्षेत्र किस राज्य में स्थित है?

[अ]असम                                                  

[ब] महाराष्ट्र

[स] आन्ध्र प्रदेश                                          

[द] गुजरात                                     [द]

21.    भारत में किस राज्य में सर्वाधिक थोरियम निकाला जाता है?

[अ]तमिलनाडु                                             

[ब] केरल

[स] कर्नाटक                                               

[द] महाराष्ट्र                                   [ब]

22.    बॉम्बे हाई किस लिए प्रसिद्ध है?

[अ]पनडुब्बी निर्माण के लिए                           

[ब] परमाणु रिएक्टर के लिए

[स] पेट्रोलियम भण्डार के लिए                         

[द] मत्स्य के लिए                            [स]

23.    भारत का नूनमती तेल शोधक कारखाना स्थित है

[अ]बिहार                                                  

[ब] महाराष्ट्र

[स] केरल                                                  

[द] असम                                      [द]

24.    सूर्य शक्ति [ऊर्जा] के उत्पादन की उपयुक्त दशाएँ पायी जाती हैं

[अ]तमिलनाडु में                                         

[ब] राजस्थान में

[स] उत्तरांचल में                                          

[द] मध्य प्रदेश में                             [ब]

25.    निम्न में से किस नदी बेसिन में कोयले के निक्षेप नहीं पाए जाते हैं?

[अ]ब्रह्मपुत्र                                    

[ब] गोदावरी

[स] दामोदर                                                

[द] गंगा                                         [द]


1.    दुर्ग लौह-अयस्क उत्पादक क्षेत्र किस राज्य में है

छत्तीसगढ़ में

2.    सिंगरेनी किस खनिज  के लिए प्रसिद्ध है?

कोयला

3.    रत्नागिरि किस राज्य का खनिज क्षेत्र है?

महाराष्ट्र

4.    कोरबा किस खनिज उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है?

कोयला

5.    बालाघाट मैगनीज क्षेत्र किस राज्य में स्थित है ?

मध्य प्रदेश

6.    सूर्य शक्ति (ऊर्जा) के उत्पादन की उपयुक्त दशाएँ पायी जाती हैं

राजस्थान में

7.     झरिया कोयला क्षेत्र किस राज्य में स्थित है ?

झारखण्ड 

8.     उड़ीसा के मयूरभंजक्योंझर तथा बोनाई क्षेत्रों में कौन-सी धातु मिलती है ?

लोहा

9.     नाभिकीय ऊर्जा के उत्पादन में कौनसे खनिज प्रयुक्त होते हैं ?

यूरेनियम और थोरियम

10.   यूरेनियम किस क्रम की चट्टानों में पाया जाता है?

धारवाड़

11.   भारत के  किस राज्य में कोयले का सबसे अधिक भण्डार है ?

झारखण्ड

12.   बॉक्साइड का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य कौनसा  है ?

ओडिशा

13.   कुद्रेमुख लौह खनिज परियोजना निम्नलिखित में से किस राज्य में स्थित है ?

कर्नाटक

14.   भारत का सबसे बड़ा गोंडवाना कोयला  उत्पादक क्षेत्र कौन सा है ?

दामोदर घाटी क्षेत्र

15.   पेट्रोलियम किस प्रकार की चट्टानों में पाया जाता है ?

टर्शयरी युगीन अवसादी चट्टानों में

16.   काला सोनातरल सोनाउद्योगो की जननी व शक्ति का प्रतीक किसे कहते हैं ?

कोयला

17.   भारत में सर्वाधिक लौह-अयस्क का  उत्पादन करने वाला राज्य कौनसा है 

कर्नाटक

18.   गैस अथॉरिटी ऑपफ इंडिया लिमिटेड का स्थापना कब हुई ?

1984 मे

19.   एलुमिनियम के अयस्क का नाम लिखिए

अथवा

एल्युमिनियम बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में किस खनिज अयस्क का उपयोग किया जाता है ?

बॉक्साइट

20.   भारत में कौन सा राज्य मैंगनीज का अग्रणी उत्पादक हैं ?

उड़ीसा

21.   मुंबई हाई किसके लिए प्रसिद्ध है ?

पेट्रोलियम

22.   राजस्थान के बाड़मेर जिले में पेट्रोलियम खनन किस कम्पनी  द्वारा किया जाता है ?

क्रेनयर्स एनर्जी लिमिटेड

23.   गुजरात के तेल उत्पादक क्षेत्र बताइए

अंकलेश्वरमेहसानाकलोल

24.   भारत के प्रमुख लिग्नाइट कोयला उत्पादक क्षेत्र का नाम लिखिए

नवेली (तमिलनाडू)

25.   परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना कब हुई ?

1948

26.   कौनसा खनिज भूरा हीरा के नाम से जाना जाता है ?

लिग्नाइट कोयला

27.   तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग की स्थापना  कब की गई ?

1956 में

28.   भारत में परमाणु ऊर्जा का शुभारम्भ कहाँ से हुआ ?

तारापुर (महाराष्ट्र)

29.   भारत में थोरियम का उत्पादन किस राज्य में सर्वाधिक होता है ?

केरल में

30.   भारत में भूपातीय ऊर्जा संयन्त्र कहाँ स्थापित किया गया है ?

मनीकरण (हिमाचल प्रदेश) में

31.   भारत में लौह अयस्क के कौनसे प्रकार  पाए जाते हैं ?

हेमेटाइट तथा मैग्नेटाइट प

32.   असम के तेल उत्पादक क्षेत्र बताइए

डाग्बोईनाहरकटियासुरमा घाटी

33.   भारत में किन दो भूगर्भिक कालो का कोयला पाया जाता है ?

गौडवाना युगीन व टर्शयरी युगीन

34.   भारत की सर्वाधिक सम्पन खनिज पेटी कौनसी है

उत्तर-पूर्वी पठारी प्रदेश

35.   भारत के परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए

कोयलापेट्रोलियम पदार्थप्राकृतिक गैसजल विद्युतलकड़ी

36.   रावतभाटा परमाणु ऊर्जा केन्द्र किस शहर के निकट अवस्थित है ?

कोटा (राजस्थान)

37.   नरोरा नाभिकीय ऊर्जा केंद्र किस राज्य में अवस्थित है ?

उत्तर प्रदेश

38.   भारत में पाए जाने वाले कुल कोयला का कितना प्रतिशत बिटुमिनस प्रकार का है?

80 प्रतिशत

39.   ऊर्जा के  नवीनीकरण योग्य / अपरम्परागत स्रोतों के नाम लिखिए

सौर ऊर्जापवन ऊर्जाज्वारीय तथा तरंग ऊर्जाभूतापीय ऊर्जाजैव-ऊर्जा आदि ऊर्जा के  नवीनीकरण योग्य / अपरम्परागत स्रोत है

40.   भारत में कौन से दो प्रकार के तेल शोधन कारखाने है ?

भारत में दो प्रकार के तेल शोधन कारखाने हैं  (1) क्षेत्र आधारित    (2) बाजार आधारित ।

डिगबोई तेल शोधन कारखाना क्षेत्र आधारित तथा बरौनी बाजार आधारित तेल शोधन कारखाने के उदाहरण हैं ।

41.   भारत के प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र कौनसे है ?

1. सिंगरोनी (आंध्रप्रदेश)                                            2. सिंगरौली (मध्यप्रदेश)       

3. झरिया (झारखण्ड) झरिया सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र है      4. रानीगंज (पश्चिम बंगाल) 

5. तलचर (उड़ीसा)                                                  6. कोरबा( छतीसगढ़)

42.   नाभिकीय ऊर्जा क्या है भारत के प्रमुख नाभिकीय ऊर्जा केन्द्रों के नाम लिखिए

यूरेनियम व थोरियम खनिजों के नियंत्रित विखंडन से प्राप्त ऊर्जा नाभिकीय ऊर्जा कहलाती है

भारत के प्रमुख नाभिकीय ऊर्जा केन्द्र

(1) तारापुरा (महाराष्ट्र)                      

(2) रावतभाटा (राजस्थान)             

(3) काकरापारा (गुजरात)                   

(4) कैगा (कर्नाटक)

(5) नरौरा (उत्तर प्रदेश)

43.   मैंगनीज के दो लाभ बताओं तथा चार उत्पादक राज्यों का उल्लेख करो

1 लौह अयस्क के प्रगलन के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल है  ।

2 इसका उपयोग लौह मिश्र धातु तथा विनिर्माण में भी किया जाता है  ।

खनन क्षेत्र :- भारत में ओडिशाकर्नाटकमहाराष्ट्रमध्य प्रदेश प्रमुख मैंगनीज उत्पादक राज्य है  तेलंगानागोआ तथा झारखंडमैंगनीज गौण उत्पादक राज्य है

44.   जैव ऊर्जा क्या है इसका महत्व लिखिए

जैविक पदार्थों जैसे कृषि अवशेषनगरपालिका औद्योगिक व अन्य अपशिष्ट से प्राप्त ऊर्जा को जैव ऊर्जा कहा जाता है  इसे विद्युत-ऊर्जाताप-ऊर्जा अथवा खाना पकाने के लिए गैस में परिवर्तित किया जा सकता है । इस ऊर्जा के उत्पादन से एक ओर अपशिष्ट व कूड़ा-करकट का सुचारु निपटान होता है तो दूसरी ओर उससे उपयोगी ऊर्जा की भी प्राप्ति होती है । यह ऊर्जा ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक जीवन को बेहतर बनाने में सहयोगी तो होती ही है साथ ही पर्यावरण प्रदूषण घटाने तथा जलाऊ लकड़ी की बचत करने में इसका महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है ।

45.   भारत में पाई जाने वाली प्रमुख  खनिज पट्टियों का वर्णन कीजिए

भारत में खनिज मुख्यतः तीन विस्तृत पट्टियाँ पाई जाती हैं  ।

1. उत्तर-पूर्वी पठारी प्रदेश - इस पट्टी के अंतर्गत छोटानागपुर (झारखंड)ओडिशा के पठारपं. बंगाल तथा छत्तीसगढ़ के कुछ भाग आते हैं ।  यह देश की सर्वाधिक सम्पन खनिज पेटी है यहाँ पर विभिन्न प्रकार के खनिज उपलब्ध हैं जैसे कि लौह अयस्ककोयलामैंगनीजबॉक्साइट व अभ्रक आदि । छोटा नागपुर पठार को भारत का खनिज हृदय स्थल कहा जाता है ।

2. दक्षिण-पश्चिमी पठार प्रदेश- यह पट्टी कर्नाटकगोआ तथा संस्पर्शी तमिलनाडु उच्च भूमि और केरल पर विस्तृत है । यह पट्टी लौह धातुओं तथा बॉक्साइट में समृद्ध है । इसमें उच्च कोटि का लौह अयस्कमैंगनीश तथा चूना-पत्थर भी पाया जाता है । निवेली लिगनाइट को छोड़कर इस क्षेत्र में कोयला निक्षेपों का अभाव है । केरल में मोनाजाइटथोरियम और बॉक्साइट क्ले के निक्षेप हैं । गोआ में लौह अयस्क निक्षेप पाए जाते हैं ।

3.उत्तर-पश्चिमी प्रदेश -यह पट्टी राजस्थान में अरावली और गुजरात के कुछ भाग पर विस्तृत है इस पट्टी के खनिज धारवाड़ क्रम की शैलों से सम्बंधित  हैं । इस पट्टी में प्रमुख रूप से ताँबा व जिंक पाए जाते  है । इसके अलावा राजस्थान में बलुआ पत्थरग्रेनाइटसंगमरमरजिप्समव मुल्तानी मिट्टी पाई जाती हैं । गुजरात में पेट्रोलियम निक्षेप पाए जाते है । गुजरात व राजस्थान दोनों में नमक के समृद्ध स्रोत पाए जाते हैं ।

46.   खनिज क्या होते हैखनिजों की विशेषताएं लिखिए

खनिज:- पृथ्वी से प्राप्त कार्बनिक या अकार्बनिक प्राकृतिक पदार्थ जिनकी एक विशेष परमाण्विक संरचना होती है तथा जिनके निश्चित रासायनिक और भौतिक गुण पाए जाते हैंउन्हें खनिज कहते है

खनिजों की विशेषताएँ

1.धरातल पर खनिज असमान रूप से वितरित होते हैं ।

2.खनिजों की गुणवत्ता और मात्रा के बीच प्रतिलोमी संबंध पाया जाता है अर्थात् अधिक गुणवत्ता वाले खनिज भूगर्भ में कम मात्रा में तथा  कम गुणवत्ता वाले खनिज भूगर्भ में अधिक मात्र में पाए जाते हैं ।

3.खनिज पदार्थ समाप्य संसाधन हैं अर्थात्‌ कुछ समय बाद ये समाप्त हो जायेंगे जिनकी पुन: पूर्ति सम्भव नहीं है ।

भूगर्भ में खनिजों का निर्माण एक दीर्घकालीन प्रक्रिया के माध्यम से होता है । चूँकि खनिजों को पुन: निर्मित नहीं किया जा सकता अत: इनका समुचित संरक्षण एवं प्रबन्धन आवश्यक है ।

47.    भारत में खनिजो का संरक्षण क्यों आवश्यक है भारत में खनिज संरक्षण के उपाय लिखिए

वर्तमान में संसाधन उपयोग के परम्परागत तरीकों के परिणामस्वरूप समस्त विश्व को बड़ी मात्रा में अपशिष्ट के साथ-साथ अनेक गम्भीर पर्यावरणीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है । सतत पोषणी विकास व मानव समुदाय की भावी पीढ़ियों के हितों के लिए संसाधनों का संरक्षण अनिवार्य है संसाधनों के संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपायों को कार्यान्वित करना आवश्यक है-

1.ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों (सौर ऊर्जापवन ऊर्जा तथा भूतापीय ऊर्जा) का अधिकाधिक विकास किया जाना चाहिए 

2.धात्विक खनिज पदार्थों के संरक्षण के लिए छाजन धातु का पुन: चक्रण कर उपयोग किया जाना चाहिए ।

3.खनिज उत्खनन से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिए ठोस कदम उठने होंगे अर्थात्‌ यह भी प्रयास करना होगा कि खनिजों के उत्खनन से अन्य संसाधनों को कोई हानि न हो ।

4.अति अल्प उपलब्ध धातुओं के स्थान पर उनके प्रतिस्थापनों का उपयोग करना चाहिए ।

5.सामरिक तथा अति अल्प मात्रा में उपलब्ध खनिजों के निर्यात को अतिसीमित कर देना चाहिए जिससे उनके संचित भण्डारों का उपयोग लम्बे समय तक किया जा सके ।

48.    तांबे के दो लाभ/उपयोग बताइए  । भारत के चार मुख्य ताँबा खनन क्षेत्रों का उल्लेख करो  ।

1.ताम्बे का उपयोग बिजली की मोटरेंट्रांसफार्मर तथा जेनेरेटर्स बनाने तथा विद्युत उद्योग में किया जाता है ।

2.यह एक मिश्रातु योग्यआघातवर्ध्य तथा तन्य धातु हैं । अतः आभूषणों को सुदृढ़ता प्रदान करने के इसे स्वर्ण के साथ भी मिलाया जाता है ।

खनन क्षेत्र

झारखण्ड का सिंहभूम जिला

मध्यप्रदेश के  बालाघाट

राजस्थान के झुंझुनुअलवर व खेतडी जिले

कर्नाटक के चित्रदुर्ग तथा हासन जिले

आंध्र प्रदेश गुंटूर जिला

तमिलनाडु का दक्षिण आरकाट जिला

49.    ऊर्जा के चार नवीनीकरण योग्य / अपरम्परागत स्रोतों को विस्तार से समझाइए

सौर ऊर्जापवन ऊर्जाज्वारीय तथा तरंग ऊर्जाभूतापीय ऊर्जा,  जैव-ऊर्जा आदि ऊर्जा के  नवीनीकरण योग्य / अपरम्परागत स्रोत है

1. सौर ऊर्जा - फोटोवोल्टाइक सेलों में आपतित सूर्य की किरणों को जब ऊर्जा में बदल दिया जाता है तो उसे सौर-ऊर्जा कहा जाता है । फोटोवोल्टाइक तथा सौर तापीय प्रौद्योगिकी सौर-ऊर्जा को काम में लाने वाले दो महत्वपूर्ण एवं प्रभावी प्रक्रम है । अन्य सभी अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की अपेक्षा सौर तापीय प्रौद्योगिकी अधिक लाभप्रद है साथ ही यह कम लागत में प्राप्त होने वालीपर्यावरण मित्र तथा निर्माण में सरल है । सौर-ऊर्जा का सामान्यतया उपयोग हीटरोंसौर कुकर्स, 'फसल शुष्ककों आदि जैसे उपकरणों में अधिकाधिक हो रहा है । भारत के पश्चिमी भागों गुजरात व राजस्थान में सौर ऊर्जा के विकास की अधिक संभावनाएँ हैं ।

2. पवन ऊर्जा - पवन ऊर्जा पूर्णरूपेण प्रदूषण मुक्त और ऊर्जा का असमाप्य स्रोत है । उन भागों में जहाँ वर्ष के अधिकांश दिनों में तीव्र गति से हवाएँ चलती हैं,वहां प्रवाहित पवन की गतिज ऊर्जा को टरबाइन के माध्यम से विद्युत-ऊर्जा में बदला जाता है । भारत में पवन ऊर्जा के लिए राजस्थानगुजरातमहाराष्ट्र तथा कर्नाटक में अनुकूल परिस्थितियाँ विद्यमान हैं ।

3. ज्वारीय तथा तरंग ऊर्जा - ज्वारीय ऊर्जा अविरल ज्वारीय तरंगों तथा महासागरीय धाराओं से उत्पादित की जाती है  भारत के पश्चिमी तट पर उठने वाली वृहत ज्वारीय तरंगें इस ऊर्जा के उत्पादन के लिए अनुकूल दशाएँ प्रदान करती हैं । अपरम्परागत ऊर्जा स्रोतों में ज्वारीय ऊर्जा एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत है । भारत में खम्भात की खाड़ीकच्छ की खाड़ी तथा सुन्दरवन देश के ज्वारीय ऊर्जा उत्पादन के सम्भाव्य क्षेत्र हैं ।

4. भूतापीय ऊर्जा -  भू-गर्भ में मैग्मा या रेडियोधर्मी तत्वों के विखण्डन से जब वहाँ का तापक्रम अधिक बढ़ जाता है तो भू-सतह के ठीक नीचे स्थित चट्टानें भी गर्म हो जाती हैं । इन चट्टानों द्वारा जो ऊर्जा निकलती हैउसे भूतापीय ऊर्जा कहा जाता है । इसे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है । गर्म सोते का गर्म जल तथा इनकी अति गर्म वाष्प का उपयोग भी ऊर्जा उत्पादन हेतु किया जाता है ।  भारत मेंभूतापीय ऊर्जा संयंत्र हिमाचल प्रदेश के मनीकरण में अधिकृत किया जा चुका है । भूतापीय ऊर्जा सस्तास्वस्थ तथा कभी समाप्त न होने वाला ऊर्जा-ख्रोत है । भूगर्भ में उपस्थित तापीय ऊर्जा भविष्य में एक अति-महत्वपूर्ण वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में प्रयुक्त होने की सम्भावना है  ।

 7.खनिज तथा ऊर्जा संसाधन                       pdf