GSSS BINCHAWA

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GSSS KATHOUTI

GSSS KATHOUTI

GSSS BUROD

03. अपवाह तंत्र-

अपवाह तंत्र- निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से हो रहे जलप्रवाह को ‘अपवाह’ कहते हैं। इन वाहिकाओं के जाल को ‘अपवाह तंत्र’ कहा जाता है
जलग्रहण क्षेत्र - एक नदी विशिष्ट क्षेत्र से अपना जल बहाकर लाती है जिसे ‘जलग्रहण’ क्षेत्र कहा जाता है
अपवाह द्रोणी - एक नदी एवं उस की सहायक नदियों द्वारा अपवाहित क्षेत्र को अपवाह द्रोणी कहते है।
जल विभाजक - एक अपवाह द्रोणी को दूसरी अपवाह द्रोणी से अलग करने वाली सीमा को जल विभाजक कहते हैं
बड़ी नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को नदी द्रोणी जबकि छोटी नदियों व नालो द्वारा अप्रवाहित क्षेत्र को जल-संभर कहा जाता है।
नदी द्रोणी का आकार बड़ा होता है जबकि जल-संभर का आकार छोटा होता है।
अपवाह प्रतिरूप 
1.वृक्षाकार प्रतिरूप:- जब सहायक नदियाँ मुख्य नदी से इस प्रकार मिलती हैं कि समूचा क्षेत्र वृक्ष की शाखाओं की भांति प्रतीत होने लगता है,तो ऐसे अपवाह प्रतिरूप को वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप कहते हैं| जैसे उत्तरी मैदान की नदियां
2. अरीय प्रतिरूप:- जब नदियाँ केन्द्रीय उच्च भूमि से निकलकर अलग-अलग दिशाओं में प्रवाहित होती हैं, तो ऐसे अपवाह प्रतिरूप को अरीय या अपकेन्द्रीय अपवाह प्रतिरूप कहते हैं  अमरकंटक पर्वत शृंखला से निकलने वाली नदियां इस प्रतिरूप के अच्छे उदाहरण है
3. जालीनूमा प्रतिरूप:- जब मुख्य नदियां एक दूसरे के समांतर बहती हो तथा सहायक नदियां उनसे समकोण पर मिलती हो तो उसे जालीनूमा प्रतिरूप कहते है।
4. अभिन्द्रीय प्रतिरूप:- जब सभी दिशाओं से नदियां बहकर किसी झील या गर्त में विसजिर्त होती हैं, तो ऐसे अपवाह प्रतिरूप को अभिकेंद्रीय प्रतिरूप कहते है।
भारतीय अपवाह तंत्र के प्रकार 
समुद्र में जल विसर्जन के आधर पर 
1. अरब सागर का अपवाह तंत्र- इस अपवाह तंत्र की नदियाँ अपना जल बंगाल की खाड़ी में जल विसर्जित करती हैं सिंधु, नर्मदा, तापी, माही व पेरियार आदि नदियाँ अरब सागर के अपवाह तंत्र की नदियां है ये नदियाँ कुल अपवाह क्षेत्र का लगभग 23 प्रतिशत जल  अरब सागर में विसर्जित करती हैं
2. बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र- इस अपवाह तंत्र की नदियाँ अपना जल बंगाल की खाड़ी में जल विसर्जित करती हैं गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा आदि नदियाँ बंगाल की खाड़ी के अपवाह तंत्र की नदिया है ये नदियाँ कुल अपवाह क्षेत्र का लगभग 77 प्रतिशत जल  बंगाल की खाड़ी में विसर्जित करती हैं
जल-संभर क्षेत्र के आकार के आधर पर 
1. प्रमुख नदी द्रोणी- जिनका अपवाह क्षेत्र 20000 वर्ग किलोमीटर से अधिक है। इसमें 14 नदी द्रोणियाँ शामिल हैं जैसे – गंगा, बह्मपुत्र, कृष्णा, तापी, नर्मदा, माही, पेन्नार, साबरमती, बराक आदि 
2.मध्यम नदी द्रोणी -जिनका अपवाह क्षेत्र 2,000 से 20,000 वर्ग किलोमीटर है। इसमें 44 नदी द्रोणियाँ हैं, जैसे - कालिंदी, पेरियार, मेघना आदि। 
3. लघु नदी द्रोणी-  जिनका अपवाह क्षेत्र 2,000 वर्ग किलोमीटर से कम है। इसमें न्यून वर्षा के क्षेत्रों में बहने वाली बहुत-सी नदियाँ शामिल हैं।
उद्गम के प्रकार, प्रकृति व विशेषताओं के आधर पर 
1. हिमालयी अपवाह तंत्र - हिमालयी अपवाह तंत्र  की नदियों का उद्गम स्रोत हिमालय पर्वत है और वे अपना जल बंगाल की खाड़ी या अरब सागर में विसर्जित करती हैं। हिमालयी अपवाह तंत्र  एक नवीन अपवाह तंत्र  है  इसमें मुख्यतः गंगा, सिन्धु व बह्मपुत्र नदी द्रोणियाँ शामिल हैं। यहाँ की नदियाँ बारहमासी हैं, क्योंकि ये बर्फ पिघलने व वर्षण दोनों पर निर्भर हैं। ये नदियाँ गहरे महाखड्डों से गुजरती हैं हिमालय क्षेत्र में इन नदियों का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा है, परंतु मैदानी क्षेत्र में इनमें सर्पाकार मार्ग में बहने की प्रवृत्ति पाई जाती है और अपना रास्ता बदलती रहती हैं। कोसी नदी, जिसे बिहार का शोक कहते हैं, अपना मार्ग बदलने के लिए कुख्यात रही है। यह नदी पर्वतों के ऊपरी क्षेत्रों से भारी मात्रा में अवसाद लाकर मैदानी भाग में जमा करती है। इससे नदी मार्ग अवरूद्ध हो जाता है व परिणामस्वरूप नदी अपना मार्ग बदल लेती है।
हिमालय पर्वतीय अपवाह तंत्र का विकास
हिमालय पर्वतीय नदियों के विकास के बारे में मतभेद है। यद्यपि भूवैज्ञानिक मानते हैं कि मायोसीन कल्प में एक विशाल नदी, जिसे शिवालिक या इंडो-ब्रह्म कहा गया है हिमालय के संपूर्ण अनुदैर्ध्य विस्तार के साथ असम से पंजाब तक बहती थी और अंत में निचले पंजाब के पास सिन्धु की खाड़ी में अपना पानी विसर्जन करती थी  ऐसा माना जाता है कि कालांतर में इंडो-ब्रह्म नदी तीन मुख्य अपवाह तंत्रों में बँट गई 
1. पश्चिम में सिंधु और इसकी पाँच सहायक नदियाँ
2. मध्य में गंगा और हिमालय से निकलने वाली इसकी सहायक नदियाँ 
3. पूर्व में बह्मपुत्र का भाग व हिमालय से निकलने वाली इसकी सहायक नदियाँ
इस विशाल नदी का इस तरह विभाजन संभवतः प्लीस्टोसीन काल में हिमालय के पश्चिमी भाग में व पोटवार पठार के उत्थान के कारण हुआ। यह क्षेत्र सिंधु व गंगा अपवाह तंत्रों के बीच जल विभाजक बन गया। इसी प्रकार मध्य प्लीस्टोसीन काल में राजमहल पहाड़ियों और मेघालय पठार के मध्य स्थित माल्दा गैप का अधेक्षेपण हुआ जिसमें गंगा और बह्मपुत्र नदी तंत्रों का दिक्परिवर्तन हुआ और वे बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवाहित हुई ।
2.प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र - प्रायद्वीपीय पठार की बड़ी नदियों का उद्गम स्थल पश्चिमी घाट है और ये नदियाँ बंगाल की खाड़ी में जल विसर्जन करती हैं। प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र पुराना अपवाह तंत्र है। ये नदियां वर्षा पर निर्भर रहती  हैं इसलिए ग्रीष्म ऋतु में सूख जाती हैं।
हिमालयी अपवाह तंत्र की नदियाँ
सिंधु नदी तंत्र
सिंधु नदी मानसरोवर झील (तिब्बत) के समीप कैलाश पर्वत श्रेणी में बोखर चू हिमनद से निकलती है।
इसकी कुल लंबाई 2880 कि.मी. है और भारत में इसकी लंबाई 1114 किलोमीटर है। 
भारत में यह हिमालय की नदियों में सबसे पश्चिमी नदी है। 
तिब्बत में सिंधु नदी को सिंगी खंबान अथवा शेर मुख कहते हैं।
सिन्धु नदी नदी लद्दाख व जास्कर श्रेणियों के बीच से बहती हुई बुंजी नामक स्थान पर लद्दाख श्रेणी को काटकर गिलगित के समीप एक दर्शनीय महाखड्ड का निर्माण करती है।  
सिन्धु नदी भारतीय केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख के दो जिलों लेह एवं कारगिल में प्रवाहित होने के पश्चात पाक अधिकृत कश्मीर में बहती है।
सिन्धु नदी दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ते हुए कराची के पूर्व में अरब सागर में मिल जाती है।
सिंधुनदी मीथनकोट के निकट पंचनद का जल प्राप्त करती है। पंचनद नाम पंजाब की पाँच मुख्य नदियों सतलुज, व्यास, रावी, चेनाब और झेलम को दिया गया है। अंत में सिंधुनदी कराची के पूर्व में अरब सागर में जा गिरती है।
सिन्धु नदी के बांयी ओर से मिलने वाली नदियों में जास्कर, सोहन तथा पंजाब की पांच नदियां सतलज, व्यास, रावी, चिनाब, झेलम (पंचनद) सबसे प्रमुख है।  वंहीं दांयी ओर से मिलने वाली नदियों में शयोक, नुब्रा, गिलगित, काबुल, कुर्रम, तोची, गोमल आदि प्रमुख है।
झेलम- झेलम नदी पीर पंजाल गिरिपद में स्थित वेरीनाग झील  से निकलती है। इसके बाद यह श्रीनगर के समीप वुलर झील से होकर बहती है वुलर झील से आगे पाकिस्तान में झंग के निकट यह चेनाब नदी से मिल जाती है। 
चेनाब-  चेनाब सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी है। यह नदी बरालाचा दर्रे के दोनों ओर चंद्र और भागा नमक दो नदियों के रूप में निकलती है अतः यह चंद्र और भागा दो सरिताओं के मिलने से बनती है। ये सरिताएँ हिमाचल प्रदेश में केलाँग के निकट तांडी में आपस में मिलती हैं। इसलिए इसे चंद्रभागा के नाम से भी जाना जाता है। 
रावी-  रावी हिमाचल प्रदेश की कुल्लू पहाड़ियों में रोहतांग दर्रे के पश्चिम से निकलती है और राज्य की चंबा घाटी से बहती है। यह पाकिस्तान में प्रवेश करने और चिनाब नदी में शामिल होने से पहले 80 किलोमीटर तक भारत-पाक सीमा के साथ बहती है
व्यास-  व्यास रोहतांग दर्रे के निकट व्यास कुंड से निकलती है। यह नदी कुल्लू घाटी से गुजरती है यह पंजाब में हरिके के पास सतलुज नदी में जा मिलती है। 
सतलुज नदी- तिब्बत में मानसरोवर के निकट राकस ताल से निकलती है, जहाँ इसे लॉगचेन खंबाब के नाम से जाना जाता है। 
भारत में सतलुज नदी हिमाचल प्रदेश के शिपकीला दर्रा में प्रवेश करती है। तथा पंजाब में से बहते हुए पाकिस्तान की मिठनकोट नामक जगह पर सिंधु नदी में मिल जाती है। यह भाखड़ा नांगल परियोजना के नहर तंत्र का पोषण करती है।
गंगा नदी तंत्र
गंगा नदी का निर्माण देवप्रयाग में दो नदियों भागीरथी और अलकनंदा के मिलने से होता है  
भागीरथी नदी उत्तराखण्ड में उत्तरकाशी जिले में गोमुख के निकट गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है और अलकनंदा नदी सतोपथ ग्लेशियर से निकलती है भागीरथी और अलकनंदा नदियां देव प्रयाग में मिलकर गंगा नदी का निर्माण करती हैं
अलकनंदा नदी –अलकनंदा नदी का निर्माण दो नदियों के संयुक्त धाराओं के मिलने से होता है – धौली गंगा नदी और विष्णु गंगा नदी
ये दोनों नदियां विष्णु प्रयाग में आपस में मिल जाती हैं और अलकनंदा नदी का निर्माण करती है
पिण्डार नदी- पिण्डार अलकनंदा की सहायक नदी है, जो कर्ण प्रयाग में अलकनंदा नदी में मिलती है 
मंदाकिनी या काली गंगा - रूद्र प्रयाग में अलकनंदा नदी से मन्दाकिनी नदी आकर मिलती है
रूद्र प्रयाग से आगे देव प्रयाग में अलकनंदा नदी से भागीरथी नदी आकर मिलती है
नंदाकिनी- नंदाकिनी गंगा की सहायक नदी है, जो नन्दप्रयाग में गंगा में मिलती है।  
गंगा नदी भारत में 5 राज्यों से होकर गुजरती है – उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल
गंगा नदी की सबसे ज्यादा लम्बाई उत्तर प्रदेश में है तथा सबसे कम लम्बाई झारखंड राज्य में है
गंगा नदी सर्वप्रथम हरिद्वार में पर्वतीय भाग से निकलकर मैदान में प्रवेश करती है
पश्चिम बंगाल में गंगा नदी दो वितरिकाओं में बंट जाती है – भागीरथी एवं हुगली  मुख्य नदी भागीरथी अर्थात् गंगा बांग्लादेश में प्रवेश कर जाती है और हुगली नदी पश्चिम बंगाल में दक्षिण की ओर बहते हुए बंगाल की खाड़ी में अपना जल गिराती है| पश्चिम बंगाल में गंगा नदी को भागीरथी नदी भी कहते हैं| गंगा नदी की मुख्य धारा भागीरथी नदी अथवा गंगा नदी बांग्लादेश में पहुँचकर पद्मा नदी के नाम से जानी जाती है ब्रह्मपुत्र नदी से मिलने के बाद गंगा नदी और ब्रह्मपुत्र नदी की संयुक्त धारा ही पद्मा नदी कहलाती है| आगे चलकर पद्मा नदी से मेघना नदी मिलती है, तो इन दोनों नदियों की मुख्य धारा मेघना नदी ही कहलाती है
गंगा नदी तंत्र भारत का सबसे बड़ा अपवाह तंत्र है, गंगा नदी की लंबाई 2, 525 किलोमीटर है। यह उत्तराखण्ड में 110 किलोमीटर, उत्तरप्रदेश में 1,450 किलोमीटर, बिहार में 445 किलोमीटर और पश्चिम बंगाल में 520 किलोमीटर मार्ग तय करती है। गंगा नदी और ब्रह्मपुत्र नदी का डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है  गंगा नदी और ब्रह्मपुत्र नदी के डेल्टा को सुन्दरवन का डेल्टा भी कहते हैं| सुन्दरवन के डेल्टा पर सुन्दरी नामक वृक्ष की बहुलता होने के कारण इसे सुन्दरवन का डेल्टा कहते हैं|
गंगा नदी की सहायक नदियां
गंगा नदी की सहायक नदियों को सुविधा की दृष्टि से दो भागों में बाँटा जा सकता है –
 (1) गंगा नदी के दाहिने तट पर आकर मिलने वाली नदियां :-
गंगा नदी के दाहिने तट पर आकर मिलने वाली प्रायद्वीपीय पठार की नदियां चम्बल, सिन्ध, बेतवा, केन और सोन हैं
गंगा नदी की एकमात्र हिमालयी सहायक नदी यमुना नदी है, जो कि इसके दाँए तट पर आकर मिलती है
यमुना नदी :- यमुना नदी गंगा नदी की सबसे लम्बी व सबसे पश्चिमी हिमालयी सहायक नदी है यमुना नदी उत्तराखण्ड में बन्दरपुच्छ चोटी पर यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलती है और प्रयागराज में गंगा नदी से आकर मिल जाती है चम्बल, सिन्ध, बेतवा, केन :- यद्यपि चम्बल, सिन्ध, बेतवा और केन नदियां गंगा नदी तंत्र का हिस्सा है, लेकिन ये चारों नदियां अपना जल सीधे गंगा नदी में न गिराकर यमुना नदी में गिराती हैं चम्बल नदी, यमुना नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है चंबल नदी मध्य प्रदेश के मालवा पठार में महु के निकट निकलती है चंबल अपनी उत्खात भूमि वाली भू-आकृति के लिए प्रसिद्ध है, जिसे चंबल खड्ड कहा जाता है।
सोन -सोन नदी मैकाल पहाड़ी के अमरकंटक चोटी से निकलकर पटना के पास गंगा नदी में मिलती है|
(2) गंगा नदी के बाँए तट पर मिलने वाली नदियां :-
गंगा नदी के बाँए तट पर मिलने वाली नदियां रामगंगा, गोमती, घाघरा, गण्डक, कोसी और महानंदा है 
रामगंगा  गोमती और घाघरा नदियां उत्तर प्रदेश में प्रवाहित होती है गण्डक नदी और कोसी नदी बिहार में प्रवाहित होती हैं, जबकि महानन्दा नदी बिहार और पश्चिम बंगाल की सीमा पर प्रवाहित होती हैं
रामगंगा नदी - रामगंगा नदी गैरसेन के निकट गढ़वाल की पहाड़ियों से निकलने वाली अपेक्षाकृत छोटी नदी है।यह नदी उत्तर प्रदेश में प्रवाहित होती है कन्नौज के निकट यह गंगा नदी में मिल जाती है।
गोमती नदी- गोमती नदी गंगा नदी की एकमात्र सहायक नदी है, जो कि हिमालय से न निकलकर मैदानी क्षेत्र से निकलती है गोमती नदी का उद्गम उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में स्थित फुल्हर झील से होता है गोमती नदी उत्तर प्रदेश में प्रवाहित होती है तथा गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) के निकट गंगा नदी में जा मिलती है।
कोसी नदी- कोसी नदी माउंट एवरेस्ट के उत्तर से निकलकर बिहार राज्य में भागलपुर के निकट गंगा नदी से मिलती है कोसी नदी को बिहार का शोक भी कहते हैं, क्योंकि कोसी नदी अपना रास्ता बदलने के लिए कुख्यात है
गंडक नदी- यह नदी दो धराओं कालीगंडक और त्रिशूलगंगा के मिलने से बनती है। यह नेपाल हिमालय में धैलागिरी व माउंट एवरेस्ट के बीच निकलती है गंडक नदी पटना के निकट सोनपुर में गंगा नदी में जा मिलती है।
घाघरा नदी- घाघरा नदी माप्चा चुँग हिमनद(तिब्बत) से निकलती है तथा तिला, सेती व बेरी नामक सहायक नदियों का जलग्रहण करने के उपरांत यह शीशापानी में एक गहरे महाखड्ड का निर्माण करते हुए पर्वत से बाहर निकलती है। अंततः छपरा में यह गंगा नदी में विलीन हो जाती है। 
शारदा या सरयू नदी घाघरा नदी की सहायक नदी है  शारदा या सरयू नदी का उद्गम नेपाल हिमालय में मिलाम हिमनद में है जहाँ इसे गौरीगंगा के नाम से जाना जाता है। यह भारत-नेपाल सीमा के साथ बहती हुई घाघरा नदी में मिल जाती है यहाँ इसे काली या चाइक कहा जाता है,
महानन्दा नदी- यह गंगा नदी के बाँए तट पर मिलने वाली गंगा नदी की सबसे पूर्वी अथवा अन्तिम सहायक नदी है महानन्दा का उद्गम पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग की पहाड़ियों से होता है पश्चिम बंगाल में फरक्का के पास यह गंगा नदी में मिल जाती है 
नमामि गंगे कार्यक्रम
नमामि गंगे कार्यक्रम एक एकीकृत संरक्षण मिशन है, जिसे प्रदूषण और संरक्षण और राष्ट्रीय नदी गंगा के कायाकल्प के प्रभावी उन्मूलन के दोहरे उद्देश्यों को पूरा करने के लिए जून 2014 में केंद्र सरकार द्वारा ‘फ्लैगशिप कार्यक्रम’ के रूप में मंजूरी दी गई थी। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG), और राज्य कार्यक्रम प्रबंधन समूह (SPMGs) द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है।
इसमें राष्ट्रीय नदी गंगा से संबंधित दो उद्देश्य हैं 
1. प्रदूषण के प्रभाव को कम करना 
2. नदी गंगा के संरक्षण और कायाकल्प को पूरा करना।
नमामी गंगे कार्यक्रम के मुख्य स्तंभ हैं-
1. सीवेज ट्रीटमेंट व्यवस्था
2. नदी-किनारे का विकास
3. नदी सतह सफाई
4. जैव विविधता संरक्षण
5. वनीकरण
6. जन जागरूकता
7. औद्योगिक अपशिष्ट निगरानी
8. गंगा ग्राम
ब्रह्मपुत्र नदी
ब्रह्मपुत्र नदी की कुल लंबाई 2900 km है भारत मे इसकी लम्बाई 916 km है। ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम कैलाश पर्वत श्रेणी में मानसरोवर झील के निकट चेमायुँगडुंग हिमनद में है। यहाँ से यह तिब्बत के शुष्क व समतल मैदान में लगभग 1200 किलोमीटर तक पूर्व दिशा में बहती है जहाँ इसे सांग्पो के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ है ‘शोधक’। 
ब्रह्मपुत्र नदी हिमालय की सबसे पूर्वी चोटी नामचाबरवा के समीप दक्षिण की तरफ मुड़कर अरुणाचल प्रदेश के सादिया कस्बे के पश्चिम में भारत में प्रवेश करती है। अरुणाचल प्रदेश में इसे दिहांग के नाम से जाना जाता है  अरुणाचल प्रदेश में इसके बाएँ तट पर दिबांग नदी और लोहित नदी ‘ब्रह्मपुत्र नदी’से मिलती हैं, तत्पश्चात ब्रह्मपुत्र नदी असम राज्य के समतल घाटी में प्रवेश कर जाती है| इसके बाद यह नदी ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है । 
इसके बाएँ तट की प्रमुख सहायक नदियाँ दिबांग, लोहित, बूढ़ी दिहांग और धनसरी हैं जबकि दाएँ तट पर मिलने वाली महत्त्वपूर्ण सहायक नदियों में सुबनसिरी, कामेग, मानस व संकोश हैं। 
बह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है और फिर दक्षिण दिशा में बहती है। बांग्लादेश में यह जमुना कहलाती है और तिस्ता नदी इसके दाहिने किनारे पर मिलती है। अंत में, यह नदी पद्मा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में जा गिरती है। बह्मपुत्र नदी बाढ़, मार्ग परिवर्तन एवं तटीय अपरदन के लिए जानी जाती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इसकी अधिकतर सहायक नदियाँ बड़ी हैं और इनके जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण इनमें अत्यधिक अवसाद बहकर आ जाता है।
प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र 
प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र हिमालयी अपवाह तंत्र से पुराना है। नर्मदा और तापी को छोड़कर अधिकतर प्रायद्वीपीय नदियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं। प्रायद्वीप के उत्तरी भाग में निकलने वाली चंबल, सिंध, बेतवा, केन व सोन नदियाँ गंगा नदी तंत्र का अंग हैं। भ्रंश घाटियों में बहने वाली नर्मदा और तापी को छोड़कर अन्य सभी प्रायद्वीपीय नदियां एक सुनिश्चित मार्ग पर चलती हैं व विसर्प नहीं बनातीं है ये नदियाँ अधिकांशतः मौसमी और वर्षा पर आश्रित होती है
प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र का उद्विकास
अतिप्राचीन काल की तीन प्रमुख भूगर्भिक घटनाओं ने आज के प्रायद्वीपीय भारत के अपवाह तंत्र को स्वरूप प्रदान किया है: 
1. आरंभिक टर्शियरी काल के दौरान प्रायद्वीप के पश्चिमी पार्श्व का अवतलन या  धंसाव हुआ जिससे यह समुद्रतल से नीचे चला गया। 
2. हिमालय में होने वाले प्रोत्थान के कारण प्रायद्वीप खंड के उत्तरी भाग का अवतलन हुआ परिणामस्वरूप भ्रंश द्रोणियों का निर्माण हुआ। नर्मदा और तापी इन्हीं भ्रृंश घाटियों में बह रही है
3. इसी काल में प्रायद्वीप खंड उत्तर-पश्चिम दिशा से दक्षिण-पूर्व दिशा में झुक गया। परिणामस्वरूप इसका अपवाह बंगाल की खाड़ी की ओर उन्मुख हो गया।
प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र को दो भागों में बांटा जा सकता है –
B. बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियां
1. गोदावरी  नदी - गोदावरी प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है। गोदावरी नदी को दक्षिण की गंगा या ‘वृद्ध गंगा’ भी कहा जाता है। गोदावरी का उद्गम पश्चिमी घाट के नासिक जिले की त्र्यंबक पहाडी से होता है। गोदावरी नदी का उद्गम नासिक जिले की त्र्यम्बक पहाड़ी से होता है। और बंगाल की खाड़ी में जल विसर्जित करती है। यह 1,465 किलोमीटर लंबी नदी है इसके जलग्रहण क्षेत्र का 49 प्रतिशत भाग महाराष्ट्र में, 20 प्रतिशत भाग मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में और शेष भाग आंध्रप्रदेश में पड़ता है। पेनगंगा, इंद्रावती, प्राणहिता व मंजरा इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।
2. कृष्णा नदी - कृष्णा दूसरी सबसे बड़ी पूर्वी की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदी है जो सह्याद्री में महाबलेश्वर के पास से निकलती है। इसकी कुल लंबाई 1,401 किमी है। कोयना, तुंगभद्रा और भीमा इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। कृष्णा नदी के कुल जलग्रहण क्षेत्र का 27 प्रतिशत महाराष्ट्र में, 44 प्रतिशत कर्नाटक में और 29 प्रतिशत आंध्र प्रदेश में हैं।
3. कावेरी नदी – कावेरी कर्नाटक राज्य के कोडागु (कुर्ग )जिले की ब्रह्मगिरी की पहाड़ीयों (तालकावेरी जलाशय) से निकलती है। इसकी लंबाई 800 किलोमीटर है दक्षिण भारत की यह एकमात्र नदी है जिसमें वर्ष भर जल प्रवाह बना रहता है। प्रायद्वीप की अन्य नदियों की अपेक्षा कम उतार-चढ़ाव के साथ यह नदी लगभग सारा साल बहती है, क्योंकि इसके ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में दक्षिण-पश्चिम मानसून (गर्मी) से और निम्न क्षेत्रों में उत्तर-पूर्वी मानसून (सर्दी) से वर्षा होती है। इस नदी की  द्रोणी का 3 प्रतिशत भाग केरल में, 41 प्रतिशत भाग कर्नाटक में और 56 प्रतिशत भाग तमिलनाडु में पड़ता है। इसकी महत्त्वपूर्ण सहायक नदियाँ काबीनी, भवानी और अमरावती हैं।
4. महानदी - महानदी का उद्गम छत्तीसगढ के रायपुर जिले की सिहावा नामक पहाडियों से होता है और ओडिशा से बहती हुई अपना जल बंगाल की खाड़ी में विसखजत करती है। यह नदी 851 किलोमीटर लंबी है संबलपुर (ओडिशा) के पास भारत की प्रसिद्ध हीराकुंड परियोजना इसी नदी पर स्थित है । इस नदी की अपवाह द्रोणी का 53 प्रतिशत भाग मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में और 47 प्रतिशत भाग ओडिशा राज्य में विस्तृत है।
B. अरब सागर में गिरने वाली नदियां 
1. नर्मदा नदी - नर्मदा नदी मध्य प्रदेश में स्थित मैकाल पर्वत की अमरकंटक पठार के पश्चिम से निकलती है। और भड़ौच के दक्षिण में अरब सागर में अपना जल विसर्जित करती  है यहाँ यह 27 किमी लंबा चौड़ा ज्वारनदमुख बनाती है।दक्षिण में सतपुड़ा और उत्तर में विंध्य श्रेणी के बीच भ्रंश घाटी में बहते हुए, यह जबलपुर के पास संगमरमर की चट्टानों में आकर्षक महाखड्ड व धुआंधार जलप्रपात बनाती है। नर्मदा पश्चिम की ओर भ्रंश घाटी में बहते हुए तथा मध्य प्रदेश, महाराष्ट एबं गुजरात होते हुए खम्बात की खाडी में गिरती है। नर्मदा की कुल लम्बाई 1312 किमी है। अरब सागर में गिरने वाली प्रायद्वीपीय नदियों में यह सबसे बडी नदी है। सरदार सरोवर परियोजना का निर्माण इसी नदी पर किया गया है। नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए नमामि देवि नर्मदे प्रारंभ योजना की गई 
2. तापी - तापी नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मुलताई नामक स्थान से होता है । यह नदी भी नर्मदा के समानान्तर भ्रंश घाटी में बहते हुए खम्बात की खाडी में गिरती है । इसकी कुल लम्बाई 724 किमी है । इसके अपवाह क्षेत्र का 79 प्रतिशत भाग महाराष्ट्र में, 15 प्रतिशत भाग मध्य प्रदेश में और शेष 6 प्रतिशत भाग गुजरात में पड़ता है। 
3. लूनी - लूनी नदी का उद्गम राजस्थान के अजमेर में स्थित अरावली की पहाड़ियों से ( पुष्कर के समीप) दो धराओं (सरस्वती और सागरमती) के रूप में उत्पन्न होती है, जो गोविंदगढ़ के निकट आपस में मिल जाती हैं। तथा यह पश्चिम की ओर बहते हुए कच्छ के रन में विलुप्त हो जाती है।
4. साबरमती- साबरमती नदी का उद्गम उदयपुर(राजस्थान) की अरावली की पहाडियों से होता है तथा यह राजस्थान और गुजरात होते हुए खम्भात की खाडी(अरब सागर) में गिरती है ।
5. माही - माही नदी का उद्गम मध्यप्रदेश के धार जिले की विंध्याचल पहाडियों से होता है तथा यह नदी पश्चिम की ओर बहते हुए खम्बात की खाडी (अरब सागर) में गिरती है।
6. शेत्रुंजी (शेतरून्जी )- यह गुजरात में पूर्व की ओर बहने वाली नदी है यह अमरेली जिले में दलकाहवा के गिर जंगल से निकलती है।
7. भादर नदी- यह नदी गुजरात की मुख्य नदी है भादर नदी गुजरात के राजकोट से निकलकर अरब सागर में गिरती है। 
8. धाधर नदी‌- धाधर नदी‌ गुजरात के पावागढ़ पहाड़ियों से उत्पन्न होती है। धाधार नदी, 87 किलोमीटर तक बहने के बाद पिंगलवाड़ा गांव में विश्वामित्री नदी से मिलती है। विश्वामित्री नदी से संगम के पश्चात, धाधार नदी 55 किलोमीटर और बहती है। अंततः धाधार नदी खंभात की खाड़ी में विलीन हो जाती है। 
9. वैतरणा- वैतरणा नदी का उद्गम स्रोत महाराष्ट्र के नासिक जिले में 670 मी० की ऊँचाई पर त्रियंबक की पहाड़ियों के दक्षिण ढालों पर है।
10. भरतपूझा - यह केरल की सबसे बड़ी नदी है भरतपूझा नदी  अन्नामलाई पहाड़ियों से निकलती है। इसे पोंनानी के नाम से भी जाना जाता है।
11. पेरियार - पेरियार नदी का उद्गम केरल की अन्नामलाई की पहाडियों से होता है तथा यह नदी बेम्बानाद झील के उत्तर में अरब सागर में गिरती है। पेरियार केरल की दूसरी सबसे बड़ी नदी है।
12. पांबा (पंबा) नदी - यह केरल की तीसरी सबसे बड़ी नदी है  पंबा नदी को केरल की गंगा के रूप में पूजा जाता है 
13. जुआरी नदी- जुआरी नदी गोवा की सबसे बड़ी नदी है।यह एक ज्वारीय नदी है।पश्चिमी घाट में हेमाड-बार्शम में उत्पन्न होती है। जुआरी और मांडवी गोवा की दो सबसे महत्वपूर्ण नदियाँ हैं।  जुआरी और माण्डावी नदियाँ आपस में मिलकर एक मुहाना बनाती हैं
14. मांडवी नदी - मांडवी नदी भारत के कर्नाटक और गोवा राज्य में बहती है यह नदी गोवा राज्य की प्रमुख दो नदियों में से एक है मांडवी नदी को गोवा की जीवनरेखा कहा जाता है मांडवी नदी गोवा और कर्नाटक की सीमा पर दुधसागर जलप्रपात बनाती है
15. कालीनदी-यह नदी कर्नाटक के बेलगाम जिले से निकलती है और कारवार खाड़ी में गिर जाती है।
16. शरावती - शरावती नदी कर्नाटक के शिमोगा जिले से निकलती है तथा यह पश्चिम की ओर बहते हुए अरब सागर में गिरती है । प्रसिद्ध गरसोप्पा (जोग) जलप्रपात इसी नदी पर स्थित है।
17. बैदती नदी - इस नदी का स्त्रोत हुबली (धारवाड़) में पड़ता है यह नदी 161 किलोमीटर लम्बी है
नदी बहाव प्रवृत्ति
एक नदी के चैनल में वर्षपर्यंत जल प्रवाह के प्रारूप को नदी बहाव प्रवृत्ति कहा जाता है।  हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बारहमासी हैं, क्योंकि ये अपना जल बर्फ पिघलने तथा वर्षा से प्राप्त करती हैं। जबकि दक्षिण भारत की नदियाँ केवल वर्षा से ही जल प्राप्त करती है इसलिए इनकी बहाव प्रवृत्ति में उतार-चढ़ाव पाया जाता है इनका बहाव मानसून ऋतु में काफी ज्यादा बढ़ जाता है। 
गंगा नदी में न्यूनतम जल प्रवाह जनवरी से जून की अवधि में होता है।जबकि अधिकतम प्रवाह अगस्त या सितंबर माह में होता है। बर्फ पिघलने के कारण गंगा नदी का प्रवाह मानसून आने से पहले भी काफी अधिक  होता है। 
नर्मदा नदी में न्यूनतम जल प्रवाह जनवरी से जुलाई माह तक होता है, लेकिन अगस्त में इस नदी का जल-प्रवाह अधिकतम हो जाता है, तो यह अचानक उफान पर आ जाती है। 
गोदावरी में न्यूनतम प्रवाह मई में और अधिकतम जुलाई-अगस्त में होता है अगस्त माह के पश्चात् इनके प्रवाह में भारी कमी आती है
नदी में जल प्रवाह की दर (जल विसर्जन) को  क्यूसेक्स (क्यूबिक फुट प्रति सैकेंड) या क्यूमैक्स (क्यूबिक मीटर प्रति सैकेंड) में मापा जाता है।
  1. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी ‘बंगाल का शोक’ के नाम से जानी जाती थी
    [अ] गंडक      
    [ब] कोसी
    [स] सोन        
    [द] दामोदर           [द]
  2. निम्नलिखित में से किस नदी की द्रोणी भारत में सबसे बड़ी है?
    [अ] सिंधु       
    [ब] ब्रह्मपुत्र
    [स] गंगा        
    [द] कृष्णा              [स]
  3. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी पंचनद में शामिल नहीं है?
    [अ] रावी             
    [ब] सिंधु
    [स] चेनाब           
    [द] झेलम               [ब] 
  4. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी भ्रंश घाटी में बहती है?
    [अ] सोन            
    [ब] यमुना
    [स] नर्मदा           
    [द] लूनी                  [स] 
  5. निम्नलिखित में से कौन-सा अलकनंदा व भागीरथी का संगम स्थल है?
    [अ] विष्णु प्रयाग    
    [ब] रूद्र प्रयाग
    [स] कर्ण प्रयाग     
    [द] देव प्रयाग          [द]
  6. नदी द्रोणी और जल-संभर अंतर लिखिए
    बड़ी नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को नदी द्रोणी कहते है  जबकि छोटी नदियों व नालो द्वारा अप्रवाहित क्षेत्र को जल-संभर कहा जाता है।
    नदी द्रोणी का आकार बड़ा होता है जबकि जल-संभर का आकार छोटा होता है।
  7. वृक्षाकार और जालीनुमा अपवाह प्रारूप में अंतर लिखिए 
    वृक्षाकार अपवाह प्रारूप में सहायक नदियाँ मुख्य नदी से पेड़ की शाखाओं के अनुरूप मिलती हैं  जबकि जालीनुमा अपवाह प्रारूप में मुख्य नदियां एक दूसरे के समांतर बहती है  तथा सहायक नदियां उनसे समकोण पर मिलती है 
  8. अपकेंद्रीय और अभिकेंद्रीय अपवाह प्रारूप में अंतर लिखो
    अभिन्द्रीय प्रतिरूप - जब सभी दिशाओं से नदियां बहकर किसी झील या गर्त में विसजिर्त होती हैं, तो ऐसे अपवाह प्रतिरूप को अभिकेंद्री प्रतिरूप कहते है।
    अपकेन्द्रीय प्रतिरूप - जब नदियाँ केन्द्रीय उच्च भूमि से निकलकर अलग-अलग दिशाओं में प्रवाहित होती हैं, तो ऐसे अपवाह प्रतिरूप को अपकेन्द्रीय अपवाह प्रतिरूप कहते हैं  
  9. डेल्टा व एश्चुअरी या ज्वारनदमुख में अन्तर लिखिए 
    नदी द्वारा बहाकर लाए गए अवसादों के मुहाने पर त्रिभुजाकार जमाव को डेल्टा कहते हैं जबकि नदी के मुहाने पर बनी सँकरी व गहरी घाटी को एश्चुअरी या ज्वारनदमुख कहते हैं।
    डेल्टा अत्यंत उपजाऊ और कृषि के लिए उपयोगी हैं। जबकि ज्वारनदमुख मछली पालन और अंतर्देशीय परिवहन के लिए उपयोगी हैं
    डेल्टा बहुत ही समतल और उपजाऊ मैदान होता है। जबकि ज्वारनदमुख में सँकरी व गहरी घाटी होने के कारण अवसादों का जमाव संभव नहीं। अतः ज्वारनदमुख समतल और उपजाऊ मैदान नहीं होता है 
  10. भारत में नदियों को आपस में जोड़ने के सामाजिक-आर्थिक लाभ क्या हैं?
    भारत की नदियाँ प्रतिवर्ष जल की विशाल मात्रा का वहन करती हैं, लेकिन समय व स्थान की दृष्टि से इसका वितरण समान नहीं है। वर्षा ऋतु में, अधिकांश जल बाढ़ में व्यर्थ हो जाता है और समुद्र में बह जाता यदि हम नदियों की द्रोणियों को आपस में जोड़ दें तो निम्न लाभ होंगें
    एक क्षेत्र से अधिक जल का अभावग्रस्त जल वाले क्षेत्र में स्थानांतरण करके बाढ़ और सूखे की समस्या हल हो जायेगी।
    पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध होने के कारण पीने के पानी की समस्या भी हल हो जायेगी 
    पर्याप्त पानी की उपलब्धता से सिंचाई सुविधाएं अच्छी होगी जिससे कृषि उत्पादन बढ़ेगा तथा किसानों की आर्थिक हालत सुधरेगी।
    यह जल-विद्युत और मत्स्य पालन गतिविधियों जैसे विभिन्न अवसर प्रदान करेगा
  11. प्रायद्वीपीय नदीयों  के तीन लक्षण लिखिए
    प्रायद्वीपीय नदियों का उद्गम स्थल प्रायद्वीपीय पठार व मध्य उच्चभूमि है
    प्रायद्वीपीय नदियां एक सुनिश्चित मार्ग पर चलती हैं व विसर्प नहीं बनातीं है 
    प्रायद्वीपीय नदियाँ अधिकांशतः मौसमी और वर्षा पर आश्रित होती है
  12. उत्तर भारतीय नदियों की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ क्या हैं? ये प्रायद्वीपीय नदियों से किस प्रकार भिन्न हैं?
    उत्तर भारत की नदियाँ बारहमासी होती हैं क्योंकि इनमें हिमनद व वर्षा से जल की प्राप्ति होती है
    उत्तर भारत की नदियाँ पर्वतीय इलाकों में गहरे गॉर्ज तथा V-आकार की घाटियों का निर्माण करती हैं|
    उत्तर भारत की नदियाँ गहरे महाखड्डों से गुजरती हैं हिमालय क्षेत्र में इन नदियों का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा है, परंतु मैदानी क्षेत्र में इनमें सर्पाकार मार्ग में बहने की प्रवृत्ति पाई जाती है और अपना रास्ता बदलती रहती हैं। 

  1. गंगा नदी किस स्थान के बाद गंगा के नाम से जानी जाती है?
    देवप्रयाग
  2. व्यास नदी का उद्गम स्थान कहां स्थित है?

    व्यास नदी का उद्गम स्थान रोहतांग दर्रे  के निकट व्यास कुडं है 
  3. ब्रहमपुत्र नदी का उद्गम स्थान कहां है?
    कैलाश पवर्त श्रेणी में मानसरोवर झील के निकट चमेायंगु डुग हिमनद।
  4. ब्रहमपुत्र नदी को तिब्बत में किस नाम से जाना जाता है?
    तिब्बत में इसे सांग्पो के नाम से जाना जाता है
  5. ब्रहमपुत्र नदी बांग्लादेश में किस नाम से जानी जाती है?
    ब्रहमपुत्र नदी बांग्लादेश में जमुना कहलाती है
  6. गरसोप्पा (जोग) जलप्रपात किस नदी पर स्थित है?
    शारावती नदी।
  7. केरल की सबसे बड़ी नदी का क्या नाम है?
    केरल की सबसे बड़ी नदी भरत पूजा है
  8. गंगा नदी का उद्गम स्थान कहां है?
    उत्तराखण्ड राज्य के उत्तरकाशी जिले मे गंगोत्राी हिमनद
  9. सतलुज नदी किस स्थान से निकलती है?
    सतलुज नदी मानसरोवर झील के निकट राक्षस ताल से निकलती है
  10. झेलम नदी का उद्गम स्थान कहाँ है?
    झेलम नदी पीर पंजाल गिरिपद में स्थित वेरीनाग झील से निकलती है।
  11. किस नदी को बिहार की शोक कहा जाता है?
    कोसी नदी
  12. सिन्धु नदी के दाहिने तट पर मिलने वाली कोई तीन सहायक नदियों के नाम बताइए?
    श्योक, नुब्रा,गिलगित, काबुल, कुर्रम, तोची, गोमल

  13. सिंधु नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी कौन सी है?
    चेनाब नदी

13. हमारा पर्यावरण

पारितंत्र (पारिस्थितिकी तंत्र) - किसी क्षेत्र विशेष के समस्त जीवो तथा पर्यावरण के अजैविक घटकों के मध्य होने वाली अन्योन्यक्रिया से निर्मित तंत्र पारितंत्र कहलाता है परितंत्र दो प्रकार के होते है

1. प्राकृतिक परितंत्र - वन, तालाब, झील, घास का मैदान,  समुद्र

2. मानव (कृत्रिम) निर्मित परितंत्र- बगीचा, खेत, जल जीवशाला 

पारितंत्र के घटक

एक पारितंत्र में जैव घटक तथा अजैव घटक होते हैं।सभी जैव  तथा अजैव घटक परस्पर अन्योन्यक्रिया करते हैं तथा प्रकृति में संतुलन बनाए रखते हैं।

1. अजैव घटक- भौतिक कारक जैसे- ताप, वर्षा, वायु, मृदा एवं खनिज इत्यादि अजैव घटक हैं।

2. जैव घटक - जैविक कारक जैसे- पेड़ - पौधे ,जंतु, पक्षी, मनुष्य आदि जैव घटक हैं। 

पोषण के आधर पर जैव घटकों को तीन वर्गों में बाँटा गया है 

उत्पादक, उपभोक्ता एवं अपघटक 

1. उत्पादक - सभी हरे पौधे एवं नील-हरित शैवाल जिनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता होती है उत्पादक कहलाते हैं। 

2. उपभोक्ता – वे जीव जो उत्पादक द्वारा उत्पादित भोजन पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्भर करते हैं,  उपभोक्ता कहलाते हैं। उपभोक्ता को पुनः शाकाहारी, मांसाहारी तथा सर्वाहारी एवं परजीवी में बाँटा गया है 

3. अपघटक (अपमार्जक)- वे सूक्ष्मजीव जो जीवों के मृत शरीर में उपस्थित जटिल कार्बनिक पदार्थों का अपघटन कर उन्हें सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं अपघटक कहलाते है ये सरल पदार्थ मिट्टी (भूमि) में चले जाते हैं तथा पौधों द्वारा पुनः उपयोग में लाए जाते हैं।  ये प्रकृति में अपमार्जन का कार्य करते है

आहार श्रृंखला 

परितंत्र में सभी जीवों की व्यवस्थित श्रृंखला जिसके द्वारा खाद्य पदार्थों व ऊर्जा का एक स्तर से दूसरे स्तर पर स्थानान्तरण होता है, आहार श्रृंखला कहलाती है।

जैसे 

        

  घास      ➡    चूहा     ➡      सांप     ➡       बाज

आहार श्रृंखला का प्रत्येक चरण अथवा कड़ी एक पोषी स्तर बनाते हैं। स्वपोषी अथवा उत्पादक प्रथम पोषी स्तर हैं शाकाहारी अथवा प्राथमिक उपभोक्ता द्वितीय पोषी स्तर, छोटे मांसाहारी अथवा द्वितीय उपभोक्ता तीसरे पोषी स्तर, तथा बड़े मांसाहारी अथवा तृतीय उपभोक्ता चौथे पोषी स्तर का निर्माण करते हैं 
आहार श्रृंखला द्वारा पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में ऊर्जा का प्रवाह होता है। और स्वपोषी से ऊर्जा विषमपोषी एवं अपघटकों तक जाती है जब आहार श्रृंखला के विभिन्न पोषी स्तरों के बीच ऊर्जा का प्रवाह होता है तो -
1. सूर्य से प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा का केवल 1% भाग हरे पौधों द्वारा खाद्य ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता हैं।
2. आहार श्रृंखला के द्वारा एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में केवल 10% ऊर्जा पहुंचती है शेष ऊर्जा जीवों द्वारा जैविक क्रियाओं में उपयोग कर ली जाती है
3. आहार श्रृंखला में उपभोक्ता के अगले स्तर के लिए ऊर्जा की बहुत कम मात्रा उपलब्ध हो पाती है, अतः आहार श्रृंखला सामान्यतः तीन अथवा चार चरण की होती है। प्रत्येक चरण पर ऊर्जा का ह्रास इतना अधिक होता है कि चौथे पोषी स्तर के बाद उपयोगी ऊर्जा की मात्रा बहुत कम हो जाती है।
4. सामान्यतः निचले पोषी स्तर पर जीवों की संख्या अधिक होती है, अतः उत्पादक स्तर पर यह संख्या सर्वाधिक होती है।
5. आहार श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह एकदिशिक अथवा एक ही दिशा में होता है। स्वपोषी जीवों द्वारा ग्रहण की गई ऊर्जा पुनः सौर ऊर्जा में परिवर्तित नहीं होती तथा शाकाहारियों को स्थानांतरित की गई ऊर्जा पुनः स्वपोषी जीवों को उपलब्ध नहीं होती है।
6. आहार श्रृंखला में प्रत्येक पोषी स्तर पर ऊर्जा की हानि के कारण प्रत्येक पोषी स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा में उत्तरोत्तर हृास होता है।

आहार जाल

परितंत्र में खाद्य शृंखलाएं विलगित (एकल) अवस्था में क्रियाशील नहीं होती वरन एक दूसरे से जुड़ी होती हैं। आहार शृंखलाओं के विभिन्न पोषक स्तरों पर परस्पर जुडा यह जाल आहार जाल कहलाता है 

उदाहरणार्थ- एक चूहा, जो अन्न पर निर्भर है वह अनेक द्वितीयक उपभोक्ताओं का भोजन है और तृतीयक माँसाहारी अनेक द्वितीयक जीवों से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं |


जैव-आवर्धन 

हानिकारक अजैव निम्नीकृत रासायनिक पदार्थों का आहार श्रृंखला में प्रविष्ट करना तथा प्रत्येक पोषी स्तर पर उतरोत्तर संग्रहित होना जैव-आवर्धन कहलाता हैं।

फसलों को रोग एवं कीटों से बचाने के लिए पीड़कनाशक एवं रसायनों का अत्यधिक प्रयोग किया जाता है ये रसायन बह कर मिट्टी में अथवा जल स्रोत में चले जाते हैं। मिट्टी से इन पदार्थों का पौधों द्वारा जल एवं खनिजों के साथ-साथ अवशोषण हो जाता है तथा जलाशयों से यह जलीय पौधों एवं जंतुओं में प्रवेश कर जाते हैं। इस प्रकार ये हानिकारक रासायनिक पदार्थ आहार श्रृंखला प्रविष्ट कर जाते हैं। ये पदार्थ अजैव निम्नीकृत होते हैं अतः प्रत्येक पोषी स्तर पर उतरोत्तर संग्रहित होते जाते हैं। किसी भी आहार श्रृंखला में मनुष्य शीर्षस्थ है, अतः हमारे शरीर में यह रसायन सर्वाधिक मात्रा में संचित हो जाते हैं। इसे ‘जैव-आवर्धन कहते हैं। 

पर्यावरणीय समस्याएं -

1. ओजोन परत का अपक्षय

ओजोन (O) के अणु ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बनते हैं ओजोन एक विष है। परंतु वायुमंडल के ऊपरी स्तर (समताप मंडल) में ओजोन सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरण से हमारी रक्षा करती है। ये पराबैंगनी विकिरण जीवों के लिए अत्यंत हानिकारक है। जो मानव में त्वचा का कैंसर उत्पन्न करती हैं।  

ओजोन का निर्माण

उच्च ऊर्जा वाले पराबैंगनी विकिरण ऑक्सीजन अणुओं (O₂) को विघटित कर स्वतंत्र ऑक्सीजन (O) परमाणु बनाते हैं। ऑक्सीजन के ये स्वतंत्र परमाणु  ऑक्सीजन (O) से क्रिया कर ओजोन बनाते हैं  

O2       ⟶ पराबैंगनी विकिरण ⟶     O           +             O


O     +    O2            ⟶              O3

                                            (ओजोन  )

ओजोन परत का ह्रास

1985 में पहली बार अंटार्टिका में ओजोन परत की मोटाई में कमी देखी गई, जिसे ओजोन छिद्र के नाम से जाना जाता है। ओजोन की मात्रा में इस तीव्रता से गिरावट का मुख्य कारक मानव संश्लेषित रसायन क्लोरोफ्रलुओरो कार्बन (CFC) है जिसका उपयोग रेफ्रीजेरेटर (शीतलन) एवं अग्निशमन के लिए किया जाता है। 1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) में सर्वानुमति बनी कि CFC के उत्पादन को 1986 के स्तर पर ही सीमित रखा जाए। 

2. कचरा (अपशिष्ट) प्रबंधन

आज के समय में अपशिष्ट निपटान एक मुख्य समस्या है जो कि हमारे पर्यावरण को प्रभावित करती है। किसी भी प्रक्रम के अंत में बनने वाले अनुपयोगी पदार्थ अपशिष्ट या कचरा कहलाता हैं अपशिष्ट दो प्रकार के होते हैं

1.जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट. 2.अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट

1. जैव निम्नीकरणीय - वे अपशिष्ट पदार्थ जिनका जैविक कारकों द्वारा अपघटन हो जाता है जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट कहलाते हैं जैसे घरेलू कचरा, जैविक कचरा, कृषि अपशिष्ट व जैव चिकित्सकीय अपशिष्ट आदि।

2. अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट- वे अपशिष्ट पदार्थ जिनका जैविक कारको द्वारा अपघटन नहीं होता है अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट कहलाते हैं जैसे प्लास्टिक की बोतलें, पॉलीथिन, कांच, सीरींज, धातु के टुकड़े आदि। ये पदार्थ सामान्यतः ‘अक्रिय’ हैं तथा लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं अथवा पर्यावरण को हानि पहुँचाते हैं।

कचरा (अपशिष्ट) प्रबंधन - अपशिष्ट प्रबंधन में अपशिष्ट निर्माण से लेकर उसके संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण व निस्तारण तक की सम्पूर्ण प्रकिया शामिल है

कचरे के प्रबन्धन की तकनीक

जैव निम्नीकरण तथा अजैव निम्नीकरणीय कचरे का निपटान अलग-अलग करना ।

ठोस जैविक अपशिष्ट को वर्मीकम्पोस्टिंग विधि द्वारा खाद में परिवर्तित करना।

जैव निम्नीकरणीय वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए ।

प्लास्टिक, धातु तथा कागज जैसे कचरे का पुनः चक्रण किया जाना चाहिए।



  1. परितंत्र के  जैव घटकों के नाम लिखें।
     पेड़ - पौधे ,जंतु, पक्षी, मनुष्य 
  2. परितंत्र के अजैव घटकों के नाम लिखें।
    ताप, वर्षा, वायु, मृदा एवं खनिज
  3. मानव-निर्मित (कृत्रिम)  पारितंत्रों के नाम लिखिए 
    बगीचा, खेत, जल जीवशाला
  4. ओजोन परत के अवक्षय करने वाले यौगिकों का समूह क्या है ?
    क्लोरो फ्लोरो कार्बन के यौगिक। (CFC) 
  5. UNEP का पूरा नाम लिखिए ।
    United Nations Environment Programme (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण प्रोग्राम)।
  6. किसी क्षेत्र के सभी जीव तथा बातावरण के अजैव घटक संयुक्त रूप क्या कहलाते हैं ?
    परितंत्र       
  7. आहार मृंखला में कितमे प्रतिशत ऊर्जा एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में स्थानांतरित होता है ?
    10%
  8. रेफ्रिजरेटर में किस रसायन का उपयोग किया जाता है
    क्लोरो फ्लोरो कार्बन के यौगिक। (CFC)
  9. स्थलीय परितंत्र में हरे पौधे की पत्तियों द्वारा प्राप्त होनेवाली सौर ऊर्जा का लगभग कितना प्रतिशत खाद्य ऊर्जा में परिवर्त्तित होता है ?
    1%
  10. एक आहार श्रृंखला का प्रथम पोषी स्तर क्या है?
    हरे पेड़-पौधे (उत्पादक)
  11. CFC का पूरा नाम लिखिए।
    क्लोरो फ्लोरो कार्बन 
  12. प्राकृतिक परितंत्रों के नाम लिखिए 
     वन, तालाब,  झील, घास का मैदान, समुद्र
  13. पोषण के आधार पर उपभोक्ताओं को किन-किन भागों में बाँटा गया है?
    पोषण के आधर पर जैव घटकों को तीन वर्गों में बाँटा गया है 
    उत्पादक, उपभोक्ता एवं अपघटक 
  14. उपभोक्ता किसे कहते हैं? उदाहरण दीजिए।
    वे जीव जो उत्पादक द्वारा उत्पादित भोजन पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्भर करते हैं,  उपभोक्ता कहलाते हैं। जैसे- सभी प्रकार के जन्तु।
  15. ओजोन परत का क्या महत्व है?
    यह सूर्य से आने वाली पराबैगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकता है। और हमारी इन किरणों से हमारी रक्षा करती है 
  16. अपघटक (अपमार्जक) किसे कहते है 
     वे सूक्ष्मजीव जो जीवों के मृत शरीर में उपस्थित जटिल कार्बनिक पदार्थों का अपघटन कर उन्हें सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं अपघटक कहलाते है जैसे 
  17. क्लोरो फ्लोरो कार्बन  (CFC) का उपयोग मुख्यतः किसमें किया जाता है ?
    क्लोरो फ्लोरो कार्बन  (CFC) है जिसका उपयोग रेफ्रीजेरेट (शीतलन) एवं अग्निशमन के लिए किया जाता है।
  18. परितन्त्र के प्रमुख घटक कौन-कौन से हैं?
    पारि तन्त्र के प्रमुख घटक-इसके दो घटक हैं –
    1. जैविक घटक     2. अजैविक घटक
  19. अपशिष्ट प्रबंधन से क्या अभिप्राय है ?
    अपशिष्ट प्रबंधन में अपशिष्ट निर्माण से लेकर उसके संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण व निस्तारण तक की सम्पूर्ण प्रकिया शामिल है 
  20. जैव आवर्धन क्या है? 
    हानिकारक अजैव निम्नीकृत रासायनिक पदार्थों का आहार श्रृंखला में प्रविष्ट करना तथा प्रत्येक पोषी स्तर पर उतरोत्तर संग्रहित होना जैव-आवर्धन कहलाता हैं।
  21. जैव निम्नीकरणीय पदार्थ क्या होते हैं? उदाहरण दीजिए।
    वे अपशिष्ट पदार्थ जिनका जैविक कारकों द्वारा अपघटन हो जाता है जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट कहलाते हैं जैसे घरेलू कचरा, जैविक कचरा, कृषि अपशिष्ट व जैव चिकित्सकीय अपशिष्ट आदि।
  22. खाद्य जाल (आहार जाल) किसे कहते हैं?
    परितंत्र में खाद्य शृंखलाएं विलगित (एकल) अवस्था में क्रियाशील नहीं होती वरन एक दूसरे से जुड़ी होती हैं। आहार शृंखलाओं के विभिन्न पोषक स्तरों पर परस्पर जुड़ा यह जाल आहार जाल कहलाता है 
  23. अपशिष्ट क्या है इनके प्रकार लिखिए ।
    किसी भी प्रक्रम के अंत में बनने वाले अनुपयोगी पदार्थ अपशिष्ट कहलाते हैं अपशिष्ट दो प्रकार के होते हैं
    1.जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट.  2.अजैव निम्नीकरणीय 
  24. ओजोन क्या है तथा यह किसी पारितंत्र को किस प्रकार प्रभावित करती है।
    ऑक्सीजन के तीन परमाणु मिलकर ऑजोन (O₃) के एक अणु का निर्माण करते हैं। ओजोन एक घातक विष है 
    ओजोन सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी विकिरण से हमारी रक्षा करती है।
  25. आहार श्रृंखला (खाद्य श्रृंखला) किसे कहते हैं?एक स्थलीय आहार-श्रृंखला का उदाहरण दीजिए।
    परितंत्र में सभी जीवों की व्यवस्थित श्रृंखला जिसके द्वारा खाद्य पदार्थों व ऊर्जा का एक स्तर से दूसरे स्तर पर स्थानान्तरण होता है, आहार श्रृंखला कहलाती है।
     घास→ कीट → मेढ़क → सर्प  → बाज
  26. एक पोखर (तालाब) की सामान्य आहार श्रृंखला (खाद्य श्रृंखला) लिखिए।
                
    जलीय पौधे → छोटे जलीय जीव → मछली → बगुला
  27. उत्पादक किसे कहते हैं? उदहारण दीजिए 
    सभी हरे पौधे एवं नील-हरित शैवाल जो सौर ऊर्जा एवं क्लोरोफिल की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड एवं जल द्वारा  प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, उत्पादक कहलाते हैं। हरे पेड़-पौधे और हरी, नीली शैवाल 
  28. अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ क्या होते हैं? उदाहरण दीजिए।
    अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट- वे अपशिष्ट पदार्थ जिनका जैविक कारको द्वारा अपघटन नहीं होता है अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट कहलाते हैं जैसे प्लास्टिक की बोतलें, पॉलीथिन, कांच, सीरींज, धातु के टुकड़े आदि।  
  29. क्या कारण है कि कुछ पदार्थ जैव निम्नीकरणीय होते हैं और कुछ अजैव निम्नीकरणीय?
    कुछ पदार्थ  जैसे लकड़ी, कागज आदि का अपघटन जीवाणु अथवा दूसरे मृतजीवियों द्वारा हो सकता है अतः ये पदार्थ  जैव निम्नीकरणीय’ कहलाते हैं। जबकि कुछ पदार्थ  जैसे प्लास्टिक, काँच आदि का जैविक प्रक्रम द्वारा अपघटन नहीं होता हैं  इसलिए इन्हें अजैव निम्नीकरणीय’ पदार्थ कहते  हैं।
  30. परितंत्र किसे कहते हैं
    किसी क्षेत्र विशेष के समस्त जीवो तथा पर्यावरण के अजैविक घटकों के मध्य होने वाली अन्योन्यक्रिया से निर्मित तंत्र पारितंत्र कहलाता है परितंत्र दो प्रकार के होते है
    1. प्राकृतिक परितंत्र - वन, तालाब तथा झील, घास का मैदान, , समुद्र
    2. मानव (कृत्रिम) निर्मित परितंत्र- बगीचा, खेत, जल जीवशाला 
  31. पोषी स्तर क्या है? एक आहार श्रृंखला का उदाहरण दीजिए तथा इसमें विभिन्न पोषी स्तर बताइए।
    आहार श्रृंखला का प्रत्येक चरण या कड़ी जिनमे ऊर्जा का स्थानान्तरण होता है।पोषी स्तर कहलाता है।
            
    घास  ➡    चूहा       ➡   सांप       ➡     बाज
    घास  ➡   प्रथम पोषी स्तर /उत्पादक
    चूहा   ➡  द्वितीय पोषी स्तर  / प्राथमिक उपभोक्ता) 
    सांप  ➡  तृतीय पोषी स्तर   / द्वितीयक उपभोक्ता 
    बाज
      ➡    चतुर्थ पोषी स्तर  / तृतीयक उपभोक्ता
  32. जैव निम्नीकरणीय व अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट में अन्तर लिखिए।
    वे अपशिष्ट पदार्थ जिनका जैविक कारकों द्वारा अपघटन हो जाता है जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट कहलाते हैं जैसे घरेलू कचरा, जैविक कचरा, कृषि अपशिष्ट व जैव चिकित्सकीय अपशिष्ट आदि।
    वे अपशिष्ट पदार्थ जिनका जैविक कारको द्वारा अपघटन नहीं होता है अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट कहलाते हैं जैसे प्लास्टिक की बोतलें, पॉलीथिन, कांच, सीरींज, धातु के टुकड़े आदि।
  33. पारितंत्र में अपमार्जकों (अपघटकों) की क्या भूमिका है? ।
    1. अपमार्जक जीवों के मृत शरीर में उपस्थित जटिल कार्बनिक पदार्थों का अपघटन कर उन्हें सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं ये सरल पदार्थ मिट्टी (भूमि) में चले जाते हैं तथा पौधों द्वारा पुनः उपयोग में लाए जाते हैं। पोषक तत्त्व पुनः प्राप्त हो जाने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनी रहती है
    2. अपमार्जक मृत पौधों और जंतुओं के मृत शरीरों के अपघटन में सहायता करते हैं तथा इस प्रकार वातावरण को स्वच्छ रखने का कार्य करते हैं। अर्थात ये प्रकृति में अपमार्जन का कार्य करते है
  34. परितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह किस प्रकार होता है ?
    पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का मुख्य स्रोत सौर-ऊर्जा है, जिसका प्रवाह सदा एक दिशा में उत्पादकों से विभिन्न पोषी स्तरों तक उत्तरोतर ह्रासित होता हुआ होता है। आहार श्रृंखला द्वारा  एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में ऊर्जा का प्रवाह होता है।सूर्य से प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा का केवल 1% भाग हरे पौधों द्वारा खाद्य ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता हैं। इस संश्लेषित ऊर्जा में से कुछ का उपयोग स्वयं की जैविक क्रियाओं में उपयोग कर ली जाती है शेष संचित रासायनिक ऊर्जा हरे पौधों में ऊतकों में होती है, जो विभिन्न स्तर के उत्पादकों में चली जाता है आहार श्रृंखला के द्वारा एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में केवल 10% ऊर्जा पहुंचती है शेष ऊर्जा जीवों द्वारा जैविक क्रियाओं में उपयोग कर ली जाती है 



 

12. विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव

विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव - जब किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है इसे विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव कहते हैं
चुम्बकीय क्षेत्र -  चुंबक के चारों ओर वह क्षेत्र जिसमें चुंबकीय प्रभाव महसूस किया जाता है चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है चुम्बकीय क्षेत्र एक सदिश राशि है क्योंकि चुम्बकीय क्षेत्र में दिशा तथा परिमाण दोनों होता है। चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता का मात्राक ऑर्स्टेड है।
चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं - किसी चुंबक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र को प्रदर्शित करने वाली काल्पनिक रेखाएं चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं कहलाती है







चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के गुण
1.चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ चुम्बक के उत्तर ध्रुव से प्रकट होती हैं तथा दक्षिण ध्रुव पर विलीन हो जाती हैं।
2.चुम्बक के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा उसके दक्षिण ध्रुव से उत्तर ध्रुव की ओर होती है अत: चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ एक बंद बक्र होती हैं।
3. दो क्षेत्र रेखाएँ कहीं भी एक-दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करतीं। यदि वे ऐसा करें तो इसका यह अर्थ होगा कि प्रतिच्छेद बिंदु पर दिकसूची को रखने पर उसकी सुई दो दिशाओं की ओर संकेत करेगी जो संभव नहीं हो सकता है 
4. जहाँ पर चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ अपेक्षाकृत अधिक नजदीक होती हैं वहाँ पर चुम्बकीय क्षेत्र अधिक प्रबल होता है। चूँकि चुम्बकीय क्षेत्र की रेखाएँ ध्रुवों के पास अधिक सघन होती हैं अत: एक चुम्बक ध्रुव के पास अधिक शक्तिशाली होता है।
किसी विद्युत धारावाही चालक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र
विद्युत धारावाही चालक दो तरह के हो सकते हैं: एक सीधा चालक तथा दूसरा वृताकार पाश वाला चालक।
सीधे चालक से विद्युत धारा प्रवाहित होने के कारण चुम्बकीय क्षेत्र 
जब किसी सीधे चालक से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसके चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। एक सीधे चालक से विद्युत धारा प्रवाहित करने पर चालक के चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाएँ संकेन्द्री वृत्त बनाती है। 
सीधे चालक से प्रावहित विद्युत धारा के परिमाण में वृद्धि से चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं कों निरूपित करने वाले संकेन्द्री वृत अधिक घने हो जाते हैं। अर्थात जैसे जैसे तार में प्रवाहित विद्युत धारा के परिमाण में वृद्धि होती है तो किसी दिये गये बिन्दु पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र के परिमाण में भी वृद्धि हो जाती है।
चालक के निकट चुम्बकीय क्षेत्र की प्रबलता अधिक होती है, तथा चालक से दूरी घटने के साथ चुम्बकीय क्षेत्र की प्रबलता उत्तरोत्तर कम होती जाती है।
मैक्सवेल का दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम
किसी विद्युत धरावाही चालक से संबद्ध चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के लिए  मैक्सवेल के दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम का उपयोग करते है इसे मैक्सवेल का कॉर्क स्क्रू नियम भी कहते हैं।दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम के अनुसार जब किसी धारावाही चालक को दाहिने हाथ से इस प्रकार पकड़े कि अंगूठा धारा की दिशा की ओर रहे तो मुड़ी हुई अंगुलियों की दिशा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को व्यक्त करती है

विद्युत धारावाही वृत्ताकार पाश के कारण चुम्बकीय क्षेत्र
जब विद्युत धारा को एक वृत्ताकार पाश से प्रवाहित किया जाता है, तो इस विद्युत धारावाही पाश के प्रत्येक बिन्दु पर उसके चारों ओर संकेन्द्री वृत्ताकार पैटर्न में चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। अतः विद्युत धारावाही वृत्ताकार पाश का प्रत्येक बिन्दु एक विद्युत धारावाही सीधे चालक की तरह व्यवहार करता है।
विद्युत धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र उससे दूरी के व्युत्क्रम होता है। अत: किसी विद्युत धारावाही पाश के प्रत्येक बिन्दु पर उसके चारों ओर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र को निरूपित करने वाले संकेन्द्री वृत्तों का आकार तार से दूर जाने पर निरंतर बड़ा होता जाता है। तथा वृत्ताकार पाश के केन्द्र में पहुँचने पर वृत्तों के चाप सरल रेखा जैसे प्रतीत होने लगते हैं। 
चुंबकीय क्षेत्र में किसी विद्युत धारावाही चालक पर बल
जब किसी चालक को किसी चुम्बक के दोनों ध्रुवों के बीच मुक्त रूप से लटकाकर चालक में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो चालक एक दिशा में विस्थापित हो जाता है। यह दर्शाता है जब किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो इसके चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र चालक के निकट रखे चुम्बक पर एक बल आरोपित करता है।चुम्बक भी विद्युत धारावाही चालक पर परिणाम में समान परंतु दिशा में विपरीत बल आरोपित करता है। 
चुम्बक द्वारा चालक पर आरोपित बल की दिशा विद्युत धारा की दिशा तथा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा पर निर्भर करती है। विद्युत धारावाही चालक में विस्थापन उस समय अधिकतम होता है जब विद्युत धारा की दिशा चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बबत होती है इस स्थिति में चालक पर आरोपित बल की दिशा का पता फ्लेमिंग का वामहस्त नियम द्वारा लगाया जा सकता है फ्लेंमिंग के वामहस्त नियम के अनुसार आरोपित बल की दिशा चुंबकीय क्षेत्र तथा विद्युत धारा दोनों की दिशाओं के लंबवत होती है।
फ्लेमिंग का वाम (बायाँ)  हस्त नियम 
फ्लेंमिंग के वाम हस्त नियम के अनुसार जब बाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा तथा अँगूठे को इस प्रकार फैलाया जाता है कि तीनों एक दूसरे के लम्बबत हों तब यदि तर्जनी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा और मध्यमा चालक में प्रवाहित विद्युत धारा की ओर संकेत करती है तो अँगूठा चालक की गति की दिशा अथवा चालक पर आरोपित बल की दिशा की ओर संकेत करेगा। यह फ्लेमिंग का वामहस्त नियम कहलाता है।


फ्लेमिंग का दक्षिण हस्त नियम 
फ्लेंमिंग के दक्षिण हस्त नियम के अनुसार जब दाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा तथा अँगूठे को इस प्रकार फैलाया जाता है कि तीनों एक दूसरे के लम्बवत हों तब यदि तर्जनी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा और अंगुठा चालक की गति की दिशा की ओर संकेत करता है तो मध्यमा चालक में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा को बताती है 
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परिनालिका में प्रवाहित विद्युत धरा के कारण चुंबकीय क्षेत्र
परिनालिका 
पास पास लिपटे विद्युतरोधी ताँम्बे के तार की बेलन की आकृति की अनेक फेरों वाली कुंडली को परिनालिका कहते हैं। 
जब किसी परिनालिका से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो यह परिनालिका एक चुम्बक की तरह व्यवहार करने लगता है। 
परिनालिका एक सिरा उत्तरी ध्रुव तथा दूसरा सिरा दक्षिणी ध्रुव की तरह व्यवहार करता है। परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ समांतर सरल रेखाओं की भाँति होती हैं। यह निर्दिष्ट करता है कि किसी परिनालिका के भीतर सभी बिंदुओं पर चुंबकीय क्षेत्र समान होता है। अर्थात परिनालिका के भीतर एकसमान चुंबकीय क्षेत्र होता है।
परिनालिका के भीतर उत्पन्न प्रबल चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग किसी चुंबकीय पदार्थ, जैसे नर्म लोहे, को परिनालिका के भीतर रखकर चुंबक बनाने में किया जा सकता है  इस प्रकार बने चुंबक को विद्युत चुंबक कहते हैं।
विद्युत मोटर
विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलने वाली युक्ति को विद्युत मोटर कहते हैं।
विद्युत मोटर का उपयोग विद्युत पंखों, रेफ्रिजेरेटरों, वाशिंग मशीनों, कंप्यूटरों, MP3 प्लेयरों आदि में किया जाता है। 
संरचना— विधुत मोटर में विधुतरोधी तार की एक आयता कार कुण्डली ABCD होती है ।
यह कुंडली किसी चुंबकीय क्षेत्र के दो ध्रुवों के बीच इस प्रकार रखी होती है कि इसकी भुजाएँ AB तथा CD चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के लंबवत रहें।  कुंडली के दोनों सिरे विभक्त वलय के दो अर्धभागों P तथा Q से जुड़े होते हैं| इन अर्धभागों की भीतरी सतह विद्युतरोधी होती है तथा धुरी से जुड़ी होती है। R तथा Q के बाहरी चालक सिरे क्रमश: दो स्थिर चालक ब्रुशों X और Y से स्पर्श करते हैं।
कार्य-प्रणाली — बैटरी से चलकर ब्रुश X से होते हुए Z से विधुत-धारा कुण्डली ABCD में प्रवेश करती है तथा चालक ब्रुश Y से होते हुए बैटरी के दूसरे टर्मिनल पर वापस भी आ जाती है । कुण्डली में विधुत-धारा इसकी भुजा AB में A से B की ओर तथा भुजा CD में C से D की ओर प्रवाहित होती है। अतः AB तथा CD में विधुत-धारा की दिशाएँ परस्पर विपरीत होती है। फ्लेंमिंग के वामहस्त नियम के अनुसार भुजा AB पर आरोपित बल इसे अधोमुखी धकेलता है, जबकि भुजा CD पर आरोपित बल इसे उपरिमुखी धकेलता है
चुंबकीय क्षेत्र में रखे विधुत-धारावाही चालक पर आरोपित बल की दिशा ज्ञात करने के लिए फ्लेमिंग का वामहस्त नियम अनुप्रयुक्त करने पर पाते हैं कि भुजा AB पर आरोपित बल इसे अधोमुखी धकेलता है, जबकि भुजा CD पर आरोपित तल इसे उपरिमुखी धकेलता है। इस प्रकार किसी अक्ष पर घूमने के लिए स्वतंत्र कुण्डली तथा धुरी वामावर्त्त घूर्णन करते हैं। आधे घूर्णन में Q का सम्पर्क ब्रुश X से होता है तथा P का सम्पर्क ब्रुश Y से होता है । अतः, कुण्डली में विधुत-धारा उत्क्रमित होकर पथ DCBA के अनुदिश प्रवाहित होती है।
दिकपरिवर्तक- वह युक्ति जो परिपथ में विद्युत धारा के प्रवाह को उत्क्रमित कर देती है, उसे दिकपरिवर्तक कहते हैं। विद्युत मोटर में विभक्त वलय दिकपरिवर्तक का कार्य करता है। 
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(i) व्यावसायिक मोटरों में स्थायी चुंबकों के स्थान पर विद्युत चुंबक प्रयोग किए जाते हैं 
(ii) व्यावसायिक मोटरों मेंविद्युत धारावाही कुंडली में फेरों की संख्या अत्यधिक होती है 
(iii) व्यावसायिक मोटरों में कुंडली को नर्म लौह क्रोड पर लपेटा जाता है। इस नर्म लौह कोड तथा उसपर लगे कुंडली को सम्मिलित रूप से आर्मेचर कहते हैं।
गैल्वेनोमीटर 
विद्युत परिपथ में विद्युत धारा की उपस्थिति बताने वाला उपकरण गैल्वेनोमीटर कहलाता है
विद्युत जनित्र
यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने वाली युक्ति को विद्युत जनित्र कहते हैं। 
सिद्धांत- एक विद्युत जनित्र वैद्युतचुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है
विद्युत जनित्र में एक आयताकार कुंडली ABCD होती है जिसे किसी स्थायी चुंबक के दो ध्रुवों के बीच रखा जाता है इस कुंडली के दोनों सिरे दो वलय R₁ तथा R₂ से जुड़े होते हैंदो स्थिर चालक ब्रुश B तथा B वलय R₁ तथा R₂ पर लगे होते है। तथा दोनों वलय R₁ तथा R₂  भीतर से धुरी से जुड़े होते हैं। दोनों ब्रुशों के बाहरी सिरे, बाहरी परिपथ में गैल्वेनोमीटर से जुड़े होते हैं। 
कार्य-विधि— जब कुंडली ABCD को चुंबकीय क्षेत्र में इस प्रकार घुमाया जाता है कि कुंडली की भुजा AB ऊपर की ओर तथा भुजा CD नीचे की ओर गति करती है चुंबकीय क्षेत्र में जब कुंडली गति करती है तो कुंडली प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है फ्लेंमिंग के दक्षिण-हस्त नियम के अनुसार विधुत-धारा भुजा AB में A से B और भुजा CD में C से D की ओर बहती है। अतः कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा ABCD दिशा में प्रवाहित होती है। बाह्य परिपथ में यह प्रेरित विद्युत धारा ब्रुश B₂ से B₁ की दिशा में प्रवाहित होती है। आधे घूर्णन के पश्चात भुजा CD ऊपर की ओर तथा भुजा AB नीचे की ओर गति करने लगती है। अतः विधुत-धारा भुजा AB में B से A और भुजा CD में D से C की ओर बहने लगती है। फलस्वरूप कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा परिवर्तित हो जाती है और कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा DCBA दिशा में प्रवाहित होने लगती है। इस प्रकार, अब बाह्य परिपथ में ब्रुश B₁ से B₂ की दिशा में विद्युत धारा प्रवाहित होती है। अतः, प्रत्येक आधे घूर्णन के पश्चात क्रमिक रूप से इन भुजाओं में विद्युत धारा की दिशा परिवर्तित होती रहती है। 

प्रत्यावर्ती धारा (AC)- ऐसी विद्युत धारा जो समान समय-अंतरालों के पश्चात अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती है, उसे प्रत्यावर्ती धारा (AC) कहते हैं। तथा प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न करने की इस युक्ति को प्रत्यावर्ती विद्युत धारा जनित्र हैं। 
अधिकांश विद्युत शक्ति संयंत्रों में प्रत्यावर्ती विद्युत धारा का उत्पादन होता है। भारत में उत्पादित प्रत्यावर्ती विद्युत धारा हर 1/100 Sec के पश्चात अपनी दिशा उत्क्रमित (उल्टी) कर लेती है अर्थात इस प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति 50 Hz है। 
दिष्ट धारा - (DC) - ऐसी विद्युत धारा जिसमे समय के साथ  दिशा में परिवर्तन नहीं होता  है, उसे दिष्ट धारा (DC) कहते हैं। तथा दिष्ट धारा उत्पन्न करने की इस युक्ति को दिष्ट  धारा जनित्र हैं। 
दिष्ट धारा तथा प्रत्यावर्ती धारा के बीच यह अंतर है कि  दिष्ट धारा सदैव एक ही दिशा में प्रवाहित होती है, जबकि प्रत्यावर्ती धारा एक निश्चित समय-अंतराल के पश्चात अपनी दिशा उत्क्रमित करती रहती है। 
दिष्ट धारा की तुलना मेंं प्रत्यावर्ती धारा का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि प्रत्यावर्ती धारा  को सुदूर स्थानों पर बिना अधिक ऊर्जा क्षय के प्रेषित किया जा सकता है।
घरेलू विद्युत परिपथ
हम अपने घरों में विद्युत शक्ति की आपूर्ति मुख्य तारों (जिसे मेंस भी कहते हैं) से प्राप्त करते हैं। ये मुख्य तार या तो धरती पर लगे विद्युत खंभों के सहारे अथवा भूमिगत केबलों से हमारे घरों तक आते हैं। इस आपूर्ति के तारों में से एक तार को जिस पर प्रायः लाल विद्युतरोधी आवरण होता है, विद्युन्मय तार [धनात्मक तार] कहते
हैं। अन्य तार को जिस पर काला आवरण होता है, उदासीन तार [ऋणात्मक तार] कहते हैं। हमारे देश में इन दोनों तारों के बीच 220 V का विभवांतर होता है। घर में लगे मीटर बोर्ड में ये तार मुख्य फ्यूज से होते हुए विद्युत मीटर में प्रवेश करते हैं। इन्हें मुख्य स्विच से होते हुए घर के लाइन तारों से संयोजित किया जाता है।
ये तार घर के पृथक-पृथक परिपथों में विद्युत आपूर्ति करते हैं। प्रायः घरों में दो पृथक परिपथ होते हैं, एक 15 A विद्युत धारा अनुमतांक के लिए जिसका उपयोग उच्च शक्ति वाले विद्युत साधित्रों जैसे गीजर, वायु शीतित्र/कूलर आदि के लिए किया जाता है। दूसरा विद्युत परिपथ 5 A विद्युत धारा अनुमतांक के लिए होता है जिससे बल्ब, पंखे आदि चलाए जाते हैं। 
भूसंपर्क तार
भूसंपर्क तार पर प्रायः हरा विद्युतरोधी आवरण होता है यह घर के निकट भूमि के भीतर बहुत गहराई पर स्थित धातु की प्लेट से संयोजित होता है। इस तार का उपयोग विशेषकर विद्युत इस्त्री, टोस्टर, मेज का पंखा, रेफ्रिजरेटर, आदि धातु के आवरण वाले विद्युत साधित्रो में सुरक्षा के उपाय के रूप में किया जाता है। धातु के आवरणों से संयोजित भूसंपर्क तार विद्युत धारा के लिए अल्प प्रतिरोध का चालन पथ प्रस्तुत करता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि साधित्र के धत्विक आवरण में विद्युत धारा का कोई क्षरण होने पर उस साधित्र का विभव भूमि के विभव के बराबर हो जाता है फलस्वरूप इस साधित्र को उपयोग करने वाला व्यक्ति तीव्र विद्युत आघात से सुरक्षित बचा रहता है। 
फ्यूज तार
जब तारों का विद्युतरोधन क्षतिग्रस्त हो जाता है अथवा साधित्र में कोई दोष होता है तब विद्युन्मय तार तथा उदासीन तार दोनों सीधे संपर्क में आ जाते हैं ऐसी परिस्थितियों में किसी परिपथ में विद्युत धारा अकस्मात बहुत अधिक (अतिभारण) हो जाती है। इसे लघुपथन कहते हैं। 
विद्युत परिपथ तथा साधित्र को अतिभारण के कारण होने वाली क्षति से बचाने के लिए  फ्यूज का उपयोग किया जाता है  फ्यूज विद्युत परिपथ तथा विद्युत साधित्र को अवांछनीय उच्च विद्युत धारा के प्रवाह को समाप्त करके, संभावित क्षति से बचाता है। परिपथ में विद्युत धारा अकस्मात बहुत अधिक (अतिभारण) हो जाने पर फ्यूज तार पिघला जाता है जिससे विद्युत परिपथ टूट जाता है। 
अतिभारण निम्न कारणों से हो सकता है 
1. आपूर्ति वोल्टता में दुर्घटनावश होने वाली वृद्धि के कारण 
2. एक ही सॉकेट से बहुत से विद्युत साधित्रों को संयोजित करने पर

  1. घरेलू परिपथ में अतिभारण तथा लघुपथन से बचने के लिए क्या उपाय किया जाता है?
    फ्यूज तार का 
  2. घरेलु परिपथ में कौन-सी धारा प्रवाहित होती है ?
    प्रत्यावर्ती धारा
  3. विद्युत धारा उत्पन्न करने की युक्ति क्या कहालाती है?
    विद्युत जनित्र
  4. विद्युत चुम्बक बनाने के लिए किस पदार्थ का उपयोग होता है?
    नरम लोहा
  5. "विद्युत-धारा का चुंबकीय प्रभाव" किसने खोज निकाला था?
    ओर्स्टेड ने
  6. विद्युत परपिथों एवं साधित्रों में सामान्यतया उपयोग होने वाले दो सूरक्षा उपायों के नाम लिखिए
    1. विद्युत फ्यूज 
    2. भू-सम्पर्क तार 
  7. MRI का पुरा नाम लिखिए 
    चुम्बकीय अनुनाद प्रतिबिंबन
  8. घरों में प्रयोग होने वाले उपकरण, मेन्स से किस क्रम में जोड़े जाते हैं ?
    समान्तर क्रम में
  9. गैल्वेनोमीटर किसे कहते है ?
    विद्युत परिपथ में विद्युत धारा की उपस्थिति बताने वाला उपकरण गैल्वेनोमीटर कहलाता है
  10. चुंबकीय क्षेत्र किसे कहते है ?
    चुंबक के चारों ओर वह क्षेत्र जिसमें चुंबकीय प्रभाव महसूस किया जाता है चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है
  11. चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता का मात्रक क्या है ?
    ऑर्स्टेड
  12. मानव शरीर के किन भागों  में चुंबकीय क्षेत्र का उत्पन्न होता है ?
    मानव शरीर के दो मुख्य भाग हृदय तथा मस्तिष्क में चुंबकीय क्षेत्र का उत्पन्न होता है 
  13. विद्युत जनित्र किसे कहते है ?
    यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने वाली युक्ति को विद्युत जनित्र कहते हैं।
  14. विद्युत जनित्र किस सिद्धांत पर कार्य करता है ?
    विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर
  15. विद्युन्मय तार एवं उदासीन तार के बीच का विभवांतर का मान कितना होता है ?
    220V
  16. एक सीधे धारावाही चालक के चारों ओर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की चुम्बकीय बल रेखाएँ कैसी होती हैं 
    संकेन्द्री वृत्तों  के रूप में
  17. विद्युत मोटर क्या है ? 
    विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलने वाली युक्ति को विद्युत मोटर कहते हैं।
  18. वृत्ताकार धारावाही चालक द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र का मान सबसे अधिक  कहाँ होता है ?
    वृत्ताकार धारावाही चालक के केन्द्र पर चुंबकीय क्षेत्र का मान सबसे अधिक होता है
  19. किसी चुंबकीय क्षेत्र में विद्युत धारावाही चालक पर आरोपित बल कब अधिकतम होता है ?
    जब विद्युत धारा की दिशा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बवत् होती है।
  20. भारत में प्रत्यावर्ती धारा [AC] की आवृत्ति क्या है ?
    50Hz
  21. चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ अधिक संख्या में कहाँ होती है ? .
    चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ ध्रुवों पर ज्यादा सघन होती हैं।
  22. कौन सी युक्ति है जो विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में रूपांतरित कर देती है ?
    विद्युत मोटर
  23. ताँबे के तार की एक आयताकार कुंडली किसी चुंबकीय क्षेत्र में घूर्णी गति कर रही है इस कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा में कितने परिभ्रमण के पश्चात परिवर्तन होता है ?
    आधे घूर्णन के बाद
  24. व्यावसायिक मोटरों में कौन-से चुंबक प्रयुक्त किए जाते हैं ?
    विद्युत चुंबक
  25. सभी आधुनिक विद्युत शक्ति संयंत्र कैसी विद्युत धारा उत्पन्न करते हैं ?
    प्रत्यावर्ती विद्युत धारा
  26. घरों में विद्युत शक्ति की आपूर्ति किन तारों के द्वारा की जाती है ?
    मुख्य तारों द्वारा  जिसे मेंस भी कहते हैं
  27. बैटरी के चार्जर में कौनसी धारा प्रयुक्त की जाती है ?
    दिष्ट धारा
  28. विद्युत चुंबकीय प्रेरण की खोज किसने की ?
    माईकल फैराडे 
  29. विद्युत धारावाही.सीधी लम्बी परिनालिका के भीतर सभी जगह चुम्बकीय क्षेत्र की प्रकृति कैसी होती है 
    चुम्बकीय क्षेत्र सभी बिन्दुओं पर समान होता है।
  30. प्रत्यावर्ती विद्युत धारा उत्पन्न करनेवाले स्रोतों के नाम लिखिए।
    नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों के जनित्र, थर्मल पॉवर प्लांट, जलीय पावर स्टेशन आदि।
  31. दिष्ट धारा उत्पन्न करने वाले मुख्य स्रोतों के नाम लिखिए।
     शुष्क सेल, बटन सेल, लेड बैटरियों,  डी सी जनित्र।
  32. विद्युत मोटर का उपयोग किन युक्तियों में किया जाता है ?
    विद्युत पंखां,  रेफ्रिजरेटर,  कूलर,  वाशिंग मशीनो आदि
  33. चिकित्सा क्षेत्र में विद्युत चुंबकीय प्रभाव कहाँ प्रयुक्त किया गया है ?
    चुंबकीय अनुनाद प्रतिबिंबन / MRI [मैगनेटिक रेजोनेंस इमेजिंग] में।
  34. विद्युत मोटर में विभक्त वलय की क्या भूमिका है ?
    विद्युत मोटर में विभक्त वलय दिकपरिवर्तक का कार्य करता है विभक्त वलय परिपथ में विद्युत धारा के प्रवाह को उत्क्रमित कर देती है| जिसके फलस्वरूप कुंडली तथा धुरी में निरंतर घूर्णन होता रहता है
  35. चुंबक के  भीतर चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा क्या होती है ? 
    चुंबक के  भीतर चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा दक्षिण ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर बंद वक्र के समान होती है।
  36. चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा क्या होती है ? 
    चुंबक के चुंबकीय क्षेत्र की दिशा चुंबक के उत्तरी ध्रुव से दक्षिण ध्रुव की ओर बंद वक्र के समान होती है।
  37. दिष्ट धारा की तुलना में प्रत्यावर्ती धारा का एक लाभ लिखें।
    दिष्ट धारा की तुलना मेंं प्रत्यावर्ती धारा का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि प्रत्यावर्ती धारा  को सुदूर स्थानों पर बिना अधिक ऊर्जा क्षय के प्रेषित किया जा सकता है।
  38. परिनालिका किसे कहते हैं ?
    पास पास लिपटे विद्युतरोधी ताँम्बे के तार की बेलन की आकृति की अनेक फेरों वाली कुंडली को परिनालिका कहते हैं। 
  39. प्रत्यावर्ती धारा किसे कहते हैं ?
    वह धारा जो निश्चित समय अंतराल के बाद अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती है प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है
  40. विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव क्या है ?
    जब किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है इस में विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव कहते हैं
  41. विद्युत चुंबकीय प्रेरण किसे कहते हैं ?
    किसी कुंडली एवं चुम्बक के बीच सापेक्ष गति के कारण कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होने की परिघटना को विद्युत चुंबकीय प्रेरण कहते हैं
  42. प्रत्यावर्ती धारा एवं दिष्ट धारा में एक मुख्य अंतर क्या है ?
    दिष्टधारा सदैव एक ही दिशा में प्रवाहित होती है तथा प्रत्यदर्शी धारा एक निश्चित समयान्तराल के पश्चात अपनी दिशा बदलती रहती है।
  43. चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं किसे कहते है ?
    किसी चुंबक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र को प्रदर्शित करने वाली काल्पनिक रेखाएं चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं कहलाती है
  44. दो चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को प्रतिच्छेद क्यों नहीं करतीं ?
    दो क्षेत्र रेखाएँ कहीं भी एक-दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करतीं। यदि वे ऐसा करें तो इसका यह अर्थ होगा कि प्रतिच्छेद बिंदु पर दिकसूची को रखने पर उसकी सुई दो दिशाओं की ओर संकेत करेगी जो संभव नहीं हो सकता है
  45. विधुत मोटर किस सिद्धान्त पर कार्य करती है ?
    विधुत मोटर विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव के सिद्धांत पर कार्य करती है जब किसी कुण्डली को चुंबकीय क्षेत्र में रखकर उसमें धारा प्रवाहित की जाती है तो कण्डली पर एक बल युग्म कार्य करने लगता है, जो कुण्डली को उसी अक्ष पर घुमाने का प्रयास करता है। यदि कुण्डली अपनी अक्ष पर घूमने के लिए स्वतन्त्र हो तो वह घूमने लगती है।
  46. विद्युत जनित्र का सिद्धांत लिखिए।
    विद्युत जनित्र  का सिद्धांत विद्युत चुंबकीय प्रेरण पर आधारित है। इस सिद्धांत के अनुसार जब किसी कुंडली को तीव्र चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है तो कुण्डली से संबंधित चुंबकीय बल रेखा में परिवर्तन होता है जिसके फलस्वरूप कुण्डली में प्रेरित धारा प्रवाहित होने लगती है। 
  47. घरेलू विद्युत परिपथों में अतिभारण से बचाव के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए ?
    एक ही सॉकेट से एक से अधिक साधित्रों को नहीं जोड़ना चाहिए
    एक ही समय में बहुत अधिक साधित्रों का एक साथ प्रयोग नहीं करना चाहिए
    दोषपूर्ण साधित्रों को परिपथ में नहीं जोड़ना चाहिए
    विद्युत परिपथ में उपयुक्त स्थान पर फ्यूज लगा होना चाहिए 
  48. फ्लेमिंग का वाम हस्त नियम लिखिए।
    फ्लेंमिंग का वाम हस्त नियम के अनुसार जब बाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा तथा अँगूठे को इस प्रकार फैलाया जाता है कि तीनों एक दूसरे के लम्बबत हों तब यदि तर्जनी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा और मध्यमा चालक में प्रवाहित विद्युत धारा की ओर संकेत करती है तो अँगूठा चालक की गति की दिशा अथवा चालक पर आरोपित बल की दिशा की ओर संकेत करेगा। यह फ्लेमिंग का वाम हस्त नियम कहलाता है।


  49. फ्लेमिंग का दक्षिण हस्त नियम लिखिए
    फ्लेंमिंग के दक्षिण हस्त नियम के अनुसार जब दाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा तथा अँगूठे को इस प्रकार फैलाया जाता है कि तीनों एक दूसरे के लम्बवत हों तब यदि तर्जनी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा और अंगुठा चालक की गति की दिशा की ओर संकेत करता है तो मध्यमा चालक में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा को बताती है 
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  50. चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के गुण लिखिए
    1.चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं उत्तरी ध्रुव से प्रकट होती हैं तथा दक्षिणी ध्रुव में विलीन हो जाती है
    2.चुंबक के भीतर चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की होती है
    3.चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं एक बंद वक्र होती है
    4.चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं एक दूसरे को काटती नहीं है
  51.  निम्नलिखित की दिशा को निर्धारित करने वाला नियम लिखिए
    [i] किसी विद्युत धारावाही सीधे चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा
    [ii] किसी चुंबकीय क्षेत्र में, क्षेत्र के लंबवत स्थित, विद्युत धारावाही सीधे चालक पर आरोपित बल
    [iii] किसी चुंबकीय क्षेत्र में किसी कुंडली के घूर्णन करने पर उस कुंडली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत धारा|
    [i] मैक्सवेल का दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम
    [ii] फ्लेंमिंग का वामहस्त नियम
    [iii] फ्लेंमिंग का दक्षिण-हस्त नियम
  52. विद्युत परिपथों तथा साधित्रों में सामान्यतः उपयोग होने वाले दो सुरक्षा उपायों के नाम लिखिए 
    विद्युत फ्यूज: विद्युत परिपथ में लगा फ्यूज परिपथ तथा साधित्र को अतिभारण के कारण होने वाली क्षति से बचाता है
    भूसंपर्क तार- भूसंपर्क तार विद्युत धारा के लिए अल्प प्रतिरोध का चालन पथ प्रस्तुत करता है। साधित्र के धत्विक आवरण में विद्युत धारा का कोई क्षरण होने पर उस साधित्र का विभव भूमि के विभव के बराबर हो जाता है फलस्वरूप इस साधित्र को उपयोग करने वाला व्यक्ति तीव्र विद्युत आघात से सुरक्षित बचा रहता है
  53. भूसंपर्क तार का क्या कार्य है ? .
    भूसंपर्क तार पर प्रायः हरा विद्युतरोधी आवरण होता है यह घर के निकट भूमि के भीतर बहुत गहराई पर स्थित धातु की प्लेट से संयोजित होता है। इस तार का उपयोग विशेषकर विद्युत इस्त्री, टोस्टर, मेज का पंखा, रेफ्रिजरेटर, आदि धातु के आवरण वाले विद्युत साधित्रो में सुरक्षा के उपाय के रूप में किया जाता है। यह तार विद्युत धारा के लिए अल्प प्रतिरोध का चालन पथ प्रस्तुत करता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि साधित्र के धत्विक आवरण में विद्युत धारा का कोई क्षरण होने पर उस साधित्र का विभव भूमि के विभव के बराबर हो जाता है फलस्वरूप इस साधित्र को उपयोग करने वाला व्यक्ति तीव्र विद्युत आघात से सुरक्षित बचा रहता है। 
  54. विधुत जनित्र क्या है ? नामांकित आरेख खींचकर किसी विधुत जनित्र का मूल सिद्धांत तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए। 
    यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने वाली युक्ति को विद्युत जनित्र कहते हैं। 
    सिद्धांत- एक विद्युत जनित्र वैद्युतचुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है
    संरचना- विद्युत जनित्र में एक आयताकार कुंडली ABCD होती है जिसे किसी स्थायी चुंबक के दो ध्रुवों के बीच रखा जाता है इस कुंडली के दोनों सिरे दो वलय R1 तथा R2 से जुड़े होते हैंदो स्थिर चालक ब्रुश B1 तथा B2 वलय R1 तथा R2 पर लगे होते है। तथा दोनों वलय R1 तथा R2 भीतर से धुरी से जुड़े होते हैं। दोनों ब्रुशों के बाहरी सिरे, बाहरी परिपथ में गैल्वेनोमीटर से जुड़े होते हैं। 
    कार्य-विधि— जब कुंडली ABCD को चुंबकीय क्षेत्र में इस प्रकार घुमाया जाता है कि कुंडली की भुजा AB ऊपर की ओर तथा भुजा CD नीचे की ओर गति करती है चुंबकीय क्षेत्र में जब कुंडली गति करती है तो कुंडली प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है फ्लेंमिंग के दक्षिण-हस्त नियम के अनुसार विधुत-धारा भुजा AB में A से B और भुजा CD में C से D की ओर बहती है। अतः कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा ABCD दिशा में प्रवाहित होती है। बाह्य परिपथ में यह प्रेरित विद्युत धारा ब्रुश B₂ से B₁ की दिशा में प्रवाहित होती है। आधे घूर्णन के पश्चात भुजा CD ऊपर की ओर तथा भुजा AB नीचे की ओर गति करने लगती है। अतः विधुत-धारा भुजा AB में B से A और भुजा CD में D से C की ओर बहने लगती है। फलस्वरूप कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा परिवर्तित हो जाती है और कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा DCBA दिशा में प्रवाहित होने लगती है। इस प्रकार, अब बाह्य परिपथ में ब्रुश B₁ से B₂ की दिशा में विद्युत धारा प्रवाहित होती है। अतः, प्रत्येक आधे घूर्णन के पश्चात क्रमिक रूप से इन भुजाओं में विद्युत धारा की दिशा परिवर्तित होती रहती है। 
  55. विधुत मोटर का नामांकित आरेख खींचिए। इसका सिद्धांत तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए। विधुत मोटर में विभक्त वलय का क्या महत्त्व है ?
    विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलने वाली युक्ति को विद्युत मोटर कहते हैं। विद्युत मोटर का उपयोग विद्युत पंखों, रेफ्रिजेरेटरों, वाशिंग मशीनों, कंप्यूटरों, MP3 प्लेयरों आदि में किया जाता है। 
    संरचना— विधुत मोटर में विधुतरोधी तार की एक आयता कार कुण्डली ABCD होती है ।
    यह कुंडली किसी चुंबकीय क्षेत्र के दो ध्रुवों के बीच इस प्रकार रखी होती है कि इसकी भुजाएँ AB तथा CD चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के लंबवत रहें।  कुंडली के दोनों सिरे विभक्त वलय के दो अर्धभागों P तथा Q से जुड़े होते हैं| इन अर्धभागों की भीतरी सतह विद्युतरोधी होती है तथा धुरी से जुड़ी होती है। R तथा Q के बाहरी चालक सिरे क्रमश: दो स्थिर चालक ब्रुशों X और Y से स्पर्श करते हैं।
    कार्य-प्रणाली — बैटरी से चलकर ब्रुश X से होते हुए Z से विधुत-धारा कुण्डली ABCD में प्रवेश करती है तथा चालक ब्रुश Y से होते हुए बैटरी के दूसरे टर्मिनल पर वापस भी आ जाती है । कुण्डली में विधुत-धारा इसकी भुजा AB में A से B की ओर तथा भुजा CD में C से D की ओर प्रवाहित होती है। अतः AB तथा CD में विधुत-धारा की दिशाएँ परस्पर विपरीत होती है। फ्लेंमिंग के वामहस्त नियम के अनुसार भुजा AB पर आरोपित बल इसे अधोमुखी धकेलता है, जबकि भुजा CD पर आरोपित बल इसे उपरिमुखी धकेलता है
    चुंबकीय क्षेत्र में रखे विधुत-धारावाही चालक पर आरोपित बल की दिशा ज्ञात करने के लिए फ्लेमिंग का वामहस्त नियम अनुप्रयुक्त करने पर पाते हैं कि भुजा AB पर आरोपित बल इसे अधोमुखी धकेलता है, जबकि भुजा CD पर आरोपित तल इसे उपरिमुखी धकेलता है। इस प्रकार किसी अक्ष पर घूमने के लिए स्वतंत्र कुण्डली तथा धुरी वामावर्त्त घूर्णन करते हैं। आधे घूर्णन में Q का सम्पर्क ब्रुश X से होता है तथा P का सम्पर्क ब्रुश Y से होता है । अतः, कुण्डली में विधुत-धारा उत्क्रमित होकर पथ DCBA के अनुदिश प्रवाहित होती है।
    दिकपरिवर्तक- वह युक्ति जो परिपथ में विद्युत धारा के प्रवाह को उत्क्रमित कर देती है, उसे दिकपरिवर्तक कहते हैं। विद्युत मोटर में विभक्त वलय दिकपरिवर्तक का कार्य करता है। 
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