GSSS BINCHAWA

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GSSS KATHOUTI

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GSSS BUROD

3. भूमंडलीकृत विश्व का बनना

पूर्व-आधुनिक विश्व
वैश्वीकरण दुनिया भर में वस्तुओं, सेवाओं और लोगों की मुक्त आवाजाही है।
वैश्विक दुनिया के निर्माण में व्यापार, प्रवास, काम की तलाश में लोगों का आना-जाना, पूंजी की आवाजाही का एक लंबा इतिहास है।
3000 ईसा पूर्व की शुरुआत में एक सक्रिय तटीय व्यापार ने सिंधु घाटी सभ्यताओं को वर्तमान पश्चिम एशिया से जोड़ा। 
एक सहस्राब्दी से अधिक समय तक, मालदीव की कौड़ियाँ चीन और पूर्वी अफ्रीका पहुँचती थीं। कौड़ी/कौड़ी - समुद्री सीप, मुद्रा के रूप में उपयोग की जाती है
1. रेशम मार्ग
प्राचीन समय में रेशम मार्गों से चीनी रेशम के कार्गो पश्चिम देशों को भेजा जाता था। चीनी व्यापारियों द्वारा रेशम मार्ग का उपयोग अन्य देशों को रेशम निर्यात करने के लिए किया जाता था।
इन मार्गों का उपयोग धर्मों के प्रसार के लिए भी किया जाता था। बौद्ध धर्म प्रचारक, ईसाई मिशनरी और मुस्लिम धर्म प्रचारक इन मार्गों से यात्रा करते थे।
रेशम मार्ग दुनिया के दूर-दराज के हिस्सों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों का एक जीवंत उदाहरण है। 'रेशम मार्ग' नाम इस मार्ग से पश्चिम की ओर जाने वाले चीनी रेशम कार्गो के महत्व के कारण पड़ा।
रेशम मार्गों ने पूर्व और पश्चिमी देशों के बीच व्यापार और सांस्कृति के आदान-प्रदान को सुगम बनाया।
चीनी मिट्टी के बर्तन, वस्त्र और मसाले भी सिल्क रूट के माध्यम से भारत और दक्षिण पूर्व एशिया से दुनिया के अन्य हिस्सों में पहुँचे। बदले में, कीमती धातुएँ (सोना और चाँदी) यूरोप से एशिया में प्रवाहित हुईं।
2. खाद्य यात्राएँ : स्पेगेटी और आलू
खाद्य पदार्थ दूर देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कई उदाहरण प्रस्तुत करता है। कई इतिहासकारों का मानना ​​है कि नूडल्स चीन से पश्चिम की ओर बढ़े और स्पेगेटी बन गए। यह भी माना जाता है कि अरब व्यापारी पाँचवीं शताब्दी में पास्ता को सिसिली (इटली का एक द्वीप) ले गए थे।
पाँचवीं शताब्दी पहले, भारतीयों को आलू, सोया, मूंगफली, मक्का, टमाटर, मिर्च और शकरकंद के बारे में पता नहीं था। क्रिस्टोफर कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज के बाद ही ये खाद्य पदार्थ यूरोप और एशिया में आए।
हमारे कई आम खाद्य पदार्थ अमेरिका के मूल निवासियों (अमेरिकी भारतीयों) से आते थे। यूरोप के गरीब लोग आलू की खेती के आने से बेहतर खाने लगे और लंबे समय तक जीने लगे। आयरलैंड के गरीब किसान आलू पर इतने निर्भर हो गए कि जब 1840 के दशक के मध्य में बीमारी ने आलू की फसल को नष्ट कर दिया, तो सैकड़ों हज़ारों लोग भूख से मर गए।
3. विजय, बीमारी और व्यापार : 16 वीं शताब्दी में यूरोपीय नाविकों ने एशिया के लिए एक समुद्री मार्ग खोजा और सफलतापूर्वक पश्चिमी महासागर को पार करके अमेरिका पहुँच गए। अमेरिका की खोज के बाद इसकी विशाल भूमि और फसलों और खनिजों ने हर जगह व्यापार और जीवन को बदलना शुरू कर दिया। पेरू और मैक्सिको में कीमती धातुएँ, खासकर चाँदी पाई गई, जिससे यूरोप की संपत्ति बढ़ी और एशिया के साथ व्यापार को वित्तपोषित किया गया। सोने के प्रसिद्ध शहर एल डोराडो की खोज में कई अभियान शुरू हुए। पुर्तगालियों और स्पेनियों ने सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक अमेरिका पर विजय प्राप्त की और उपनिवेश स्थापित किए।
यूरोपीय लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला हथियार चेचक के कीटाणु थे। उन्होंने जैविक युद्ध का इस्तेमाल किया। अमेरिका के मूल निवासियों में यूरोप से आने वाली इन बीमारियों के खिलाफ कोई प्रतिरक्षा नहीं थी। इसलिए चेचक एक जानलेवा बीमारी साबित हुई।
उन्नीसवीं सदी में यूरोप में गरीबी और भुखमरी आम बात थी। शहरों में भीड़भाड़ थी और जानलेवा बीमारियाँ फैल रही थीं। धार्मिक संघर्ष आम थे और धार्मिक असंतुष्टों को सताया जाता था। इसलिए हज़ारों लोग यूरोप से भागकर अमेरिका चले गए।
उन्नीसवीं शताब्दी (1815-1914)

उन्नीसवीं सदी में दुनिया तेजी से बदलने लगी। अर्थशास्त्रिायों ने अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में तीन तरह के प्रवाहों का उल्लेख किया है।

(i) व्यापार का प्रवाह (ii) श्रम का प्रवाह (iii) पूँजी का प्रवाह 

1 विश्व अर्थव्यवस्था का उदय

अठारहवीं सदी के अन्त में ब्रिटेन की आबादी तेजी से बढ़ने के कारण भोजन की माँग बढ़ी और कृषि उत्पाद मँहगे होने लगे। ब्रिटेन सरकार ने बड़े भू-स्वामियों के दबाव में सरकार ने मक्का के आयात पर पाबंदी लगा दी। जिस कानून के तहत सरकार ने यह पाबंदी लागू की थी उन्हें 'कॉर्न लॉ' कहा जाता था।
खाद्य पदार्थों की ऊँची कीमतों से परेशान उद्योगपतियों और शहरी बाशिंदों के सरकार पर दबाव के चलते कॉर्न लॉ को निरस्त कर दिया। जिससे ब्रिटेन में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थों से भी कम कीमत पर खाद्य पदार्थों का आयात किया जाने लगा। फलस्वरूप, ब्रिटिश किसानों की हालत बिगड़ने लगी क्योंकि वे आयातित माल की कीमत का मुकाबला नहीं कर सकते थे। विशाल भूभागों पर खेती बंद हो गई। हजारों लोग बेरोजगार हो गए। गाँवों से वे शहरों और दूसरे देशों में जाने लगे।
जब खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट आई तो ब्रिटेन में उपभोग का स्तर बढ़ गया। उन्नीसवीं सदी के मध्य से ब्रिटेन की औद्योगिक प्रगति से लोगों की आय में वृद्ध हुई। इससे लोगों की जरूरतें बढ़ीं। खाद्य पदार्थों का और भी ज्यादा मात्रा में आयात होने लगा।
पूर्वी यूरोप, रूस, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में ब्रिटेन का पेट भरने के लिए जमीनों को साफ करके खेती की जाने लगी। खेतिहर इलाकों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए रेलवे लाइन बिछाई गई । माल ढुलाई के लिए नयी गोदियाँ बनाई और पुरानी गोदियों बड़ा किया।
नयी जमीनों पर खेती करने के लिए दूसरे इलाकों के लोग वहाँ आकर बसें। उनके लिए नए घर बनाने के लिए पूँजी आरै श्रम की जरूरत थी। जो लदंन आने लगी। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में मजदूरों की कमी थी वहाँ लोगों को ले जाकर बसाया जाने लगा यानी श्रम का प्रवाह होने लगा।
1890 तक एक विश्व की कृषि अर्थव्यवस्था सामने आ चुकी थी। अब भोजन किसी आसपास के गांव या कस्बे से नहीं बल्कि हजारों मील दूर से आने लगा था। अब अपने खेतों पर खुद काम करने वाले किसान ही खाद्य पदार्थ पैदा नहीं कर रहे थे। अब यह काम ऐसे औद्योगिक मजदूर करने लगे थे जो संभवतः हाल ही में वहाँ आए थे और ऐसे खेतों में काम कर रहे थे जहाँ महज एक पीढ़ी पहले संभवतः ठेठ जंगल रहे होंगे। खाद्य पदार्थों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने के लिए रेलवे का इस्तेमाल किया जाता था। पानी के जहजों से इसे दूसरे देशों में पहुँचाया जाता था।

2.तकनीक की भूमिका

औपनिवेशीकरण के कारण यातायात और परिवहन साधनों में भारी सुधार किए गए। तेज चलने वाली रेलगाड़ियाँ बनीं, बोगियों का भार कम किया गया, जलपोतों का आकार बढ़ा जिससे किसी भी उत्पाद को खेतों से दूर-दूर के बाजारों में कम लागत पर और ज्यादा आसानी से पहुँचाया जा सके।
मांस का निर्यात तभी संभव हो पाया जब जहाजों को ठंडा रखने की व्यवस्था कर ली गई थी। 1870 के दशक तक अमेरिका से यूरोप को मांस का निर्यात नहीं किया जाता था। उस समय केवल जिंदा जानवर ही भेजे जाते थे जिन्हें यूरोप ले जाकर ही काटा जाता था। लेकिन जिंदा जानवर बहुत ज्यादा जगह घेरते थे। बहुत सारे तो लंबे सफर में मर जाते थे या बीमार पड़ जाते थे। बहुतों का वजन गिर जाता था या वे खाने के लायक नहीं रह जाते थे। इसी वजह से मांस खाना एक मँहगा सौदा था और यूरोप के गरीबों की पहुँच से बाहर था। दूसरी तरफ, ऊँची कीमतों के कारण मांस उत्पादों की माँग और उत्पादन भी कम रहता था। नयी तकनीक के आने पर यह स्थिति बदल गई। पानी के जहाजो में रेफ्रीजेरेटर की तकनीक स्थापित कर दी गई जिससे जल्दी खराब होने वाली चीजों को भी लंबी यात्राओं पर ले जाया जा सकता था।
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड, सब जगह से जानवरों की बजाय उनका मांस ही यूरोप भेजा जाने लगा। इससे न केवल समुद्री यात्रा में आने वाला खर्चा कम हो गया बल्कि यूरोप में मांस के दाम भी गिर गए। यूरोप के गरीबों को ज्यादा विविधतापूर्ण खुराक मिलने लगी। पहले उनके पास सिर्फ आलू और ब्रेड होते थे। अब बहुत सारे लोगों के भोजन में मांस शामिल हो गया। जीवन स्थिति सुधरी तो देश में शांति स्थापित होने लगी और दूसरे देशों में साम्राज्यवादी मंसूबों को समर्थन मिलने लगा।

3 उन्नीसवीं सदी के आखिर में उपनिवेशवाद

व्यापार बढ़ने और विश्व अर्थव्यवस्था के साथ निकटता के करण दुनिया के बहुत सारे भागों में स्वतंत्रता और आजीविका के साधन छिनने लगे। 

1885 में यूरोप के ताकतवर देशों की बर्लिन में एक बैठक हुई जिसमें अफ्रीका के नक्से पर लकीरें खींचकर उसको आपस में बाँट लिया गया था।

उन्नीसवीं सदी के आखिर में ब्रिटेन और फ़्रांस ने अपने शासन वाले विदेशी क्षेत्रफल में भारी वृद्ध कर ली थी। बेल्जियम और जर्मनी नयी औपनिवेशिक ताकतों के रूप में सामने आए। 

पहले स्पेन के कब्जे  में रह चुके  कुछ उपनिवशो पर व़ कब्जा करके 1890 के दशक के आखिरी वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका भी औपनिवेशिक ताकत बन गया। 

प्राचीन काल से ही अफ्रीका में जमीन की कभी कोई कमी नहीं रही जबकि वहाँ की आबादी बहुत कम थी। सदियों तक अफ्रीकियों  की जिंदगी  व कामकाज जमीन और पालतू पशुओं के सहारे ही चलता रहा है। वहाँ पैसे या वेतन पर काम करने का चलन नहीं था। 

उन्नीसवीं सदी के आखिर में यूरोपीय ताकतें  अफ्रीका के विशाल भूक्षेत्र और खनिज भंडारों को देखकर इस महाद्वीप की ओर आकर्षित हुई थीं। यूरोपीय लोग अफ्रीका में बागानी खेती करने और खदानों का दोहन करना चाहते थे । लेकिन वहाँ के लोग तनख़्वाह पर काम नहीं करना चाहते थे। मजदूरों की भर्ती और उन्हें अपने पास रोके रखने के लिए मालिकों ने बहुत सारे हथकंडे आजमा कर देख लिए लेकिन बात नहीं बनी। उन पर भारी भरकम कर लाद दिए गए जिनका भुगतान केवल तभी किया जा सकता था जब करदाता बागानों या खदानों में काम करता हो। काश्तकारों को उनकी जमीन से हटाने के लिए उत्तराधिकार कानून भी बदल दिए गए। नए कानून में यह व्यवस्था कर दी गई कि अब परिवार के केवल एक ही सदस्य को पैतृक संपत्ति मिलेगी। इस कानून के जरिए परिवार के बाकी लोगों को श्रम बाजार में धकेलने का प्रयास किया जाने लगा। खानकर्मियों को बाड़ों में बंद कर दिया गया। उनके खुलेआम घूमने-फिरने पर पाबंदी लगा दी गई। तभी अफ्रीका में 1890 के दशक मे रिंडरपेस्ट नामक विनाशकारी पशु रोग फैल गया। मवेशियों में प्लेग की तरह फैलने वाली इस बीमारी से लोगों की आजीविका और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा। उस समय पूर्वी अफ्रीका में एरिट्रिया पर हमला कर रहे इतालवी सैनिकों का पेट भरने के लिए एशियाई देशों से जानवर लाए जाते थे। यह बीमारी ब्रिटिश अधिपत्य वाले एशियाई देशों से आए उन्हीं जानवरों के जरिए यहाँ पहुँची थी। अफ्रीका के पूर्वी हिस्से से महाद्वीप में दाखिल होने वाली यह बीमारी जंगल की आगकी तरह पश्चिमी अफ्रीका की तरफ बढ़ने लगी। 1892 में यह अफ्रीका के अटलांटिक तट तक जा पहुँची। पाँच साल बाद यह केप (अफ्रीका का धुर दक्षिणी हिस्सा) तक भी पहुँच गई। रिंडरपेस्ट ने अपने रास्ते में आने वाले 90 प्रतिशत मवेशियों को मौत की नींद सुला दिया। पशुओं के खत्म हो जाने से तो अफ्रिकियों  के रोजी-रोटी के साधन ही खत्म हो गए। अपनी सत्ता को और मजबूत करने तथा अफ्रिकियों  को श्रम बाजार में धकेलने के लिए वहाँ के बागान मालिकों, खान मालिकों और औपनिवेशिक सरकारों ने बचे-खुचे पशु भी अपने कब्जे में ले लिए। बचे-खुचे पशु संसाधनों पर कब्जे  से यूरोपीय उपनिवेशकारों को पूरे अफ्रीका को जीतने व गुलाम बना लेने का बेहतरीन मौका  हाथ लग गया था।

4 भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना : उन्नीसवीं सदी में भारत और चीन के लाखों मजदूरों को बागानों, खदानों और सड़क व रेलवे निर्माण परियोजनाओं में काम करने के लिए दूर-दूर के देशों में ले जाया जाता था। यह तेज आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ जनता के कष्टों में वृद्धिकुछ लोगों की आय में वृद्धि और दूसरों के लिए बेहिसाब गरीबीकुछ क्षेत्रों में भारी तकनीकी प्रगति और दूसरे क्षेत्रों में उत्पीड़न के नए रूपों की ईजाद की दुनिया थी। भारतीय अनुबंधित श्रमिकों (गिरमिटिया) को खास तरह के अनुबंध या एग्रीमेंट के तहत ले जाया जाता था। इन अनंबुधों में यह शर्त होती थी कि यदि मजदूर अपने  मालिक के बागानों में पाँच साल काम कर लेंगे तो वे स्वदेश लौट सकते हैं।

भारत के ज्यादातर अनुबंधित श्रमिक मौजूदा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखे इलाकों  से जाते थे। 

भारतीय अनुबंधित श्रमिकों को कैरीबियाई द्वीप समूह (त्रिनिदाद, गुयाना और सुरीनाम) मॉरिशस व फिजी ले जाया जाता था। मजदूरों की भर्ती का काम मालिकों के एजेंट किया करते थे। नयी जगह की जीवन एवं कार्य स्थितियाँ कठोर थीं इसलिए कुछ मजदूर भाग कर जगंलों  में चले गए। बहुतों ने अपनी पुरानी और नयी संस्कृतियों का सम्मिश्रण करते हुए व्यक्तिगत और सामूहिक आत्माभिव्यक्ति के नए रूप खोज लिए।त्रिनिदाद में मुहर्रम के सालाना जुलूस को एक विशाल उत्सवी मेले "होसे" (इमाम हुसैन  के नाम पर) का रूप दे दिया गया। उसमें सभी धर्मों व नस्लों  के मजदूर हिस्सा लेते थे। 

त्रिनिदाद और गुयाना में मशहूर चटनी म्यूज़िकभी भारतीय आप्रवासियों के वहाँ पहुँचने के बाद सामने आई रचनात्मक अभिव्यक्ति है। 

ज्यादातर अनुबंधित श्रमिक अनुबंध समाप्त हो जाने के बाद भी वापस नहीं लौटे।इसी कारण इन देशों में भारतीय मूल के लोगों की संख्या बहुत ज्यादा पाई जाती है। नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार वी. एस. नायपॉल, वेस्टइंडीज के क्रिकेट खिलाड़ी शिवनरैन चंद्रपॉल और रामनरेश सरवन भारत से गए अनुबंधित मजदूरों के ही वंशज हैं। 

बीसवीं सदी के शुरुआती सालों से ही हमारे देश के राष्ट्रवादी नेता इस प्रथा का विरोध करने लगे थे। उनकी राय में यह बहुत अपमानजनक और क्रूर व्यवस्था थी। इसी दबाव के कारण 1921 में इसे खत्म कर दिया गया। लेकिन इसके बाद भी कई दशक तक भारतीय अनुबंधित मजदूरों के वंशज कैरीबियाई द्वीप समूह में बेचैन अल्पसंख्यकों का जीवन जीते रहे। वहाँ के लोग उन्हें कुलीमानते थे और उनके साथ कुलियों जैसा बर्ताव करते थे। 

5 विदेश में भारतीय उद्यमी

विश्व बाजार के लिए खाद्य पदार्थ व फसलें उगाने के वास्ते पूँजी की आवश्यकता थी। बड़े बागानों के लिए तो बाजार और बैंकों से पैसा लिया जा सकता था। लेकिन छोटे-मोटे किसान साहूकार और महाजन से पैसे लेते थे शिकारीपूरी श्रॉफ और नट्टूकोट्टई चेट्टियारों उन बहुत सारे बैंकरों और व्यापारियों में से थे जो मध्य एवं दक्षिण पूर्व एशिया में निर्यातोन्मुखी खेती के लिए कर्जे देते थे। 

अफ्रीका में यूरोपीय उपनिवेशकारों के पीछे-पीछे भारतीय व्यापारी और महाजन भी जा पहुँचे। हैदराबादी सिंधी व्यापारी तो यूरोपीय उपनिवेशों से भी आगे तक जा निकले। 1860 के दशक से उन्होंने दुनिया भर के बंदरगाहों पर अपने बड़े-बड़े एम्पोरियम खोल दिए। इन दुकानों में सैलानियों को आकर्षक स्थानीय और विदेशी चीजे मिलती थीं। यह एक फलता-फूलता कारोबार था क्योंकि सुरक्षित और आरामदेह जलपोतों के आ जाने से सैलानियों की संख्या भी दिनोंदिन बढ़ने लगी थी।

6 भारतीय व्यापार, उपनिवेशवाद और वैश्विक व्यवस्था

भारत में पैदा होने वाली महीन कपास का यूरोपीय देशों को निर्यात किया जाता था। औद्योगीकरण के बाद ब्रिटेन में भी कपास का उत्पादन बढ़ने लगा था। इसी कारण वहाँ के उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह कपास के आयात पर रोक लगाए और स्थानीय उद्योगों की रक्षा करे। फलस्वरूप, ब्रिटेन में आयातित कपड़ों पर सीमा शुल्क थोप दिए गए। वहाँ महीन भारतीय कपास का आयात कम होने लगा।

उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत से ही ब्रिटिश कपड़ा उत्पादक दूसरे देशों में भी अपने कपड़े के लिए नए-नए बाजार ढूँढ़ने लगे थे। सीमा शुल्क की व्यवस्था के कारण ब्रिटिश बाजारों से बेदखल हो जाने के बाद भारतीय कपड़ों को दूसरे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भी भारी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। निर्मित वस्तुओं का निर्यात घटता जा रहा था और उतनी ही तेजी से कच्चे मालों का निर्यात बढ़ता जा रहा था।  कपड़ों की रँगाई के लिए इस्तेमाल होने वाले नील का भी कई दशक तक बड़े पैमाने पर निर्यात होता रहा। 

1820 के दशक से ब्रिटेन की सरकार भारत में अफीम  की खेती करवाती थी और उसे चीन को निर्यात कर देती थी। अफीम  के निर्यात से जो पैसा मिलता था उसके बदले चीन से ही चाय और दूसरे पदार्थों का आयात किया जाता था। 

उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय बाजारों में ब्रिटिश औद्योगिक उत्पादों की बाढ़ ही आ गई थी। भारत से ब्रिटेन और शेष विश्व को भेजे जाने वाले खाद्यान्न व कच्चे मालों के नियार्त में इजाफा हुआ ।ब्रिटेन से जो  माल भारत भेजा जाता था उसकी कीमत भारत से ब्रिटेन भेजे जाने वाले माल की कीमत से बहुत ज्यादा होती थी। भारत के साथ ब्रिटेन हमेशा व्यापार अधिशेषकी अवस्था में रहता था। इसका मतलब है कि आपसी व्यापार में हमेशा ब्रिटेन को ही फायदा रहता था। ब्रिटेन इस मुनाफे  के सहारे दूसरे देशों के साथ होने वाले व्यापारिक घाटे की भरपाई कर लेता था। बहुपक्षीय बंदोबस्त ऐसे ही काम करता है। इसमें एक देश के मुकाबले दूसरे देश को होने वाले घाटे की भरपाई किसी तीसरे देश के साथ व्यापार में मुनाफा कमा कर की जाती है। 

ब्रिटेन के व्यापार से जो अधिशेष हासिल होता था उससे तथाकथित होम चार्जेज’ का निबटारा होता था। इसके तहत ब्रितानी अफसरों और व्यापारियों द्वारा अपने घर में भेजी गई निजी रकम, भारतीय बाहरी कर्जे पर ब्याज आरै भारत में काम कर चुके  ब्रितानी अफसरों की पेंशन शामिल थी।

3 महायुद्धों के बीच अर्थव्यवस्था

पहला महायुद्ध मुख्य रूप से यूरोप में ही लड़ा गया। लेकिन उसके असर सारी दुनिया में महसूस किए गए।  इस युद्ध ने विश्व अर्थव्यवस्था को एक ऐसे संकट में ढकेल दिया जिससे उबरने में दुनिया को तीन दशक से भी ज्यादा समय लग गया

1 युद्धकालीन रूपांतरण

प्रथम विश्वयुद्ध मित्र राष्ट्र (ब्रिटेन, फ़्रांस,रूस) और केंद्रीय शक्तियों  (जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, ऑटोमन तुर्की)  के बीच हुआ  यह युद्ध शुरू अगस्त 1914 में हुआ और चार साल से भी ज्यादा समय तक चलता रहा। 

मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसा भीषण युद्ध पहले कभी नहीं हुआ था। इस युद्ध में दुनिया के सबसे अगुआ औद्योगिक राष्ट्र एक-दूसरे से जूझ रहे थे 

यह पहला आधुनिक औद्योगिक युद्ध था। इस युद्ध में मशीनगनों, टैंकों, हवाई जहाजों और रासायनिक हथियारों का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल किया गया।  युद्ध के लिए दुनिया भर से असंख्य सिपाहियों की भर्ती की जानी थी और उन्हें विशाल जलपोतों व रेलगाड़ियों में भर कर युद्ध के मोर्चों पर ले जाया जाना था।युद्ध में 90 लाख से ज्यादा  लोग मारे गए और 2 करोड़ घायल हुए। मृतकों और घायलों में से ज्यादातर कामकाजी उम्र के लोग थे। इस महाविनाश के कारण यूरोप में कामकाज के लायक लोगों की संख्या बहुत कम रह गई। परिवार के सदस्य घट जाने से युद्ध के बाद परिवारों की आय भी गिर गई।

युद्ध संबंधी सामग्री का उत्पादन करने के लिए उद्योगों का पुनर्गठन किया गया। युद्ध की जरूरतों के मद्देनजर पूरे के पूरे समाजों को बदल दिया गया। मर्द मोर्चे पर जाने लगे तो उन कामों को सँभालने के लिए घर की औरतों को बाहर आना पड़ा जिन्हें अब तक केवल मर्दों का ही काम माना जाता था। युद्ध के कारण दुनिया की कुछ सबसे शक्तिशाली आर्थिक ताकतों के बीच आर्थिक संबंध टूट गए।  इस युद्ध के लिए ब्रिटेन को अमेरिकी बैंकों और अमेरिकी जनता से भारी कर्जा लेना पड़ा। फलस्वरूप, इस युद्ध ने अमेरिका को कर्जदार की बजाय कर्जदाता बन गया 

2 युद्धोत्तर सुधार

युद्ध से पहले ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था। जिस समय ब्रिटेन युद्ध से जूझ रहा था उसी समय भारत और जापान में उद्योग विकसित होने लगे थे। युद्ध के बाद भारतीय बाजार में पहले वाली वर्चस्वशाली स्थिति प्राप्त करना ब्रिटेन के लिए बहुत मुश्किल हो गया था।  युद्ध के खर्चे की भरपाई करने के लिए ब्रिटेन ने अमेरिका से जम कर कर्जे  लिए थे। इसका परिणाम यह हुआ कि युद्ध खत्म होने तक ब्रिटेन भारी विदेशी कर्जो  में दब चुका था। 

युद्ध के कारण आर्थिक उछाह का माहौल पैदा हो गया था क्योंकि माँगउत्पादन और रोजगारों में भारी इजाफा हुआ था। पर जब युद्ध के कारण पैदा हुआ उछाह शांत होने लगा तो उत्पादन गिरने लगा और बेरोजगारी बढ़ने लगी।

दूसरी ओर सरकार ने भारी-भरकम युद्ध संबंधी व्यय में भी कटौती शुरू कर दी ताकि शांतिकालीन करों के सहारे ही उनकी भरपाई की जा सके। इन सारे प्रयासों से रोजगार भारी तादाद में खत्म हुए। 1921 में हर पाँच में से एक ब्रिटिश मजदूर के पास काम नहीं था। 

बहुत सारी कृषि आधारित अर्थव्यवस्थाएँ भी संकट में थीं। युद्ध से पहले पूर्वी यूरोप विश्व बाजार में गेहूँ की आपूर्ति करने वाला एक बड़ा केंद्र था। युद्ध के दौरान यह आपूर्ति अस्त-व्यस्त हुई तो कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में गेहूँ की पैदावार अचानक बढ़ने लगी। लेकिन जैसे ही युद्ध समाप्त हुआ पूर्वी यूरोप में गेहूँ की पैदावार सुधरने लगी और विश्व बाजारों में गेहूँ की अति के हालात पैदा हो गए। अनाज की कीमतें गिर गईं, ग्रामीण आय कम हो गई और किसान गहरे कर्ज संकट में फँस गए।

3 बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग

1920 के दशक में "बृहत उत्पादन का चलन" अमेरिकी अर्थव्यवस्था की एक बड़ी खासियत थी ।  कार निर्माता हेनरी फोर्ड बृहत उत्पादन के विख्यात प्रणेता थे। उन्होंने शिकागो के एक बूचड़खाने की असेंबली लाइन की तर्ज पर डेट्रॉयट के अपने कार कारखाने में भी आधुनिक असेंबली लाइन स्थापित की थी। शिकागो के बूचड़खाने में मरे हुए जानवरों को एक कन्वेयर बेल्ट पर रख दिया जाता था और उसके दूसरे सिरे पर खड़े मांस विक्रेता अपने हिस्से का मांस उठा कर निकलते जाते थे। यह देख कर फोर्ड को लगा कि गाड़ियों के उत्पादन के लिए भी असेंबली लाइन का तरीका समय और पैसे, दोनों के लिहाज से किफायती

साबित हो सकता है। असेंबली लाइन पर मजदूरों को एक ही काम - जैसे, कार के किसी खास पुर्जे को ही लगाते रहना - मशीनी ढंग से बार-बार करते रहना होता था।  यह काम की गति बढ़ाकर प्रत्येक मजदूर की उत्पादकता बढ़ाने वाला तरीका था। कन्वेयर बेल्ट के साथ खड़े होने के बाद कोई मजदूर अपने काम में ढील करने या कुछ पल के लिए भी अवकाश लेने का जोखिम नहीं उठा सकता था। इस व्यवस्था में मजदूर अपने साथियों के साथ बातचीत भी नहीं कर सकते थे। इसका नतीजा यह हुआ की हेनरी फोर्ड के कारखाने की असेंबली लाइन से हर तीन मिनट में एक कार तैयार होकर निकलने लगी। 

शुरुआत में फोर्ड फेक्ट्री के मजदूरों को असेंबली लाइनरों पर पैदा होने वाली थकान झेलने में काफी मुश्किल महसूस हुई  बहुत सारे मजदू ने काम छोड़ दिया। इस चुनौती से निपटने के लिए फोर्ड ने हताश होकर जनवरी 1914 से वेतन दोगुना यानी 5 डॉलर प्रतिदिन कर दिया। तनख़्वाह बढ़ाने से हेनरी फोर्ड के मुनाफे में जो कमी आई थी उसकी भरपाई करने के लिए वे अपनी असेंबली लाइन की रफ्ऱतार बार-बार बढ़ाने लगे।

उनके मजदूरों पर काम का बोझ लगातार बढ़ता रहता था। अपने इस फैसले से फोर्ड बहुत संतुष्ट थे। कुछ समय बाद उन्होंने कहा था कि लागत कम करने के लिएअपनी जिंदगी में उन्होंने इससे अच्छा फैसला कभी

नहीं लिया। फोर्ड द्वारा अपनाई गई उत्पादन पद्धतियों को जल्दी ही पूरे अमेरिका में अपनाया जाने लगा। बृहत उत्पादन पद्धति ने इंजीनियरिंग आधारित चीजों की लागत और कीमत में कमी ला दी। बेहतर वेतन के चलते अब बहुत सारे मजदूर भी कार जैसी टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ खरीद सकते थे। इसके साथ ही बहुत सारे लोग फ्रिज, वॉशिंग मशीनरेडियो, ग्रामोफोन प्लेयर्स आदि भी खरीदने लगे। ये सब चीजें हायर-परचेज़’ व्यवस्था के तहत खरीदी जाती थीं। यानी लोग ये सारी चीजें कर्जे पर खरीदते थे और उनकी कीमत साप्ताहिक या मासिक किस्तों में चुकाई जाती थी। 

1920 के दशक में आवास एवं निर्माण क्षेत्रा में आए उछाल से अमेरिकी संपन्नता का आधार पैदा हो चुका था। मकानों के निर्माण और घरेलू जरूरत की चीजों में निवेश से रोजगार और माँग बढ़ती थी तो दूसरी और उपभोग भी बढ़ता था। बढ़ते उपभोग के लिए और ज्यादा  निवेश की जरूरत थी जिससे और नए रोजगार व आमदनी में वृद्धि होने लगती थी। 1923 में अमेरिका शेष विश्व को पूँजी का निर्यात दोबारा करने लगा और वह दुनिया में सबसे बड़ा कर्जदाता देश बन गया। अमेरिका द्वारा आयात और पूँजी निर्यात ने यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को भी संकट से उबरने में मदद दी।

4 महामंदी

आर्थिक महामंदी की शुरुआत 1929 से हुई और यह संकट तीस के दशक के मध्य तक बना रहा। इस मंदी का सबसे बुरा असर कृषि क्षेत्रों और समुदायों पर पड़ा। क्योंकि औद्योगिक उत्पादों की तुलना में खेतिहर उत्पादों की कीमतों में ज्यादा  भारी और ज्यादा समय तक कमी बनी रही।

इस महामंदी के कई कारण थे।  

(i)  कृषि उत्पादों की कीमतें गिरने से किसानों की आय घटने लगी तो आमदनी बढ़ाने के लिए किसान उत्पादन बढ़ाने का प्रयास करने लगे। फलस्वरूप, बाजार में कृषि उत्पादों की आमद और भी बढ़ गई जिससे कीमतें आरै नीचे चली गइ। खरीददारों के अभाव में कृषि उपज पडी़ -पडी़ सड़ने लगी। 

(ii) 1920 के दशक के मध्य में बहुत सारे देशों ने अमेरिका से कर्जे लेकर अपनी निवेश संबंधी जरूरतों को पूरा किया था। जब हालात अच्छे थे तो अमेरिका से कर्जा  जुटाना बहुत आसान था लेकिन संकट का संकेत मिलते ही अमेरिकी उद्यमियों के होश उड़ गए। अमेरिका ने कर्जा देना बंद कर दिया। जो देश अमेरिकी कर्जे पर सबसे ज्यादा निर्भर थे उनके सामने गहरा संकट आ खड़ा हुआ।

अमेरिकी पूँजी के लौट जाने से पूरी दुनिया पर असर पड़ा। यूरोप में कई बड़े बैंक धराशायी हो गए। कई देशों की मुद्रा की कीमत बुरी तरह गिर गई। 

अमेरिकी सरकार इस महामंदी से अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए आयातित पदार्थों पर दो गुना सीमा शुल्क वसूल करने लगी। इस फैसले  ने तो विश्व व्यापार की कमर ही तोड़ दी। 

औद्योगिक देशों में मंदी का सबसे बुरा असर अमेरिका को झेलना पड़ा। 

कीमतों में कमी और मंदी की आशंका को देखते हुए अमेरिकी बैंकों ने घरेलू कर्जे देना बंद कर दिया। जो कर्जे दिए जा चुके थे उनकी वसूली तेज कर दी गई। 

किसान उपज नहीं बेच पा रहे थे, परिवार तबाह हो गए, कारोबार ठप पड़ गए। 

आमदनी में गिरावट आने पर अमेरिका के बहुत सारे परिवार कर्जे चुकाने में नाकामयाब हो गए जिसके चलते उनके मकान, कार और सारी जरूरी चीजें कुर्क कर ली गईं। 

बीस के दशक में जो उपभोक्तावादी संपन्नता दिखाई दे रही थी वह धूल के गुबार की तरह रातोंरात काफर  हो गई थी। 

बेरोजगारी बढ़ी तो लोग काम की तलाश में दूर-दूर तक जाने लगे। 

आखिरकार अमेरिकी बैंकिंग व्यवस्था भी धराशायी हो गई। 

निवेश से अपेक्षित लाभ न पा सकनेकर्जे वसूल न कर पाने और जमाकर्ताओं की जमा पूँजी न लौटा पाने के कारण हजारों बैंक दिवालिया हो गए और बंद कर दिए गए। 

5 भारत और महामंदी

औपनिवेशिक भारत कृषि वस्तुओं का निर्यातक और तैयार मालों का आयातक बन चुका था।  1928 से 1934 के बीच देश के आयात-निर्यात घट कर लगभग आधे रह गए थे। जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरने लगीं तो यहाँ भी कीमतें नीचे आ गईं। 1928 से 1934 के बीच भारत में गेहूँ की कीमत 50 प्रतिशत गिर गई।

शहरी निवासियों के मुकाबले किसानों और काश्तकारों को ज्यादा नुकसान हुआ। यद्यपि कृषि उत्पादों की कीमत तेजी से नीचे गिरी लेकिन सरकार ने लगान वसूली में छूट देने से साफ इनकार कर दिया। सबसे बुरी मार उन काश्तकारों पर पड़ी जो विश्व बाजार के लिए उपज पैदा करते थे। बंगाल के जूट/पटसन उत्पादक कच्चा पटसन उगाते थे जिससे कारखानों में टाट की बोरियाँ बनाई जाती थीं। जब टाट का निर्यात बंद हो गया तो कच्चे पटसन की कीमतों में 60 प्रतिशत से भी ज्यादा गिरावट आ गई। जिन काश्तकारों ने दिन फिरने की उम्मीद में या बेहतर आमदनी के लिए उपज बढ़ाने के वास्ते कर्जे ले लिए थे उनकी हालत भी उपज का सही मोल न मिलने के कारण खराब थी। वे दिनोंदिन और कर्ज में डूबते जा रहे थे। इसी विपत्ति को ध्यान में रखकर बंगाल के एक कवि ने लिखा था पूरे देश में काश्तकार पहले से भी ज्यादा कर्ज में डूब गए। खर्चे पूरे करने के चक्कर में उनकी बचत खत्म हो चुकी थीजमीन  सूदखोरों के पास गिरवी पड़ी थी, घर में जो भी गहने-जेवर थे बिक चुके थे। मंदी के इन्हीं सालों में भारत कीमती धातुओंखासतौर से सोने का निर्यात करने लगा। प्रसिद्ध अर्थशास्त्रा कीन्स का मानना था कि भारतीय सोने के निर्यात से भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में काफी मदद मिली। 1931 में मंदी अपने चरम पर थी और ग्रामीण भारत असंतोष व उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। यह मंदी शहरी भारत के लिए इतनी दुखदाई नहीं रही। कीमतें गिरते जाने के बावजूद शहरों में रहने वाले ऐसे लोगों की हालत ठीक रही जिनकी आय निश्चित थी। जैसे, शहर में रहने वाले जमींदार जिन्हें अपनी जमीन  पर बँधा-बँधाया भाड़ा मिलता था, या मध्यवर्गीय वेतनभोगी कर्मचारी। 

4 विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण :  

पहला विश्व युद्ध खत्म होने के दो दशक बाद दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया। यह युद्ध भी दो बड़े खेमों के बीच था। एक गुट में धुरी शक्तियाँ (नात्सी जर्मनी, जापान और इटली) थीं तो दूसरा खेमा मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ़्रांस और अमेरिका) के नाम से जाना जाता था।

छह साल तक चला यह युद्ध जमीन , हवा और पानी में असंख्य मोर्चों पर लड़ा गया। इस युद्ध में मौत और तबाही की कोई हद बाकी नहीं बची थी। माना जाता है कि इस जंग के कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से करीब 6 करोड़ लोग मारे गए। करोड़ों लोग घायल हुए।

अब तक के युद्धों में मोर्चे पर मरने वालों की संख्या ज्यादा  होती थी। इस युद्ध में ऐसे लोग ज्यादा मरे जो किसी मोर्चे पर लड़ नहीं रहे थे। यूरोप और एशिया के विशाल भूभाग तबाह हुए। कई शहर हवाई बमबारी या लगातार गोलाबारी के कारण मिट्टी में मिल गए। इस युद्ध ने बेहिसाब आर्थिक और सामाजिक तबाही को जन्म दिया। ऐसे हालात में पुनर्निर्माण का काम कठिन और लंबा साबित होने वाला था। 

1 युद्धोत्तर बंदोबस्त और ब्रेटन-वुड्स संस्थान

दो महायुद्धों के बीच मिले आर्थिक अनुभवों से अर्थशास्त्रियों और राजनीतिज्ञों ने दो अहम सबक निकाले। पहला,  बृहत उत्पादन पर आधारित किसी औद्योगिक समाज को व्यापक उपभोग के बिना कायम नहीं रखा जा सकता। लेकिन व्यापक उपभोग को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था कि आमदनी काफी ज्यादा  और स्थिर हो। स्थिर आय के लिए पूर्ण रोजगार भी जरूरी था। लेकिन बाजार पूर्ण रोजगार की गारंटी नहीं दे सकता। कीमत, उपज और रोजगार में आने वाले उतार-चढ़ावों को नियंत्रित करने के लिए सरकार का दखल जरूरी था। आर्थिक स्थिरता केवल सरकारी हस्तक्षेप के जरिये ही सुनिश्चित की जा सकती थी।

दूसरा सबक  बाहरी दुनिया के साथ आर्थिक संबंधों के बारे में था। पूर्ण रोजगार का लक्ष्य केवल तभी हासिल किया जा सकता है जब सरकार के पास वस्तुओंपूँजी और श्रम की आवाजाही को नियंत्रित करने की ताकत  उपलब्ध हो। 

युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था ( ब्रेटन वुड्स व्यवस्था) : औद्योगिक विश्व में आर्थिक स्थिरता एवं पूर्ण रोजगार बनाए रखने के लिए युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था लागू की गई । 

जुलाई 1944 में न्यू हैम्पशायर (अमेरिका) के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर ब्रेटन वुड्स सम्मेलन आयोजित किया गया इसे संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक और वित्तीय सम्मेलन के रूप में जाना जाता है।

यह सम्मेलन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय व्यवस्था को विनियमित करने के लिए आयोजित किया गया था इस सम्मेलन में सदस्य राष्ट्रों ने विदेश व्यापार में लाभ और घाटे से निपटने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना की। साथ ही युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए पैसे का इंतजाम करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (विश्व बैंक) का गठन किया गया। 

विश्व बैंक और IMF को ब्रेटन वुड्स संस्थान या ब्रेटन वुड्स ट्वीन (ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतान) भी कहा जाता है। क्योंकि इन्हें वैश्विक आर्थिक स्थिरता और विकास सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करने के लिए बनाया गया था।

विश्व बैंक और IMF ने 1947 में औपचारिक रूप से काम करना शुरू किया। इन संस्थानों की निर्णय प्रक्रिया पर पश्चिमी औद्योगिक देशों का नियंत्रण रहता है। अमेरिका विश्व बैंक और IMF के किसी भी

फैसले को वीटो कर सकता है। 

अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था राष्ट्रीय मुद्राओं आरै मौद्रिक व्यवस्थाओं को एक-दूसरे से जोड़ने वाली व्यवस्था है। ब्रेटन वुड्स व्यवस्था निश्चित विनिमय दरों पर आधरित होती थी। इस व्यवस्था में राष्ट्रीय मुद्राएँ, जैसे भारतीय मुद्रा- रुपया-डॉलर के  साथ एक निश्चित विनिमय दर से बंधा हुआ था। एक डालॅर के बदले में

कितने  रुपये देने  होंगे यह स्थिर रहता था। डालॅर का मूल्य सोने  से बंधा हुआ था एक डॉलर की कीमत 35 औंस सोने के बराबर निर्धारित की गई थी।

2 प्रारंभिक युद्धोत्तर वर्ष

ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने पश्चिमी औद्योगिक राष्ट्रों और जापान के लिए व्यापार तथा आय में वृद्ध के एक अप्रतिम युग का सूत्रपात किया। 1950 से 1970 के बीच विश्व व्यापार की विकास दर सालाना 8 प्रतिशत से भी ज्यादा  रही। इस दौरान वैश्विक आय में लगभग 5 प्रतिशत की दर से वृद्ध हो रही थी। विकास दर भी कमोबेश स्थिर ही थी। उसमें ज्यादा  उतार-चढ़ाव नहीं आए। इस दौरान ज्यादातर समय अधिकांश औद्योगिक देशों में बेरोजगारी औसतन 5 प्रतिशत से भी कम ही रही। इन दशकों में तकनीक और उद्यम का विश्वव्यापी प्रसार हुआ। विकासशील देश विकसित औद्योगिक देशों के बराबर पहुँचने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने आधुनिक तकनीक से चलने वाले संयंत्रों और उपकरणों के आयात पर बेहिसाब पूँजी का निवेश किया।

वीटो : (निषेधाधिकार) इस अधिकार के सहारे एक ही सदस्य की असहमति किसी भी प्रस्ताव को खारिज करने का आधार बन जाती है।

3 अनौपनिवेशीकरण और स्वतंत्रता

दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद भी दुनिया का एक बहुत बड़ा भाग यूरोपीय औपनिवेशिक शासन के अधीन था। अगले दो दशकों में एशिया और अफ्रीका के ज्यादातर उपनिवेश स्वतंत्र, स्वाधीन राष्ट्र बन चुके थे। लेकिन ये सभी देश गरीबी व संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे। उनकी अर्थव्यवस्थाएँ और समाज लंबे समय तक चले औपनिवेशिक शासन के कारण अस्त-व्यस्त हो चुके थे। 

औद्योगिक देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए IMF और विश्व बैंक का गठन किया गया था।लेकिन ये संस्थान भूतपूर्व उपनिवेशों में गरीबी की समस्या और विकास की कमी से निपटने में दक्ष नहीं थे। 

नवस्वाधीन राष्ट्रों के रूप में भी अपनी जनता को गरीबी और पिछड़ेपन की गर्त से बाहर निकालने के लिए उन्हें ऐसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की मदद लेनी पड़ी जिन पर भूतपूर्व औपनिवेशिक शक्तियों का ही वर्चस्व था।अनौपनिवेशीकरण के बहुत साल बीत जाने के बाद भी बहुत सारे नवस्वाधीन राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाओं पर भूतपूर्व औपनिवेशिक शक्तियों का ही नियंत्रण बना हुआ था। जो देश ब्रिटेन और फ़्रांस के उपनिवेश रह चुके थे  वहाँ के महत्त्वपूर्ण संसाधनों, जैसे खनिज संपदा और जमीन पर अभी भी ब्रिटिश और फ़्रांसिसी  कंपनियों का ही नियंत्रण था और वे इस नियंत्रण को छोड़ने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थीं। कई  बार अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों  की बहुराष्ट्रीय कंपनिया विकासशील देशों के प्राकृतिक संसाधनों का बहुत  कम कीमत पर दोहन करने लगती थीं। दूसरी ओर ज्यादातर विकासशील देशों को पचास और साठ के दशक में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की तेज प्रगति से कोई लाभ नहीं हुआ। इस समस्या को देखते हुए उन्होंने एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली (NIEO) के लिए आवाज उठाई और समूह 77  के रूप में संगठित हो गए । 

4 ब्रेटन वुड्स का समापन और वैश्वीकरण’ की शुरुआत : 

सालों की स्थिर और तेज वृद्धि के बावजूद युद्धोत्तर दुनिया में सब कुछ सही नहीं चल रहा था। साठ के दशक से ही विदेशों में अपनी गतिविधियों की भारी लागत ने अमेरिका की वित्तीय और प्रतिस्पर्धी क्षमता को कमजोर कर दिया था। अमेरिकी डॉलर अब दुनिया की प्रधान मुद्रा के रूप में पहले जितना सम्मानित और निर्विवाद नहीं रह गया था। सोने की तुलना में डॉलर की कीमत गिरने लगी थी। अंततः स्थिर विनिमय दर की व्यवस्था विफल हो गई और अस्थिर विनिमय दर की व्यवस्था शुरू की गई।

सत्तर के दशक के मध्य से अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में भी भारी बदलाव आ चुके थे। अब तक विकासशील देश विमर्श और विकास संबंधी सहायता के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की शरण ले सकते थे लेकिन अब उन्हें पश्चिम के व्यावसायिक बैंकों और निजी ऋणदाता संस्थानों से विमर्श न लेने के लिए बाध्य किया जाने लगा। विकासशील विश्व में समय-समय पर विमर्श संकट पैदा होने लगा जिसके कारण आय में गिरावट आती थी और गरीबी बढ़ने लगती थी।

औद्योगिक विश्व भी बेरोजगारी की समस्या में फंसने लगा था। 70 के दशक के मध्य से बेरोजगारी बढने लगी। 70 के दशक के आखिर सालों से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ एशिया के ऐसे देशों में उत्पादन केंद्रित करने लगीं जहाँ वेतन कम थे। चीन 1949 की क्रांति के बाद विश्व अर्थव्यवस्था से अलग-थलग ही था। परंतु चीन में नयी आर्थिक नीतियों और सोवियत खेमे के बिखराव तथा पूर्वी यूरोप में सोवियत शैली की व्यवस्था समाप्त हो जाने के पश्चात बहुत सारे देश दोबारा विश्व अर्थव्यवस्था का अंग बन गए।

चीन जैसे देशों में वेतन तुलनात्मक रूप से कम थे। फलस्वरूप विश्व बाजारों पर अपना प्रभुत्व  कायम करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही विदेशी बहुराष्ट्रीय  कंपनियों ने वहाँ जमकर निवेश करना शुरू कर दिया। 

उद्योगों को कम वेतन वाले देशों में ले जाने से वैश्विक व्यापार और पूँजी प्रवाहों पर भी असर पड़ा। पिछले दो दशक में भारत, चीन और ब्राजील आदि देशों की अर्थव्यवस्थाओं में आए भारी बदलावों के कारण दुनिया का आर्थिक भूगोल पूरी तरह बदल चुका है।

विनिमय दर : इस व्यवस्था के जरिये अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की सुविधा के लिए विभिन्न देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं को एक-दूसरे से जोड़ा जाता है। मोटे तौर पर विनिमय दर दो प्रकार की होती हैं : 

स्थिर विनिमय दर और परिवर्तनशील विनिमय दर।

स्थिर विनिमय दर : जब विनिमय दर स्थिर होती हैं और उनमें आने वाले उतार-चढ़ावों को नियंत्रित करने के लिए सरकारों को हस्तक्षेप करना पड़ता है तो ऐसी विनिमय दर को स्थिर विनिमय दर कहा जाता है।

लचीली या परिवर्तनशील विनिमय दर : इस तरह की विनिमय दर विदेशी मुद्रा बाजार में विभिन्न मुद्राओं की माँग या आपूर्ति के आधार पर और सिद्धांततः सरकारों के हस्तक्षेप के बिना घटती-बढ़ती रहती है।


  1. अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
    विश्व बैंक के नाम से 
  2. कौन सी बीमारी यूरोप से अमेरिका पहुँची और अमेरिका के मूल निवासियों की सामूहिक मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार थी ?

    चेचक
  3. 1885 में यूरोप के ताकतवर देशों ने किस देश के नक्से पर लकीरें खींचकर आपस में बाँट लिया था।

    अफ्रीका के

  4. अमेरिका की खोज किसने की? 
    क्रिस्टोफर कोलंबस। 
  5. विश्वव्यापी आर्थिक मन्दी की शुरुआत हुई-
    1929 में 
  6. ब्रेटन वुड्स नामक प्रसिद्ध स्थान किस देश में है?

    अमेरिका

  7. भारत से विदेशों में ले जाये जाने वाले अनुबन्धित श्रमिक क्या कहलाते थे? 
    गिरमिटिया
  8. कॉन लॉ किस देश में पारित किया गया था ?
    ब्रिटेन
  9. दक्षिणी अमेरिका में एल डोराडो क्या है ? 
    किंवदंतियों की बदौलत सोने का शहर।
  10. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान केन्द्रीय शक्तियों के सदस्य राष्ट्रों के नाम लिखिए।
    जर्मनी, ऑस्ट्रिया – हंगरी और तुर्की। 
  11. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ‘सहयोगी राष्ट्र’ कौन थे?
    प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्र ब्रिटेन, फ्रांस और रूस थे।
  12.  द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान धुरी शक्तियाँ के सदस्य राष्ट्रों के नाम लिखिए।
     नात्सी जर्मनीजापान और इटली
  13. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान  मित्र राष्ट्रों के नाम लिखिए।
    द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों में ब्रिटेन, फ्रांस, सोवियत संघ और अमेरिका शामिल थे।
  14. 1890 के दशक में किस बीमारी से 90 प्रतिशत मवेशी मारे गए?
    रिंडरपेस्ट 
  15. रिंडरपेस्ट क्या था ? 
    रिंडरपेस्ट एक घातक पशु रोग था। यह 1890 के दशक में अफ्रीका में फैल गया।
  16. क्रिस्टोफर कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज के बाद यूरोप और एशिया में कौन से खाद्य पदार्थ पेश किए गए? 
    आलू, सोया, मूंगफली, मक्का, टमाटर, मिर्च, शकरकंद 
  17. किस दो यूरोपीय शक्ति गुटों के बीच प्रथम विश्व युद्ध लड़ा गया था?

    प्रथम विश्वयुद्ध मित्र राष्ट्र (ब्रिटेन, फ़्रांस,रूस) और केंद्रीय शक्तियों  (जर्मनीऑस्ट्रिया-हंगरी, ऑटोमन तुर्की)  के बीच हुआ 

  18.  'कॉर्न लॉ' क्या था ?

    ब्रिटेन सरकार ने बड़े भू-स्वामियों के दबाव में सरकार ने मक्का के आयात पर पाबंदी लगा दी। जिस कानून के तहत सरकार ने यह पाबंदी लागू की थी उन्हें 'कॉर्न लॉ' कहा जाता था।

  19. पूर्व-आधुनिक व्यापार में रेशम मार्ग के किन्हीं दो लाभों का उल्लेख करें।
    (i) रेशम मार्गों ने पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की सुविधा प्रदान की।
    (ii) रेशम मार्ग का इस्तेमाल ईसाई मिशनरियों, मुस्लिम और बौद्ध धर्म प्रचारकों ने किया था। इसलिए इस मार्ग ने अलग-अलग विचारधाराओं को अलग-अलग क्षेत्रों में पहुँचाया।
  20. 19वीं शताब्दी में विश्व अर्थव्यवस्था में हुए तकनीकी परिवर्तनों का वर्णन करें
    औपनिवेशीकरण के कारण यातायात और परिवहन साधनों में भारी सुधार किए गए। तेज चलने वाली रेलगाड़ियाँ बनीं, बोगियों का भार कम किया गया, जलपोतों का आकार बढ़ा जिससे किसी भी उत्पाद को खेतों से दूर-दूर के बाजारों में कम लागत पर और ज्यादा आसानी से पहुँचाया जा सके।
    नयी तकनीक के आने पर पानी के जहाजो में रेफ्रीजेरेटर की तकनीक स्थापित कर दी गई जिससे जल्दी खराब होने वाली चीजों को भी लंबी यात्राओं पर ले जाया जा सकता था।
    अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड, सब जगह से जानवरों की बजाय उनका मांस ही यूरोप भेजा जाने लगा। 
  21. 'रेशम मार्ग' के ज़रिए किस तरह के सांस्कृतिक आदान-प्रदान किए गए?
    रेशम मार्ग का इस्तेमाल ईसाई मिशनरियों, मुस्लिम और बौद्ध धर्म प्रचारकों ने किया था। इसलिए इस मार्ग ने अलग-अलग विचारधाराओं को अलग-अलग क्षेत्रों में पहुँचाया।
  22. गिरमिटिया मजदूरों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

    औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय श्रमिकों को खास तरह के अनुबंध या एग्रीमेंट के तहत ले जाया जाता था। जिन्हें  गिरगिटिया मजदूर कहा जाता था  इन अनंबुधों में यह शर्त होती थी कि यदि मजदूर अपने  मालिक के बागानों में पाँच साल काम कर लेंगे तो वे स्वदेश लौट सकते हैं।  

    भारतीय अनुबंधित श्रमिकों को कैरीबियाई द्वीप समूह (त्रिनिदाद, गुयाना और सुरीनाम) मॉरिशस व फिजी ले जाया जाता था। मजदूरों की भर्ती का काम मालिकों के एजेंट किया करते थे। नयी जगह की जीवन एवं कार्य स्थितियाँ कठोर थीं

  23. 1929 की महामंदी के महत्वपूर्ण कारणों का वर्णन करें

    (i) कृषि उत्पादों की कीमतें गिरने से किसानों की आय घटने लगी तो आमदनी बढ़ाने के लिए किसान उत्पादन बढ़ाने का प्रयास करने लगे। फलस्वरूप, बाजार में कृषि उत्पादों की आमद और भी बढ़ गई जिससे कीमतें आरै नीचे चली गइ। खरीददारों के अभाव में कृषि उपज पडी़-पडी़ सड़ने लगी।
    (ii) 1920 के दशक के मध्य में बहुत सारे देशों ने अमेरिका से कर्जे लेकर अपनी निवेश संबंधी जरूरतों को पूरा किया था। जब हालात अच्छे थे तो अमेरिका से कर्जा जुटाना बहुत आसान था लेकिन संकट का संकेत मिलते ही अमेरिकी उद्यमियों के होश उड़ गए। अमेरिका ने कर्जा देना बंद कर दिया। जो देश अमेरिकी कर्जे पर सबसे ज्यादा निर्भर थे उनके सामने गहरा संकट आ खड़ा हुआ।
  24. "ब्रेटन वुड्स सम्मेलन" से आपका क्या अभिप्राय है?  किसे इसका जुड़वाँ कहा जाता है?
    ब्रेटन वुड्स सम्मेलन जुलाई 1944 में न्यू हैम्पशायर (अमेरिका) के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर आयोजित किया गया इसे संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक और वित्तीय सम्मेलन के रूप में जाना जाता है।
    यह सम्मेलन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय व्यवस्था को विनियमित करने के लिए आयोजित किया गया था.
    इस सम्मेलन में सदस्य राष्ट्रों ने विदेश व्यापार में लाभ और घाटे से निपटने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना की। साथ ही युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए पैसे का इंतजाम करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (विश्व बैंक) का गठन किया गया। 
    विश्व बैंक और IMF को ब्रेटन वुड्स संस्थान या ब्रेटन वुड्स ट्वीन (ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतान) भी कहा जाता है। क्योंकि इन्हें वैश्विक आर्थिक स्थिरता और विकास सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करने के लिए बनाया गया था। 
  25. 'रेशम मार्ग' क्या थे?
    प्राचीन समय में रेशम मार्गों से चीनी रेशम के कार्गो पश्चिम देशों को भेजा जाता था। रेशम मार्गों ने पूर्व और पश्चिमी देशों के बीच व्यापार और सांस्कृति के आदान-प्रदान को सुगम बनाया।
    रेशम मार्ग दुनिया के दूर-दराज के हिस्सों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों का एक जीवंत उदाहरण है।
  26. अमेरिका पर विश्व महामंदी के प्रभावों पर चर्चा करें।

    औद्योगिक देशों में मंदी का सबसे बुरा असर अमेरिका को झेलना पड़ा। 

    अमेरिकी बैंकों ने घरेलू कर्जे देना बंद कर दिया। जो कर्जे दिए जा चुके थे उनकी वसूली तेज कर दी गई। 

    किसान उपज नहीं बेच पा रहे थेपरिवार तबाह हो गएकारोबार ठप पड़ गए। 

    आमदनी में गिरावट आने पर अमेरिका के बहुत सारे परिवार कर्जे चुकाने में नाकामयाब हो गए जिसके चलते उनके मकानकार और सारी जरूरी चीजें कुर्क कर ली गईं। 

    बीस के दशक में जो उपभोक्तावादी संपन्नता दिखाई दे रही थी वह धूल के गुबार की तरह रातोंरात काफर  हो गई थी। 

    बेरोजगारी बढ़ी तो लोग काम की तलाश में दूर-दूर तक जाने लगे। 

    आखिरकार अमेरिकी बैंकिंग व्यवस्था भी धराशायी हो गई। 

    निवेश से अपेक्षित लाभ न पा सकनेकर्जे वसूल न कर पाने और जमाकर्ताओं की जमा पूँजी न लौटा पाने के कारण हजारों बैंक दिवालिया हो गए और बंद कर दिए गए। 


2. भारत में राष्ट्रवाद

राष्ट्रवाद का उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से गहरा संबंध है। औपनिवेशिक सत्ता के तहत उत्पीड़ित होने की भावना अलग-अलग वर्गों में आम थी। लेकिन हर वर्ग और समूह ने उपनिवेशवाद के प्रभाव को अलग-अलग तरीके से महसूस किया।  महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इन समूहों को इकट्ठा करके एक विशाल आंदोलन खड़ा किया
प्रथम विश्व युद्ध : प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने एक नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा की। युद्ध काल के दौरान भारत को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। 
रक्षा व्यय में वृद्धि हुई। 
सीमा शुल्क में वृद्धि हुई । 
1913-1918 के बीच खाद्यान्न की कीमतें दोगुनी हो गईं । 
गाँवों में सिपाहियों को सेना में जबरन भर्ती किया गया
1918-19 और 1920-21 में भारत के कई हिस्सों में फसलें बर्बाद हो गईं भारत को खाद्यान्न की भारी कमी का सामना करना पड़ा 
भारत को इन्फ्लूएंजा महामारी का सामना करना पड़ा ऐसी गंभीर स्थिति में एक नए नेता महात्मा गांधी सामने आए और उन्होंने संघर्ष का एक नया तरीका सुझाया। 
सत्याग्रह का विचार
◈ महात्मा गांधी जनवरी 1915 में भारत लौटे।
◈ सत्याग्रह जन आंदोलन का एक नया तरीका था 
◈ सत्याग्रह का विचार सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज की आवश्यकता पर दिया जाता था। सत्याग्रह उत्पीड़क के खिलाफ जन आंदोलन का एक अहिंसक तरीका है।
◈ महात्मा गांधी ने कहा कि यदि आप सत्य के लिए और अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं तो उत्पीड़क को हराने के लिए शारीरिक बल की कोई आवश्यकता नहीं है। बिना आक्रामक हुए सत्याग्रही अहिंसा के माध्यम से लड़ाई जीत सकता है।
◈ महात्मा गांधी का मानना ​​था कि अहिंसा का यह धर्म सभी भारतीयों को एकजुट कर सकता है।
भारत आने के बाद गांधीजी ने कई स्थानों पर सत्याग्रह आंदोलन चलाया।
महात्मा गांधी द्वारा सफल सत्याग्रह
चंपारण (बिहार): 1917 में गांधीजी ने दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने के लिए किसानों को प्रेरित करने के लिए चंपारण सत्याग्रह शुरू किया।
खेड़ा (गुजरात) : 1917 में गांधीजी ने खेड़ा सत्याग्रह की शुरुआत की, ताकि उन किसानों का समर्थन किया जा सके जो फसल खराब होने और प्लेग महामारी के कारण राजस्व का भुगतान करने की स्थिति में नहीं थे। अहमदाबाद (गुजरात) : 1918 में महात्मा गांधी कपास मिल मजदूरों के बीच सत्याग्रह आंदोलन आयोजित करने के लिए अहमदाबाद गए थे। 
रॉलेट एक्ट (1919) 
  भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद यह अधिनियम 1919 में इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल द्वारा पारित किया गया था। 
◈ इस अधिनियम ने सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को दबाने के लिए अपार शक्तियाँ प्रदान कीं। 
◈ इस अधिनियम ने राजनीतिक कैदियों को दो साल तक बिना किसी मुकदमे के हिरासत में रखने की अनुमति दी। 
महात्मा गांधी ने 6 अप्रैल, 1919 को इस अन्यायपूर्ण कानून (काला विधेयक) के खिलाफ अहिंसक सविनय अवज्ञा शुरू की और रॉलेट एक्ट का भारतीयों द्वारा निम्नलिखित तरीकों से विरोध किया गया:
◈ विभिन्न शहरों में रैलियाँ आयोजित की गईं।
◈ रेलवे वर्कशॉप में मज़दूर हड़ताल पर चले गए।
◈ विरोध में दुकानें बंद कर दी गईं।
इस विद्रोह पर ब्रिटिश प्रशासन की प्रतिक्रिया
◈ राष्ट्रवादियों पर शिकंजा कसा गया।
◈ स्थानीय नेताओं को अमृतसर से उठा लिया गया और महात्मा गांधी को दिल्ली में प्रवेश करने से रोक दिया गया।
◈ मार्शल लॉ लागू किया गया
जलियाँवाला बाग की घटना
◈ 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग की घटना हुई।
◈ अमृतसर पंजाब के जलियाँवाला बाग में सालाना वैसाखी मेले में शिरकत करने के लिए भारी भीड़ जमा हुई। जनरल डायर ने सभी निकास मार्ग बंद कर भीड़ पर गोलियाँ चला दीं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए।
◈ जनरल डायर का उद्देश्य सत्याग्रहियों के मन में भय और खौफ की भावना पैदा करना था।
जैसे ही जलियांवाला बाग की खबर फैली, भीड़ सड़कों पर उतर आई और हिंसा फैलने लगी। हिंसा फैलती देख महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया।
खिलाफत आंदोलन
यह आंदोलन 1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा तुर्की में खलीफा के पद को समाप्त करने के विरोध में शुरू किया गया था
खिलाफत आंदोलन महात्मा गांधी के सहयोग से मुहम्मद अली और शौकत अली द्वारा शुरू किया गया एक संयुक्त संघर्ष था।
प्रथम विश्व युद्ध में ओटोमन तुर्की की हार के साथ, ऐसी अफवाहें फैलीं कि ओटोमन सम्राट (खलीफा) पर एक कठोर शांति संधि थोपी जाने वाली थी।
खलीफा की शक्तियों की रक्षा करने और ओटोमन साम्राज्य पर एक कठोर शांति संधि थोपे जाने से रोकने के लिए 1919 में बॉम्बे में खिलाफत समिति का गठन किया गया था।

सितंबर 1920 में कांग्रेस ने कलकत्ता अधिवेशन में खिलाफत मुद्दे पर सत्याग्रह शुरू करने का प्रस्ताव पारित किया। 
सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गांधीजी ने खिलाफत और स्वराज के समर्थन में असहयोग आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव रखा। 
असहयोग आंदोलन: महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक हिंद स्वराज (1909) में कहा कि भारतीयों के सहयोग से भारत में ब्रिटिश शासन स्थापित हुआ था। यदि भारतीयों ने सहयोग करने से इनकार कर दिया, तो भारत में ब्रिटिश शासन एक वर्ष के भीतर ही समाप्त हो जाएगा, और हम स्वराज स्थापित करने में सक्षम होंगे। गांधीजी ने प्रस्ताव दिया कि आंदोलन चरणों में होना चाहिए। 
सबसे पहले लोगों को सरकार द्वारा दी गई उपाधियाँ लौटा देनी चाहिए और सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए। 
दिसंबर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में एक समझौता हुआ और असहयोग कार्यक्रम पर स्वीकृति की मोहर लगा दी गई।
बहिष्कार: किसी के साथ संपर्क रखने और जुड़ने से इनकार करना या गतिविधियों में हिस्सेदारी, चीजों की खरीद व इस्तेमाल से इनकार करना। आमतौर पर यह विरोध का एक रूप होता है।
आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ
जनवरी 1921 में असहयोग-खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन में विभिन्न सामाजिक समूहों ने भाग लिया
शहरों में आंदोलन
शहरों में मध्यम वर्ग के लोगों की भागीदारी से असहयोग आंदोलन शुरू हुआ।
छात्रों ने सरकारी स्कूल और कॉलेज छोड़ दिए
हेडमास्टरों और शिक्षकों ने इस्तीफा दे दिया
वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी।
लगभग हर जगह ( मद्रास के अलावा) परिषद के चुनावों का बहिष्कार किया गया।
आर्थिक मोर्चे पर असहयोग के प्रभाव
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया।
शराब की दुकानों को बंद कर दिया गया।
विदेशी कपड़े जलाए गए
इसके परिणामस्वरूप लोगों ने केवल भारतीय मिल के कपड़े पहनना शुरू कर दिया, भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघों का उत्पादन बढ़ गया।
लेकिन धीरे-धीरे शहरों में यह आंदोलन धीमा पड़ गया।
क्योंकि-
◈ खादी का कपड़ा मिल के कपड़े से अधिक महंगा था, इसलिए गरीब लोग इसे खरीदने में असमर्थ थे।
◈ ब्रिटिश संस्थानों के बहिष्कार ने एक समस्या खड़ी कर दी। क्योंकि ब्रिटिश संस्थानों के स्थान पर वैकल्पिक भारतीय संस्थान स्थापित करने थे, जिसमें स्पष्ट रूप से समय लगता।
ग्रामीण इलाकों में आंदोलन
शहरों से, असहयोग आंदोलन ग्रामीण इलाकों में फैल गया। ग्रामीण इलाकों में अपने संघर्षों के लिए किसान और आदिवासी आंदोलन में शामिल हो गए।
◈ अवध में, किसानों का नेतृत्व बाबा रामचंद्र ने किया। यह आंदोलन तालुकदारों और जमींदारों के खिलाफ था, जो किसानों से उच्च किराया और अन्य उपकर मांगते थे
किसानों को बिना किसी भुगतान के काम करने के लिए मजबूर किया जाता था (जिसे बेगार कहा जाता था)
किरायेदारों को काश्तकारी की कोई सुरक्षा नहीं थी।
किसान आंदोलन ने राजस्व में कमी, बेगार को खत्म करने और दमनकारी जमींदारों के सामाजिक बहिष्कार की मांग की। कई जगहों पर जमींदारों को नाई और धोबी की सेवाओं से वंचित कर दिया गया।
◈ आंध्र प्रदेश के गुडेम हिल्स में 1920 के दशक की शुरुआत में एक उग्रवादी गुरिल्ला आंदोलन फैला, जिसका नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू ने किया था
बागानों में स्वराज
“असम में बागान मजदूरों की महात्मा गांधी और स्वराज की अवधारणा के बारे में अपनी समझ थी”। अंतर्देशीय उत्प्रवास अधिनियम 1859 के अनुसार, असम में बागान मजदूरों को बिना अनुमति के चाय बागान छोड़ने की अनुमति नहीं थी। असम में बागान मजदूरों के लिए स्वतंत्रता का मतलब था, उस सीमित स्थान में स्वतंत्र रूप से आने-जाने का अधिकार जिसमें वे बंद थे। जब उन्होंने असहयोग आंदोलन के बारे में सुना, तो वे बागान छोड़कर घर चले गए। उन्हें विश्वास था कि गांधी राज आने वाला है और सभी को उनके अपने गांवों में जमीन दी जाएगी। लेकिन वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पाए। रेलवे और स्टीमर हड़ताल के कारण रास्ते में ही फंस गए। उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया और बेरहमी से पीटा। 
चौरी चौरा की घटना और असहयोग आंदोलन को वापस लेना : चौरी चौरा (गोरखपुर) में एक बाजार में शांतिपूर्ण प्रदर्शन फरवरी 1922 को पुलिस के साथ हिंसक झड़प में बदल गया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस स्टेशन पर हमला किया और आग लगा दी। इस घटना में 22 पुलिसकर्मी मारे गए। फरवरी 1922 में इस घटना के बारे में सुनकर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया। 
कांग्रेस की आंतरिक गर्मी : कुछ नेता अहिंसा के माध्यम से संघर्ष से थक चुके थे और ब्रिटिश नीतियों का विरोध करने के लिए परिषदों के चुनावों में भाग लेना चाहते थे।
सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने परिषद चुनावों के समर्थन में कांग्रेस के भीतर स्वराज पार्टी का गठन किया।
जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेताओं ने अधिक कट्टरपंथी जन आंदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता के लिए दबाव डाला।
दो कारक जिन्होंने 1920 के दशक के उत्तरार्ध में भारतीय राजनीति को आकार दिया।
◈ विश्वव्यापी आर्थिक मंदी
◈ साइमन कमीशन
साइमन कमीशन: नवंबर 1927 में, ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग का गठन किया, जिसे साइमन कमीशन के नाम से जाना जाता था।
साइमन कमीशन 1928 में भारत सरकार अधिनियम 1919 के कामकाज को देखने और आगे के संवैधानिक सुधारों का सुझाव देने के लिए भारत आया था।
आयोग में सात ब्रिटिश सदस्य थे। इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था।
जब 1928 में साइमन कमीशन भारत आया, तो उसका स्वागत 'साइमन वापस जाओ' के नारे के साथ किया गया।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग समेत सभी दलों ने इसका कड़ा विरोध किया। इस विरोध को शांत करने के लिए भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन ने अक्टूबर 1929 में 'डोमिनियन स्टेटस' की पेशकश की घोषणा की। लेकिन इससे कांग्रेस के नेता संतुष्ट नहीं हुए। 
पूर्ण स्वराज: दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर कांग्रेस ने भारत के लिए 'पूर्ण स्वराज' या पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को औपचारिक रूप दिया और 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया। 
नमक मार्च और सविनय अवज्ञा आंदोलन : महात्मा गांधी के अनुसार, नमक एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में राष्ट्र को एकजुट कर सकता है। 31 जनवरी 1930 को उन्होंने वायसराय इरविन को ग्यारह माँगों वाला एक पत्र भेजा। ये माँगें अलग-अलग लोगों की ओर से आई थीं क्योंकि वह संघर्ष में सभी को एकजुट करना चाहते थे। इन 11 माँगों में सबसे महत्वपूर्ण माँग नमक कर को खत्म करना था। इसका असर सभी पर पड़ा क्योंकि नमक का सेवन हर वर्ग के लोग करते थे और यह भोजन का सबसे महत्वपूर्ण घटक था। महात्मा जी अंधई के पत्र में कहा गया था कि यदि 11 मार्च तक मांगें पूरी नहीं हुईं तो कांग्रेस सविनय अवज्ञा अभियान शुरू करेगी। इरविन ने मांगें नहीं मानीं तो महात्मा गांधी ने साबरमती से दांडी तक नमक मार्च शुरू किया। 6 अप्रैल को वह दांडी पहुंचे और समुद्र के पानी से नमक बनाकर कानून का उल्लंघन किया। इसने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की। सविनय अवज्ञा आंदोलन महात्मा गांधी के दांडी मार्च के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ। 6 अप्रैल को वह दांडी पहुंचे जहां उन्होंने नमक कानून तोड़ा। अब लोगों से न केवल अंग्रेजों के साथ सहयोग से इनकार करने को कहा गया बल्कि औपनिवेशिक कानूनों को भी तोड़ने को कहा गया। औपनिवेशिक कानून (नमक कानून) तोड़े गए। विदेशी कपड़े का बहिष्कार किया गया। शराब की दुकानों पर धरना दिया गया। किसानों ने राजस्व और चौकीदारी कर देने से इनकार कर दिया। गांव के अधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया चिंतित औपनिवेशिक सरकार ने कई कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। इससे कई महलों में हिंसक झड़पें हुईं।
गांधी-इरविन समझौता [5 मार्च 1931]
गांधी-इरविन समझौता महात्मा गांधी और भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा 5 मार्च 1931 को हस्ताक्षरित एक राजनीतिक समझौता था।
इस समझौते के तहत, गांधीजी ने लंदन में एक गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए सहमति व्यक्त की और सरकार राजनीतिक कैदियों को रिहा करने के लिए सहमत हुई। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
विभिन्न समूहों की भागीदारी
धनी किसान समुदाय: गुजरात के पाटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट जैसे धनी किसान समुदाय आंदोलन में सक्रिय थे।
व्यापारिक मंदी और गिरती कीमतों की वजह से उनकी नकद आय खत्म हो गई और उन्हें सरकार की राजस्व मांग का भुगतान करना असंभव लगा। सरकार ने राजस्व मांग को कम करने से इनकार कर दिया। इससे धनी किसानों में व्यापक आक्रोश फैल गया और वे सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हो गए।
गरीब किसान: कई गरीब किसान छोटे पट्टेदार थे जो जमींदारों से किराए पर जमीन लेकर खेती करते थे। मंदी की मार के कारण उनकी नकद आय कम हो गई और उन्हें अपना किराया चुकाना मुश्किल हो गया। वे चाहते थे कि मकान मालिक को बकाया किराया वापस कर दिया जाए।
व्यवसायी : अपने व्यवसाय का विस्तार करने के लिए, व्यवसायियों ने औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ़ प्रतिक्रिया व्यक्त की, जो व्यावसायिक गतिविधियों को प्रतिबंधित करती थीं।
वे विदेशी वस्तुओं के आयात के विरुद्ध सुरक्षा चाहते थे, और एक रुपया-स्टर्लिंग विदेशी मुद्रा अनुपात चाहते थे जो आयात को हतोत्साहित करे।
उन्होंने 1920 में भारतीय औद्योगिक और वाणिज्यिक कांग्रेस और 1927 में भारतीय वाणिज्य और उद्योग महासंघ (FICCI) का गठन किया।
उन्होंने आंदोलन को वित्तीय सहायता दी और सविनय अवज्ञा आंदोलन का समर्थन किया।
औद्योगिक श्रमिक वर्ग :  औद्योगिक श्रमिक वर्ग ने नागपुर क्षेत्र को छोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन में बड़ी संख्या में भाग नहीं लिया।
महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी सविनय अवज्ञा आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी।
महिलाएँ : गांधीजी के नमक मार्च के दौरान, हजारों महिलाएँ गांधीजी के भाषणों को सुनने के लिए अपने घरों से बाहर निकलीं।
उन्होंने विरोध मार्च में भाग लिया, नमक बनाया, और विदेशी कपड़े और शराब की दुकानों पर धरना दिया।
सविनय अवज्ञा की सीमाएँ
◈ सीमित दलित भागीदारी: सविनय अवज्ञा आंदोलन में दलितों/'अछूतों' की भागीदारी बहुत सीमित थी।
◈ हिंदू-मुस्लिम विभाजन: मुस्लिम राजनीतिक समूहों की भागीदारी फीकी थी, क्योंकि अविश्वास और संदेह का माहौल था।
◈ एकता विरोधी निक्षेप: भारतीय समाज के विभिन्न संप्रदायों के विभिन्न समुदायों ने आंदोलन में भाग लिया। इसलिए उनकी अलग-अलग निशानियाँ थीं। इन नरसंहारों में तानाशाह हुआ और संघर्ष में एकजुटता नहीं रही।
परस्पर विरोधी आकांक्षाएँ: भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों के विभिन्न समूहों ने आंदोलन में भाग लिया। इसलिए उनकी अलग-अलग आकांक्षाएं थीं. इन आकांक्षाओं में टकराव हुआ और संघर्ष एकजुट नहीं रहा। सामूहिक राष्ट्र की भावना
सामूहिक राष्ट्रवाद की भावना तब फैलती है जब लोग यह मानने लगते हैं कि वे सभी एक ही राष्ट्र का हिस्सा हैं, जब उन्हें कुछ ऐसी एकता का पता चलता है जो उन्हें एक साथ बांधती है।
एकजुटता की यह भावना एकजुट संघर्षों से आई है। लेकिन विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक प्रक्रियाओं ने भी राष्ट्रवाद के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लोकप्रिय प्रिंट, इतिहास और कथा साहित्य, लोकगीत और गीत तथा प्रतीक, सभी ने राष्ट्रवाद के निर्माण में भूमिका निभाई। 
उदाहरण बाल गंगाधर तिलक की एकता के प्रतीकों (मंदिर, चर्च, मस्जिद) से घिरी हुई तस्वीर। 
भारत माता की छवि  सबसे पहले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा बनाई गई थी। 
राष्ट्रीय भजन 'वंदे मातरम' जिसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था। 
राष्ट्रवाद की विचारधारा भारतीय लोकगीत और लोक कथाओं को पुनर्जीवित करने के आंदोलन के माध्यम से भी विकसित हुई। 
नटेसा शास्त्री ने तमिल लोक कथाओं का एक बड़ा संग्रह, द फोकलोर ऑफ साउथर्न इंडिया प्रकाशित किया। 
बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान, एक तिरंगा झंडा (लाल, हरा और पीला) डिजाइन किया गया था। इसमें ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करने वाले आठ कमल और हिंदुओं और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक अर्धचंद्र था। 
1921 में, गांधीजी द्वारा एक तिरंगा स्वराज ध्वज (लाल, हरा और सफेद) डिजाइन किया गया था। ध्वज के केंद्र में एक घूमता हुआ चरखा था।
  1. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में बनी नई आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों की व्याख्या करें। 
    प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने एक नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा की। युद्ध काल के दौरान भारत को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। 
    रक्षा व्यय में वृद्धि हुई। 
    सीमा शुल्क में वृद्धि हुई । 
    1913-1918 के बीच खाद्यान्न की कीमतें दोगुनी हो गईं । 
    गाँवों में सिपाहियों को सेना में जबरन भर्ती किया गया
    1918-19 और 1920-21 में भारत के कई हिस्सों में फसलें बर्बाद हो गईं भारत को खाद्यान्न की भारी कमी का सामना करना पड़ा 
    भारत को इन्फ्लूएंजा महामारी का सामना करना पड़ा 
  2. सत्याग्रह का क्या अर्थ है ? 
    सत्याग्रह जन आंदोलन का एक नया तरीका है सत्याग्रह का विचार सत्य की शक्ति और सत्य की खोज की आवश्यकता पर जोर देता है। सत्याग्रह उत्पीड़क के खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन का एक अहिंसक तरीका है। महात्मा गांधी ने कहा कि यदि आप सत्य के लिए और अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं तो उत्पीड़क को हराने के लिए शारीरिक बल का कोई काम नहीं है।
  3. गांधीजी के सत्याग्रह के विचार के बारे में चार बिंदु बताइए।
    ◈ गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह जन आंदोलन का एक नया तरीका था
    ◈ सत्याग्रह का विचार सत्य की शक्ति और सत्य की खोज की आवश्यकता पर जोर देता है।
    ◈ महात्मा गांधी का मानना ​​था कि अहिंसा का यह धर्म सभी भारतीयों को एकजुट कर सकता है। ◈ महात्मा गांधी ने कहा कि यदि आप सत्य के लिए और अन्याय के विरुद्ध लड़ रहे हैं तो अत्याचारी को हराने के लिए शारीरिक बल का कोई उपयोग नहीं है। बिना आक्रामक हुए सत्याग्रह अहिंसा के माध्यम से लड़ाई जीत सकता है।
  4. महात्मा गांधी ने भारत में पहली बार सत्याग्रह किस वर्ष और किस स्थान पर आयोजित किया था ?
    1917 में, बिहार के चंपारण में।
  5. एम के गांधी द्वारा 1917-1918 के दौरान निम्नलिखित तीन आंदोलन किस क्रम में हुए?
    चंपारण (1917), खेड़ा (1917), अहमदाबाद मिल (1918)
  6. खेड़ा जिले के किसान किन कारणों से राजस्व देने की स्थिति में नहीं थे?
    फसल खराब होने और प्लेग महामारी के कारण
  7.  रॉलेट एक्ट क्या था?
    रॉलेट एक्ट 1919 में इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल द्वारा पारित किया गया था।
    इस अधिनियम ने सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को दबाने के लिए अपार शक्तियाँ दीं। इस अधिनियम ने राजनीतिक कैदियों को बिना किसी मुकदमे के दो साल तक हिरासत में रखने की अनुमति दी। 
  8. भारत में लोगों ने रॉलेट एक्ट का विरोध कैसे किया? उदाहरणों के साथ समझाएँ। 
    रॉलेट एक्ट का भारतीयों द्वारा निम्नलिखित तरीकों से विरोध किया गया
    ◈ विभिन्न शहरों में रैलियाँ आयोजित की गईं। 
    ◈ रेलवे वर्कशॉप में श्रमिकों ने हड़ताल की। ​​
    ◈ विरोध में दुकानें बंद कर दी गईं। 
    रॉलेट एक्ट के विरोध में ही जलियाँवाला बाग की घटना हुई थी। जनरल डायर ने अपने सैनिकों को निर्दोष नागरिकों पर गोलियाँ चलाने का आदेश दिया, जो अमृतसर शहर और बाहर से शांतिपूर्ण बैठक में भाग लेने के लिए एकत्र हुए थे। 
  9. गांधीजी ने प्रस्तावित रौलेट एक्ट (1919) के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी 'सत्याग्रह' शुरू करने का निर्णय क्यों लिया?
    गांधीजी ने प्रस्तावित रौलेट एक्ट (1919) के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी 'सत्याग्रह' शुरू करने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि -
    (a) यह अधिनियम भारतीय सदस्यों के एकजुट विरोध के बावजूद इंपीरियल विधान परिषद द्वारा जल्दबाजी में पारित किया गया था
    (b) इस अधिनियम ने सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को दबाने के लिए अपार शक्तियाँ प्रदान कीं।
    (c) इस अधिनियम ने राजनीतिक कैदियों को दो साल तक बिना किसी मुकदमे के हिरासत में रखने की अनुमति दी।
  10. क्रूर ‘जलियांवाला हत्याकांड’ कब हुआ था?
    13 अप्रैल 1919 को
  11. क्रूर ‘जलियांवाला हत्याकांड’ कहाँ हुआ था?
    अमृतसर
  12. जलियाँवाला बाग की घटना पर टिपण्णी लिखिए 
    ◈ 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग की घटना हुई।
    ◈ अमृतसर पंजाब के जलियाँवाला बाग में सालाना वैसाखी मेले में शिरकत करने के लिए भारी भीड़ जमा हुई। जनरल डायर ने सभी निकास मार्ग बंद कर भीड़ पर गोलियाँ चला दीं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए।
    ◈ जनरल डायर का उद्देश्य सत्याग्रहियों के मन में भय और खौफ की भावना पैदा करना था।
  13. खिलाफत समिति का गठन किस शहर में किया गया था ?
    बॉम्बे
  14. खिलाफत आंदोलन किसने शुरू किया? आंदोलन क्यों शुरू किया गया था? 
    खिलाफत आंदोलन महात्मा गांधी के सहयोग से मुहम्मद अली और शौकत अली द्वारा शुरू किया गया एक संयुक्त संघर्ष था।
    यह आंदोलन 1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा तुर्की में खलीफा के पद को समाप्त करने का विरोध करने के लिए शुरू किया गया था।
  15. गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन क्यों किया?(गांधीजी की भूमिका)
    महात्मा गांधी ने हिंदू और मुस्लिम धर्म के लोगों को एकजुट करने और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह करने के लिए खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया।
  16. 'हिंद स्वराज' पुस्तक के लेखक का नाम बताइए।
    महात्मा गांधी
  17. असहयोग आंदोलन कब शुरू हुआ?
    जनवरी 1921 में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ।
  18. विभिन्न सामाजिक समूहों ने 'असहयोग' के विचार को कैसे समझा? उदाहरणों के साथ समझाएँ।(असहयोग आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ)
    (i) मध्यम वर्ग समूह : 
    शहरों में मध्यम वर्ग के लोगों की भागीदारी से असहयोग आंदोलन शुरू हुआ।
    छात्रों ने सरकारी स्कूल और कॉलेज छोड़ दिए
    हेडमास्टरों और शिक्षकों ने इस्तीफा दे दिया
    वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी।
    लगभग हर जगह ( मद्रास के अलावा) परिषद के चुनावों का बहिष्कार किया गया।
    (ii) ग्रामीण इलाकों में किसान: 
    अवध में, किसानों का नेतृत्व बाबा रामचंद्र ने किया। 
    किसानो ने राजस्व में कमी, बेगार को खत्म करने और दमनकारी जमींदारों के सामाजिक बहिष्कार की मांग की। कई जगहों पर जमींदारों को नाई और धोबी की सेवाओं से वंचित कर दिया गया।
    (iii) आदिवासी: आंध्र प्रदेश के गुडेम हिल्स में 1920 के दशक की शुरुआत में आदिवासियों द्वारा एक उग्रवादी गुरिल्ला आंदोलन फैला।जिसका नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू ने किया था
    (iv) बागानों में काम करने वाले: अंतर्देशीय उत्प्रवास अधिनियम 1859 के अनुसार, असम में बागान मजदूरों को बिना अनुमति के चाय बागान छोड़ने की अनुमति नहीं थी। जब उन्होंने असहयोग आंदोलन के बारे में सुना, तो वे बागान छोड़कर घर चले गए। लेकिन वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाए। रेलवे और स्टीमर हड़ताल के कारण रास्ते में ही फंस गए।
  19. अल्लूरी सीताराम राजू कौन थे? 
    अल्लूरी सीताराम राजू एक भारतीय क्रांतिकारी थे जो भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में शामिल थे। उन्होंने आदिवासी नेताओं के साथ उग्रवादी गुरिल्ला आंदोलन का नेतृत्व किया। राजू महात्मा गांधी की महानता की बात करते थे और वे असहयोग आंदोलन से प्रेरित थे। उन्होंने लोगों को खादी पहनने और शराब छोड़ने के लिए प्रेरित किया। लेकिन साथ ही उन्होंने दावा किया कि भारत को केवल बल के प्रयोग से ही आज़ाद किया जा सकता है, अहिंसा से नहीं। 
  20. अवध के किसान आंदोलन के नेता कौन थे?
    बाबा रामचंद्र संन्यासी
  21. बेगार का क्या मतलब है?
    बिना किसी भुगतान के ग्रामीणों को काम करने के लिए मजबूर करना जबरन मजदूरी कहलाता था।
  22. किस अधिनियम ने बागान श्रमिकों को बिना अनुमति के चाय बागान छोड़ने की अनुमति नहीं दी?
    1859 का अंतर्देशीय उत्प्रवास अधिनियम।
  23. गांधीजी द्वारा 'असहयोग आंदोलन' को वापस लेने का कारण बताइए?
    चौरी-चौरा की घटना (फरवरी 1922)
  24. भारत की अर्थव्यवस्था पर असहयोग आंदोलन के किन्हीं तीन प्रभावों की व्याख्या करें।
    (i) विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों को अवरुद्ध/धरना किया गया तथा विदेशी कपड़ों को जलाया गया।
    (ii) 1921 और 1922 में विदेशी कपड़ों का आयात घटकर आधा रह गया।
    (iii) कई स्थानों पर व्यापारियों और व्यापारियों ने विदेशी वस्तुओं का व्यापार करने या विदेशी व्यापार को वित्तपोषित करने से इनकार कर दिया।
    इसके परिणामस्वरूप लोगों ने केवल भारतीय मिल का कपड़ा पहनना शुरू कर दिया तथा भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघों का उत्पादन बढ़ गया।
  25. फरवरी, 1922 में गांधीजी ने ‘असहयोग आंदोलन’ वापस लेने का निर्णय क्यों लिया? कोई तीन कारण बताइए।
    (i) चौरी चौरा की घटना : चौरी चौरा (गोरखपुर) में एक बाजार में शांतिपूर्ण प्रदर्शन फरवरी 1922 को पुलिस के साथ हिंसक झड़प में बदल गया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस स्टेशन पर हमला किया और आग लगा दी। इस घटना में 22 पुलिसकर्मी मारे गए। फरवरी 1922 में इस घटना के बारे में सुनकर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया। 
    (ii) कांग्रेस की आंतरिक गर्मी : कुछ नेता अहिंसा के माध्यम से संघर्ष से थक चुके थे तथा ब्रिटिश नीतियों का विरोध करने के लिए परिषदों के चुनावों में भाग लेना चाहते थे।सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने परिषद चुनावों के समर्थन में कांग्रेस के भीतर स्वराज पार्टी का गठन किया।जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेताओं ने अधिक कट्टरपंथी जन आंदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता के लिए दबाव डाला।
    (iii) गांधीजी को लगा कि लोग अहिंसक जन संघर्ष के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें लगा कि उन्हें उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
  26. भारत में 1928 में साइमन कमीशन का स्वागत किस नारे के साथ किया गया था?
    'साइमन वापस जाओ'.
  27. साइमन कमीशन को 1928 में भारत क्यों भेजा गया था ?
    साइमन कमीशन 1928 में भारत सरकार अधिनियम 1919 के कामकाज को देखने और आगे के संवैधानिक सुधारों का सुझाव देने के लिए भारत आया था।
  28. भारतीयों ने ‘साइमन कमीशन’ का विरोध क्यों किया?
    इस आयोग में सात ब्रिटिश सदस्य थे। इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था।
  29. स्वराज पार्टी का गठन किसने किया।
    सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने 
  30. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के किस अधिवेशन में  पूर्ण 'स्वराज' की मांग की ?
    लाहौर अधिवेशन, दिसंबर 1929.
  31. 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष कौन थे?
    जवाहरलाल नेहरू
  32. सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं ने किस तरह भाग लिया? समझाइए। 
    सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं ने बड़े पैमाने पर भाग लिया। गांधीजी के नमक मार्च के दौरान, हजारों महिलाएं गांधीजी के भाषणों को सुनने के लिए अपने घरों से बाहर निकलीं। उन्होंने विरोध मार्च में भाग लिया, नमक बनाया और विदेशी कपड़े और शराब की दुकानों पर धरना दिया। गांधीजी के आह्वान से प्रेरित होकर, वे राष्ट्र की सेवा को महिलाओं का पवित्र कर्तव्य मानने लगीं। 
  33. महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस लेने का फैसला क्यों किया? स्पष्ट कीजिए।
    (i) जब हजारों लोगों ने औपनिवेशिक कानूनों को तोड़ना शुरू किया तो चिंतित औपनिवेशिक सरकार ने कांग्रेस नेताओं को एक-एक करके गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। इससे कई स्थानों पर हिंसक झड़पें हुईं
    (ii) जब अप्रैल 1930 में अब्दुल गफ्फार खान को गिरफ्तार किया गया तो गुस्साई भीड़ ने पेशावर की सड़कों पर प्रदर्शन किया, बख्तरबंद गाड़ियों और पुलिस की गोलीबारी का सामना किया। हमले में कई लोग मारे गए।
    (iii) जब महात्मा गांधी को गिरफ्तार किया गया, तो शोलापुर में औद्योगिक श्रमिकों ने पुलिस चौकियों, नगरपालिका भवनों, कानून अदालतों और रेलवे स्टेशनों पर हमला किया। ब्रिटिश सरकार आंदोलन के बढ़ने से चिंतित थी और उसने क्रूर दमन की नीति अपनाई। शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर हमला किया गया, महिलाओं और बच्चों को पीटा गया और लगभग 100,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया। ऐसी स्थिति में, महात्मा गांधी ने एक बार फिर आंदोलन को बंद करने का फैसला किया।
  34. सविनय अवज्ञा आंदोलन का विस्तार से वर्णन करें
    सविनय अवज्ञा आंदोल महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1930 में शुरू हुआ । 
    वायसराय इरविन द्वारा नमक कर सहित अन्य मांगें नहीं मानाने पर  महात्मा गांधी ने12 मार्च 1930 को  साबरमती से दांडी तक नमक मार्च शुरू किया और 6 अप्रैल को वह दांडी पहुंचे और समुद्र के पानी से नमक बनाकर कानून का उल्लंघन किया।यहीं से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ 
    इस आंदोलन में औपनिवेशिक कानून (नमक कानून) तोड़े गए। विदेशी कपड़े का बहिष्कार किया गया। शराब की दुकानों पर धरना दिया गया। किसानों ने राजस्व और चौकीदारी कर देने से इनकार कर दिया। गांव के अधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया
    गांधी-इरविन समझौता [5 मार्च 1931]
    गांधी-इरविन समझौता महात्मा गांधी और भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा 5 मार्च 1931 को हस्ताक्षरित एक राजनीतिक समझौता था।
    इस समझौते के तहत, 
    गांधीजी ने लंदन में एक गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए सहमति व्यक्त की ।  
    सरकार राजनीतिक कैदियों को रिहा करने के लिए सहमत हुई।  
    भारतीयों को समुद्र किनारे नमक बनाने का अधिकार दिया गया
    कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन को समाप्त करने पर सहमत हो गई । 
    विभिन्न समूहों की भागीदारी
    धनी किसान समुदाय: गुजरात के पाटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट जैसे धनी किसान समुदाय आंदोलन में सक्रिय थे। व्यापारिक मंदी और गिरती कीमतों की वजह से उनकी नकद आय खत्म हो गई और उन्हें सरकार की राजस्व मांग का भुगतान करना असंभव लगा। सरकार ने राजस्व मांग को कम करने से इनकार कर दिया। इससे धनी किसानों में व्यापक आक्रोश फैल गया और वे सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हो गए।
    गरीब किसान: कई गरीब किसान छोटे पट्टेदार थे जो जमींदारों से किराए पर जमीन लेकर खेती करते थे। मंदी की मार के कारण उनकी नकद आय कम हो गई और उन्हें अपना किराया चुकाना मुश्किल हो गया। वे चाहते थे कि मकान मालिक को बकाया किराया वापस कर दिया जाए।
    व्यवसायी : अपने व्यवसाय का विस्तार करने के लिए, व्यवसायियों ने उन औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ़ प्रतिक्रिया व्यक्त की, जो उनकी व्यावसायिक गतिविधियों को प्रतिबंधित करती थीं। उन्होंने आंदोलन को वित्तीय सहायता दी और सविनय अवज्ञा आंदोलन का समर्थन किया।
    औद्योगिक श्रमिक वर्ग :  औद्योगिक श्रमिक वर्ग ने नागपुर क्षेत्र को छोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन में बड़ी संख्या में भाग नहीं लिया।
    महिलाएँ : गांधीजी के नमक मार्च के दौरान, हजारों महिलाएँ गांधीजी के भाषणों को सुनने के लिए अपने घरों से बाहर निकलीं। उन्होंने विरोध मार्च में भाग लिया, नमक बनाया, और विदेशी कपड़े और शराब की दुकानों पर धरना दिया। गांधीजी के आह्वान से प्रेरित होकर, वे राष्ट्र की सेवा को महिलाओं का पवित्र कर्तव्य मानने लगीं। 
    सविनय अवज्ञा की सीमाएँ
    ◈ सीमित दलित भागीदारी: सविनय अवज्ञा आंदोलन में दलितों/'अछूतों' की भागीदारी बहुत सीमित थी।
     हिंदू-मुस्लिम विभाजन: मुस्लिम राजनीतिक समूहों की भागीदारी फीकी थी, क्योंकि अविश्वास और संदेह का माहौल था।
     एकता विरोधी निक्षेप: भारतीय समाज के विभिन्न संप्रदायों के विभिन्न समुदायों ने आंदोलन में भाग लिया। इसलिए उनकी अलग-अलग निशानियाँ थीं। इन नरसंहारों में तानाशाह हुआ और संघर्ष में एकजुटता नहीं रही।
    ◈ परस्पर विरोधी आकांक्षाएँ: भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों के विभिन्न समूहों ने आंदोलन में भाग लिया। इसलिए उनकी अलग-अलग आकांक्षाएं थीं. इन आकांक्षाओं में टकराव हुआ और संघर्ष एकजुट नहीं रहा।
  35. 'वंदे मातरम' गीत किसने लिखा था ?
    बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय.
  36. 1921 में गांधीजी द्वारा डिजाइन किए गए 'स्वराज ध्वज' में रंगों का कौन-सा संयोजन था?
    लाल, हरा और सफेद।
  37. 'वंदे मातरम' गीत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के किस प्रसिद्ध उपन्यास में शामिल किया गया था ?
    आनंदमठ
  38. किस उपन्यास में भजन ‘वंदे मातरम’ शामिल किया गया था और यह उपन्यास किसके द्वारा लिखा गया था? 

    लेखक- बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय
    उपन्यास- आनंदमठ
  39. बंगाल में ‘स्वदेशी आंदोलन’ के दौरान किस प्रकार का झंडा बनाया गया था? इसकी मुख्य विशेषताओं की व्याख्या करें।
    बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान एक तिरंगा झंडा बनाया गया था
    इसमें लाल, हरा और पीला रंग था।
    इसमें आठ कमल थे जो ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों (राज्य) का प्रतिनिधित्व करते थे, और एक अर्धचंद्र था, जो हिंदुओं और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता था।


1. यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय


फ्रेडरिक सॉरयू : फ्रेडरिक  सॉरयू एक फ्रांसीसी कलाकार थे, जिन्होंने 1848 में चित्रों की एक श्रृंखला प्रस्तुत की। इनमें उन्होंने सपनों की एक दुनिया बनाई जो 'लोकतांत्रिक और सामाजिक गणराज्यों' से बनी थी। 
निरंकुशवाद : ऐसी सरकार या शासन व्यवस्था जिसकी सत्ता पर किसी प्रकार का कोई अंकुश नहीं होता है  इतिहास में ऐसी राजशाही सरकारों को निरंकुश सरकार कहा जाता है जो अत्यंत केंद्रीकृत, सैन्य बल पर
आधरित और दमनकारी सरकारें होती थीं।
कल्पनादर्श (युटोपिया) : एक ऐसे समाज की कल्पना जो इतना आदर्श है कि उसका साकार होना लगभग असंभव होता है।
1. फ्रांसीसी क्रांति और राष्ट्र का विचार :  राष्ट्रवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति 1789 में फ्रांसीसी क्रांति के साथ हुई। 1789 में फ्रांस पर एक निरंकुश सम्राट का आधिपत्य था। फ्रांसीसी क्रांति से जो राजनीतिक और संवैधानिक बदलाव हुए उनसे प्रभुसत्ता राजतंत्र से निकल कर फ्रांसीसी नागरिकों के समूह में हस्तांतरित हो गई। फ्रांसीसी क्रांति ने घोषणा की कि "लोग राष्ट्र का गठन करेंगे और इसके भाग्य को आकार देंगे।" फ्रांसीसी क्रांतिकारियों का मुख्य उद्देश्य फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान की भावना पैदा करके राजशाही से फ्रांसीसी लोगों के एक समूह को संप्रभुता हस्तांतरित करना था। 
फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने लोगों के बीच सामूहिक पहचान की भावना पैदा करने के लिए अनेक कदम उठाए
(i) ला पैट्री (पितृभूमि) और ले सिटॉयन (नागरिक) का विचार: फ्रांसीसी क्रांति में ला पैट्री (पितृभूमि) और ले सिटॉयन (नागरिक) का विचार दर्शाता है कि देश के संविधान के तहत समुदाय को समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए। 
(ii) नया फ्रांसीसी तिरंगा झंडा: फ्रांसीसी नागरिकों ने नया  तिरंगा झंडा चुना। झंडे के रंग नीला, सफेद और लाल था। 
(iii) एस्टेट जनरलों का चुनाव और राष्ट्रीय सभा का गठन: इस्टेट जनरल का नाम बदलकर राष्ट्रीय सभा (नेशनल असेंबली) कर दिया गया और इसे सक्रिय नागरिकों के एक समूह द्वारा चुना गया। 
(iv) नागरिकों के लिए समान कानूनों का निर्माण: एक केंद्रीकृत प्रशासनिक प्रणाली लागू की गई और इसने पूरे देश के सभी नागरिकों के लिए समान कानून बनाए। 
(v) आंतरिक सीमा शुल्क का उन्मूलन: आंतरिक सीमा शुल्क और बकाया को समाप्त कर दिया गया और वजन और माप की एक समान प्रणाली को अपनाया गया। 
(vi) फ्रेंच को आम भाषा बनाना - क्षेत्रीय बोलियों को हतोत्साहित किया गया और फ्रेंच राष्ट्र की आम भाषा बन गई। 
फ्रांसीसी क्रांति की खबर के बाद छात्रों और शिक्षित मध्यम वर्ग के सदस्यों द्वारा जैकोबिन्स क्लब स्थापित किए गए, जिसका असर फ्रांसीसी सेना पर पड़ा।
फ्रांसीसी सेना द्वारा राष्ट्रवाद के विचार को विदेशों में फैलाया गया।
नेपोलियन : नेपोलियन ने फ्रांस में लोकतंत्र को नष्ट कर दिया था, लेकिन प्रशासनिक क्षेत्र में उसने पूरी व्यवस्था को अधिक तर्कसंगत और कुशल बनाने के लिए क्रांतिकारी सिद्धांतों को शामिल किया था।
नेपोलियन कोड: नेपोलियन ने वर्ष 1804 में नागरिक संहिता की शुरुआत की, जिसे नेपोलियन कोड भी कहा जाता है। 
(i) कानून के समक्ष समानता स्थापित की
(ii) जन्म के आधार पर सभी विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया
(iii) फ्रांसीसी नागरिकों को संपत्ति का अधिकार दिया
(iv) प्रशासनिक विभाजन को सरल बनाया
(v) सामंती व्यवस्था को समाप्त किया और किसानों को भू-दासत्व और जागीरदारी शुल्कों से मुक्ति दिलाई
(vi) शहरों में कारीगरों के श्रेणी-संघों के नियंत्रणों को हटा दिया।
(vii) परिवहन और संचार में सुधार किया।
नेपोलियन ने मानकीकृत वजन और माप की प्रणाली और एक आम राष्ट्रीय मुद्रा की शुरुआत की। नेपोलियन ने परिवहन और संचार की प्रणाली को बदल दिया था और इसे और अधिक उन्नत बनाया था। 
स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया : नेपोलियन द्वारा जीते गए क्षेत्रों में स्थानीय लोगों की फ्रांसीसी शासन के प्रति मिश्रित प्रतिक्रिया थी। व्यापारी और छोटे उत्पादकों ने नेपोलियन द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों का स्वागत किया। शुरू में, फ्रांसीसी सेनाओं को स्वतंत्रता के अग्रदूत/संदेशवाहक के रूप में मान्यता दी गई थी, लेकिन बाद में यह महसूस किया गया कि नयी प्रशासनिक व्यवस्थाएँ राजनीतिक स्वतंत्रता के अनुरूप नहीं है  बढ़े हुए कर, सेंसरशिप और फ्रांसीसी सेनाओं में जबरन भर्ती लोगों को पसंद नहीं थी। 
यूरोप में राष्ट्रवाद का निर्माण :  अठारहवीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में कोई 'राष्ट्र-राज्य' नहीं थे। वे तब राजशाहियों, डचियों और कैंटन में विभाजित थे जिनके शासकों के पास अपने स्वायत्त क्षेत्र थे। 
कुलीन वर्ग: सामाजिक और राजनीतिक रूप से कुलीन वर्ग यूरोपीय महाद्वीप में प्रमुख वर्ग था।
उनके पास ग्रामीण इलाकों और शहर के घरों में संपत्ति थी।
वे कूटनीति और उच्च समाज के उद्देश्यों के लिए फ्रेंच बोलते थे।
अभिजात वर्ग संख्यात्मक रूप से एक छोटा समूह था
किसान: किसान कृषि किसान थे जो खेती में लगे थे। किसान संख्यात्मक रूप से एक बड़ा समूह था
मजदूर वर्ग और मध्यम वर्ग: औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप, नए सामाजिक समूह - एक मजदूर वर्ग और मध्यम वर्ग अस्तित्व में आए। ये समूह उद्योगपतियों, व्यापारियों और पेशेवरों से बने थे।
उदारवादी राष्ट्रवाद का अर्थ :
'उदारवाद' शब्द लैटिन मूल लिबर से निकला है, जिसका अर्थ है "आजाद" ।
नए मध्यम वर्ग के लिए, उदारवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के समक्ष सभी की समानता के लिए खड़ा था।
राजनीतिक रूप से, उदारवाद ने सहमति से सरकार की अवधारणा पर जोर दिया।
फ्रांसीसी क्रांति के बाद से उदारवाद निरंकुश शासक और पादरीवर्ग के विशेषाधिकारों की समाप्ति तथा संविधान व संसदीय प्रतिनिधि सरकार का पक्षधर था। 
उन्नीसवीं सदी के उदारवादी निजी संपत्ति के स्वामित्व की अनिवार्यता पर भी बल देते थे।
आर्थिक क्षेत्र में, उदारवाद बाजारों की स्वतंत्रता और माल व पूंजी की आवाजाही पर राज्य द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के उन्मूलन के लिए खड़ा था।
1834 में प्रशा की पहल पर एक शुल्क संघ जालवेराइन स्थापित किया गया
1834 में, एक सीमा शुल्क संघ या जॉलवेरिन संघ  का गठन किया गया, जिसने शुल्क अवरोधों को समाप्त कर दिया और मुद्राओं की संख्या दो कर दी जो पहले तीस से ऊपर थी।
गतिशीलता को प्रोत्साहित करने के लिए रेलवे के एक नेटवर्क को बढ़ावा दिया।
1815 के बाद एक नया रूढ़िवाद
1815 में नेपोलियन की हार के बाद रूढ़िवाद की भावना मजबूत हो गई।  रूढ़िवादी मानते थे कि राज्य और समाज की स्थापित पारंपरिक संस्थाएँ जैसे-राजतंत्र, चर्च, सामाजिक ऊँच-नीच, संपत्ति और परिवार को बनाए रखना चाहिए 
नेपोलियन द्वारा किए गए परिवर्तनों से अधिकांश रूढ़िवादियों को एहसास हुआ कि आधुनिकीकरण वास्तव में राजतंत्र जैसी पारंपरिक संस्थाओं को मजबूत कर सकता है। एक आधुनिक सेना, एक कुशल नौकरशाही, एक गतिशील अर्थव्यवस्था, सामंतवाद और दासता का उन्मूलन यूरोप के निरंकुश राजतंत्रों को मजबूत कर सकता है।
वियना की संधि (1815) :
1815 में, यूरोप के लिए एक समझौते का मसौदा तैयार करने के लिए यूरोपीय शक्तियों (ऑस्ट्रिया, ग्रेट ब्रिटेन, प्रशा और रूस ) के प्रतिनिधियों ने वियना में मुलाकात की। इस सम्मलेन की मेजबानी ऑस्ट्रियाई चांसलर ड्यूक मैटरनिख ने की थी। 
1815 की वियना संधि का उद्देश्य नेपोलियन युद्धों के दौरान यूरोप में आए बदलावों को पूर्ववत करना था।
वियना संधि के प्रावधान।
(i) बूर्बों राजवंश को सत्ता में बहाल किया गया
(ii) भविष्य में फ्रांसीसी विस्तार को रोकने के लिए फ्रांस की सीमाओं पर राज्यों की एक श्रृंखला स्थापित की गई।
(iii) फ्रांस ने नेपोलियन के अधीन अपने कब्जे वाले क्षेत्रों को खो दिया 
(iv) नेपोलियन द्वारा स्थापित 39 राज्यों का जर्मन संघ इस संधि से प्रभावित नहीं हुआ।
(v) प्रशा को उसकी पश्चिमी सीमाओं पर महत्वपूर्ण नए क्षेत्र दिए गए, जबकि ऑस्ट्रिया को उत्तरी इटली का नियंत्रण दिया गया।
(vi) पूर्व में, रूस को पोलैंड का हिस्सा दिया गया, जबकि प्रशा को सैक्सोनी का एक हिस्सा दिया गया।
1815 में स्थापित रूढ़िवादी शासन निरंकुश थे। वे आलोचना और असहमति को बर्दाश्त नहीं करते थे। उन्होंने समाचार पत्रों, पुस्तकों, नाटकों और गीतों को नियंत्रित करने के लिए सेंसरशिप कानून लागू किए। फिर भी फ्रांसीसी क्रांति की स्मृति उदारवादियों को प्रेरित करती रही। नयी रूढ़िवादी व्यवस्था के आलोचक उदारवादी राष्ट्रवादियों द्वारा उठाया गया एक मुख्य मुद्दा था- प्रेस की आजादी।
क्रांतिकारी
1815 के बाद, दमन के डर से कई उदार-राष्ट्रवादी भूमिगत हो गए। अपने विचारों को फैलाने और क्रांतिकारियों को प्रशिक्षित करने के लिए कई यूरोपीय राज्यों में गुप्त समाज बनाए गए।
उदाहरण के लिए -ज्युसेपी मेत्सिनी इटालवी क्रांतिकारी थे। उनका जन्म 1807 में जेनोआ में हुआ था। वे कार्बोनेरी नामक गुप्त समाज का सदस्य बन गया। उन्होंने दो भूमिगत समाजों की स्थापना की मार्सेई में यंग इटली और बर्न में यंग यूरोप। जिसके  सदस्य पोलैंड, फ्रांस, इटली और जर्मन राज्यों में समान विचार रखने
वाले युवा थे।
मेत्सिनी ने राजतंत्र का घोर विरोध करके और लोकतांत्रिक गणतंत्रों के स्वप्न से रूढ़िवादियों को हरा दिया। 
मैटरनिख ने उसे ‘हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे खतरनाक दुश्मन’ बताया।
3. क्रांतियों का युग: 1830 - 1848
जुलाई क्रांति : 
पहला फ़्रांस में  जुलाई 1830 में हुआ। बूर्बों राजाओं जिन्हें  1815 में सत्ता में बहाल किया गया, को उदारवादी क्रांतिकारियों ने उखाड़ फेंका। उनके स्थान पर एक संवैधानिक राजतंत्र स्थापित किया गया जिसका प्रमुख लुई फिलिप था।
मैटरनिख ने एक बार टिप्पणी की थी, 'जब फ्रांस छींकता है, तो शेष यूरोप को सर्दी लग जाती है।' 
जुलाई क्रांति से  ब्रुसेल्स में भी विद्रोह भड़क गया , जिसके कारण बेल्जियम नीदरलैंड से अलग हो गया। 
यूनान का स्वंतत्राता संग्राम : पंद्रहवीं सदी से ही यूनान ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था यूनान  में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष 1821 में शुरू हुआ और  1832 की कुस्तुनतुनियाकी संधि ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी। 
रूमानी कल्पना और राष्ट्रीय भावना : राष्ट्रवाद का विकास केवल युद्धों और क्षेत्राीय विस्तार से नहीं हुआ संस्कृति ने भी राष्ट्र के विचार को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  कला, काव्य, कहानियों-किस्सों  और संगीत ने राष्ट्रवादी भावनाओं को गढ़ने और व्यक्त करने में सहयोग दिया। रूमानी कलाकारों और कवियों ने तर्क और विज्ञान के महिमामंडन की आलोचना की। उन्होंने भावनाओं, अंतर्ज्ञान और रहस्यमय भावनाओं पर ध्यान केंद्रित किया। जर्मन दार्शनिक योहान गॉटफ्रीड ने दावा किया कि सच्ची जर्मन संस्कृति  आम लोगों (दास वोल्क) के बीच खोजा जाना था।
 लोकगीतों, कविताओं और नृत्यों के संग्रह के माध्यम से राष्ट्र की सच्ची भावना को लोकप्रिय बनाया गया पोलैंड में संगीत और भाषा के माध्यम से राष्ट्रीय भावनाओं को जीवित रखा गया।
भाषा ने भी राष्ट्रीय भावनाओं को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रूसी कब्जे के बाद, पोलिश भाषा को स्कूलों से हटा दिया और रूसी भाषा को हर जगह थोप दिया गया। पोलैंड में पादरी धार्मिक शिक्षा के लिए पोलिश भाषा का इस्तेमाल करते थे और इसे एक धार्मिक भाषा के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
भूख, कठिनाई और लोकप्रिय विद्रोह
1830 का दशक यूरोप में बहुत बड़ी आर्थिक कठिनाई का वर्ष था।
उन्नीसवीं सदी के पहले भाग में, जनसंख्या वृद्धि का अनुपात रोजगार सृजन से अधिक था।
इंग्लैंड से सस्ते मशीन-निर्मित सामानों के आयात के कारण छोटे उत्पादकों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
यूरोप के कुछ क्षेत्रों में किसान अभी भी सामंती शुल्क और दायित्वों के बोझ तले दबे हुए थे।
खाद्य कीमतों में वृद्धि या खराब फसल के एक साल के कारण शहर और देश में व्यापक गरीबी फैल गई।
बुनकरों का विद्रोह
1845 में सिलेसिया में बुनकरों ने उन ठेकेदारों वके खिलाप़फ विद्रोह कर दिया था जो उन्हें कच्चा माल देकर निर्मित कपड़ा लेते थे परंतु दाम बहुत कम थे। 4 जून को दोपहर 2 बजे बुनकरों की भीड़ ने विद्रोह कर दिया और ठेकेदार से अधिक मजदूरी की मांग की। ठेकेदार ने उनके साथ बुरा व्यवहार किया और उन्हें धमकाया। उनमें से एक समूह ने घर में जबरन प्रवेश किया, उसकी खिड़कियाँ, फर्नीचर, चीनी मिट्टी के बर्तन तोड़ दिए, दूसरे समूह ने गोदाम में प्रवेश किया और कपड़े लूट लिए । ठेकेदार अपने परिवार के साथ भाग गया। 24 घंटे बाद वह सेना के साथ लौटा और इसके बाद सेना के साथ मुठभेड़ में ग्यारह बुनकरों को गोली मार दी गई। 
1848 मेंखाद्यान्न की कमी और व्यापक बेरोजगारी से पेरिस के लोग सड़कों पर उतर आए। जगह-जगह अवरोध लगाए गए और लुई फिलिप को भागने पर मजबूर किया गया। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय सभा ने एक गणतंत्र की घोषणा करते हुए 21 वर्ष से ऊपर सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार प्रदान किया और काम के अधिकार की गारंटी दी।
उदारवादियों की क्रांति : 1848 में कई यूरोपीय देशों (जर्मनी, इटली, पोलैंड, ऑस्ट्रो, हंगरी साम्राज्य) में शिक्षित मध्यम वर्ग के नेतृत्व में क्रांति हुई। उन्होंने संविधानवाद की माँग को राष्ट्रीय एकीकरण की माँग से जोड़ दिया उन्होंने  बढ़ते जन असंतोष का फायदा उठाया और एक राष्ट्र-राज्य के निर्माण की माँगों को आगे बढ़ाया। यह राष्ट्र-राज्य संविधान, प्रेस की स्वतंत्राता और संगठन बनाने की आजादी जैसे संसदीय   सिद्धांतों  पर आधारित था।
नारीवाद : स्त्री-पुरुष की सामाजिक, आर्थिक  एवं राजनीतिक समानता की सोच के आधार पर महिलाओं के अधिकारों और हितों का बोध
मई क्रांति : बड़ी संख्या में राजनीतिक संघ जिनके सदस्य मध्यम वर्ग के पेशेवर, व्यवसायी और कारीगर थे, फ्रैंकफर्ट शहर में एक अखिल जर्मन राष्ट्रीय सभा के लिए मतदान करने के लिए एकत्र हुए। 18 मई 1848 को, 831 निर्वाचित प्रतिनिधि सेंट पॉल चर्च में एकत्र हुए। उन्होंने एक जर्मन राष्ट्र के लिए एक संविधान का मसौदा तैयार किया इस संविधान के अनुसार राष्ट्र का नेतृत्व एक राजतंत्र द्वारा किया जाना था जो संसद के नियंत्रण में था। महिलाओं को फ्रैंकफर्ट संसद में आगंतुकों की गैलरी में खड़े होने के लिए केवल पर्यवेक्षकों के रूप में प्रवेश दिया गया था। उन्हें विधानसभा के चुनाव के दौरान वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया था। जब प्रतिनिधियों ने फ्रेडरिक विल्हेम चतुर्थ (प्रशा के राजा) को ताज की पेशकश की, तो उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया और निर्वाचित विधानसभा का विरोध करने के लिए अन्य राजाओं के साथ शामिल हो गए। कुलीन वर्ग और सेना का विरोध मजबूत हो गया और संसद का सामाजिक आधार नष्ट हो गया। संसद पर मध्यम वर्ग का प्रभुत्व था, जो श्रमिकों और कारीगरों की मांगों का विरोध करता था और परिणामस्वरूप उनका समर्थन खो बैठा। अंत में सेना को बुलाया गया और विधानसभा को भंग करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
उदारवादी आंदोलन के अंदर महिलाओं को राजनीतिक अधिकार प्रदान करने का मुद्दा विवादास्पद था हालाँकि आंदोलन में वर्षों से बड़ी संख्या में महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया था। महिलाओं ने अपने राजनीतिक संगठन स्थापित किए, अखबार शुरू किए और राजनीतिक बैठकों और प्रदर्शनों में शिरकत की। इसके बावजूद उन्हें एसेंबली के चुनाव के दौरान मताधिकार से वंचित रखा गया था। जब सेंट पॉल चर्च में फ्रेंकफर्ट संसद की सभा आयोजित की गई थी तब महिलाओं को केवल प्रेक्षकों की सियत से दर्शक-दीर्घा में खड़े होने दिया गया।  हालाँकि रूढ़िवादी ताकतें 1848 में उदारवादी आंदोलनों को दबा पाने में
कामयाब हुईं लेकिन वे पुरानी व्यवस्था बहाल नहीं कर पाईं। राजाओं को यह समझ में आना शुरू हो गया था कि उदारवादी-राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों को रियायतें देकर ही क्रांति और दमन के चक्र को समाप्त किया जा सकता था। अतः 1848 के बाद मध्य और पूर्वी यूरोप की निरंकुश राजशाहियों ने उन परिवर्तनों को आरंभ किया जो पश्चिमी यूरोप में 1815 से पहले हो चुके थे। इस प्रकार हैब्सबर्ग अधिकार वाले क्षेत्रों और रूस में
भूदासत्व और बंधुआ मजदूरी समाप्त कर दी गई।
जर्मनी का एकीकरण : इसकी शुरुआत 1848 के उदारवादी राष्ट्रवादी आंदोलन से हुई, जिसमें फ्रैंकफर्ट संसद का गठन किया गया, हालांकि प्रयास विफल रहे। उसके बाद प्रशा के मुख्यमंत्री ओटो वॉन बिस्मार्क ने प्रशा की सेना और नौकरशाही की मदद से राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन का नेतृत्व संभाला। बिस्मार्क ने ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस के साथ सात साल की अवधि में तीन युद्धों का नेतृत्व किया, जो प्रशा की जीत के साथ समाप्त हुआ। अंत में एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई। जनवरी 1871 में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मन सम्राट घोषित किया गया। 
इटली का एकीकरण : एकीकरण से पहले इटली सात राज्यों में विभाजित था, जिनमें से केवल एक, सार्डिनिया-पीडमोंट, पर एक इतालवी राजघराने का शासन था। 1830 के दशक में, ज्युसेपे मेत्सिनी ने इटली को एकीकृत करने का प्रयास किया। उन्होंने यंग इटली नामक एक गुप्त संगठन बनाया।लेकिन वे असफल रहे। 1831 और 1848 के दोनों विद्रोहों की विफलता के बाद, इतालवी राज्यों को एकीकृत करने की जिम्मेदारी सार्डिनिया-पीडमोंट के शासक राजा विक्टर इमैनुएल द्वितीय पर आ गई। उन्होंने यह जिम्मेदारी अपने मंत्री प्रधान कावूर को सौंपी, जिन्होंने फ्रांस के साथ एक चतुर कूटनीतिक गठबंधन बनाया और 1859 में ऑस्ट्रियाई सेना को हराया। बाद में, 1860 में ज्युसेपे गैरीबॉल्डी की मदद से दक्षिण इटली और दो सिसिली के राज्य पर कब्जा कर लिया गया। 1861 में विक्टर इमैनुएल द्वितीय को संयुक्त इटली का राजा घोषित किया गया। 
 ब्रिटेन की अजीब दास्तान :  अठारहवीं शताब्दी से पहले कोई ब्रिटिश राष्ट्र नहीं था। ब्रिटिश द्वीपों में रहने वाले लोगों की प्राथमिक पहचान जातीय थी। इन सभी जातीय समूहों की अपनी सांस्कृतिक और राजनीतिक परंपराएँ  थी । लेकिन अंग्रेजी राष्ट्र की अधिक शक्ति और धन के कारण यह राष्ट्रों के अन्य द्वीपों पर नियंत्रण करने में सफल हुआ। अंग्रेजी संसद ने 1688  में राजतन्त्र से सत्ता छीन ली और ब्रिटेन को केंद्र में रखकर एक राष्ट्र राज्य बनाया। 
इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बीच संघ अधिनियम (1707)  से 'यूनाइटेड किंगडम ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन' का गठन हुआ।
आयरलैंड कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के बीच विभाजित देश था। अंग्रेजों ने प्रोटेस्टेंट की मदद की और आयरलैंड को 1801 में जबरन यूनाइटेड किंगडम में शामिल कर लिया गया। अंत में प्रमुख अंग्रेजी संस्कृति के प्रचार के माध्यम से एक नया 'ब्रिटिश राष्ट्र' स्थापित किया गया। नए ब्रिटेन के प्रतीक ब्रिटिश ध्वज (यूनियन जैक), राष्ट्रगान (गॉड सेव अवर नोबल किंग), अंग्रेजी भाषा थे।
5. राष्ट्र की दृश्य कल्पना :
18वीं और 19वीं शताब्दी में कलाकारों ने राष्ट्र को एक महिला आकृति के रूप में चित्रित किया। राष्ट्र को मूर्त रूप देने के लिए जिस महिला रूप को चुना गया, वह वास्तविक जीवन में किसी विशेष महिला का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी। यह महिला आकृति राष्ट्र का रूपक बन गई। 
रूपक - जब किसी व्यक्ति या वस्तु के माध्यम से अमूर्त विचार व्यक्त किया जाता है, तो उसे रूपक कहा जाता है। रूपक कहानी के दो अर्थ होते हैं, एक शाब्दिक और एक प्रतीकात्मक। 
मारिआन फ्रांस की महिला रूपक थी। जो एक लोकप्रिय ईसाई नाम था। उसकी विशेषताएँ स्वतंत्रता और गणतंत्र की भी थीं - लाल टोपी, तिरंगा, कलंगी । मैरिएन की मूर्तियाँ सार्वजनिक चौकों पर लोगों को "एकता के राष्ट्रीय प्रतीक" की याद दिलाने के लिए स्थापित की गईं। मारिआन की छवियाँ सिक्कों और टिकटों पर अंकित की गईं। 
जर्मेनिया जर्मन राष्ट्र की महिला रूपक थी। जर्मेनिया ओक(बलूत) के पत्तों का मुकुट पहने हुए थी, क्योंकि जर्मन ओक बहादुरी का प्रतीक था। 
6. राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद 
उन्नीसवीं सदी के अंत में, राष्ट्रवाद ने अपनी आदर्शवादी उदार लोकतांत्रिक भावना खो दी। 1871 के बाद बाल्कन क्षेत्र यूरोप में राष्ट्रवादी तनाव का मुख्य कारण था।
बाल्कन भौगोलिक और जातीय विविधता वाला क्षेत्र था, जिसके निवासियों को स्लाव के नाम से जाना जाता था।
बाल्कन में आधुनिक रोमानिया, मैसेडोनिया, क्रोएशिया, बुल्गारिया, अल्बानिया, ग्रीस, बोस्निया-हर्जेगोविना, सर्बिया, मोंटेनेग्रो और स्लोवेनिया शामिल थे।
बाल्कन का एक बड़ा हिस्सा ओटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में था।
रोमांटिक राष्ट्रवाद के विकास और ओटोमन साम्राज्य के पतन के कारण बाल्कन एक बहुत ही अस्थिर क्षेत्र बन गया।
इस अवधि के दौरान, एक-एक करके, इसके यूरोपीय राष्ट्रीयताएँ इसके नियंत्रण से अलग हो गईं और स्वतंत्रता की घोषणा की।
इस अवधि के दौरान, रूस, जर्मनी, इंग्लैंड, ऑस्ट्रो-हंगरी जैसी यूरोपीय शक्तियों ने बाल्कन पर अपना नियंत्रण पाने के लिए प्रतिस्पर्धा की। इससे क्षेत्र में कई युद्ध हुए और अंततः प्रथम विश्व युद्ध हुआ।
प्रतीकों का अर्थ
टूटी हुई बेड़ियाँ - आजादी मिलना
बाज-छाप कवच - जर्मन साम्राज्य की प्रतीक-शक्ति
बलूत पत्तियों का मुकुट - बहादुरी
तलवार - मुकाबले की तैयारी
तलवार पर लिपटी जैतून की डाली - शांति की चाह
काला, लाल और सुनहरा तिरंगा -1848 में उदारवादी-राष्ट्रवादियों का झंडा, जिसे जर्मन राज्यों के ड्यूक्स ने प्रतिबंधित घोषित कर दिया
उगते सूर्य की किरणें - एक नए युग का सूत्रपात



  1. कावूर कौन था?
    सर्डीनिया-पीडमांट का मंत्री प्रमुख 
  2. फ्रांसीसी  क्रांति के बाद इस्टेट जनरल का नाम बदलकर क्या किया गया?
     राष्ट्रीय सभा (नेशनल असेंबली)
  3. जर्मनी के एकीकरण के जनक कौन थें?
    ओटो वॉन बिस्मार्क
  4. इटली के एकीकरण के जनक कौन थें?
    ज्युसेपे मेत्सिनी
  5. ‘‘टूटी हुई बेडियाँ’’ किसका प्रतीक थी?
    आजादी मिलना
  6. नेपोलियन संहिता किस वर्ष लागू की गई ?
    1804 में
  7. तलवार पर लिपटी जैतून की डाली किसका प्रतिक है ?
    शांति की चाह
  8. यूरोपीय सभ्यता का पालना’ किसे कहा जाता था ?
    यूनान को
  9. फ्रांस गणराज्य का प्रतिनिधित्व करने वाली महिला रूपक का नाम बताइए।
    मारिआन
  10. एक विचारधारा जो  अधिकारों और अवसरों के मामले में स्त्री व पुरुष को सामान मानती है क्या कहलाती है 
    नारीवाद 
  11. 'यूनाइटेड किंगडम ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन' का गठन कब हुआ।
    1707 में
  12. किस फ्रांसीसी कलाकार ने अपने सपनों की दुनिया को दर्शाते हुए चार चित्रों की एक श्रृंखला तैयार की।
    फ्रेडरिक सोरियू।
  13. यूरोप में 1815 में कौन सी रूढ़िवादी व्यवस्थाएँ स्थापित की गईं?
    निरंकुश
  14. फ़्रांस में जुलाई क्रांति  कब हुई
    1830 में 
  15. इटली के एकीकरण से पहले किस राज्य पर एक इतालवी रियासत का शासन था? 
    सार्डिनिया-पीडमोंट
  16. लाल टोपी या टूटी जंजीर किसका प्रतीक  है ?
    स्वतंत्रता का 
  17. किस क्रांति को ‘राष्ट्रवाद’ की पहली अभिव्यक्ति कहा जाता है?
    फ्रांसीसी क्रांति को ‘राष्ट्रवाद’ की पहली अभिव्यक्ति कहा जाता है।
  18. 1815 में वियना कांग्रेस की मेजबानी किसने की थी।
    ऑस्ट्रियाई चांसलर ड्यूक मेटरनिख।
  19. किसने कहा था, “जब फ्रांस छींकता है तो बाकी यूरोप को सर्दी-जुकाम हो जाता है"?
    ड्यूक मेटरनिख
  20. यंग इटली व यंग यूरोप के संस्थापक कौन था ?
    ज्युसेपी मेत्सिनी
  21. जर्मनी के एकीकरण का कर्णधार/जनक कौन था?
    प्रशा का मुख्यमंत्री ऑटोवॉन बिस्मार्क 
  22. जर्मनी के एकीकरण के पश्चात् जर्मनी का सम्राट किसे घोषित किया गया?
    प्रशा के राजा विलियम प्रथम को।
  23. फ्रांसीसी क्रांति कब हुई थी?
    1789
  24. उगते सूर्य की किरणें किसका प्रतीक है  ?
    एक नए युग का सूत्रपात
  25. उदार राष्ट्रवादियों ने कौन सा प्रमुख मुद्दा उठाया?
    उदार राष्ट्रवादियों ने प्रेस की स्वतंत्रता का प्रमुख मुद्दा उठाया।
  26. यूनान को किस सन्धि के द्वारा स्वतन्त्र राष्ट्र की मान्यता मिली और कब? 
    1832 में कुस्तुन्तुनिया की सन्धि के द्वारा यूनान को स्वतन्त्र राष्ट्र की मान्यता प्राप्त हुई। 
  27. मारिआन कहाँ की महिला रूपक थी?
    फ्रांस की
  28. जर्मेनियाँ  किस राष्ट्र की रूपक थी ?
    जर्मन राष्ट्र की
  29. जनवरी 1871 में राजा विलियम प्रथम को किस राष्ट्र का सम्राट घोषित किया गया।
    जर्मनी का
  30. जर्मनी के एकीकरण के पश्चात जर्मनी का सम्राट किसे घोषित किया गया?
    विलियम प्रथम 
  31. कुस्तुनतुनिया की संधि कब हुई?
    1832  में
  32. ‘‘जनमत संग्रह’’ से क्या आशय है?
    एक प्रत्यक्ष मतदान जिसके जरिए एक क्षेत्र के सभी लोगों से एक प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए पूछा जाता है।
  33. फ्रांसीसी क्रांति की घोषणा का उल्लेख करें। 
    फ्रांसीसी क्रांति की घोषणा थी "लोग राष्ट्र का गठन करेंगे और इसके भाग्य को आकार देंगे।"
  34. यूरोप में फ्रांसीसी क्रांति के कारण राजनीतिक और संवैधानिक परिदृश्य में कौन सा बड़ा परिवर्तन हुआ?
    इससे राजशाही से फ्रांसीसी नागरिकों के एक समूह को संप्रभुता/सत्ता का हस्तांतरण हुआ
  35. 'उदारवाद' से क्या अभिप्राय है?
    'उदारवाद' शब्द लातिन भाषा के मूल 'Liber' पर आधारित है जिसका अर्थ है- आजाद अर्थात् व्यक्ति के लिए स्वतन्त्रता और कानून के समक्ष सबकी बराबरी
  36. रूढ़िवादिता क्या है?
    रूढ़िवाद एक राजनीतिक विचारधारा है जो पारंपरिक मूल्यों और स्थापित संस्थाओं को महत्व देती है। 
  37. 1815 की वियना संधि का मुख्य उद्देश्य क्या था?
    1815 की "वियना की संधि" का मुख्य उद्देश्य नेपोलियन के शासनकाल और नेपोलियन युद्धों के दौरान यूरोप में लाए गए सभी परिवर्तनों को पूर्ववत करना था। 
  38. 'जॉलवेराइन' संघ से आप क्या समझते हैं?
    जॉलवेराइन संघ एक शुल्क संघ था। जिसकी स्थापना 1834 में की गई जिसने विभिन्न जर्मन राज्यों के बीच शुल्क अवरोधों को समाप्त कर दिया था इस संघ का उद्देश्य जर्मन लोगों को आर्थिक रूप से एक राष्ट्र में बाँध देना था।
  39. निरंकुशवाद का अर्थ लिखिए
    ऐसी सरकार या शासन व्यवस्था जिसकी सत्ता पर किसी प्रकार का कोई अंकुश नहीं होता है  इतिहास में ऐसी राजशाही सरकारों को निरंकुश सरकार कहा जाता है जो अत्यंत केंद्रीकृत, सैन्य बल पर आधरित और दमनकारी सरकारें होती थीं।
  40. वियना सम्मेलन में भाग लेने वाले चार प्रमुख देशों के नाम लिखिए जिनके प्रतिनिधि सम्मेलन में सम्मिलित हुए थे?
    (1) इंग्लैण्ड (2) रूस (3) प्रशा (4) आस्ट्रिया।
  41. वियना सम्मेलन कब आयोजित किया गया? इसकी मेजबानी किसने की थी?
    वियना सम्मेलन 1815 में आयोजित किया गया था।
    इस सम्मेलन की मेजबानी आस्ट्रिया के चांसलर ड्यूक मेटरनिख ने की थी।
  42. मारियान की मूर्तियाँ सार्वजनिक चौकों पर क्यों स्थापित की गईं।
    मैरिएन की मूर्तियाँ सार्वजनिक चौकों पर लोगों को "एकता के राष्ट्रीय प्रतीक" की याद दिलाने के लिए स्थापित की गईं।
  43. फ्रांसीसी क्रांतिकारियों का मुख्य उद्देश्य क्या था?
    उनका मुख्य उद्देश्य फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान की भावना पैदा करके राजशाही से फ्रांसीसी लोगों के एक समूह को संप्रभुता का हस्तांतरण करना था।
  44. रूमानीवाद से आप क्या समझते हैं? 
    एक ऐसी विचार धारा जो राष्ट्रवादी भावना का विकास संस्कृति के द्वारा करना चाहता है। इस विचारधारा को मानने वाले तर्क-वितर्क और विज्ञान के महिमामंडन की जगह भावनाओं,अन्तर्दृष्टि और रहस्यवादी भावनाओं पर जोर देते थे। इसने  लोकगीतों, कहानियों, लोककथाओ और संगीत के माध्यम से राष्ट्रवादी भावनाओं का प्रसार किया। इसने सामूहिक विरासत और संस्कृति को राष्ट्र का आधार बनाया 
  45. नेपोलियन संहिता क्या है? 
    नेपोलियन ने वर्ष 1804 में नागरिक संहिता की शुरुआत की जिसे नेपोलियन संहिता भी कहा जाता है। इसे जन्म के आधार पर मिलने वाले विशेषाधिकारों को समाप्त करने, कानून के समक्ष समानता स्थापित करने और सभी को संपत्ति का अधिकार देने के लिए पेश किया गया था।
  46. जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया का वर्णन करें। 
    इसकी शुरुआत 1848 में फ्रैंकफर्ट संसद के गठन के साथ उदार राष्ट्रवादी आंदोलन से हुई, हालांकि प्रयास विफल रहे। उसके बाद प्रशा के मुख्यमंत्री ओटो वॉन बिस्मार्क ने प्रशा की सेना और नौकरशाही की मदद से राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन का नेतृत्व संभाला। बिस्मार्क ने ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस के साथ सात वर्षों की अवधि में तीन युद्ध लड़े, जो प्रशा की जीत के साथ समाप्त हुए। अंत में एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई। जनवरी 1871 में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मन सम्राट घोषित किया गया।
  47. वियना संधि की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख करें।
    (i) बूर्बों राजवंश को सत्ता में बहाल किया गया
    (ii) भविष्य में फ्रांसीसी विस्तार को रोकने के लिए फ्रांस की सीमाओं पर राज्यों की एक श्रृंखला स्थापित की गई। 
    (iii) फ्रांस ने नेपोलियन के अधीन अपने कब्जे वाले क्षेत्रों को खो दिया 
    (iv) प्रशा को उसकी पश्चिमी सीमाओं पर महत्वपूर्ण नए क्षेत्र दिए गए, जबकि ऑस्ट्रिया को उत्तरी इटली का नियंत्रण दिया गया।
    (v) रूस को पोलैंड का हिस्सा दिया गया, जबकि प्रशा को सैक्सोनी का एक हिस्सा दिया गया।
  48. इटली के एकीकरण की प्रक्रिया का वर्णन करें।
    तीन महान नेताओं, माज़िनी, कैवूर और गैरीबाल्डी की प्रतिबद्धता, भागीदारी और प्रयास के परिणामस्वरूप इटली का एकीकरण हुआ। 
    1830 के दशक में, ज्युसेपे मेत्सिनी ने इटली को एकीकृत करने का प्रयास किया। उन्होंने यंग इटली नामक एक गुप्त संगठन बनाया। लेकिन वे असफल रहे। 1831 और 1848 के दोनों विद्रोहों की विफलता के बाद, इतालवी राज्यों को एकीकृत करने की जिम्मेदारी सार्डिनिया-पीडमोंट के शासक राजा विक्टर इमैनुएल द्वितीय पर आ गई। उन्होंने यह जिम्मेदारी अपने मुख्यमंत्री कैवूर को सौंप दी, जिन्होंने फ्रांस के साथ एक चतुर कूटनीतिक गठबंधन बनाया और 1859 में ऑस्ट्रियाई सेनाओं को हराया। बाद में, 1860 में ग्यूसेप गैरीबाल्डी की मदद से दक्षिण इटली और दो सिसिली के साम्राज्य पर कब्जा कर लिया गया। 1861 में विक्टर इमैनुएल द्वितीय को संयुक्त इटली का राजा घोषित किया गया।
  49. आर्थिक क्षेत्र में उदार राष्ट्रवादियों के किन्हीं चार विचारों की व्याख्या कीजिए।
    (i) उदारवाद बाजारों की स्वतंत्रता और माल और पूंजी की आवाजाही पर राज्य द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के उन्मूलन के लिए खड़ा था।
    (ii) 1834 में, एक सीमा शुल्क संघ या जॉलवेराइन का गठन किया गया, जिसने टैरिफ बाधाओं को समाप्त कर दिया और मुद्राओं की संख्या तीस से घटाकर दो कर दी।
    (iii) गतिशीलता को प्रोत्साहित करने के लिए रेलवे के एक नेटवर्क को बढ़ावा दिया।
  50. 1830 के दशक में यूरोप द्वारा सामना की गई किन्हीं तीन आर्थिक कठिनाइयों का वर्णन करें।
    (i) उन्नीसवीं सदी के पहले भाग में, जनसंख्या वृद्धि का अनुपात रोजगार सृजन से अधिक था।
    (ii) इंग्लैंड से सस्ते मशीन-निर्मित सामानों के आयात के कारण छोटे उत्पादकों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
    (iii) यूरोप के कुछ क्षेत्रों में किसान अभी भी सामंती बकाया और दायित्वों के बोझ तले दबे हुए थे।
    (iv) खाद्य कीमतों में वृद्धि या खराब फसल के एक साल के कारण शहर और देश में व्यापक गरीबी फैल गई
  51. फ्रांसीसी क्रांतिकारियों द्वारा फ्रांसीसी लोगों में सामूहिक पहचान की भावना पैदा करने के लिए शुरू किए गए किसी भी चार उपायों का वर्णन करें। 
    (i) ला पैट्री (पितृभूमि) और ले सिटॉयन (नागरिक) का विचार: फ्रांसीसी क्रांति में ला पैट्री (पितृभूमि) और ले सिटॉयन (नागरिक) का विचार दर्शाता है कि देश के संविधान के तहत समुदाय को समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए। 
    (ii) नया फ्रांसीसी तिरंगा झंडा: फ्रांसीसी नागरिकों ने नया  तिरंगा झंडा चुना। झंडे के रंग नीला, सफेद और लाल था। 
    (iii) एस्टेट जनरलों का चुनाव और राष्ट्रीय सभा का गठन: इस्टेट जनरल का नाम बदलकर राष्ट्रीय सभा (नेशनल असेंबली) कर दिया गया और इसे सक्रिय नागरिकों के एक समूह द्वारा चुना गया। 
    (iv) नागरिकों के लिए समान कानूनों का निर्माण: एक केंद्रीकृत प्रशासनिक प्रणाली लागू की गई और इसने पूरे देश के सभी नागरिकों के लिए समान कानून बनाए। 
    (v) आंतरिक सीमा शुल्क का उन्मूलन: आंतरिक सीमा शुल्क और बकाया को समाप्त कर दिया गया और वजन और माप की एक समान प्रणाली को अपनाया गया। 
    (vi) फ्रेंच को आम भाषा बनाना - क्षेत्रीय बोलियों को हतोत्साहित किया गया और फ्रेंच राष्ट्र की आम भाषा बन गई। 
  52. नेपोलियन द्वारा जीते गए क्षेत्रों में किए गए किन्हीं तीन सुधारों का वर्णन कीजिए।
    (i) नेपोलियन ने वर्ष 1804 में नागरिक संहिता लागू की। इसे जन्म के आधार पर मिलने वाले विशेषाधिकारों को समाप्त करने, कानून के समक्ष समानता स्थापित करने और सभी को संपत्ति का अधिकार देने के लिए लागू किया गया था।
    (ii) यह संहिता फ्रांसीसी नियंत्रण वाले क्षेत्रों में लागू की गई थी। डच गणराज्य, स्विट्जरलैंड, इटली और जर्मनी में नेपोलियन ने प्रशासनिक विभाजन को सरल बनाया, सामंती व्यवस्था को समाप्त किया और किसानों को दासता और जागीर शुल्क से मुक्त किया।
    (iii) उन्होंने एक समान वजन और माप की प्रणाली और राष्ट्र के लिए एक समान मुद्रा की प्रणाली भी शुरू की, जिससे लोगों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में व्यापार करने में मदद मिली।
    (iii) उन्होंने परिवहन और संचार की प्रणाली को बदल दिया था और इसे और अधिक उन्नत बनाया था।


  • ..............................कलाकार फ्रेडरिक सोरियू ने  चार चित्रों की एक श्रृंखला प्रस्तुत की (फ्रांसीसी)
  • वियना सम्मेलन की मेजबानी आस्ट्रिया के चांसलर .................... ने की थी। (ड्यूक मैटरनिख)
  • सॉरयू के ................... में दुनिया के लोग अलग राष्ट्रों के समूह में बंटे हुए है। (कल्पनादर्श /युटोपिया)
  • 1832 की ने................की संधि ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी। (कुस्तुनतुनिया)
  • .................. के एकीकरण में बिस्मार्क की प्रमुख भूमिका थी। (जर्मनी)
  • फ्रांस  की जुलाई क्रांति  जुलाई .................... में हुई थी (1830)
  • चाक्षुष अभिव्यक्तियों में जर्मेनिया ..............वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहनती है (बलूत )
  • सार्डिनिया- पीडमॉण्ट में एक ..............राजघराने का शासन था।(इतालवी )
  • उन्नीसवीं सदी के मध्य में इटली .............राज्यों में बँटा हुआ था (सात )