GSSS BINCHAWA

GSSS BINCHAWA

GSSS KATHOUTI

GSSS KATHOUTI

GSSS BUROD

9. वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम

वायुमंडलीय दाब

पृथ्वी की सतह के एकांक क्षेत्रफल पर उसके उपर के वायु स्तम्भ के भार द्वारा डाला गया दाब वायुदाब या वायुमंडलीय दाब कहलाता हैं। वायुमंडलीय दाब को पारद वायुदाबमापी अथवा निर्द्रव वायुदाब मापी (बेरोमीटर) से मापा जाता है। वायुदाब के मापने की इकाई को मिलीबार कहते हैं। है। समुद्र तल पर औसत वायुमंडलीय दाब 1013.25 मिलीबार के बराबर होता है। एक निश्चित स्थान एवं निश्चित समय पर वायु के एक स्तम्भ का भार वायुदाब कहलाता है। 

वायुदाब का उर्ध्वाधर वितरण

वायुदाब, ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ कम होता जाता है लेकिन यह एक ही दर से हमेशा कम नहीं होता है। यह ह्रास दर प्रत्येक 10 मीटर की ऊँचाई पर 1 मिलीबार होता है। वायुदाब सदैव एक ही दर से नहीं घटता। निश्चित ऊँचाई पर उर्ध्वाधर दाब प्रवणता क्षैतिज दाब प्रवणता की अपेक्षा अधिक होती है। लेकिन, इसके विपरीत दिशा में कार्यरत गुरुत्वाकर्षण बल से यह संतुलित हो जाती है अतः अतः उर्ध्वाधर पवनें अधिक शक्तिशाली नहीं होती। 

वायुदाब का क्षैतिज वितरण

वायुमंडलीय दाब का सारे संसार में वितरण क्षैतिज वितरण कहलाता है। इसे मानचित्र में समदाब रेखाओं द्वारा दर्शाया जाता है। समदाब रेखाएँ वे रेखाएँ हैं जो समुद्र तल से एक समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाती हैं। समदाब रेखायें जब पास-पास होती हैं तो वायुदाब प्रवणता तीव्र होती हैं और जब वे दूर-दूर होती है तो वायुदाब प्रवणता की मंद होती हैं। समदाब रेखाओं के बीच की दूरी वायुदाब में आने वाले परिवर्तन की दर तथा उसकी दिशा को बताती है। वायुदाब की दर में इस परिवर्तन को वायुदाब की प्रवणता कहते हैं। वायुदाब की प्रवणता दो स्थानों के वायुदाब में भिन्नता तथा उनके बीच क्षैतिज दूरी का अनुपात होता है। निम्न दाब प्रणाली एक या अधिक समदाब रेखाओं से घिरी होती है जिसके केंद्र में निम्न वायुदाब होता है। उच्च दाब प्रणाली में भी एक या अधिक समदाब रेखाएँ होती हैं जिनकें केन्द्र्र में उच्चतम वायुदाब होता है।

समुद्रतल वायुदाब का विश्व-वितरण

ये वायुदाब पट्टिðयाँ स्थाई नही हैं। सूर्य किरणों के विस्थापन के साथ ये पट्टिðयाँ वस्थापित होती रहती हैं। उत्तरी गोलार्ध में शीत ऋतु में ये पट्टिðयाँ दक्षिण की ओर तथा ग्रीष्म ऋतु ये उत्तर दिशा की ओर खिसक जाती हैं।

वायुदाब की पेटियाँ

धरातल पर वायुदाब का क्षैतिज वितरण मुख्य अक्षांश वृत्तों के साथ पट्टियों के रूप में पाया जाता है। इन्हीं को वायुदाब पेटियाँ कहा जाता है। 

संसार में पाई जाने वाली वायुदाब की आदर्श चार पेटियाँ हैं 

1. विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी: विषुवत वृत्त पर सूर्य की किरणें लगभग वर्षभर लम्बवत् पड़ती हैं। इस कारण विषुवतीय क्षेत्रों में वायु गर्म होकर ऊपर उठ जाती है, जिससे यहां निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है। इस वायुदाब की पेटी का विस्तार 10  उत्तरी और 10 दक्षिणी अक्षांश के बीच है। 

2. उपोष्ण उच्चदाब पेटी: उपोष्ण उच्च दाब पेटी का विस्तार दोनों गोलार्धों 23  से 35 अक्षाशों तक है। विषुवतीय क्षेत्रों से उपर उठी गर्म वायु पृथ्वी के घूर्णन से ध्रुवों की ओर बढ़ने लगती है। उपोष्ण क्षेत्र में आकर वह ठंडी और भारी हो जाती है, जिससे वह नीचे उतर कर इकट्ठी हो जाती है। परिणाम स्वरूप यहाँ उच्च वायुदाब क्षेत्र बन जाता है।

3. उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी: उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी का उत्तरी गोलार्ध्द में विस्तार 45 उत्तर अक्षांश से आर्कटिक वृत्त तक है और दक्षिणी गोलार्ध में 45 दक्षिण अक्षांश से एन्टार्कटिक वृत्त तक है। इन पेटियों में धु्रवों और उपोष्ण उच्च दाब क्षेत्रों में पवनें आकर मिलती हैं और ऊपर उठती हैं। इन आने वाली पवनों के तापमान और आर्द्रता में बहुत अन्तर होता है। इस कारण यहाँ चक्रवात या निम्न वायुदाब की दशायें बनती हैं। 

4. ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी : धु्रवीय क्षेत्रों में सूर्य की किरणे तिरछी पङती है इस कारण यहां सबसे कम तापमान पाये जाते हैं। निम्न तापमान होने के कारण वायु सिकुड़ती है और उसका घनत्व बढ़ जाता है, जिससे यहां उच्च वायुदाब का क्षेत्रा बनता है। इन पेटियों से पवनें उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटियों की ओर चलती हैं 

वास्तव में वायुदाब पेटियों की यह स्थिति स्थायी नहीं है। ये पेटियाँ जुलाई में उत्तर की ओर, और जनवरी में दक्षिण की ओर खिसकती रहती हैं। 

पवन

वायुमंडलीय दाब में भिन्नता के कारण वायु उच्च वायुदाब के क्षेत्र से निम्न वायुदाब के क्षेत्र की ओर चलती है। वायुदाब के अन्तर के कारण क्षैतिज रूप में चलने वाली वायु को पवन कहते हैं। जब वायु ऊर्ध्वाधर रूप में गतिमान होती है 

पवनों की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले बल

पृथ्वी के धरातल पर क्षैतिज पवनें तीन संयुक्त प्रभावों का परिणाम है: वायुदाब प्रवणता, घर्षण बल, तथा कोरिआलिस बल।

वायुदाब-प्रवणता 

किन्हीं दो स्थानों के बीच वायुदाब के अन्तर को दाब प्रवणता कहते हैं। यह प्रवणता क्षैतिज दिशा में होती है। किन्हीं दो स्थानों के बीच दाब प्रवणता अधिक होने पर पवनों की गति अधिक होती है, इसके विपरीत दाब प्रवणता कम होने पर पवनों की गति धीमी होती है।

घर्षण बल

धरातल की विषमताओं के कारण उत्पन्न यह बल पवन की गति के विपरित काम करता है । तथा पवन की गति और दिशा को प्रभावित करता है पृथ्वी तल से 500 मीटर तक की ऊँचाई पर धरातलीय विषमताओं (पहाड़, पठार, मैदान, महासागर आदि) के कारण घर्षण अत्यधिक होता है और पवन की गति काफी कम हो जाती है समुद्र सतह पर घर्षण न्यूनतम होता है।

कोरिऑलिस बल :-

पृथ्वी की घर्णून गति के कारण पवनें अपनी मूल दिशा से विक्षेपित हो जाती है इसे कोरिओलिस प्रभाव या कोरिओलिस बल कहा जाता है इस प्रभाव से पवनें उत्तरी गोलार्ध में अपनी मूल दिशा से दाहिने तरफ व दक्षिण गोलार्ध में बाईं तरफ विक्षेपित हो जाती हैं। इसे फैरल का नियम भी कहते हैं। विषुवत वृत्त पर कोरिओलिस बल नगण्य होता है, परन्तु ध्रुव की ओर जाने पर यह बढ़ता जाता है।

भूविक्षेपी पवन :-

पृथ्वी की सतह से 2-3 कि.मी की ऊँचाई पर उपरी वायुमंडल में पवनें धरातलीय घर्षण के प्रभाव से मुक्त होती हैं जब समदाब रेखाएँ सीधी हों और घर्षण का प्रभाव न हो, तो दाब प्रवणता बल कोरिऑलिस बल से संतुलित हो जाता है और फलस्वरूप पवनें समदाब रेखाओं के समानांतर चलती हैं। ये पवनें भूविक्षेपी पवने कहलाती हैं।

चक्रवाती परिसंचरण व  प्रतिचक्रवाती परिसंचरण :-

निम्न दाब क्षेत्र के चारों तरफ पवनों का परिक्रमण चक्रवाती परिसंचरण कहलाता है। तथा उच्च वायु दाब क्षेत्र के चारों तरफ पवनों का परिक्रमण प्रतिचक्रवाती परिसंचरण कहलाता है। 

वायुमंडल का सामान्य परिसंचरण 

वायुमंडलीय पवनों के प्रवाह प्रारूप को वायुमंडल का सामान्य परिसंचरण कहते है। यह वायुमंडलीय परिसंचरण महासागरीय जल को भी गतिमान करता है, जो पृथ्वी की जलवायु को प्रभावित करता है। उच्च सूर्यातप व निम्न वायुदाब होने से अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र में वायु संवहन धाराओं के रूप में उपर उठती है। उष्णकटिबंधों से आने वाली पवनें इस निम्न दाब क्षेत्र में अभिसरण करती हैं। अभिसरित वायु उपर उठती हैं। यह क्षोभमंडल के उपर 14 कि.मी. की ऊँचाई तक उपर चढ़ती है और फिर सहवनी धाराएं दो भागों में विभाजित होकर ध्रुवों की तरफ प्रवाहित होती हैं। उपोष्ण क्षेत्र में आकर यह वायु ठंडी और भारी हो जाती है, जिससे वह नीचे उतर कर इकट्ठी हो जाती है। परिणाम स्वरूप यहाँ उच्च वायुदाब क्षेत्र बन जाता है। यहां धरातल के निकट वायु का दो दिषाओं में अपसरण होता है  एक भूमध्य रेखा की तरफ तथा दूसरा ध्रुवों की तरफ। भूमध्य रेखा की ओर जाने वाली हवा भूमध्य रेखीय निम्न वायुदाब क्षेत्र में उपर उठती हवा की क्षतिपूर्ती करती हैं। और धू्रवों की और जाने वाली धरातलीय हवा उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी में उपर उठती हवा की क्षतिपूर्ति करती है ध्रुवीय अक्षाँशों पर ठंडी सघन वायु का ध्रुवों पर अवतलन होता है और मध्य अक्षांशों की ओर ध्रुवीय पवनों के रूप में प्रवाहित होती हैं। 

कोष्ठ

पृथ्वी की सतह से उपर की दिशा में होने वाले परिसंचरण और इसके विपरीत दिशा में होने वाले परिसंचरण को कोष्ठ कहते हैं 

उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में ऐसे कोष्ठ को हेडले कोष्ठ या फैरल कोष्ठ तथा ध्रुवों पर इस कोष्ठ को ध्रुवीय कोष्ठ कहा जाता है। 

स्थानीय पवनें 

जो हवाएँ किसी स्थान विशेष के तापमान और वायुदाब में अन्तर के कारण चलती हैं, उन्हें स्थानीय पवनें कहते हैं।

स्थल व समुद्र समीर

स्थल और जल भाग के अलग-अलग ठंडा और गर्म होने के कारण दिन में स्थल भाग समुद्र या झील की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाता है। अतः स्थल भाग के ऊपर की वायु फैलती है और ऊपर उठती है। इस कारण स्थल भाग पर स्थानीय निम्न वायुदाब विकसित हो जाता है और इसके विपरीत समुद्र या झील की सतह पर उच्च वायुदाब होता है। वायुदाबों में अन्तर होने के कारण समुद्र से स्थल की ओर वायु चलती है। इसे समुद्र-समीर कहते हैं। 

रात के समय स्थल भाग शीघ्र ठंडा हो जाता है इसके परिणामस्वरूप स्थल भाग पर उच्च वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है और समुद्री-भाग पर अपेक्षाकृत निम्न वायुदाब, अतः पवनें स्थल-भाग से समुद्र की ओर चला करती है। ऐसी पवनों को स्थल-समीर कहते हैं 

घाटी एवं पर्वतीय समीर: 

दिन के समय पर्वतीय ढाल घाटीतल की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाते हैं। इससे ढालों पर वायु दाब कम और घाटी तल पर वायुदाब अधिक होता है। अतः दिन के समय घाटी तल से वायु मन्द गति से पर्वतीय ढालों की ओर चला करती है। इसे घाटी-समीर कहते हैं

रात्रि के समय पर्वतीय ढालों पर विकिरण द्वारा ताप ह्मास अधिक होता है। और पर्वतीय ढाल ठंडे हो जाते है इससे पर्वतीय ढालों पर उच्च दाब और घाटी-तल में निम्न दाब बन जाता है। ऐसी परिस्थिति में पर्वतीय ढालों की ऊँचाईयों से ठण्डी और भारी हवा नीचे घाटी की ओर उतरने लगती है। इसे पर्वत-समीर कहते हैं।

वायुराशियाँ 

जब वायु बहुत बड़े और लगभग एक समान स्थलीय भाग या महासागरीय तल पर बहुत लम्बे समय तक स्थिर रहती है, तो यह उस क्षेत्र के गुणों को धारण कर लेती है।  तापमान तथा आर्द्रता संबंधी विशिष्ट गुणों वाली यह वायु, वायुराशि कहलाती है। 

अर्थात वायु का वृहत् भाग जिसमें तापमान व आर्द्रता संबंधी क्षैतिज भिन्नताएँ बहुत कम पाई जाती हैं। वायुराशि कहलाती है।

वायु-राशियों के प्रमुख स्रोत  समान दशाओं वाले उच्च अक्षांशों के ध्रुवीय प्रदेश या निम्न अक्षांशों के उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र होते हैं। अतः वायु-राशियाँ दो प्रकार की होती

हैं- ध्रुवीय वायु-राशि और उष्ण कटिबंधीय वायु-राशि। 

वह समांग धरातल जिन पर वायुराशियाँ बनती हैं उन्हें वायुराशियों का उद्गम क्षेत्र कहा जाता है। वायुराशियों को उनके उद्गम क्षेत्र के आधार पर वर्गीवृफत किया जाता है। इनके प्रमुख पाँच उद्गम क्षेत्र हैं। जो इस प्रकार हैं: 

1. उष्णकटिबंधीय महासागरीय क्षेत्र 

2. उष्ण कटिबंधीय महाद्वीपीय क्षेत्र

3. ध्रुवीय महासागीय क्षेत्र

4. ध्रुवीय महाद्वीपीय क्षेत्र

5. महाद्वीपीय आर्कटिक क्षेत्र

इसी के आधार पर निम्न प्रकार की वायुराशियाँ पायी जाती हैं-

1. उष्णकटिबंधीय महासागरीय वायुराशियां

2. उष्ण कटिबंधीय महाद्वीपीय वायुराशियां

3. ध्रुवीय महासागीय वायुराशियां

4. ध्रुवीय महाद्वीपीय वायुराशियां

5. महाद्वीपीय आर्कटिक वायुराशियां

वाताग्र :

जब दो विपरीत स्वभाव वाली वायु (ठण्डी व गर्म) आकार मिलती है तो वे तापमान एवं आर्द्रता संबंधी अपनी पहचान बनाये रखने की लगातार कोशिश करती है। इस प्रक्रिया में इनके बीच में एक ढलुआ सीमा का विकास हो जाता है। इसे वाताग्र कहते हैं। 

वाताग्रों के बनने की प्रक्रिया को वाताग्र-जनन कहते हैं। वाताग्र चार प्रकार के होते हैं 

शीत वाताग्र- ठंडी वायु-राशि द्वारा गर्म वायु-राशि को ऊपर उठा देने पर जो वाताग्र बनता है वह शीत वाताग्र कहलाता है।

उष्ण वाताग्र-  जब गर्म वायु-राशि ठंडी वायु-राशि के ऊपर चढ़ती है तो इससे बने वाताग्र

को उष्ण वाताग्र कहते हैं। 

अचर वाताग्र - दो विपरीत वायुराशियों के समानान्तर रूप में अलग होने एवं वायु की लम्बवत् गति के अभाव में बने वाताग्र को स्थायी वाताग्र कहते हैं।

अधिविष्ट वाताग्र शीत वाताग्र के गर्म वाताग्र से मिलने एवं गर्म वायु का नीचे धरातल से सम्पर्क खत्म होने से उत्पन्न होने वाला वाताग्र अधिविष्ट वाताग्र कहलाता है। 

चक्रवात: -

चक्रवात निम्न वायुदाब के केन्द्र होते है जिसके चारों ओर बाहर की ओर वायुदाब क्रमशः बढ़ता जाता है, जिससे सभी दिशाओं से हवाएँ अन्दर केन्द्र की तरफ प्रवाहित होने लगती है। उत्तरी गोलार्ध में चक्रवात के भीतर पवनें घड़ी की सुइयों के घूमने की वपरीत दिशा में चलती हैं और दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों के हैं

शीतोष्ण कटिबंधीय /बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात 

वे चक्रवातीय वायु प्रणालियाँ, जो उष्ण कटिबंध से दूर, मध्य व उच्च अक्षांशों में विकसित होती हैं, उन्हें बहिरूष्ण या शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात कहते हैं। मध्य तथा उच्च अक्षांशों में जिस क्षेत्र से ये गुजरते हैं, वहाँ मौसम संबंधी अवस्थाओं में अचानक तेजी से बदलाव आते हैं। ये चक्रवात पश्चिम से पूर्व दिशा में चलते हैं। शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों का विस्तार बहुत अधिक होता है। बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात ध्रुवीय वाताग्र के साथ-साथ बनते हैं। आरम्भ में वाताग्र अचर होता है। उत्तरी गोलार्ध में वाताग्र के दक्षिण में कोष्ण व उत्तर दिशा से ठंडी हवा प्रवाहित होती है। जब वाताग्र के साथ वायुदाब कम हो जाता है, कोष्ण वायु उत्तर दिशा की ओर तथा ठंडी वायु दक्षिण दिशा में घड़ी की सुइयों के विपरीत चक्रवातीय परिसंचरण करती है। इस चक्रवातीय प्रवाह से बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात विकसित होता है जिसमें एक उष्णवाताग्र तथा एक शीत वाताग्र होता है। कोष्ण वायु आक्रामक रूप में ठंडी वायु के उपर चढ़ती है  पीछे से आता शीत वाताग्र उष्ण वायु को उपर धकेलता है शीत वाताग्र उष्ण वाताग्र की अपेक्षा तीव्रगति से चलते हैं और अंततः उष्ण वाताग्रों को पूरी तरह ढक लेते हैं। यह कोष्ण वायु उपर उठती हैं और इस का भूतल से कोई संपर्वफ नहीं रहता तथा अधिविष्ट वाताग्र बनता है एवं चक्रवात धीरे-धीरे क्षीण हो जाता है

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आक्रामक तूफान हैं जिनकी उत्पत्ति उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के महासागरों पर होती है और ये तटीय क्षेत्रों की तरफ गतिमान होते हैं। ये चक्रवात आक्रामक पवनों के कारण विस्तृत विनाश, अत्यधिक वर्षा और तूफान लाते हैं। ये चक्रवात विध्वंसक प्राकृतिक आपदाओं में से एक हैं। हिंद महासागर में ये ‘चक्रवात’ अटलांटिक महासागर में ‘हरीकेन’ के नाम से, पश्चिम प्रशांत और दक्षिण चीन सागर में ‘टाइफून’ और पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ‘विली-विलीज’ के नाम से जाने जाते हैं।उष्ण कटिबंधीय चक्रवात, उष्ण कटिबंधीय महासागरों में उत्पन्न व विकसित होते हैं। इनकी उत्पत्ति व विकास के लिए बृहत् समुद्री सतह, कोरिऑलिस बल का होना, उर्ध्वाधर पवनों की गति में अंतर कम होना तथा कमजोर निम्न वायु दाब क्षेत्र का होना अनुकुल स्थितियाँ हैं  समुद्रों से लगातार आर्द्रता की आपूर्ति से ये तूफान अधिक प्रबल होते हैं। स्थल पर पहुँचकर आर्द्रता की आपूर्ति रुक जाती है और ये क्षीण होकर समाप्त हो जाते हैं। वह स्थान जहाँ से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात तट को पार करके जमीन पर पहुँचते हैं चक्रवात का लैंडफाल कहलाता है। वे चक्रवात जो प्रायः 20°उत्तरी अक्षांश से गुजरते हैं, उनकी दिशा अनिश्चित होती है और ये अधिक विध्वंसक होते हैं। एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की विशेषता इसके केंद्र के चारो तरफ प्रबल सर्पिल पवनों का परिसंचरण है, जिसे इसकी आँख कहा जाता है। ये चक्रवात तूफान तरंग उत्पन्न करते हैं और तटीय निम्न इलाकों को जल प्लावित कर देते हैं। ये तूपफान स्थल पर धीरे-धीरे क्षीण होकर खत्म हो जाते हैं।

बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात व उष्णकटिबंधीय चक्रवातों में अन्तर 

1. बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवातों में स्पष्ट वाताग्र प्रणालियाँ होती हैं, जबकि उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों में स्पष्ट वाताग्र प्रणालियाँ नहीं होती है 

2. बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात विस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करते  हैं जबकि उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कम क्षेत्र को प्रभावित करते है 

3. बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति जल व स्थल दोनों पर होती है, जबकि उष्ण कटिबंधीय चक्रवात केवल समुद्रों में उत्पन्न होते हैं और स्थलीयभागों में पहुँचने पर नष्ट हो जाते हैं। 

4. बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात पश्चिमसे पूर्व दिशा में चलते हैं। जबकि उष्ण कटिबंधीय चक्रवात पूर्व से पश्चिम में चलते हैं

तड़ित झंझा व टोरनेडो 

तड़ितझंझा उष्ण आर्द्र दिनों में प्रबल संवहन के कारण उत्पन्न होते हैं। ये अल्प समय के लिए रहते हैं, अपेक्षाकृत कम क्षेत्रफल तक सीमित होते हैं, परंतु आक्रामक होते हैं। तड़ितझंझा एक पूर्ण विकसित कपासी मेघ है जो गरज व बिजली उत्पन्न करते हैं। उष्ण आर्द्र दिनों में अधिक तापमान के कारण उष्ण वायु प्रबलता के साथ उपर उठती है इस वायु में उपस्थित जलवाष्प के कारण बादलों का आकार बढ़ता है और ये बादल अधिक उँचाई तक चले जाते हैं अधिक उंचाई पर तापमान कम होने के कारण ओले बनने लगते हैं और ओलावृष्टि होती है। आर्द्रता कम होने पर ये तड़ितझंझा धूल भरी आंधियाँ लाते हैं।

भयानक तड़ितझंझा से कभी-कभी वायु आक्रामक रूप में हाथी की सूंड की तरह सर्पिल अवरोहण करती है। इसमें केंद्र पर अत्यंत कम वायुदाब होता है और यह व्यापक रूप से भयंकर विनाशकारी होती हैं। इस परिघटना को ‘टोरनेडो’ कहते हैं। टोरनेडो सामान्यतः मध्य अक्षांशों में उत्पन्न होते हैं। समुद्र पर टोरनेडो को जलस्तंभ कहते हैं।



  1. यदि धरातल पर वायुदाब 1,000 मिलिबार तो धरातल से 1 कि.मी. की ऊँचाई पर वायुदाब कितना होगा?
    (क) 700 मिलीबार                         (ख) 900 मिलीबार
    (ग) 1,100 मिलीबार                        (घ) 1,300 मिलीबार                    (ख)
  2. अंतर उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र प्रायः कहाँ होता है?
    (क) विषुवत् वृत्त के निकट                 (ख) कर्क रेखा के निकट
    (ग) मकर रेखा के निकट                  (घ) आर्कटिक वृत्त के निकट             (क)
  3. उत्तरी गोलार्ध में निम्नवायुदाब के चारों तरफ पवनों की दिशा क्या होगी?
    (क) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के अनुरूप
    (ख) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत
    (ग) समदाब रेखाओं के समकोण पर
    (घ) समदाब रेखाओं के समानांतर                                                  (ख)
  4. वायुराशियों के निर्माण के उद्गम क्षेत्र निम्नलिखित में से कौन-सा है
    (क) विषुवतीय वन                          (ख) साइबेरिया का मैदानी भाग
    (ग) हिमालय पर्वत                          (घ) दक्कन पठार                      (ख)
  5. वायुदाब मापने की इकाई क्या है? मौसम मानचित्र बनाते समय किसी स्थान के वायुदाब को समुद्र तल तक क्यों घटाया जाता है?
    वायुदाब को मापने की इकाई मिलीबार है| दाब पर ऊँचाई के प्रभाव को दूर करने तथा तुलनात्मक बनाने के लिए, मौसम मानचित्र बनाते समय किसी स्थान के वायुदाब को समुद्र तल तक घटाया जाता है |
  6. जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ हो अर्थात् उपोष्ण उच्च दाब से विषुवत वृत्त की ओर हो तो उत्तरी गोलार्ध में उष्णकटिबंधीय में पवनें उत्तरी पूर्वी क्यों होती हैं?
    पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण पवनें दाब प्रवणता की दिशा में नहीं बहकर अपनी मूल दिशा से विक्षेपित हो जाती है पृथ्वी के घूर्णन के द्वारा लगने वाला यह बल कोरिऑलिस बल कहलाता है। इसके द्वारा पवनें उत्तरी गोलार्ध में अपनी मूल दिशा से दाहिने तरफ (उत्तरी पूर्वी) व दक्षिणी गोलार्ध में अपने बाई तरफ (दक्षिणी पूर्वी) विक्षेपित हो जाती हैं। कोरिऑलिस प्रभाव दाब प्रवणता के समकोण पर कार्य करता है। दाब प्रवणता बल समदाब रेखाओं के समकोण पर होता है। दाब प्रवणता जितनी अधिक होगी, पवनों का वेग उतना ही ज़्यादा होगा और पवनों की दिशा उतनी ही ज़्यादा विक्षेपित होगी। इसलिए जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ हो अर्थात उपोष्ण उच्चदाब से विषुवत वृत की ओर ही तो उत्तरी गोलार्ध में उष्णकटिबंध में पवनें उत्तर-पूर्व होती हैं।
  7. भूविक्षेपी पवनें क्या हैं?
    पृथ्वी की सतह से 2-3 कि.मी की ऊँचाई पर उपरी वायुमंडल में पवनें धरातलीय घर्षण के प्रभाव से मुक्त होती हैं जब समदाब रेखाएँ सीधी हों और घर्षण का प्रभाव न हो, तो दाब प्रवणता बल कोरिऑलिस बल से संतुलित हो जाता है और फलस्वरूप पवनें समदाब रेखाओं के समानांतर चलती हैं। ये पवनें भूविक्षेपी पवने कहलाती हैं।
  8. समुद्र व स्थल समीर का वर्णन करें|
    स्थल और जल भाग के अलग-अलग ठंडा और गर्म होने के कारण दिन में स्थल भाग की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाता है। अतः स्थल भाग के ऊपर की वायु फैलती है और ऊपर उठती है। इस कारण स्थल भाग पर स्थानीय निम्न वायुदाब विकसित हो जाता है और इसके विपरीत समुद्र अपेक्षाकृत ठंडे रहते हैं अतः समुद्र की सतह पर उच्च वायुदाब होता है। वायुदाबों में अन्तर होने के कारण समुद्र से स्थल की ओर वायु चलती है। इसे समुद्र-समीर कहते हैं।रात के समय स्थल भाग शीघ्र ठंडा हो जाता है इसके परिणामस्वरूप स्थल भाग पर उच्च वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है और समुद्री-भाग पर अपेक्षाकृत निम्न वायुदाब पाया जाता है अतः पवनें स्थल-भाग से समुद्र की ओर चला करती है। ऐसी पवनों को स्थल-समीर कहते हैं
  9. पवनों की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारक बताएँ?
    वायुमंडलीय दाब भिन्नता के कारण उत्पन्न बल उत्पन्न दाब प्रवणता बल , भूतल पर धरातलीय विषमताओं के कारण घर्षण बल व पृथ्वी के घूर्णन द्वारा लगने वाले कोरिऑलिस बल पवनों की दिशा व वेग को प्रभावित करते है
    दाब-प्रवणता बल - किन्हीं दो स्थानों के बीच वायुदाब के अन्तर को दाब प्रवणता कहते हैं। किन्हीं दो स्थानों के बीच दाब प्रवणता अधिक होने पर पवनों की गति अधिक होती है, इसके विपरीत दाब प्रवणता कम होने पर पवनों की गति धीमी होती है।
    घर्षण बल- धरातल की विषमताओं के कारण उत्पन्न यह बल पवन की गति के विपरित काम करता है । तथा पवन की गति और दिशा को प्रभावित करता है पृथ्वी तल से 500 मीटर तक की ऊँचाई पर धरातलीय विषमताओं (पहाड़, पठार, मैदान, महासागर आदि) के कारण घर्षण अत्यधिक होता है और पवन की गति काफी कम हो जाती है समुद्र सतह पर घर्षण न्यूनतम होता है।
    कोरिऑलिस बल- पृथ्वी की घर्णून गति के कारण पवनें अपनी मलू दिशा से विक्षेपित हो जाती है इसे कोरिओलिस प्रभाव या कोरिओलिस बल कहा जाता है इस प्रभाव से पवनें उत्तरी गोलार्ध में अपनी मूल दिशा से दाहिनी तरफ व दक्षिणी गोलार्ध में अपने बाई तरफ विक्षेपित हो जाती हैं।
  10. पृथ्वी पर वायुमंडलीय सामान्य परिसंचरण का वर्णन करते हुए चित्र बनाएँ| 30° उत्तरी व दक्षिण अक्षांशों पर उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब के संभव कारण बताएँ|
    वायुमंडलीय सामान्य परिसंचरण महासागरीय जल को भी गतिमान करता है, जो पृथ्वी की जलवायु को प्रभावित करता है| उच्च सूर्यातप व निम्न वायुदाब होने से अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) पर वायु संवहन धाराओं के रूप में ऊपर उठती है| उष्णकटिबंधों से आने वाली पवनें इस निम्न दाब क्षेत्र में अभिसरण करती हैं| अभिसारित वायु संवहन कोष्ठों के साथ ऊपर उठती हैं| यह क्षोभमंडल के ऊपर 14 कि.मी. की ऊँचाई तक ऊपर चढ़ती है और फिर ध्रुवों की तरफ प्रवाहित होती हैं| लगभग 30° उत्तर व 30° दक्षिण अक्षांश पर यह वायु ठंडी और भारी हो जाती है, जिससे वह नीचे उतर कर इकट्ठी हो जाती है। परिणाम स्वरूप यहाँ उच्च वायुदाब क्षेत्र बन जाता है। यहां धरातल के निकट वायु का दो दिशाओं में अपसरण होता है एक भूमध्य रेखा की तरफ तथा दूसरा ध्रुवों की तरफ। भूमध्य रेखा की ओर जाने वाली हवा भूमध्य रेखीय निम्न वायुदाब क्षेत्र में ऊपर उठती हवा की क्षतिपूर्ती करती हैं। और ध्रुवों की और जाने वाली धरातलीय हवा उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी में ऊपर उठती हवा की क्षतिपूर्ति करती है ध्रुवीय अक्षाँशों पर ठंडी सघन वायु का ध्रुवों पर अवतलन होता है और मध्य अक्षांशों की ओर ध्रुवीय पवनों के रूप में प्रवाहित होती हैं।
    30° उत्तरी व दक्षिण अक्षांशों पर उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब के कारण
    1. अभिसरण- उच्च सूर्यातप व निम्न वायुदाब होने से अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) पर वायु संवहन धाराओं के रूप में ऊपर उठती है| उष्णकटिबंधों से आने वाली पवनें इस निम्न दाब क्षेत्र में अभिसरण करती हैं| अभिसारित वायु संवहन कोष्ठों के साथ ऊपर उठती हैं| यह क्षोभमंडल के ऊपर 14 कि.मी. की ऊँचाई तक ऊपर चढ़ती है और फिर ध्रुवों की तरफ प्रवाहित होती हैं| इसके परिणामस्वरूप लगभग 30° उत्तर व 30° दक्षिण अक्षांश पर वायु एकत्रित हो जाती है|
    2. अवतलन- 30° उत्तर व 30° दक्षिण अक्षांश पर एकत्रित वायु ठंडी और भारी हो जाती है, जिससे वायु का अवतलन होता है| परिणाम स्वरूप यहाँ उच्च वायुदाब क्षेत्र बन जाता है। यहां धरातल के निकट वायु का दो दिशाओं में अपसरण होता है
  11. उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति केवल समुद्रों पर ही क्यों होती है ? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के किस भाग में मूसलाधार वर्षा होती है और उच्च वेग की पवनें चलती हैं और क्यों?
    उष्ण कटिबंधीय चक्रवात, उष्ण कटिबंधीय महासागरों में उत्पन्न व विकसित होते हैं| क्योंकि इनकी उत्पत्ति व विकास के लिए अनुकूल दशाएं समुद्री सतह पर सबसे ज्यादा प्रभावी होती हैइनकी उत्पत्ति व विकास के लिए अनुकूल स्थितियाँ हैं
    (i) वृहत् समुद्री सतह 
    (ii) कोरिऑलिस बल का होना
    (iii) ऊर्ध्वाधर पवनों की गति में अंतर कम होना
    (iv) कमजोर निम्न दाब क्षेत्र या निम्न स्तर का चक्र्वातीय परिसंचरण का होना
    (v) समुद्री तल तंत्र पर ऊपरी अपसरण
    एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के चारो तरफ प्रबल सर्पिल पवनें चलती है जिसे इसकी आँख कहा जाता है। इसका केन्द्रीय (अक्षु) क्षेत्र शांत होता है, जहाँ पवनों का अवतलन होता है| अक्षु के चारों तरफ अक्षुभित्ति होती है जहाँ वायु का प्रबल व वृत्ताकार रूप में आरोहण होता है; यह आरोहण क्षोभसीमा की ऊँचाई तक पहुँचता है| इसी क्षेत्र में पवनों का वेग अधिकतम होता है चव्रफवात की आँख से रेनबैंड विकरित होते हैं तथा कपासी वर्षा बादलों की पंक्तियाँ बाहरी क्षेत्र की ओर विस्थापित हो जाती हैं। जिससे इन चक्रवातों से तटीय निम्न इलाकों में मूसलाधार वर्षा होती है।


  1. समुद्र तल पर औसत वायुमंडलीय दाब कितना होता है ?
    समुद्र तल पर औसत वायुमंडलीय दाब 1013.25 मिलीबार के बराबर होता है। 
  2. वायुमंडलीय दाब को किस यंत्र  से मापा जाता है ?
    वायुमंडलीय दाब को पारद वायुदाबमापी अथवा निर्द्रव वायुदाब मापी (बेरोमीटर) से मापा जाता है।
  3. समदाब रेखाएँ किसे कहते हैं ?  
    समुद्र तल से समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाएं समदाब रेखाएँ कहलाती हैं। 
  4. वायुदाब या वायुमंडलीय दब से क्या अभिप्राय है ?
    पृथ्वी की सतह के एकांक क्षेत्रफल पर उसके उपर के वायु स्तम्भ के भार द्वारा डाला गया दाब वायुदाब या वायुमंडलीय दाब कहलाता हैं। 
  5. चक्रवाती परिसंचरण व  प्रतिचक्रवाती परिसंचरण में अंतर लिखिए । 
    निम्न दाब क्षेत्र के चारों तरफ पवनों का परिक्रमण चक्रवाती परिसंचरण कहलाता है। तथा उच्च वायु दाब क्षेत्र के चारों तरफ पवनों का परिक्रमण प्रतिचक्रवाती परिसंचरण कहलाता है।
  6. चक्रवात से आप क्या समझते हैं? 
    चक्रवात निम्न वायुदाब के केन्द्र होते है जिसके चारों ओर बाहर की ओर वायुदाब क्रमशः बढ़ता जाता है, जिससे सभी दिशाओं से हवाएँ अन्दर केन्द्र की तरफ प्रवाहित होने लगती है। उत्तरी गोलार्ध में चक्रवात के भीतर पवनें घड़ी की सुइयों के घूमने की वपरीत दिशा में चलती हैं और दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों के हैं
  7. दाब प्रवणता क्या है?
    किन्हीं दो स्थानों के बीच वायुदाब के अन्तर को दाब प्रवणता कहते हैं। यह प्रवणता क्षैतिज दिशा में होती है। किन्हीं दो स्थानों के बीच दाब प्रवणता अधिक होने पर पवनों की गति अधिक होती है, इसके विपरीत दाब प्रवणता कम होने पर पवनों की गति धीमी होती है।
  8. कोरिऑलिस बल क्या है ? इसके खोजकर्ता का नाम बताइए।
    पृथ्वी की घर्णून गति के कारण पवनें अपनी मूल दिशा से विक्षेपित हो जाती है इसे कोरिओलिस प्रभाव या कोरिओलिस बल कहा जाता है  इसकी खोज फ्रांसीसी वैज्ञानिक कोरिऑलिस द्वारा की गई थी। अत: उन्हीं के नाम पर इसका कोरिऑलिस बल  नाम पड़ा है।
  9. फैरल का नियम क्या है ?
    कोरिओलिस बल के प्रभाव से पवनें उत्तरी गोलार्ध में अपनी मूल दिशा से दाहिने तरफ व दक्षिण गोलार्ध में बाईं तरफ विक्षेपित हो जाती हैं। इसे फैरल का नियम भी कहते हैं।
  10. डोलडम से क्या अभिप्राय है ?
    डोलड्रम विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी है जो भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5° अक्षांशों में मध्य स्थित है। इस पेटी में वायु शान्त रहती है।
  11. उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों को विश्व के अलग-अलग क्षेत्रो में किस नाम से जाना जाता है ? 
    उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों को  हिंद महासागर में ये ‘चक्रवात’ अटलांटिक महासागर में ‘हरीकेन’ के नाम से, पश्चिम प्रशांत और दक्षिण चीन सागर में ‘टाइफून’ और पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ‘विली-विलीज’ के नाम से जाने जाते हैं।
  12. वाताग्र किसे कहते है ? ये कितने प्रकार के होते है समझाइए । 
    जब दो विपरीत स्वभाव वाली वायु (ठण्डी व गर्म) आकार मिलती है तो वे तापमान एवं आर्द्रता संबंधी अपनी पहचान बनाये रखने की लगातार कोशिश करती है। इस प्रक्रिया में इनके बीच में एक ढलुआ सीमा का विकास हो जाता है। इसे वाताग्र कहते हैं। वाताग्र चार प्रकार के होते हैं 
    1. शीत वाताग्र - ठंडी वायु-राशि द्वारा गर्म वायु-राशि को ऊपर उठा देने पर जो वाताग्र बनता है वह शीत वाताग्र कहलाता है।
    2. उष्ण वाताग्र जब गर्म वायु-राशि ठंडी वायु-राशि के ऊपर चढ़ती है तो इससे बने वाताग्र
    को उष्ण वाताग्र कहते हैं। 
    3. अचर वाताग्र दो विपरीत वायुराशियों के समानान्तर रूप में अलग होने एवं वायु की लम्बवत् गति के अभाव में बने वाताग्र को स्थायी वाताग्र कहते हैं।
    4. अधिविष्ट वाताग्र शीत वाताग्र के गर्म वाताग्र से मिलने एवं गर्म वायु का नीचे धरातल से सम्पर्क खत्म होने से उत्पन्न होने वाला वाताग्र अधिविष्ट वाताग्र कहलाता है। 
  13. . वायुराशियों से क्या अभिप्राय है? उद्गम क्षेत्र के आधार पर इनको वर्गीकृत कीजिए।
    जब वायु बहुत बड़े और लगभग एक समान स्थलीय भाग या महासागरीय तल पर बहुत लम्बे समय तक स्थिर रहती है, तो यह उस क्षेत्र के गुणों को धारण कर लेती है।  तापमान तथा आर्द्रता संबंधी विशिष्ट गुणों वाली यह वायु, वायुराशि कहलाती है। 
    अर्थात वायु का वृहत् भाग जिसमें तापमान व आर्द्रता संबंधी क्षैतिज भिन्नताएँ बहुत कम पाई जाती हैं। वायुराशि कहलाती है। वायुराशियों का उद्गम क्षेत्र कहा जाता है। वायुराशियों के प्रमुख पाँच उद्गम क्षेत्र हैं।  
    1. उष्णकटिबंधीय महासागरीय क्षेत्र 
    2. उष्ण कटिबंधीय महाद्वीपीय क्षेत्र
    3. ध्रुवीय महासागीय क्षेत्र
    4. ध्रुवीय महाद्वीपीय क्षेत्र
    5. महाद्वीपीय आर्कटिक क्षेत्र
  14. घाटी एवं पर्वतीय समीर में अंतर लिखिए । 
    दिन के समय पर्वतीय ढाल घाटीतल की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाते हैं। इससे ढालों पर वायु दाब कम और घाटी तल पर वायुदाब अधिक होता है। अतः दिन के समय घाटी तल से वायु मन्द गति से पर्वतीय ढालों की ओर चला करती है। इसे घाटी-समीर कहते हैं
    रात्रि के समय पर्वतीय ढालों पर विकिरण द्वारा ताप ह्मास अधिक होता है। और पर्वतीय ढाल ठंडे हो जाते है इससे पर्वतीय ढालों पर उच्च दाब और घाटी-तल में निम्न दाब बन जाता है। ऐसी परिस्थिति में पर्वतीय ढालों की ऊँचाईयों से ठण्डी और भारी हवा नीचे घाटी की ओर उतरने लगती है। इसे पर्वत-समीर कहते हैं।
  15. बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात व उष्णकटिबंधीय चक्रवातों में अन्तर  लिखिए । 
    1. बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवातों में स्पष्ट वाताग्र प्रणालियाँ होती हैं, जबकि उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों में स्पष्ट वाताग्र प्रणालियाँ नहीं होती है 
    2. बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात विस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करते  हैं जबकि उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कम क्षेत्र को प्रभावित करते है 
    3. बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति जल व स्थल दोनों पर होती है, जबकि उष्ण कटिबंधीय चक्रवात केवल समुद्रों में उत्पन्न होते हैं और स्थलीयभागों में पहुँचने पर नष्ट हो जाते हैं। 
    4. बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात पश्चिमसे पूर्व दिशा में चलते हैं। जबकि उष्ण कटिबंधीय चक्रवात पूर्व से पश्चिम में चलते हैं


8.सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

      सूर्यातप -सूर्य से पृथ्वी तक पहुंचने वाले सौर विकिरण को सूर्यातप कहते हैं। यह ऊर्जा लघु तरंगों के रुप में सूर्य से पृथ्वी पर है
      पृथ्वी की गोलाभ आकृति के कारण सूर्य की किरणें धरातल पर सर्वत्र समान कोण पर नहीं पड़ती हैं। सूर्य की किरणें धरातल पर तिरछी पड़ने के कारण पृथ्वी सौर ऊर्जा के बहुत कम अंश को ही प्राप्त कर पाती है। पृथ्वी औसत रूप से वायुमंडल की ऊपरी सतह पर 1.94 केलोरी/प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रति मिनट ऊर्जा प्राप्त करती है।
      अपसौर -
      पृथ्वी की कक्षा में वह स्थिति जब पृथ्वी और सूर्य के बीच सर्वाधिक दूरी होती है उसे अपसौर की स्थिति कहते है। यह स्थिति 4 जुलाई को बनती है और इस स्थिति में पृथ्वी व सूर्य के मध्य की दूरी 15.2 करोड़ किलोमीटर होती है
      उपसौर -
      पृथ्वी की कक्षा में वह स्थान जहाँ सूर्य तथा पृथ्वी के बीच सबसे कम दूरी होती है उसे उपसौर की स्थिति कहते है। उपसौर की स्थिति 3 जनवरी को बनती है। उपसैेर के दौरान सूर्य और पृथ्वी के बीच 14.7 करोड़ किलोमीटर की दूरी होती है।
      सूर्यातप को प्रभावित करने वाले कारक
      1.सूर्य की किरणों का आपतन कोण- पृथ्वी के गोलाकार होने के कारण सूर्य की किरणें इसके तल के साथ विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग कोण बनाती है। पृथ्वी के किसी बिन्दु पर सूर्य की किरण और पृथ्वी के वृत्त की स्पर्श रेखा के बीच बनने वाले कोण को आपतन-कोण कहते हैं। सौर विकिरण का आपतन कोण किसी स्थान के अक्षांश पर निर्भर करता है। अक्षांश जितना उच्च होगा किरणों का आपतन कोण उतना ही कम होगा। आपतन कोण सूर्याताप को दो प्रकार से प्रभावित करता है। प्रथम जब सूर्य की स्थिति ठीक सिर के ऊपर होती है, उस समय सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती हैं। और आपतन कोण बड़ा होने के कारण सूर्य की किरणें छोटे से क्षेत्र पर पङती हैं, जिससे वहाँ अधिक ऊष्मा (सूर्यातप) प्राप्त होती है। इसके विपरीत यदि सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं तो आपतन कोण छोटा होता है। इससे सूर्य की किरणें बड़े क्षेत्रा पर फैल जाती हैं और उनसे वहाँ कम ऊष्मा (सूर्यातप) प्राप्त होती है। दूसरा दूसरे, तिरछी किरणों को सीधी किरणों (लम्बवत्-किरणों) की अपेक्षा वायुमंडल में अधिक दूरी पार करके धरातल पर आना पड़ता है। सूर्य की किरणें जितना अधिक लम्बा मार्ग पार करेंगी उतनी ही अधिक उनकी ऊष्मा वायुमंडल द्वारा सोख ली जाएगी या परावर्तित कर दी जायेगी। इसी कारण एक स्थान पर तिरछी किरणों से लम्बवत् किरणों की अपेक्षा कम सूर्यातप प्राप्त होता है। आपतन कोण उच्च अक्षांशों अर्थात् ध्रुवों पर कम होता है तथा निम्न अक्षांशों अर्थात् भूमध्य रेखा पर अधिक होता है। यही कारण है कि भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों पर तापमान कम होता जाता है। ध्रुवों पर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने से वह अधिक क्षेत्र पर फैलती हैं अतः इन किरणों से कम ताप की प्राप्ति होती है जबकि भूमध्यरेखा पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। अतः ये किरणें अधिक तापमान प्रदान करती है।
      2.दिन की अवधि: दिन की अवधि स्थान-स्थान और ऋतुओं के अनुसार बदलती रहती है। पृथ्वी की सतह पर मिलने वाली सूर्यातप की मात्रा का दिन की अवधि से सीधा संबंध है। दिन की अवधि जितनी लम्बी होगी सूर्यातप की मात्रा उतनी ही अधिक मिलेगी। इसके विपरीत दिन की अवधि छोटी होने पर सूर्यातप कम मिलेगा।
      3. वायुमंडल की पारदर्शकता: पृथ्वी की सतह पर पहुँचने से पहले सूर्य की किरणें वायुमंडल से होकर गुजरती हैं। वायुमंडल की पारदर्शिता मेघों की उपस्थिति एवं उनकी मोटाई, जल-वाष्प, धूल-कणों आदि पर निर्भर करती है। इनके द्वारा सौर विकिरणों का परावर्तन, अवशोषण अथवा प्रकीर्णन होता है। 4. घने बादल
      सूर्यातप को धरातल पर पहुँचने में बाधा डालते हैं; जबकि बादलों रहित साफ आकाश धरातल पर सूर्यातप पहुँचने में बाधा नहीं डालता। इस कारण साफ आकाश की अपेक्षा बादलों से घिरे आकाश के समय सूर्यातप कम मिलता है। जलवाष्प सौर विकिरण को अवशोषित कर लेते हैं, परिणामस्वरूप धरातल तक सौर विकिरण की थोड़ी मात्रा ही पहुँच पाती है।
      5. धरातलीय विषमता- सामान्य रूप से किसी स्थान के तापमान पर धरातल के ढाल तथा उसकी प्रकृति का प्रभाव पड़ता है। हिमाच्छादित प्रदेशों में सूर्यातप के परावर्तन के कारण तापमान कम हो जाता है। मरुस्थलीय भागों में बलुई मिट्टी के द्वारा ताप का अधिक अवशोषण करने के फलस्वरूप तापमान में एकाएक वृद्धि हो जाती है। पर्वतीय भागों के जो ढाल सूर्य की किरणों के सामने पड़ते हैं, वे अधिक सूर्यातप ग्रहण कर लेते हैं।
      सूर्यातप का पृथ्वी की सतह पर स्थानिक वितरण-
      सामान्य रूप से तापक्रम भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर कम होता जाता है । प्रायः भूमध्य रेखा के निकट के भाग बादलों से आच्छादित रहते है। बादलों से घिरे रहने से यहाँ पर सौर विकिरण की उष्मा का बहुत सा भाग बादलो तथा जलवाष्प द्वारा अवशोषित हो जाता है।जिस कारण भूमध्य रेखा पर कम मात्रा में सूर्यातप प्राप्त होता है। जबकि कर्क तथा मकर रेखाओं पर प्रायः आकाश बादलों से आच्छादन कम होता है, इसलिए कर्क तथामकर रेखाओं पर उच्च तापमान क्रमशः जून तथा दिसम्बर माह रहता है । इनके बाद के अक्षांशों पर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती जाती है और तापमान में कमी आती जाती है । सामान्यतः एक ही अक्षांश पर स्थित महाद्वीपीय भाग पर अधिक और महासागरीय भाग में अपेक्षतया कम मात्रा में सूर्यातप प्राप्त होता है।
      वायुमंडल का तापन एवं शीतलन
      वायुमंडल के गर्म और ठंडा होने के अनेक तरीके हैं।सामान्यता निम्नांकित तरीकों वायुमण्डल गर्म व ठण्डी होती है
      विकिरण : जब किसी ताप-स्रोत से ताप, तरंगों द्वारा किसी वस्तु तक सीधे पहुँचता है तो इस प्रक्रिया को विकिरण कहते हैं। पृथ्वी को मिलने वाली और इससे छोड़ी जाने वाली अधिकांश ताप ऊर्जा विकिरण द्वारा ही स्थानांतरित होती हैं। कोई भी वस्तु चाहे गर्म हो या ठंडी नियमित रूप से विकिरण का उत्सर्जन करती है। एक वस्तु जितनी गर्म होगी वह उतनी ही अधिक ऊर्जा का विकिरण करेगी और उसका तरंगदैर्घ्य उतना ही लघु होगा। अतः सूर्यातप पृथ्वी की सतह पर लघु तरंगों के रूप में पहुँचता है दूसरी तरफ, पृथ्वी की अपेक्षाकृत ठंडी सतह होने के कारण वायुमंडल में दीर्घ तरंगों के रूप में ऊर्जा विकिरित करती है, जिसे पार्थिव विकिरण कहा जाता है। वायुमंडल लघु तरंगों के लिये पारगम्य है और दीर्घ तरंगों के लिये अपारगम्य। इस कारण वायुमंडल सूर्यातप की अपेक्षा पृथ्वी द्वारा छोड़ी गई ऊष्मा या पार्थिव विकिरण से अधिक गर्म होता है
      चालन
      जब असमान तापमान की दो वस्तुएं एक-दूसरे के सम्पर्क में आती हैं तो अधिक गर्म वस्तु से कम गर्म वस्तु की ओर ऊर्जा प्रवाह होता है इस प्रक्रिया को चालन कहते हैं। ऊर्जा का स्थानांतरण तब तक होता रहता है जब तक दोनों पिंडों का तापमान एक समान नहीं हो जाता अथवा उनमें संपर्क टूट नहीं जाता। वायुमंडल में चालन प्रक्रिया उस क्षेत्रा में काम करती है, जहाँ वायुमंडल पृथ्वी की सतह के संपर्क में आता है। पृथ्वी के संपर्क में आने वाली वायु धीरे-धीरे गर्म होती है। निचली परतों के संपर्क में आने वाली वायुमंडल की ऊपरी परतें भी गर्म हो जाती है वायुमंडल की निचली परतों को गर्म करने में चालन महत्त्वपूर्ण है।
      संवहन: पृथ्वी के संपर्क में आने वाली वायु गर्म होकर धाराओं के रूप में लम्बवत् ऊपर उठती है और वायुमंडल में ताप का संचरण करती है। वायुमंडल के लंबवत् तापन की यह प्रक्रिया संवहन कहलाती है। इस प्रक्रिया में ऊर्जा को स्वयं अणुओं की गति द्वारा स्थानांतरित किया जाता है। वायुमडल की निचली परतें चालन द्वारा गर्म हो जाती है। और सतह की वायु गर्म होकर फैलना प्रारंभ करती है, जिससे इसका घनत्व कम हो जाता है घनत्व कम होने से वायु हल्की हो जाती है और ऊपर की ओर उठने लगती है। गर्म वायु के लगातार ऊपर उठने के कारण वायुमंडल की निचली परतों में खाली जगह हो जाती है। इस खाली जगह को भरने के लिए ऊपर से ठंडी वायु नीचे उतरती है और इस प्रकार संवहनीय धारायें बन जाती है। संवहन धाराओं में ताप का स्थानांतरण नीचे से ऊपर की ओर होता है ऊर्जा स्थानांतरण की यह प्रक्रिया केवल क्षोभमंडल तक ही सीमित है।
      अभिवहन- वायु के क्षैतिज संचलन से होने वाला तापीय स्थानांतरण अभिवहन कहलाता है। वायु अपने उत्पत्ति स्थल की विशेषताओं को अपने साथ लेकर चलती है। गर्म स्थानों से उत्पन्न होकर चलने वाली वायु के मार्ग में आने वाले स्थानों के तापमान में वृद्धि हो जाती है। इसके विपरीत यदि वायु ठंडे स्थानों से उत्पन्न होकर चलती है तो इसके मार्ग में आने वाले स्थानों के तापमान में गिरावट हो जाती है।
      उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में, विशेषतः उत्तरी भारत में गर्मियों में चलने वाली स्थानीय पवन ‘लू’ अभिवहन का ही परिणाम है
      पृथ्वी का ऊष्मा बजट
      सूर्यताप और पार्थिव विकिरण के मध्य बने संतुलन के कारण पृथ्वी की सतह का औसत तापमान हमेशा स्थिर रहता है।इस संतुलन को ऊष्मा बजट कहते हैं।
      माना वायुमंडल की ऊपरी सतह पर सूर्यास्त की 100 इकाईयाँ प्राप्त होती है। इनमें से लगभग 35 इकाईयाँ पृथ्वी तल पर आने से पहले ही अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती हैं। इन 35 इकाइयों में से 6 इकाइयाँ वायुमंडल की ऊपरी परत से अंतरिक्ष को परावर्तित हो जाती हैं। 27 इकाइयाँ बादलों द्वारा और 2 इकाइयाँ धरातल के बर्फ से ढके क्षेत्रों द्वारा परावर्तित हो जाती हैं। सौर विकिरण की 35 इकाईयाँ पृथ्वी तल पर आने से पहले ही अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती हैं सौर विकिरण की इस परावर्तित मात्रा को पृथ्वी का एल्बिडो कहते हैं।
      प्रथम 35 इकाइयों को छोड़कर शेष 65 इकाइयाँ में से 51 इकाइयाँ सीधे पृथ्वीतल को प्राप्त होती हैं पृथ्वी द्वारा अवशोषित 51 इकाईयां पुनः पार्थिव विकिरण के रूप में लौटा देती है। इन 51 इकाइयों में से 17 इकाइयाँ सीधे अंतरिक्ष में चली जाती हैं और 34 इकाइयाँ वायुमंडल द्वारा अवशोषित कर ली जाती है इन 34 इकाइयों मे 6 इकाइयाँ स्वयं वायुमंडल द्वारा, 9 इकाइयाँ संवहन के जरिए और 19 इकाइयाँ संघनन की गुप्त ऊष्मा के रूप में अवशोषित कर ली जाती है वायुमंडल द्वारा अवशोषित की गई 48 इकाइयों (14 सूर्यातप की और 34 पार्थिक विकिरण की) धीरे-धीरे अंतरिक्ष में वापस लौटा दी जाती है। इस प्रकार सूर्यताप की 65 इकाइयाँ जिन्होंने वायुमंडल में प्रवेश किया था पुनः 17 और 48 इकाइया के रूप में अंतरिक्ष में वापिस कर दी जाती हैं।इससे सूर्यताप और पार्थिव विकिरण के मध्य एक संतुलन बना रहता है।
      तापमान
      वायुमंडल एवं भू-पृष्ठ के साथ सूर्यातप की अन्योन्यक्रिया द्वारा जनित ऊष्मा को तापमान के रूप में मापा जाता है। ऊष्मा वह ऊर्जा है जो किसी वस्तु को गर्म करती है जबकि तापमान किसी वस्तु में ऊष्मा की तीव्रता की माप है।
      तापमान के वितरण को नियंत्रित करने वाले कारक
      किसी भी स्थान पर वायु का तापमान निम्नलिखित कारकों द्वारा प्रभावित होता हैः
      1. अक्षांश रेखा - विषुवत वृत्त से 
      ध्रुवों की ओर जाने पर सूर्य की किरणों का आपतन-कोण छोटा होता जाता है। आपतन कोण जितना छोट होगा तापमान उतना ही कम होगा। इसलिए विषुवत वृत्त से ध्रुवों की ओर जाने पर तापमान घटता है अतः ऊष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ऊँचे तापमान पाये जाते हैं और ध्रुवों पर वर्ष के अधिकतर भाग में तापमान हिमांक बिंदु से नीचे रहते हैं।
      2.उत्तुंगता - समुद्र तल से जैसे-जैसे ऊपर जाते हैं तापमान धीरे-धीरे घटता जाता है तापमान औसतन प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1 सें. की दर से गिरता है। इसे सामान्य ह्रास दर कहते हैं। कम ऊँचाई की वायु तप्त धरातल के निकट होने और घनी होने के कारण अधिक ऊँचाई की वायु से ज्यादा गर्म होती है। यही कारण है कि ग्रीष्म ऋतु में मैदानों की अपेक्षा पर्वतीय भाग ठंडे होते हैं
      3.समुद्र से दूरी: स्थल की अपेक्षा समुद्र धीरे-धीरे गर्म और धीरे-धीरे ठंडा होता है। स्थल जल्दी गर्म और जल्दी ठंडा होता है। इसलिए समुद्र के निकट तापमान सम रहता है। तथा समुद्र से दूरी बढने के साथ तापान्तर बढता जाता है
      4. महासागर धाराएं: महासागर धारायें गर्म और ठंडी दो प्रकार की होती हैं। गर्म धाराएं जिन तटों के साथ बहती हैं, उन्हें अपेक्षाकृत गर्म कर देती हैं और ठंडी धारायें निकटवर्ती तटों को ठंडा बना देती हैं। उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट (गर्म धारा) के कारण उत्तरी-पश्चिमी यूरोप का तट सर्दियों में जमता नहीं है जबकि कनाडा का क्यूबेक तट लेब्राडोर ठण्डी धारा के कारण सर्दियों में जम जाता है।
      समताप रेखा -समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली मानचित्र पर खींची गई रेखाओं को समताप रेखा कहते हैं। मानचित्रों पर तापमान वितरण समान्यतः समताप रेखाओं की मदद से दर्शाया जाता है।
      तापमान का वितरण- 
      जनवरी और जुलाई के तापमान के वितरण का अध्ययन करके हम पूरे विश्व के तापमान वितरण के बारे में जान सकते हैं। समताप रेखायें प्रायः अक्षांश के समानांतर होती हैं।
      1. जनवरी में तापमान का क्षैतिज वितरण
      जनवरी में सूर्य की किरणें मकर वृत्त पर लम्बवत् पड़ती हैं। अतः जनवरी में दक्षिणी गोलार्ध में ग्रीष्म ऋतु होती है और उत्तरी गोलार्ध में शीत ऋतु। उत्तरी गोलार्ध में इस समय महासागरों की अपेक्षा महाद्वीप अधिक ठंडे होते हैं। तथा महाद्वीपों की अपेक्षा महासागरों के ऊपर की वायु गर्म होती है। इसलिए यहाँ समताप रेखायें महाद्वीपों को पार करते समय विषुवत वृत्त की ओर एवं महासागरों को पार करते समय धु्रवों की ओर मुड़ जाती है। दक्षिणी गोलार्ध में समताप रेखाओं की स्थिति उत्तरी गोलार्ध में समताप रेखाओं की स्थिति के ठीक विपरीत होती है। वे महाद्वीपों को पार करते समय धु्रवों की ओर मुड़ जाती है और महासागरों को पार करते समय विषुवत रेखा की ओर मुड़ जाती है। दक्षिणी गोलार्ध में महाद्वीपों की अपेक्षा महासागरों का विस्तार अधिक है। इसलिए यहाँ समताप रेखायें नियमित तथा दूर-दूर हैं। इसके विपरीत उत्तरी गोलार्ध में समताप रेखायें, महाद्वीपों का अधिक विस्तार होने के कारण, अनियमित तथा पास-पास है।

      2. जुलाई में तापमान का क्षैतिज वितरण- जुलाई में सूर्य की किरणें कर्क वृत्त पर लम्बवत पड़ती हैं। इस कारण सम्पूर्ण उत्तरी गोलार्ध में ऊच्च तापमान पाया जाता हैं। उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्म ऋतु की अवधि में समताप रेखायें महासागरों को पार करते समय विषुवत वृत्त की ओर मुड़ जाती है और महाद्वीपों को पार करते समय वे ध्रुवों की ओर मुड़ती है। दक्षिणी गोलार्ध में समताप रेखाओं की स्थिति उत्तरी गोलार्ध की स्थिति से बिल्कुल विपरीत होती है। महासागरों पर समताप रेखायें दूर-दूर और महाद्वीपों पर वे पास-पास होती हैं।

      तापमान का व्युत्क्रमण
      सामान्यतः तापमान ऊँचाई के साथ घटता जाता है ।परन्तु कुछ परिस्थितियों में ऊँचाई के साथ तापमान घटने के स्थान पर बढ़ता है। ऊँचाई के साथ तापमान के बढ़ने को तापमान का व्युत्क्रमण कहते हैं। इसके लिए लम्बी रातें, स्वच्छ आकाश, शान्त वायु, शुष्क वायु एवं हिमाच्छादन इत्यादि आदर्श दशाएँ हैं। ऐसी परिस्थितियों में धरातल और वायु की निचली परतों से ऊष्मा का विकिरण तेज गति से होता है। परिणामस्वरूप निचली परत की हवा ठण्डी होने के कारण घनी व भारी हो जाती है। ऊपर की हवा जिसमें ऊष्मा का विकिरण धीमी गति से होता है, अपेक्षाकृत गर्म रहती है। ऐसी परिस्थति में तापमान ऊँचाई के साथ घटने के स्थान पर बढ़ने लगता है। अन्तरापर्वतीय घाटियों में शीत ऋतु की रातों में ऐसा प्रायः होता है। पर्वतीय घाटियों में रात में ठंडी हुई हवा गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में भारी और घनी होने के कारण ऊपर से नीचे उतरती है। यह घाटी की तली में गर्म हवा के नीचे एकत्र हो जाती है। और ऊँचाई के साथ बढता है।
      प्लैंक का नियम इस नियम के अनुसार कोई वस्तु जितनी अधिक गर्म होगी वह उतनी ही अधिक ऊर्जा का विकिरण करेगी और उसकी तरंग दैर्ध्य उतनी लघु होगी। 

      1. निम्न में से किस अक्षांश पर 21 जून की दोपहर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं?
        (क) विषुवत् वृत्त पर                     (ख) 23.5° उ०
        (ग) 66.5° द०                          (घ)66.5° उ०                       (ख)

      2. निम्न में से किस शहर में दिन ज्यादा लम्बा होता है?
        (क) तिरुवनन्तपुरम                      (ख) हैदराबाद
        (ग) चण्डीगढ़                           (घ) नागपुर                          (ग)

      3. निम्नलिखित में से किस प्रक्रिया द्वारा वायुमण्डल मुख्यतः गर्म होता है?
        (क) लघु तरंगदैर्घ्य वाले सौर विकिरण से (ख) लम्बी तरंगदैर्घ्य वाले स्थलीय विकिरण से
        (ग) परावर्तित सौर विकिरण से          (घ) प्रकीर्णित सौर विकिरण से          (ख)

      4. निम्न पदों को उसके उचित विवरण के साथ मिलाएँ
        1. सूर्यातप (अ) सबसे कोष्ण और सबसे शीत महीनों के मध्य तापमान का अन्तर
        2. एल्बिडो (ब) समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा।
        3. समताप रेखा (स) आने वाला सौर विकिरण ।
        4. वार्षिक तापान्तर (द) किसी वस्तु के द्वारा परावर्तित दृश्य प्रकाश का प्रतिशत।
        (1) (स), 2. (द) 3. (ब), 4. (अ)।।

      5. पृथ्वी के विषुवत वृत्तीय क्षेत्रों की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध के उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों का तापमान अधिकतम होता हैइसका मुख्य कारण है
        (क) विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में कम बादल होते हैं।
        (ख) उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में गर्मी के दिनों की लम्बाई विषुवत्तीय क्षेत्रों से ज्यादा होती है।
        (ग) उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में ग्रीनहाउस प्रभाव’ विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा ज्यादा होता है।
        (घ) उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा महासागरीय क्षेत्रों के ज्यादा करीब है। (क)
      6. पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण किस प्रकार जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है?
        जहाँ तापमान अधिक पाया जाता है वहाँ उष्ण जलवायु मिलती है किन्तु जहाँ तापमान निम्न रहता है वहाँ शीत जलवायु रहती है। वस्तुत: तापमान जलवायु व मौसम का निर्धारक तत्त्व हैअतः तापमान के असमान वितरण से मौसम और जलवायु प्रभावित होती है तापमान का असमान वितरण वायु की उत्पत्ति का मुख्य कारण है। शीतऋतु में हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं इसलिए ये हवाएँ प्रायः शुष्क होती हैं। ग्रीष्म ऋतु में हवाएँ समुद्र से स्थल की ओर चलती हैं इसलिए ये पवनें आर्द्र होती हैं। चक्रवात की उत्पत्ति भी तापमान के असमान वितरण का कारण होती है। इस तरह तापमान के असमान वितरण से मौसम और जलवायु प्रभावित होती है।

      7. वे कौन-से कारक हैं जो पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करते हैं?
        उत्तर-पृथ्वी पर तापमान वितरण में पर्याप्त असमानताएँ मिलती हैं। इस असमानता के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं।
        1. अक्षांश
        2. समुद्रतल से ऊँचाई
        3. समुद्रतल से दूरी
        4. पवनों की दिशा
        5. स्थानीय कारक
      8. भारत में मई में तापमान सर्वाधिक होता हैलेकिन उत्तर अयनांत के बाद तापमान अधिकतम नहीं होता। क्यों?
        भारत में मई में तापमान अधिकतम होने का मुख्य कारण सूर्य का उत्तरायन होना है। सूर्य उस वक्त कर्क रेखा पर लंबवत रूप से चमकता है और कर्क रेखा भारत के बीचों बीच से होकर गुजरती है। इसलिए भारत में मई में तापमान सर्वाधिक होता है लेकिन उत्तर अयनांत के बाद सूर्य की किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है और दिन की अवधि भी में परिवर्तन आ जाता है। इस कारण उत्तर अयनांत के बाद तापमान अधिकतम नहीं होता है
      9. साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापान्तर सर्वाधिक होता है। क्यों?
        साइबेरिया के मैदानी भाग समुद्र से काफी दूर हैं और यहाँ महाद्वीपीय जलवायु पाई जाती। है। इस भाग में कोष्ण महासागरीय धारा गल्फस्ट्रीम तथा उत्तरी अटलांटिक महासागरीय ड्रिफ्ट की उपस्थिति से उत्तरी अन्ध महासागर अधिक गर्म हो जाता है महाद्वीप के आंतरिक भाग में इन धाराओं का प्रभाव नहीं पड़ता है अतः यहाँ तापमान कम बना रहता है इस कारण साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापान्तर सर्वाधिक होता है।

      10. अक्षांश और पृथ्वी के अक्ष का झुकाव किस प्रकार पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाली विकिरण की मात्रा को प्रभावित करते हैं?
        पृथ्वी पर सूर्यातप की प्राप्ति अक्षांश और पृथ्वी के अक्ष के झुकाव द्वारा निर्धारित होती है। पृथ्वी का अक्ष सूर्य के चारों ओर परिक्रमण की समतल कक्षा से 66.5° का कोण बनाता है इसके कारण विभिन्न अक्षांशों पर प्राप्त होने वाला सूर्यताप प्रभावित होता है पृथ्वी की भू-आभ आकृति के कारण अक्ष के झुकाव के कारण सूर्य की किरण पृथ्वी पर सब जगह सामान नहीं पड़ती है भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणे वर्ष भर लम्बवत पड़ती है परन्तु भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों की और जाने पर किरणों का तिरछापन बढता जाता है सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने से वह अधिक क्षेत्र परे फैलती हैंअतः इन किरणों को पृथ्वी का अधिक स्थान घेरना पड़ता हैतथा तिरछी किरणों को वायुमंडल में अधिक दूरी तय करनी पड़ती है इसलिए इन किरणों से कम ताप की प्राप्ति होती है जबकि भूमध्यरेखा पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं।जो कम स्थान पर पड़ती है अतः इन किरणों से कम क्षेत्र को अधिक तापमान प्राप्त होता है।

      11. पृथ्वी और वायुमण्डल किस प्रकार ताप को सन्तुलित करते हैंइसकी व्याख्या करें।
        वास्तव में पृथ्वी तापमान (ऊष्मा) का न तो संचय करती है न ही ह्रासबल्कि यह अपने तापमान को स्थिर रखती है। ऐसा तभी सम्भव हैजब सूर्य विकिरण द्वारा सूर्यातप के रूप में प्राप्त उष्मा एवं पार्थिव विकिरण द्वारा अन्तरिक्ष में संचलित ताप बराबर हो। यदि यह मान लें कि वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर सूर्यातप की 100 प्रइकाइयाँ प्राप्त होती है तो 100 इकाइयों में से 35 इकाइयाँ पृथ्वी के धरातल पर पहुँचने से पहले ही अन्तरिक्ष में परावर्तित हो जाती हैं। इन 35 इकाइयों में से इकाइयाँ वायुमंडल की ऊपरी परत से अंतरिक्ष को परावर्तित हो जाती हैं। 27 इकाइयाँ बादलों द्वारा और इकाइयाँ धरातल के बर्फ से ढके क्षेत्रों द्वारा परावर्तित हो जाती प्रथम 35 इकाइयों को छोड़कर शेष 65 इकाइयाँ में से 51 इकाइयाँ सीधे पृथ्वीतल को प्राप्त होती हैं पृथ्वी द्वारा अवशोषित 51 इकाईयां पुनः पार्थिव विकिरण के रूप में लौटा देती है। इन 51 इकाइयों में से 17 इकाइयाँ सीधे अंतरिक्ष में चली जाती हैं और 34 इकाइयाँ वायुमंडल द्वारा अवशोषित कर ली जाती है इन 34 इकाइयों मे इकाइयाँ स्वयं वायुमंडल द्वारा, 9 इकाइयाँ संवहन के जरिए और 19 इकाइयाँ संघनन की गुप्त ऊष्मा के रूप में अवशोषित कर ली जाती है वायुमंडल द्वारा अवशोषित की गई 48 इकाइयों (14 सूर्यातप की और 34 पार्थिक विकिरण की) धीरे-धीरे अंतरिक्ष में  वापस लौटा दी जाती है। इस प्रकार सूर्यताप की 65 इकाइयाँ जिन्होंने वायुमंडल में  प्रवेश किया था पुनः 17 और 48 इकाइया के रूप में अंतरिक्ष में  वापिस कर दी जाती हैं। इससे सूर्यताप और पार्थिव विकिरण के मध्य एक संतुलन बना रहता है।यही कारण है कि पृथ्वी पर ऊष्मा के इतने बड़े स्थानान्तरण के होते हुए भी उष्मा सन्तुलन बना रहता है। इसीलिए पृथ्वी न तो बहुत गर्म होती है न ही अधिक ठण्डीबल्कि मानव एवं जीव-जंतुओं के अनुकूल तापमान रखती है।

      12. जनवरी में पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के बीच तापमान के विश्वव्यापी वितरण की तुलना करें।
        (1) जनवरी में तापमान का क्षैतिज वितरण- जनवरी में सूर्य की किरणें मकर वृत्त पर लम्बवत् पड़ती हैं। अतः जनवरी में दक्षिणी गोलार्ध में ग्रीष्म ऋतु होती है और उत्तरी गोलार्ध में शीत ऋतु। उत्तरी गोलार्ध में इस समय महासागरों की अपेक्षा महाद्वीप अधिक ठंडे होते हैं। तथा महाद्वीपों की अपेक्षा महासागरों के ऊपर की वायु गर्म होती है। इसलिए यहाँ समताप रेखायें महाद्वीपों को पार करते समय विषुवत वृत्त की ओर एवं महासागरों को पार करते समय धु्रवों की ओर मुड़ जाती है। दक्षिणी गोलार्ध में समताप रेखाओं की स्थिति उत्तरी गोलार्ध में समताप रेखाओं की स्थिति के ठीक विपरीत होती है। वे महाद्वीपों को पार करते समय धु्रवों की ओर मुड़ जाती है और महासागरों को पार करते समय विषुवत रेखा की ओर मुड़ जाती है। दक्षिणी गोलार्ध में महाद्वीपों की अपेक्षा महासागरों का विस्तार अधिक है। इसलिए यहाँ समताप रेखायें नियमित तथा दूर-दूर हैं। इसके विपरीत उत्तरी गोलार्ध में समताप रेखायेंमहाद्वीपों का अधिक विस्तार होने के कारणअनियमित तथा पास-पास है।


        (2) जुलाई में तापमान का क्षैतिज वितरण- जुलाई में सूर्य की किरणें कर्क वृत्त पर लम्बवत पड़ती हैं। इस कारण सम्पूर्ण उत्तरी गोलार्ध में ऊच्च तापमान पाया जाता हैं। उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्म ऋतु की अवधि में समताप रेखायें महासागरों को पार करते समय विषुवत वृत्त की ओर मुड़ जाती है और महाद्वीपों को पार करते समय वे धु्रवों की ओर मुड़ती है। दक्षिणी गोलार्ध में समताप रेखाओं की स्थिति उत्तरी गोलार्ध की स्थिति से बिल्कुल विपरीत होती है। महासागरों पर समताप रेखायें दूर-दूर और महाद्वीपों पर ये पास-पास होती है 





      1. पृथ्वी वायुमंडल का ऊपरी सतह पर कितना ऊर्जा प्राप्त करता है ?
        1.94 कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर
      2. वायुमंडल की निचली परते किस प्रक्रिया से गर्म होती है  
        चालन प्रक्रिया द्वारा 
      3. संवहन प्रक्रिया कौन सी मंडल तक सीमित होती है
        क्षोभमंडल तक
      4. अभिवहन प्रक्रिया किसे कहते हैं 
        वायु के क्षैतिज संचलन से होने वाला तापीय स्थानांतरण अभिवहन कहलाता है।
      5. विशिष्ट ऊष्मा किसे कहते हैं ?
        एक ग्राम पदार्थ का तापमान एक अंश सेल्सियस बढ़ाने के लिए जितनी ऊर्जा की आवश्यकता है उसे विशिष्ट ऊष्मा कहते हैं।
      6. संवहन किसे कहते हैं 
         पृथ्वी के संपर्क में आने वाली वायु गर्म होकर धाराओं के रूप में लम्बवत् ऊपर उठती है और वायुमंडल में ताप का संचरण करती है। वायुमंडल के लंबवत् तापन की यह प्रक्रिया संवहन कहलाती है।
      7. सूर्याताप या सूर्यातप से क्या तात्पर्य है?
        सूर्य से पृथ्वी तक पहुंचने वाले सौर विकिरण को सूर्यातप कहते हैं। यह ऊर्जा लघु तरंगों के रुप में सूर्य से पृथ्वी पर है
      8. तापमान व्युत्क्रमण के लिए आवश्यक दशाएं लिखिए
        लम्बी रातें, स्वच्छ आकाश, शान्त वायु, शुष्क वायु एवं हिमाच्छादन इत्यादि तापमान व्युत्क्रमण के लिए आदर्श दशाएँ हैं।
      9. वायु अपवाह किसे कहते हैं?
        घाटी की तली में गर्म हवा के नीचे एकत्र हो जाती है। इसे वायु अपवाह कहते हैं। यह पाले से पौधों की रक्षा करती है।
      10. पृथ्वी का एल्बिडो किसे कहते हैं?
        सौर विकिरण की 35 इकाईयाँ पृथ्वी तल पर आने से पहले ही अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती हैं सौर विकिरण की इस परावर्तित मात्रा को पृथ्वी का एल्बिडो कहते हैं।
      11. प्लैंक का नियम लिखिए
        इस नियम के अनुसार कोई वस्तु जितनी अधिक गर्म होगी वह उतनी ही अधिक ऊर्जा का विकिरण करेगी और उसकी तरंग दैर्ध्य उतनी लघु होगी। 
      12. चालन प्रक्रिया किसे कहते हैं 
        जब असमान तापमान की दो वस्तुएं एक-दूसरे के सम्पर्क में आती हैं तो अधिक गर्म वस्तु से कम गर्म वस्तु की ओर ऊर्जा प्रवाह होता है इस प्रक्रिया को चालन कहते हैं। 
      13. समताप रेखाओं से क्या अभिप्राय है?
        समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली मानचित्र पर खींची गई रेखाओं को समताप रेखा कहते हैं। मानचित्रों पर तापमान वितरण समान्यतः समताप रेखाओं की मदद से दर्शाया जाता है।
      14. तापमान का व्युत्क्रमण से क्या अभिप्राय है
        सामान्यतः तापमान ऊँचाई के साथ घटता जाता है ।परन्तु कुछ परिस्थितियों में ऊँचाई के साथ तापमान घटने के स्थान पर बढ़ता है। ऊँचाई के साथ तापमान के बढ़ने को तापमान का व्युत्क्रमण कहते हैं।
      15. तापमान की सामान्य ह्रास दर से आप क्या समझते हैं?
        समुद्र तल से जैसे-जैसे ऊपर जाते हैं तापमान में धीरे-धीरे घटता जाता है तापमान औसतन प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1 सें. की दर से गिरता है। इसे सामान्य ह्रास दर कहते हैं।
      16. अपसौर व उपसौर से  क्या अभिप्राय है 
        पृथ्वी की कक्षा में वह स्थिति जब पृथ्वी और सूर्य के बीच सर्वाधिक दूरी होती है उसे अपसौर की स्थिति कहते है। यह स्थिति 4 जुलाई को बनती है और इस स्थिति में पृथ्वी व सूर्य के मध्य की दूरी 15.2 करोड़ किलोमीटर होती है
        पृथ्वी की कक्षा में वह स्थान जहाँ सूर्य तथा पृथ्वी के बीच सबसे कम दूरी होती है उसे उपसौर की स्थिति कहते है। उपसौर की स्थिति 3 जनवरी को बनती है। उपसैेर के दौरान सूर्य और पृथ्वी के बीच 14.7 करोड़ किलोमीटर की दूरी होती है।









      7. वायुमंडल का संघटन तथा संरचना




      वायुमंडल -पृथ्वी के चारों ओर व्याप्त गैसीय आवरण को वायुमण्डल कहा जाता हैजो पृथ्वी के गुरुत्वीय बल के कारण पृथ्वी के साथ जुड़ा हुआ है 

      वायुमंडल का संघटन

      वायुमण्डल का संघटन वायुमण्डल विभिन्न प्रकार की गैसों, जलवाष्प और धूलकणों से बना है। 

      वायुमण्डलीय गैसें - जलवाष्प एवं धूलकण सहित वायुमण्डल विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है। नाइट्रोजन और ऑक्सीजन वायुमण्डल की दो प्रमुख गैसें हैं। वायुमण्डल का 99% भाग इन्हीं दो गैसों से मिलकर बना है। शेष 1% भाग में आर्गन, कार्बन-डाई-आक्साइड, हाइड्रोजन, नियॉन, हीलियम आदि गैसें पाई जाती हैं। वायुमण्डल में सर्वाधिक मात्रा में नाइट्रोजन गैस 78.1 प्रतिशत पायी जाती है इसके बाद जीवधारियों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण गैस ऑक्सीजन 20.9 प्रतिशत पायी जाती है जिसे प्राण वायु कहा जाता है 120 कि॰मी॰ की ऊँचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है। तीसरी महत्वपूर्ण गैस कार्बन डाईऑक्साइड है जो वायुमण्डल में 0.03 प्रतिशत पायी जाती है मौसम विज्ञान की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण गैस है क्योंकि कार्बन डाईऑक्साइड सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है, लेकिन पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी है। जीवाश्म ईंधन के दहन के कारण वायुमण्डल में कार्बन डाईऑक्साइड के आयतन में लगातार वृद्धि हो रही है। जिसके फलस्वरूप पृथ्वी का तापमान बढ रहा है अतः यह ग्रीन हाउस प्रभाव के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। यह गैस पौधों के भोजन बनाने में सहायक है 

      ओजोन वायुमंडल का दूसरा महत्त्वपूर्ण घटक है जो कि पृथ्वी की सतह से 10 से 50 किलोमीटर की ऊँचाई के बीच पाया जाता है। यह एक फिल्टर की तरह कार्य करता है तथा सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर उनको पृथ्वी की सतह पर पहुँचने से रोकता है।

      इन गैसों के अलावा गौण मात्रा में आर्गन, हाइड्रोजन, नियॉन, हीलियम आदि गैसे पायी जाती है

      जलवाष्प

      वायुमण्डल में विद्यमान जल के गैसीय स्वरूप को जलवाष्प कहते हैं। जलवाष्प की मात्रा वायुमंडल में ऊँचाई के साथ घटती जाती है। उष्ण आर्द्र कटिबंध में जलवाष्प की मात्रा 4 प्रतिशत तक पायी जाती है, जबकि धु्रवों जैसे ठंडे तथा रेगिस्तानों जैसे शुष्क प्रदेशों में यह मात्र 1 प्रतिशत से भी कम पायी जाती है। विषुवत् वृत्त से धु्रव की तरपफ जलवाष्प की मात्रा कम होती जाती है। यह सूर्य से निकलने वाले ताप के कुछ भाग को अवशोषित करती है तथा पृथ्वी से निकलने वाले ताप को संग्रहित करती है। इस प्रकार यह एक कंबल की तरह कार्य करती है तथा पृथ्वी को न तो अधिक गर्म तथा न ही अधिक ठंडा होने देती है

      धूल कण 

      धूलकण अधिकतर वायुमण्डल के निचले स्तर में मिलते हैं। ये कण धूल, धुआँ, समुद्री लवण, परागकण, राख, आदि के रूप में पाये जाते हैं। धूलकणों का वायुमण्डल में विशेष महत्व है। धूल कण आर्द्रताग्राही केन्द्र की तरह कार्य करते हैं जिसके चारों ओर जलवाष्प संघनित होकर बादलों का निर्माण करते है वर्षण सम्भव हो पाता है। 

      वायुमंडल की संरचना

      सामान्यत वायुमंडल धरातल से लगभग 1600 कि.मी. की ऊँचाई तक फैला है। वायुमण्डल के कुल भार की मात्रा का 97 प्रतिशत भाग लगभग 30 कि.मी. की ऊँचाई तक सीमित है। तापमान की स्थिति के अनुसार वायुमंडलको पाँच विभिन्न संस्तरों में बाँटा गया है।

      1.  क्षोभमण्डल - यह वायुमण्डल की सबसे निचली परत है। इसकी औसत ऊचाई सतह से लगभग 13 कि॰मी॰ है भूमध्य रेखा पर इस परत की ऊँचाई 18 कि.मी. और ध्रुवों पर इसकी ऊँचाई 8 कि.मी. है। क्षोभमंडल की मोटाई भूमध्य रेखा पर सबसे अधिक है भूमध्य रेखा पर चलने वाली तेज संवहन धाराएँ धरातल की ऊष्मा को अधिक ऊंचाई पर ले जाती हैं। इसलिए भूमध्य रेखा पर क्षोभमंडल की ऊंचाई अधिक हैं संवहन धाराओ की अधिक सक्रियता के कारण इस परत को संवहन-क्षेत्र  भी कहते हैं। वायुमण्डल की यह सबसे महत्वपूर्ण परत है, क्योंकि इसी परत में सभी प्रकार के मौसमी परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों के कारण पृथ्वी पर जीव-जगत की उत्पत्ति एवं विकास होता है। इस भाग में वायु कभी शान्त नहीं रहती। इसीलिए इस मण्डल को परिवर्तन मण्डल भी कहते हैं। इस परत में प्रत्येक 165 मी. की ऊचाई पर तापमान 1 से॰ (1 किमा पर 6.4 से॰ ) घट जाता है। इसे सामान्य ताप ह्रास दर कहते है क्षोभमंडल के शीर्ष भाग पर स्थित संक्रमण स्तर जो इसे समताप मण्डल से अलग करता है  क्षोभ सीमा कहलाती हैं। इसकी मोटाई लगभग 1.5 किमी है इस परत को ‘मौसमी परिवर्तनो की छत’ कहा जाता हैं 

      2.  समताप मण्डल - यह क्षोभमंडल से ऊपर धरातल से 50 किलोमीटर ऊंचाई तक विस्तृत हैं। इस परत की मोटाई भूमध्य रेखा की अपेक्षा ध्रुवों पर अधिक होती हैं। कभी-कभी यह परत भूमध्य रेखा पर लुप्त हो जाती हैं। इस परत के निचले भागों में अर्थात 20 किलोमिटर की ऊंचाई तक तापमान एक जैसा रहता हैं। इसी कारण इस परत को ‘समतापमंडल‘ कहा जाता हैं। समतापमंडल में ओजोन गैस पाई जाती हैं जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों का अवशोषण कर लेती हैं। और हमें उनके हानिकारक प्रभावों से बचाती है इस मण्डल में मौसम सम्बन्धी घटनाए  नहीं पायी जाती हैं। इसीलिए यह परत वायुयानों की उड़ानों के लिए आदर्श मानी जाती हैं।

      3.  मध्यमंडल - इस मण्डल का विस्तार समताप मण्डल के ऊपर धरातल से 80 किलोमीटर की ऊंचाई  तक होता हैं। इस परत में ऊंचाई के साथ तापमान घटने लगता हैं और 80 किलोमीटर की ऊंचाई पर तापमान -100℃ तक नीचे गिर जाता हैं। मध्यमण्डल में वायुमंडल का सबसे कम तापमान पाया जाता हैं। मध्यमण्डल की ऊपरी सीमा ‘मध्यमण्डल सीमा‘ कहलाती हैं।

      4.  आयनमंडल - यह मण्डल मध्यमण्डल के ऊपर 80 से 400 किलोमीटर के बीच स्थित होती है। इसमें विद्युत आवेशित कण पाये जाते हैं, जिन्हें आयन कहते हैं तथा इसीलिए इसे आयनमंडल के नाम से जाना जाता है। पृथ्वी के द्वारा भेजी गई रेडियो तरंगें इस परत के द्वारा वापस पृथ्वी पर लौट आती हैं। यहाँ पर ऊँचाई बढ़ने के साथ ही तापमान में वृद्धि शुरू हो जाती है। 

      5. बहिर्मंडल - यह वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत है। इस परत में वायु बहुत ही विरल है जो धीरे-धीरे बाह्य अन्तरिक्ष में विलीन हो जाती है वैज्ञानिकों ने इसकी ऊँचाई 1000 किमी तक मानी है।

      मौसम और जलवायु के तत्त्व

      ताप, दाब, हवा, आर्द्रता, बादल और वर्षण, वायुमंडल के महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं, जो पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन को प्रभावित करते है

      मौसम और जलवायु के तत्त्व 

      ताप, दाब, हवा, आर्द्रता, बादल और वर्षण मौसम और जलवायु के मुख्य तत्त्व हैं|



       


      1. निम्नलिखित में से कौन सी गैस वायुमंडल में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद है?
        (क) ऑक्सीजन              (ख) आर्गन
        (ग) नाइट्रोजन               (घ) कार्बन डाईऑक्साइड                    (ग)
      2. वह वायुमंडलीय परत जो मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण है :
        (क) समतापमंडल            (ख) क्षोभमंडल
        (ग) मध्यमंडल               (घ) आयनमंडल                             (ख)
      3. समुद्री नमक, पराग, राख, धुएँ की कालिमा, महीन मिट्टी- किससे संबंधित हैं?
        (क) गैस                   (ख) जलवाष्प
        (ग) धूलकण                (घ) उल्कापात                                (ग)
      4. निम्नलिखित में से कितनी ऊँचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है?
        (क) 90 कि.मी.            (ख) 100 कि.मी.
        (ग) 120 कि.मी.           (घ) 150 कि.मी.                                (ग)
      5. निम्नलिखित में से कौन-सी गैस सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है तथा पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी ?
        (क) ऑक्सीजन           (ख) नाइट्रोजन
        (ग) हीलियम              (घ) कार्बन डाईऑक्साइड                      (घ)
      6. वायुमंडल से आप क्या समझते हैं?
        पृथ्वी के चारों ओर स्थित गैसीय आवरण को वायुमण्डल कहा जाता है, जो पृथ्वी के गुरुत्वीय बल के कारण पृथ्वी के साथ जुड़ा हुआ है यह जीवन के लिए हानिकारक पराबैंगनी किरणों को रोकने तथा जीवन के लिए अनुकूल तापमान बनाए रखने में सहायक है।
      7. मौसम और जलवायु के तत्त्व कौन-कौन से हैं?
        ताप, दाब, हवा, आर्द्रता, बादल और वर्षण मौसम और जलवायु के मुख्य तत्त्व हैं|
      8. क्षोभमंडल में 1 किलोमीटर की ऊंचाई पर जाने पर तापमान में कितनी गिरावट आती है-
        6.4 डिग्री सेंटीग्रेड की 
      9. संवहनीय धाराएं किस मंडल में चलती है -
        क्षोभ  मंडल में 
      10. वायुयान उड़ाने हेतु आदर्श दशा किस मंडल में पाई जाती है
        समताप मंडल में
      11. किस मंडल में मौसम संबंधी घटनाएं होती है
        क्षोभ मंडल में
      12. पृथ्वी पर संचालित टीवी चैनल मोबाइल आदि किस मंडल की सहायता से अपना कार्य संपादित करते हैं 
        आयन मंडल
      13. समताप मंडल की मोटाई सर्वाधिक कहां पर होती है
        ध्रुवों पर
      14. क्षोभ मंडल की ऊंचाई कितनी होती है 
        ध्रुवों पर 8 किलोमीटर तथा विषुवत रेखा पर 18 किलोमीटर तक
      15. 'मौसमी परिवर्तनो की छत’ किसे कहा जाता हैं 
        क्षोभ सीमा  को ‘मौसमी परिवर्तनो की छत’ कहा जाता हैं 
      16. पृथ्वी का सुरक्षा कवच किस गैस को कहा जाता है 
        ओज़ोन गेस को
      17. ग्लोबल वार्मिंग की क्रिया हेतु प्रमुख जिम्मेदार गैस कौन सी है
        कार्बन डाइऑक्साइड 
      18. वायुमंडल में सर्वाधिक मात्रा में कौन सी गैस पाई जाती है 
        नाइट्रोजन 78.8%
      19. वायुमंडल में ऑक्सीजन कितने प्रतिशत मात्रा में पाई जाती है -
        20.95%
      20. ग्रीन हाउस गैसों के नाम बताइए -
        कार्बन डाई ऑक्साइड ,सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड ,सल्फर हेक्साफ्लोराइड ,क्लोरोफ्लोरोकार्बन, मेथेन
      21. वायुमंडल की संरचना के बारे में लिखें|
        वायुमण्डल अलग – अलग घनत्व वाली विभिन्न परतों का बन हुआ है है। वायुमण्डल में तापमान के ऊर्ध्वाधर वितरण के आधार वायुमण्डल को निम्न पाँच परतों में बांटा गया है। 
        1. क्षोभमण्डल, 2. समताप मण्डल, 3. मध्य मण्डल, 4. आयन मण्डल, 5.बहिर्मण्डल।
      22. वायुमंडल के सभी संस्तरों में क्षोभमंडल सबसे अधिक महत्वपूर्ण क्यों है?
        वायुमण्डल की यह सबसे महत्वपूर्ण परत है, क्योंकि इसी परत में सभी प्रकार के मौसमी परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों के कारण पृथ्वी पर जीव-जगत की उत्पत्ति एवं विकास होता है।
      23. वायुमण्डल में जलवाष्प  का क्या महत्त्व लिखिए 
        1. जलवाष्प सूर्य से आने वाले सूर्यताप के कुछ भाग को अवशोषित कर लेता है।
        2. यह पृथ्वी द्वारा विकिरित ऊष्मा को संजोए रखता है।
        3. जलवाष्प पृथ्वी के लिए एक कंबल के समान काम करता हैए जिससे पृथ्वी न तो अधिक गर्म और न ही अधिक ठण्डी होती है।
        4. जलवाष्प के संघनन से वर्षा होती है।
      24. वायुमण्डल में धूल कण का क्या महत्त्व लिखिए 
        1.धूलकणों के कारण ही आकाश का रंग नीला दिखाई देता है।
        2.सूर्योदय व सूर्यास्त के समय धूलकणों के कारण ही आकाश का रंग लाल होता है।
        3.कोहरे  कुहासे व धुन्ध के निर्माण में धूलकण केन्द्रक के रूप में कार्य करते हैं। इनके चारों ओर ही जलवाष्प मिलता है।
      25. ओजोन गैस के महत्व के सम्बन्ध में संक्षेप में बताइए।
        ओजोन गैस समतापमण्डल की निचली सीमा में 0 से 50 किमी. के मध्य पाई जाती है। यह रक्षा-आवरण का काम करती है। यह सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों का अवशोषण कर लेती है जिससे धरातल का तापमान सामान्य बना रहता है। यदि ये किरणें सीधे धरातल तक आ जाती तो तापमान इतना अधिक बढ़ जाता है कि धरातल पर जीवों का अस्तित्व सम्भव नहीं हो सकता था। वर्तमान समय में नवीन प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी विकास के फलस्वरूप ओजोन गैस का क्षरण हो रहा है जिससे धरातल का तापमान निरन्तर बढ़ता जा रहा है। इस प्रकार मानव अपने लिए स्वयं समस्याएँ पैदा कर रहा है।
      26. वायुमंडल के संघटन की व्याख्या करें|
        वायुमण्डल का संघटन वायुमण्डल विभिन्न प्रकार की गैसों, जलवाष्प और धूलकणों से बना है। वायुमण्डल का संघटन स्थिर नहीं है। यह समय और स्थान के अनुसार बदलता रहता है।
        वायुमण्डलीय गैसें :- जलवाष्प एवं धूलकण सहित वायुमण्डल विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है। नाइट्रोजन और आक्सीजन वायुमण्डल की दो प्रमुख गैसें है। वायुमण्डल का 99% भाग इन्हीं दो गैसों से मिलकर बना है। शेष 1% भाग में आर्गन, कार्बन-डाई-आक्साइड, हाइड्रोजन, नियान, हीलियम आदि गैसें पाई जाती हैं। वायुमण्डल में सर्वाधिक मात्रा में नाइट्रोजन गैस 78.1 % पायी जाती है इसके बाद जीवधारियों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण गैस आक्सीजन 20.9 प्रतिषत पायी जाती है जिसे प्राण वायु कहा जाता है 120 कि॰मी॰ की ऊँचाई पर आक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है। तीसरी महत्वपूर्ण गैस कार्बन डाईआक्साइड है जो वायुमण्डल में 0.03 % पायी जाती है मौसम विज्ञान की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण गैस है क्योंकि कार्बन डाईआक्साइड सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है, लेकिन पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी है। जीवाश्म ईंधन के दहन के कारण वायुमण्डल में कार्बन डाईआक्साइड के आयतन में लगातार वृद्वि हो रही है। जिसके फलस्वरूप पृथ्वी का तापमान बढ रहा है अतः यह ग्रीन हाउस प्रभाव के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। यह गैस पौधों के भोजन बनाने में सहायक है
        ओजोन वायुमंडल का अन्य महत्त्वपूर्ण गैस ह ओजोन क्षेत्रा में ही सीमित है; लेकिन इसका विशेष महत्व है। यह सूर्य की पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करके पृथ्वी पर जीव-जंतुओं की रक्षा करती है। यदि ओजोन गैस वायुमण्डल में न होती तो धरातल पर जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधों का अस्तित्व नहीं होता। इन गैसों के अलावा गौण मात्रा में आर्गन, हाइड्रोजन, नियान, हीलियम आदि गैसे पायी जाती है
      27. वायुमंडल की संरचना का चित्र खींचे और व्याख्या करें|
        वायुमंडल अलग-अलग घनत्व तथा तापमान वाली विभिन्न परतों का बना होता है| पृथ्वी की सतह के पास घनत्व अधिक होता है, जबकि ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ यह घटता जाता है| तापमान की स्थिति के अनुसार वायुमंडल को पाँच विभिन्न संस्तरों में बाँटा गया है| ये हैं: क्षोभमंडल, समतापमंडल, मध्यमंडल, बाह्य वायुमंडल तथा बहिर्मंडल|
        क्षोभमंडल: यह वायुमंडल का सबसे नीचे का संस्तर है| इसकी ऊँचाई सतह से लगभग 13 कि.मी. है तथा यह ध्रुव के निकट 8 कि.मी. तथा विषुवत् वृत्त पर 18 कि.मी. को ऊँचाई तक है| क्षोभमंडल को मोटाई विषुवत बृत्त पर सबसे अधिक है, क्योंकि तेज वायुप्रवाह के कारण ताप का अधिक ऊँचाई तक संवहन किया जाता है| इस संस्तर में धूलकण तथा जलवाष्प मौजूद होते है| मौसम में परिवर्तन इसी संस्तर में होता है| इस संस्तर में प्रत्येक 165 मी. की ऊँचाई पर तापमान 1° से. घटता जाता है। जैविक क्रिया के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण संस्तर है।
        क्षोभसीमा: क्षोभमंडल और समताप-मंडल को अलग करने वाले भाग को क्षोभसीमा कहते है| विषुवत् वृत्त के ऊपर क्षोभसीमा में हवा का तापमान -80° से. और ध्रुव के उपर -45° से. होता है। यहाँ पर तापमान स्थिर होने के कारण इसे क्षोभसीमा कहा जाता है|
        समतापमंडल: समतापमंडल इसके ऊपर 50 कि॰मी. को ऊँचाई तक पाया जाता है| समतापमंडल का एक महत्वपूर्ण लक्षण यह है कि इसमें ओजोन परत पायी जाती है| यह परत पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर पृथ्वी को ऊर्जा के तीव्र तथा हानिकारक तत्वों से बचाती है|
        मध्यमंडल: मध्यमंडल, समतापमंडल के ठीक ऊपर 80 कि.मी. की ऊँचाई तक फैला होता है| इस संस्तर में भी ऊँचाई के साथ-साथ तापमान में कमी होने लगती है और 80 किलोमीटर को ऊँचाई तक पहुंचकर यह -100° से. हो जाता है| मध्यमंडल की उपरी परत को मध्यसीमा कहते हैं|
        आयनमंडल: यह मध्यमंडल के ऊपर 80 से 400 किलोमीटर के बीच स्थित होता है| इसमें विद्युत आवेशित कण पाये जाते है, जिन्हें आयन कहते है तथा इसीलिए इसे आयनमंडल के नाम से जाना जाता है| पृथ्वी के द्वारा भेजी गई रेडियों तरंगें इस संस्तर के द्वारा वापस पृथ्वी पर लौट आती है| यहाँ पर ऊँचाई बढ़ने के साथ ही तापमान में वृद्धि शुरू हो जाती है|
        बहिर्मंडल: वायुमंडल का सबसे उपरी संस्तर, जो बाह्यमंडल के ऊपर स्थित होता है उसे बहिर्मंडल कहते है। यह सबसे ऊँचा संस्तर है तथा इसके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है| इस संस्तर में मौजूद सभी घटक विरल हैं, जो धीरे-धीरे बाहरी अंतरिक्ष में मिल जाते हैं|