GSSS BINCHAWA

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GSSS KATHOUTI

GSSS KATHOUTI

GSSS BUROD

04. कार्बन एवं उसके यौगिक

भूपर्पटी में खनिजों (जैसे कार्बोनेट, हाइड्रोजनकार्बोनेट, कोयला एवं पेट्रोलियम) के रूप में केवल 0.02% कार्बन उपस्थित है तथा वायुमंडल में 0.03% कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में उपस्थित है।
कार्बन में आबंधन - सहसंयोजी आबंध
कार्बन की परमाणु संख्या 6 है। कार्बन के सबसे बाहरी कोश में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं तथा उत्कृष्ट गैस विन्यास प्राप्त करने के लिए कार्बन को चार इलेक्ट्रान प्राप्त करने या खोने की आवश्यकता होती है।
1. जब कार्बन चार इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर ऋणायन बनाता है  तो छः प्रोटॉन वाले नाभिक के लिए दस इलेक्ट्रॉन, अर्थात चार अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन धारण करना मुश्किल होता है।
2. जब कार्बन चार इलेक्ट्रॉन त्यागकर कर धनायन बनाता है। तो चार इलेक्ट्रॉनों को खो कर छः प्रोटॉन वाले नाभिक में केवल दो इलेक्ट्रॉन वाला कार्बन धनायन बनाने के लिए अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
अतः कार्बन अन्य परमाणुओं के साथ संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी करके इस समस्या को सुलझाता है। जिन इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी की जाती है वे दोनों परमाणुओं के बाहरी कोश के ही होते हैं, तथा इनके फलस्वरूप दोनों ही परमाणु उत्कृष्ट गैस विन्यास की स्थिति को प्राप्त करते हैं।
सहसंयोजी आबंध :
हाइड्रोजन की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना

       H - H
ऑक्सीजन की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना 

नाइट्रोजन  की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना 

        N ≡ N
क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना

    Cl - Cl
अपररूपता : एक ही तत्व के दो या दो से अधिक रूप जिनके भौतिक गुणधर्म भिन्न-भिन्न हो अपरूप कहलाते हैं तथा इस गुण को अपररूपता कहते हैं
कार्बन के अपरूप
1.क्रिस्टलीय अपररूप -हीरा, ग्रेफाइट,  फ्लोरीन
2.अक्रिस्टलीय रूप -कॉल, कोक, काष्ट चारकोल, जंतु चारकोल, काजल, गैस कार्बन
हीरा एवं ग्रेफाइट दोनों ही कार्बन के परमाणुओं से बने हैं परन्तु हीरे एवं ग्रेफाइट में अंतर होता है।
1. हीरा अब तक का ज्ञात सर्वाधिक कठोर पदार्थ है, जबकि ग्रेप़फाइट चिकना तथा फिसलनशील होता है।
2. हीरे में प्रत्येक कार्बन परमाणु चार अन्य कार्बन परमाणुओं से जुङा रहता है जबकि ग्रेफाइट में प्रत्येक कार्बन परमाणु तीन अन्य कार्बन परमाणुओं से जुङा रहता है
3. हीरे की संरचना चतुष्फलकीय होती है जबकि .ग्रेफाइट की संरचना में षट्कोणीय परते पायी जाती है
4. हीरे में कार्बन की चारों संयोजकताए चार अन्य कार्बन परमाणुओं से जुङी रहती है इसलिए मुक्त इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति के कारण हीरा विद्युत का कुचालक होता है जबकि ग्रेफाइट में कार्बन की तीन संयोजकताए तीन अन्य कार्बन परमाणुओं से जुङी रहती है इसलिए मुक्त इलेक्ट्रोन की उपस्थिति के कारण ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक होता है
फुलरीन :  फुलरीन फुटबॉल के समान संरचना वाला कार्बन का अपररूप है  जिसमें 60,70 या इससे अधिक कार्बन पाये जाते है सबसे पहले C60 फुलरीन की पहचान की गई । यह फुलरीन 32 फलकीय फुटबॉल जैसा होता है। इसलिए इसे वाॅकीबाॅल भी कहते हैं  फुलरीन का नामकरण प्रसिद्ध वास्तुकार बंकमिन्सटर फुलर के नाम पर किया गया है  
कार्बन की सर्वतोमुखी प्रकृति
सहसंयोजी बंध की प्रकृति के कारण कार्बन में बड़ी संख्या में यौगिक बनाने की क्षमता होती है। कार्बन में पाए जाने वाले दो विशिष्ट लक्षणों, शृंखलन और चतुःसंयोजकता  के कारण बड़ी संख्या में यौगिकों का निर्माण होता है। 
1.  श्रंखलन  :  कार्बन में कार्बन के ही दूसरे परमाणुओं के साथ सहसंयोजी आबंध बनाकर श्रृंखला बनाने का गुण पाया जाता है । कार्बन के इस गुण को शृंखलन कहते हैं। इस गुण के कारण कार्बन दूसरे कार्बन के परमाणु के साथ आबंध बनाकर सीधी श्रृंखला, शाखित श्रृंखला तथा वलय के आकार में श्रृंखला का निर्माण करता है। कार्बन दूसरे कार्बन के परमाणुओं के साथ एकल बंध व्दि आबंध तथा त्रिआबंधों का निर्माण भी करता है।साथ कार्बन दूसरे कार्बन  परमाणुओं से एकल आबंध , द्विआबंध  तथा त्रिआबंधों का निर्माण भी करता है।
2. चतुःसंयोजकता : कार्बन के बाहरी कक्षा में चार इलेक्ट्रॉन हैं अर्थात कार्बन की संयोजकता चार होती है, अतः इसमें कार्बन के चार अन्य  परमाणुओं अथवा एक संयोजकता वाले चार विभिन्न  परमाणुओं के साथ आबंधन की क्षमता होती है। 
हाईड्रोकार्बन : रासायनिक यौगिक  जो केवल कार्बन तथा हाईड्रोजन  के द्वारा बने होते हैं हाईड्रोकार्बन कहलाते हैं। हाईड्रोकार्बन को दो भागों में बाँटा जा सकता है: संतृप्त हाईड्रोकार्बन तथा असंतृप्त हाईड्रोकार्बन 
संतृप्त हाइड्रोकार्बन :- ऐसे हाइड्रोकार्बन जिनमे कार्बन-कार्बन परमाणु के मध्य एकल बंध पाया जाता है संतृप्त हाइड्रोकार्बन कहलाते हैं जैसे जैसे एल्केन
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन :- ऐसे हाइड्रोकार्बन जिनमे कार्बन-कार्बन परमाणु के मध्य द्विबंध या त्रिबंध पाया जाता है असंतृप्त हाइड्रोकार्बन कहलाते हैं जैसे एल्कीन व एल्काइन
एल्केन : एल्केन का सामान्य सूत्र   CnH2n+2 होता है 
जहाँ, n = कार्बन के परमाणुओं की संख्या 
Ex. मेथेन : 
मेथेन कार्बन के सर्वाधिक सरल यौगिक है। है। ईंधन के रूप में मेथेन का सर्वाधिक उपयोग होता है तथा यह बायोगैस एवं संपीडित प्राकृतिक गैस CNG का प्रमुख घटक है।  
मेथेन का सूत्र  :  CH₄ 
मेथेन का संरचना सूत्र

मेथेन  की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना 

Ex. एथेन : 
एथेन का सूत्र   C₂H
एथेन का संरचना सूत्र

एथेन की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना

Ex. प्रोपेन 
प्रोपेन का सूत्र C₃H
प्रोपेन का संरचना सूत्र

Ex. ब्यूटेन 
ब्यूटेन का सूत्र  C₄ H10₁₀
ब्यूटेन का संरचना सूत्र

Ex. पेंटेन 
पेंटेन का सूत्र C₅ H₁₂
पेंटेन का संरचना सूत्र

Ex. हेक्सेन 
हेक्सेन का संरचना सूत्र C₆ H₁₄

संरचनात्मक  समावयवी : ऐसे यौगिक जिनके समान आणविक सूत्र तो सामान होते है  लेकिन संरचना सूत्र अलग – अलग होते है  ऐसे यौगिक संरचनात्मक  समावयवी कहलाते हैं। जैसे  n-ब्यूटेन और आइसो-ब्यूटेन(दोनों C4H10)

             n-ब्यूटेन                          इसो-ब्यूटेन
ऐल्किन या ओलिफिन –  ऐल्किन  में कार्बन - कार्बन परमाणु के मध्य  द्विबंध होता है | | ऐल्किन का सामान्य सूत्र Cn H2n होता है | 
Ex. एथीन 
एथीन का सूत्र : C₂H₄
एथीन का संरचना सूत्र
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एथीन की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना
 
ऐलकाईन  या ऐसीटिलीन – ऐल्काइन में कार्बन-कार्बन है त्रिबंध होता है ऐल्काइन का सामान्य सूत्र 
Cn H2n – 2  होता है |
Ex. एथाइन
H-C ≡ C-H 
सीधी तथा शाखित कार्बन शृंखलाओं के अतिरिक्त कुछ यौगिकों में कार्बन के परमाणु वलय के आकार में व्यवस्थित होते हैं। जैसे, साइक्लोहेक्सेन, बेंजीन 

         साइक्लोहेक्सेन                   बेंजीन 
समजातीय श्रेणी :  यौगिकों की ऐसी शृंखला जिसमें कार्बन श्रृंखला में स्थित हाइड्रोजन को एक ही प्रकार का प्रकार्यात्मक समूह प्रतिस्थापित करता है, उसे समजातीय श्रेणी कहते हैं। समजातीय श्रेणी  के प्रत्येक सदस्य का अपने उतरोत्तर सदस्य से – CH2  का अंतर होता है।
यौगिकों में हाइड्रोजन को प्रतिस्थापित करने वाले तत्वों को विषम परमाणु कहते हैं। यह विषम परमाणु कुछ प्रकार्यात्मक समूहों में भी उपस्थित होते हैं,  किसी कार्बनिक यौगिक में उपस्थित वे समूह जो  यौगिक को विशिष्ट गुण प्रदान करते हैं। उसे प्रकार्यात्मक समूह कहते हैं।
प्रकार्यात्मक समूह का नाम -
विषम परमाणु  यौगिकों का प्रकार        प्रकार्यात्मक समूह
Cl/Br             हैलो -एल्केन                  —Cl, —Br
                      (क्लोरो / ब्रोमो)
ऑक्सीजन        (i) ऐल्कोहॉल                 —OH
                      (ii) ऐल्डिहाइड               
                      (iii) कीटोन                 
                      (iv) कार्बोक्सिलिक अम्ल
कार्बन यौगिकों के रासायनिक गुणधर्म
दहन : कार्बन के सभी यौगिकों को हवा की उपस्थिति में जलाने अर्थात दहन (Combustion) के पश्चात वे कार्बन डाइऑक्साइड, उष्मा  तथा प्रकाश  देते हैं।
C + O₂   →     CO₂   +   ऊष्मा व प्रकाश
CH₄ +   O₂   →    CO₂ + H₂O  +  ऊष्मा व प्रकाश
CH₃–CH₂OH +   O₂ → CO₂ + H₂O  +  ऊष्मा व प्रकाश
संतृप्त हाइड्रोकार्बन स्वच्छ लौ के साथ जलते है जबकि असंतृप्त हाइड्रोकार्बन पीले लौ के साथ जलते है। असंतृप्त हाइड्रोकार्बन को जलाने पर पीले लौ के साथ धुँआ भी उत्पन्न होता है। इस कारण असंतृप्त हाइड्रोकार्बन को हवा की उपस्थिति में जलाने पर बर्तन के पेंदें में काले रंग का पदार्थ जमा हो जाता है, जिसे आम बोल चाल की भाषा में कालिख/कज्जली  कहते हैं। परन्तु संतृप्त हाइड्रोकार्बन को भी जब हवा की सीमित उपस्थिति में जलाया जाता है, तो यह भी  पीले लौ के साथ जलते है, तथा कालिख /कज्जली उत्पन्न करते है। गैस या केरोसीन स्टोव में ईंधन के साथ पर्याप्त मात्रा में हवा जाने के लिये एक या दो छेद बने होते है। कभी कभी जब यह हवा जाने वाला छेद बाधित हो जाता है, तो स्टोव जलाने पर नीली लौ की जगह पीली लौ के साथ साथ कालिख भी उत्पन्न करता है।
कोयला तथा पेट्रोलियम में नाइट्रोजन तथा सल्फर की मात्रा पायी जाती है, जिसके कारण इन्हें जलाने पर ये  सल्फर तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड भी उत्पन्न करते है, जो पर्यावरण में प्रमुख प्रदूषक हैं।
ऑक्सीकरण
कार्बन यौगिक ऑक्सीकारकों की उपस्थिति में सरलता से ऑक्सीकृत हो जाते है, जब एथेनॉल को क्षारीय पोटैशियम परमैगनेट या अम्लीय पोटैशियम डाइक्रोमेट  के साथ गर्म किया जाता है तो यह ऑक्सीकृत होकर एसेटिक अम्ल [एथेनोइक अम्ल] देता है।

वे पदार्थ हैं जो अन्य पदार्थों को ऑक्सीजन प्रदान कर उन्हें ऑक्सीकृत कर देते है हैं। ऑक्सीकारक कहलाते है क्षारीय पोटैशियम परमैगनेट या आम्लिक पोटैशियम डाइक्रोमेट ऑक्सीकारक का कार्य करता है, क्योंकि यह एल्कोहल को ऑक्सीजन देकर है तथा ऑक्सीकृत कर देता है।
संकलन अभिक्रिया
पैलेडियम अथवा निकिल जैसे उत्प्रेरकों की उपस्थिति में असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हाइड्रोजन से अभिक्रिया कर संतृप्त हाइड्रोकार्बन बनाते हैं।

ऐसे पदार्थ जो रासायनिक अभिक्रिया में स्वयं अपरिवर्तित रहते हैं परन्तु अभिक्रिया के वेग को परिवर्तित कर देते है, उत्प्रेरक कहलाते है।
वनस्पति तेलों के हाड्रोजनीकरण में संकलन अभिक्रिया अभिक्रिया का उपयोग होता है। वनस्पति तेलों में असंतृप्त कार्बन शृंखलाएँ होती हैं जबकि जंतु वसा में संतृप्त कार्बन शृंखलाएँ होती हैं। साधारणतः, जंतु वसा में संतृप्त वसा अम्ल होते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माने जाते हैं। जबकि वनस्पति तेल स्वास्थ्य के लिये अच्छा माना जाता है, इसी कारण से खाना पकाने के लिये वनस्पति तेल का उपयोग ज्यादा अच्छा रहता है।
प्रतिस्थापन अभिक्रिया
संतृप्त हाइड्रोकार्बन अधिकांश अभिकारकों के साथ प्रायः अक्रियाशील होते हैं । लेकिन जब संतृप्त हाइड्रोकार्बन सूर्य के प्रकाश उपस्थिति में क्लोरीन के साथ अभिक्रिया करता है, तो प्रतिस्थापन अभिक्रिया होती है, क्लोरीन एक-एक करके हाइड्रोजन परमाणुओं का प्रतिस्थापन कर देती है। जब मेथेन सूर्य के प्रकाश में क्लोरीन के साथ अभिक्रिया करता है, तो मेथाइल क्लोराइड (क्लोरोमेथेन) तथा हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बनाता है।

एथेनॉल
एथेनॉल कमरे के ताप पर द्रव अवस्था में होता है एथेनॉल का सामान्य नाम एथाइल एल्कोहॉल है। एथेनॉल को प्रायः एल्कोहॉल कहा जाता है क्योंकि एथेनॉल सभी एल्कोहोलिक का महत्वपूर्ण अवयव होता है।
1. एथेनॉल की सोडियम के साथ अभिक्रिया
एथेनॉल सोडियम के साथ प्रतिक्रिया कर सोडियम एथोक्साइड तथा हाइड्रोजन गैस बनता है।
2Na + 2CH₃CH₂OH  → 2CH₃CH₂O–Na+ + H
2असंतृप्त हाइड्रोकार्बन का निर्माण
एथेनॉल को सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में 443 K तापमान पर गर्म किया जाता है तो एथेनॉल का निर्जलीरण होकर एथीन बनती है। इस अभिक्रिया में सल्फ्यूरिक अम्ल निर्जलीकारक के रूप में काम करता है जो एथेनॉल से जल को अलग कर देता है।

सजीव प्राणियों पर एल्कोहॉल का प्रभाव
एथेनॉल का अधिक मात्रा में सेवन करने पर उपापचयी क्रिया धीमी हो जाती है तथा केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र कमजोर हो जाता है। इसके कारण समन्वय की कमी हो जाती है, मानसिक दुविधा, अनिद्रा, भावशून्यता आ जाती है मेथनॉल की थोड़ी-सी मात्रा लेने पर मृत्यु हो सकती है। मेथनॉल यकृत में ऑक्सीकृत होकर मेथेनैल बन जाता है। मेथेनैल यकृत की कोशिकाओं के घटकों के साथ शीघ्र अभिक्रिया करने लगता है। इससे प्रोटोप्लाज्म नष्ट होने लगता है। यह चक्षु तंत्रिका को भी प्रभावित करता है और व्यक्ति अंधा हो जाता है। 
एल्कोहॉल की पहचान करने के लिए इसमें रंजक मिलाकर इसका रंग नीला बना दिया जाता है। इसे विकृत एल्कोहॉल कहा जाता है।
एल्कोहॉल में पेट्रोल मिलाकर उसे स्वच्छ इंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। 
एल्कोहॉल अच्छा विलायक है इसलिए इसका उपयोग टिंचर आयोडीन, कफ सीरप जैसी औषधियों में होता है।
एस्टरीकरण अभिक्रिया:  अम्ल एवं एल्कोहॉल की अभिक्रिया से एस्टर का निर्माण होता है जब एथेनोइक अम्ल किसी अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में एथिल एल्कोहॉल से अभिक्रिया करता है  तो एथिल एसिटेट (एस्टर) बनता हैं इस अभिक्रिया को इस अभिक्रिया को एस्टरीकरण कहते है सामान्यतया एस्टर की गंध मृदु होती है। इसका उपयोग इत्र बनाने एवं स्वाद बढ़ाने में किया जाता है।

एथेनोइक अम्ल 
एस्टर सोडियम हाइड्रोक्साइड के साथ अभिक्रिया कर एल्कोहॉल तथा सोडियम लवण (सोडियम एथेनोएट या सोडियम एसिटेट) तथा जल बनाता है। इस अभिक्रिया को साबुनीकरणकहा जाता है क्योंकि इसका उपयोग साबुन बनाने में होता है। साबुन दीर्घ शृंखला वाले कार्बोक्सिलिक अम्लों सोडियम अथवा पोटैशियम लवण होते हैं।

क्षारक के साथ अभिक्रियाः एथेनोइक अम्ल सोडियम हाईड्रोक्साइड के साथ अभिक्रिया कर सोडियम एसिटेट (एसिटेट (लवण) तथा जल बनाता है

एथेनोइक अम्ल की कार्बोनेट तथा हाइड्रोजन कार्बोनेट के साथ अभिक्रिया एथेनोइक अम्ल का कार्बोनेट तथा हाइड्रोजन कार्बोनेट के साथ अभिक्रिया कर लवण, कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल बनाते है।

एथेनोइक अम्ल सोडियम कार्बोनेट के साथ अभिक्रिया कर सोडियम एसिटेट, जल एवं कार्बन डाइऑक्साइड बनाता है। तथा सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट के साथ अभिक्रिया कर सोडियम एसिटेट
कार्बोनेट के साथ अभिक्रिया कर सोडियम एसिटेट, जल एवं कार्बन डाइऑक्साइड बनाता है।

साबुन तथा अपमार्जक
साबुन के अणु लंबी श्रृंखला वाले कार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम एवं पोटैशियम लवण होते हैं। साबुन के अणु में साबुन का आयनिक भाग जल में विलेय होता है इसे जलरागी शिरा कहते है जबकि हाइड्रोकार्बन पूँछ वाला भाग जल में अविलेय होता है इसे जल विरागी शिरा कहते है जब साबुन जल की सतह पर होता है तब इसके अणु अपने को इस प्रकार व्यवस्थित कर लेते हैं कि इसका आयनिक सिरा जल के अन्दर रहता है जबकि हाइड्रोकार्बन पूँछ वाला शिरा जल के बाहर रहता है ऐसा अणुओं का बड़ा गुच्छा बनने के कारण होता है, जिसमें जलविरागी पूँछ गुच्छे के आंतरिक हिस्से में होती है जबकि उसको आयनिक सिरा गुच्छे की सतह पर होता है। इस संरचना को मिसेल कहते हैं।

साबुन कठोर जल में उपस्थित कैल्सियम एवं मैग्नीशियम लवणों से अभिक्रिया कर घुलनशील पदार्थ बनाता है। इसलिए साबुन कठोर जल में झाग नहीं देता है अपमार्जक के अणु कार्बोक्सिलिक अम्ल की लम्बी श्रृंखला वाले अमोनियम या सल्फोनेट लवण होते हैं। सामान्यतः अपमार्जकों का उपयोग शैंपू एवं कपड़े धोने के उत्पाद बनाने में होता है। अपमार्जकों का उपयोग शैंपू एवं कपड़े धोने के उत्पाद बनाने में होता है।कार्बोक्सिलिक अम्ल की लम्बी श्रृंखला वाले अमोनियम या सल्फोनेट लवण होते हैं। सामान्यतः अपमार्जकों का उपयोग शैंपू एवं कपड़े धोने के उत्पाद बनाने में होता है। अपमार्जकों का उपयोग शैंपू एवं कपड़े धोने के उत्पाद बनाने में होता है। अपमार्जकों का उपयोग शैंपू एवं कपड़े धोने के उत्पाद बनाने में होता है।अपमार्जक कठोर जल में उपस्थित कैल्शियम एवं मैग्नीशियम आयनों के साथ अघुलनशील पदार्थ नहीं बनाते हैं। इसलिए कठोर जल में भी झाग देते है

3. धातु एवं अधातु



❖ धातु के भौतिक गुणधर्म 
1. धातुएं सामान्य ताप पर ठोस अवस्था में पाई जाती है परन्तु मर्करी (पारा) एक ऐसी धातु है जो कमरे के ताप पर तरल अवस्था में में पाई जाती हैं। 
2. धातु की सतह चमकदार होती है। धातु के इस गुणधर्म को धात्विक चमक कहते हैं।
3. धातुएं सामान्यता कठोर होती है परन्तु  क्षारीय धातु (लीथियम, सोडियम, पोटैशियम) इतनी मुलायम होती हैं कि उनको चाकू से भी काटा जा सकता है।
3. धातुएँ विद्युत व उष्मा की सुचालक होती हैं सिल्वर तथा कॉपर ऊष्मा के सबसे अच्छे चालक हैं। इनकी तुलना में लेड तथा मर्करी ऊष्मा के कुचालक हैं।
4. धातुओं  का गलनांक बहुत अधिक होता है। परन्तु गैलियम और सीज़ियम का गलनांक बहुत कम है। यदि इन धातुओं को हथेली पर रखा जाए तो तुरंत पिघल जाती है 
5. धातुओं में तन्यता का गुण पाया जाता है धातु के पतले तार के रूप में खींचने की क्षमता को तन्यता कहा जाता है। सोना सबसे अधिक तन्य धातु है। 
6. जब धातुएँ किसी कठोर सतह से टकराती है तो उनसे एक विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। जो धातुएँ कठोर सतह से टकराने पर आवाज़ उत्पन्न करती हैं उन्हें ध्वानिक (सोनोरस) कहते हैं। 
7. धातुओं में आघातवर्ध्यता का गुण पाया जाता है धातुओं को पीटकर पतली चादर बनाया जा सकता है। धातुओं के इस गुणधर्म को आघातवर्ध्यता कहते हैं। 
Example - लोहा,तम्बा, चांदी, सोना ,पारा, एल्युमिनियम, जस्ता आदि 
❖अधातु के भौतिक गुणधर्म 
1.सभी अधातुएं ठोस या गैसीय अवस्था में पाई जाती है परन्तु  ब्रोमीन एक ऐसी अधातु है जो द्रव अवस्था में पाई जाती है 
2. अधातुएं प्रायः भंगुर होती हैं।
3.अधातुओं में चमक नहीं पाई जाता है परन्तु  आयोडीन अधातु होते हुए भी चमकीला होता है।
4.अधातुएँ विद्युत व उष्मा की कुचालक होती हैं। परन्तु ग्रेफाइट  विद्युत व उष्मा का सुचालक होता हैं।
अपररूपता- जब कोई तत्व प्रकृति में विभिन्न रूपों में मिलता है जिनके भौतिक गुणधर्म भिन्न-भिन्न हो , लेकिन रासायनिक गुण समान होते हैं, तो उनको उस तत्व के अपररूप एवं उनके इस गुण को अपररूपता कहते हैं। कार्बन ऐसी अधातु है जो विभिन्न रूपों में पाई जाती है। जिन्हें कार्बन के अपररूप कहते हैं। हीरा, ग्रेफाइट,  फ्लोरीन, कोक, काष्ट चारकोल, जंतु चारकोल, काजल आदि कार्बन के अपररूप है  हीरा सबसे कठोर प्राकृतिक पदार्थ है तथा ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक होता है। 
Example- कार्बन, सल्फर, आयोडीन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन आदि 
❖धातुओं के रासायनिक गुणधर्म
1. धातुओं का वायु में दहन 
लगभग सभी धातुएँ ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया कर धातु के ऑक्साइड बनाती हैं। धातु ऑक्साइड की प्रकृति क्षारकीय होती है।
धातु + ऑक्सीजन   ⟶   धातु ऑक्साइड
Example :-
जब कॉपर को वायु की उपस्थिति में गर्म किया जाता है तो यह ऑक्सीजन के साथ मिलकर काले रंग का कॉपर ऑक्साइड बनाता है।
Cu     +     O₂      ⟶    2CuO
जब ऐलुमिनियम को वायु की उपस्थिति में गर्म किया जाता है तो यह ऑक्सीजन के साथ मिलकर ऐलुमिनियम ऑक्साइड बनाता है।
4Al    +    3O₂     ⟶    2Al₂O₃
सामान्यता धातु ऑक्साइड की प्रकृति क्षारकीय होती है। परन्तु कुछ धातु ऑक्साइड जैसे ऐलुमिनियम ऑक्साइड व जिंक ऑक्साइड अम्लीय तथा क्षारकीय दोनों प्रकार के व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। इन्हें उभयधर्मी ऑक्साइड कहते है
❖ उभयधर्मी ऑक्साइड
ऐसे धातु ऑक्साइड जो अम्ल तथा क्षारक दोनों से अभिक्रिया करके लवण तथा जल प्रदान करते हैं, उभयधर्मी ऑक्साइड कहलाते हैं। उभयधर्मी ऑक्साइड अम्लीय तथा क्षारकीय दोनों प्रकार के व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। जैसे ऐलुमिनियम ऑक्साइड(Al₂O₃) व जिंक ऑक्साइड(ZnO)
अधिकांश धातु ऑक्साइड जल में अघुलनशील हैं लेकिन सोडियम ऑक्साइड एवं पोटैशियम ऑक्साइड जल में घुलकर क्षार प्रदान करते हैं
पोटैशियम तथा सोडियम जैसी कुछ धातुएँ ऑक्सीजन के साथ इतनी तेज़ी से अभिक्रिया करती हैं कि खुले में रखने पर ये आग पकड़ लेती हैं। इसलिए, इन्हें सुरक्षित रखने तथा आकस्मिक आग को रोकने के लिए किरोसिन तेल में डुबो कर रखा जाता है।
सामान्य ताप पर मैग्नीशियम, ऐलुमिनियम, जिंक, लेड आदि धातुओं की सतह पर ऑक्साइड की पतली परत चढ़ जाती है। ऑक्साइड की यह परत धातुओं को पुनः ऑक्सीकरण से सुरक्षित रखती है।
गर्म करने पर आयरन का दहन तो नहीं होता है लेकिन जब बर्नर की ज्वाला में लौह चूर्ण डालते हैं तब वह तेज़ी से जलने लगता है।
कॉपर का दहन तो नहीं होता है लेकिन गर्म धातु पर कॉपर ऑक्साइड की काले रंग की परत चढ़ जाती है।
सिल्वर एवं गोल्ड अत्यंत अधिक ताप पर भी ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया नहीं करते हैं।
ऐनोडीकरण 
ऐलुमिनियम पर मोटी ऑक्साइड की परत बनाने की प्रक्रिया ऐनोडीकरण  कहलाती है। वायु के संपर्क में आने पर ऐलुमिनियम पर ऑक्साइड की पतली परत का निर्माण होता है। ऐलुमिनियम ऑक्साइड की यह परत इसे संक्षारण से बचाती है। इस परत को मोटा करके इसे संक्षारण से अधिक सुरक्षित किया जा सकता है।
2. धातुओं की जल के साथ अभिक्रिया 
जल के साथ अभिक्रिया करके धातुएँ हाइड्रोजन गैस तथा धातु ऑक्साइड उत्पन्न करती हैं। धातु ऑक्साइड जल में धातु हाइड्रॉक्साइड बनाती हैं। 
धातु + जल धातु ऑक्साइड + हाइड्रोजन
धातु ऑक्साइड + जल धातु हाइड्रॉक्साइड
Example -
पोटैशियम एवं सोडियम जैसी धातुएँ ठंडे जल के साथ तेज़ी से अभिक्रिया करती हैं। सोडियम तथा पोटैशियम की अभिक्रिया तेज़ तथा ऊष्माक्षेपी होती है कि इससे उत्सर्जित हाइड्रोजन तत्काल प्रज्ज्वलित हो जाती है।
2K + 2HO → 2KOH + H
2Na + 2HO → 2NaOH + H
जल के साथ कैल्सियम की अभिक्रिया थोड़ी धीमी होती है। यहाँ उत्सर्जित ऊष्मा हाइड्रोजन के प्रज्ज्वलित होने के लिए पर्याप्त नहीं होती है। इस अभिक्रिया में उत्पन्न हाइड्रोजन गैस के बुलबुले कैल्सियम धातु की सतह पर चिपक जाते हैं। अतः कैल्सियम तैरना प्रारंभ कर देता है। 
Ca + 2H⟶ Ca(OH) + H
मैग्नीशियम शीतल जल के साथ अभिक्रिया नहीं करता है परंतु गर्म जल के साथ अभिक्रिया करके वह मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड एवं हाइड्रोजन गैस उत्पन्न करता है। चूँकि हाइड्रोजन गैस के बुलबुले मैग्नीशियम धातु की सतह से चिपक जाते हैं। अतः यह भी तैरना प्रारंभ कर देते हैं। 
2Mg + 2HO → 2Mg(OH) + H
ऐलुमिनियम, आयरन तथा जिंक जैसी धातुएँ न तो शीतल जल के साथ और न ही गर्म जल के साथ अभिक्रिया करती हैं। लेकिन भाप के साथ अभिक्रिया करके यह धातु ऑक्साइड तथा हाइड्रोजन प्रदान करती हैं।
2Al  +  3HO → AlO  + 3HO
3Fe  +   4HO → FeO₃  +  4HO
लेड, कॉपर, सिल्वर तथा गोल्ड जैसी धातुएँ जल के साथ बिलकुल अभिक्रिया नहीं करती हैं।
3. धातु की अम्ल के साथ अभिक्रिया
धातुएँ अम्ल के साथ अभिक्रिया करके संगत लवण तथा हाइड्रोजन गैस प्रदान करती हैं।
अम्ल  + धातु  → लवण ।+ हाइड्रोजन गैस 
Example -
मैग्नीशियम हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के साथ अभिक्रिया करके मैग्नीशियम क्लोराइड और हाइड्रोजन गैस बनाते है |
Mg   HCl   →   MgCl   +   H  
जब धातुएँ नाइट्रिक अम्ल के साथ अभिक्रिया करती हैं तब हाइड्रोजन गैस उत्सर्जित नहीं होती है। क्योंकि HNO₃ एक प्रबल ऑक्सीकारक होता है जो उत्पन्न H को ऑक्सीकृत करके जल में परिवर्तित कर देता है एवं स्वयं नाइट्रोजन के किसी ऑक्साइड में अपचयित हो जाता है। 
मैग्नीशियम एवं मैंगनीज अति तनु HNO के साथ अभिक्रिया कर H गैस उत्सर्जित करते हैं।
ऐक्वा रेजिया (रॉयल जल/अम्लराज) - सांद्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा सांद्र नाइट्रिक अम्ल के 3:1 के अनुपात के ताजा मिश्रण को एक्वा रेजिया कहते है ऐक्वा रेजिया भभकता द्रव होने के साथ प्रबल संक्षारक है। ऐक्वा रेजिया गोल्ड एवं प्लैटिनम को गलाने में समर्थ होता है।
4. धातु की अन्य धातु लवणों के साथ अभिक्रिया 
अधिक अभिक्रियाशील धातु अपने से कम अभि-क्रियाशील धातु को उसके यौगिक के विलयन में से विस्थापित कर देती है।
Example -
जब लोहे की कील को कॉपर सल्फेट के विलयन में डुबोया जाता है तो लोहा कॉपर सल्फेट में से कॉपर को विस्थापित कर देता है और फेरस सल्फेट का निर्माण होता है 
Fe   +  CuSO₄  → FeSO   +  Cu
उपरोक्त अभिक्रिया में अधिक क्रियाशील Fe कम क्रियाशील Cu को उसके यौगिक में से विस्थापित कर देता है
❖ सक्रियता श्रेणी
सक्रियता श्रेणी वह सूची है जिसमें धातुओं को उनकी क्रियाशीलता के अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाता है। 
K पोटैशियम
Na सोडियम
Ca कैल्सियम    सबसे अधिक अभिक्रियाशील
Mg मैग्नीशियम
Al ऐल्युमिनियम                                             
Zn जिंक
Fe आयरन
Pb लेड            मध्यम अभिक्रियाशील
H हाइड्रोजन  
Cu कॉपर
Hg मर्करी
Ag सिल्वर       सबसे कम अभिक्रियाशील
Au सोना
5. धातु एवं अधातु की अभिक्रिया 
धातुओं में इलेक्ट्रोन त्यागकर धनायन बनाने की प्रवृति पाई जाती है तथा अधातुओं में इलेक्ट्रोन ग्रहण का ऋणायन बनाने की प्रवृति पाई जाती है ये धनायन व ऋणायन आपस में जुड़कर आयनिक यौगिको का निर्माण करते है 
Example -
सोडिय क्लोराइड का निर्माण 
सोडियम परमाणु अपनी  बाह्यतम कोश में उपस्थित एक इलेक्ट्रॉन त्यागकर सोडियम धनायन[Na+] बनता है
Na            Na⁺  +   e-
सोडियम        सोडियम  धनायन
2,8,1             2,8
दूसरी ओर, क्लोरीन की बाह्यतम कोश में 7 इलेक्ट्रॉन होते हैं क्लोरीन अपना अष्टक पूर्ण करने के लिए सोडियम द्वारा त्यागा गया एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर लेता है। और क्लोराइड ऋणायन[Cl-] बना लेता है 
Cl   +   e-      Cl⁻
2,8,7                 2,8,8
विपरीत आवेश होने के कारण सोडियम तथा क्लोराइड आयन परस्पर आकर्षित होते हैं तथा मजबूत स्थिरवैद्युत बल में बँधकर सोडियम क्लोराइड का निर्माण करते हैं।

मैग्नीशियम क्लोराइड का निर्माण 
Mg                Mg²⁺  +   2e⁻
2,8,2                  2,8
Cl  +   2e⁻   →    Cl
2,8,7                  2,8,8

आयनिक यौगिक-  धातु से अधातु में इलेक्ट्रॉन के स्थानांतरण से बने यौगिकों को आयनिक यौगिक या वैद्युत संयोजक यौगिक कहा जाता है। 
आयनिक यौगिकों के गुणधर्म
1. भौतिक प्रकृतिः धन एवं ऋण आयनों के बीच मजबूत आकर्षण बल के कारण आयनिक यौगिक ठोस एवं थोड़े कठोर होते हैं। ये यौगिक सामान्यतः भंगुर होते हैं तथा दाब डालने पर टुकड़ों में टूट जाते हैं।
2. गलनांक एवं क्वथनांकः आयनिक यौगिकों का गलनांक एवं क्वथनांक बहुत अधिक होता है क्योंकि मजबूत अंतर-आयनिक आकर्षण को तोड़ने के लिए ऊर्जा की पर्याप्त मात्रा की आवश्यकता होती है।
3. घुलनशीलताः आयनिक यौगिक सामान्यतः जल में घुलनशील तथा किरोसिन, पेट्रोल आदि जैसे विलायकों में अविलेय होते हैं।
4. विद्युत चालकताः ठोस अवस्था में आयनिक यौगिक विद्युत का चालन नहीं करते हैं क्योंकि ठोस अवस्था में दृढ़ संरचना के कारण आयनों की गति संभव नहीं होती है। लेकिन आयनिक यौगिक गलित अवस्था में विद्युत का चालन करते हैं क्योंकि आयनिक यौगिकों के जलीय विलयन में आयन उपस्थित होते हैं। जब विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो यह आयन विपरीत इलैक्ट्रोड की ओर गमन करने लगते हैं। एवं विद्युत का चालन करते हैं।
धातुओं की प्राप्ति 
पृथ्वी की भूपर्पटी धातुओं का मुख्य स्रोत है। समुद्री जल में भी सोडियम क्लोराइड, मैग्नीशियम क्लोराइड आदि जैसे कुछ विलेय लवण उपस्थित रहते हैं। 
खनिज - पृथ्वी की भूपर्पटी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले तत्वों या यौगिकों को खनिज कहते हैं। 
अयस्क - ऐसे खनिज जिनसें धातुएँ आसानी से कम लागत में प्राप्त की जा सकती है अयस्क कहलाते है।
धातुओं का निष्कर्षण
1. सक्रियता श्रेणी में नीचे आने वाली धातुओं का निष्कर्षण 
सक्रियता श्रेणी में नीचे आने वाली धातुएँ जैसे सोना, सिल्वर, प्लैटिनम एवं कॉपर आदि अक्रियाशील होती हैं। अतः प्रकृति में ये धातुएँ स्वतंत्र अवस्था में पाई जाती हैं। कॉपर एवं सिल्वर, अपने सल्फाइड या ऑक्साइड के अयस्क के रूप में संयुक्त अवस्था में भी पाए जाते हैं। इन धातुओं के ऑक्साइड को केवल गर्म करने से ही धातु प्राप्त की जा सकता है। 
Example 
मर्करी के अयस्क सिनाबार से मर्करी का निष्कर्षण 
मर्करी का अयस्क सिनाबार (HgS) है। सिनाबार (HgS) को वायु में गर्म करने पर यह मर्क्यूरिक ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है मर्क्यूरिक ऑक्साइड को अधिक गर्म करने पर यह मर्करी (पारद) में अपचयित हो जाता है। 
2HgS +  3O  --तापन   2HgO  +  2SO
सिनाबार                        मर्क्यूरिक ऑक्साइड
2HgO     ----तापन    2Hg    +   O₂ 
मर्क्यूरिक ऑक्साइड
सक्रियता श्रेणी के मध्य में स्थित धातुओं का निष्कर्षण 
सक्रियता श्रेणी के मध्य की धातुएँ जैसे जिंक,आयरन,लेड आदि की अभिक्रियाशीलता मध्यम होती है। प्रकृति में ये सल्फाइड या कार्बोनेट के रूप में पाई जाती हैं। सल्फाइड या कार्बोनेट अयस्क की तुलना में धातु को उसके ऑक्साइड अयस्क से प्राप्त करना अधिक आसान है। इसलिए पहले धातु के सल्फाइड एवं कार्बोनेट अयस्क को धातु ऑक्साइड में परिवर्तित किया जाता है। 
भर्जन - सल्फाइड अयस्क को वायु की उपस्थिति में अधिक ताप पर गर्म करने से यह ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती है। इस प्रक्रिया को भर्जन कहते हैं”। 
निस्तापन - कार्बोनेट अयस्क को वायु की सीमित  मात्र में अधिक ताप पर गर्म करने से यह ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रक्रिया को निस्तापन कहा जाता है। 
इस प्रकार प्राप्त धातु ऑक्साइड का कार्बन जैसे अपचायक की उपस्थिति में अपचयन करवाने पर धातु प्राप्त होता है इसके अलावा विस्थापन अभिक्रिया का भी उपयोग का भी धातु प्राप्त की जा सकती है। अधिक अभिक्रियाशील धातुएँ जैसे सोडियम, कैल्सियम, ऐलुमिनियम आदि अपने से कम अभिक्रियाशील धातुओं को उनके यौगिकों से विस्थापित कर देते हैं। 
✠थर्मिट अभिक्रिया 
आयरन ऑक्साइड ( FeO )  की एल्युमीनियम साथ अभिक्रिया करवाई जाती है तो अत्यधिक मात्रा में ऊष्मा निकलती है जिससे लोहा धातु गलित अवस्था में प्राप्त होती है इस अभिक्रिया को थर्मिट अभिक्रिया कहते है 
FeO   + Al       →   Fe + AlO  +  ऊष्मा 
इसका अभिक्रिया का उपयोग रेल की पटरी व मशीनी पुर्जों की दरारों को जोड़ने में किया जाता है।
Example:-  जिंक का निष्कर्षण
सर्वप्रथम जिंक  के अयस्कों का भर्जन एवं निस्तापन एवं निस्तापन किया जाता है 
भर्जन 
2ZnS  + 3O   ---तापन    2ZnO+ 2SO
निस्तापन
ZnCO     ----तापन    ZnO+ CO
इस प्रकार प्राप्त जिंक ऑक्साइड का कार्बन जैसे अपचायक की उपस्थिति में अपचयन करवाने पर जिंक प्राप्त होता है 
ZnO  + C  -----तापन   Zn  +  CO
2. सक्रियता श्रेणी में सबसे ऊपर स्थित धातुओं का निष्कर्षण 
अभिक्रियाशीलता श्रेणी में सबसे ऊपर स्थित धातुएँ जैसे सोडियम, मैग्नीशियम, कैल्सियम, ऐलुमिनियम आदि अत्यंत अभिक्रियाशील होती हैं। इसलिए ये स्वतंत्र अवस्था में नहीं रह सकती है इन धातुओं को विद्युत अपघटनी अपचयन द्वारा प्राप्त किया जाता है।
Example
सोडियम क्लोराइड से सोडियम धातु प्राप्त करना 
सोडियम क्लोराइड से सोडियम धातु प्राप्त करने के लिए गलित सोडियम क्लोराइड का विद्युत अपघटन किया जाता है। सोडियम क्लोराइड के विद्युत अपघटन से कैथोड पर सोडियम धातु निक्षेपित हो जाती हैं तथा ऐनोड पर क्लोरीन मुक्त होती है। 
कैथोड पर  Na⁺ + e–     Na
एनोड पर   2Cl⁻           Cl  + 2e–
अयस्कों का समृद्धीकरण
पृथ्वी से निकलने वाले अयस्कों में मिट्टी, रेत आदि जैसी कई अशुद्धिया पाई जाती इन्हें हटाना अयस्कों का समृद्धीकरण कहलाता है।
गैंग - पृथ्वी से प्राप्त खनिज अयस्कों में मिट्टी, रेत आदि कई अशुद्धियाँ होती हैं। धातुओं के निष्कर्षण से पहले अयस्क से अशुद्धियों को हटाना आवश्यक होता है। ये अशुद्धियाँ गैंग कहलाती हैं। ☸
धातुओं का परिष्करण 
अपचयन प्रक्रम से प्राप्त धातुएँ शुद्ध नहीं होती हैं। इनमें अपद्रव्य होती हैं। शुद्ध धातु की प्राप्ति के लिए इन अपद्रव्यों को धातु से हटाना धातुओं का परिष्करण कहा जाता है। धातुओं से अपद्रव्य को विद्युत अपघटनी परिष्करण विधि से हटाया जाता है। 
विद्युत अपघटनी परिष्करण
विद्युत अपघटनी परिष्करण में अशुद्ध धातु को ऐनोड तथा शुद्ध धातु की पतली परत को कैथोड बनाया जाता है। धातु के लवण विलयन का उपयोग विद्युत अपघट्य के रूप में होता है। विद्युत अपघट्य से जब धारा प्रवाहित की जाती है तब ऐनोड पर स्थित अशुद्ध धातु विद्युत अपघट्य में घुल जाती है। तथा इतनी ही मात्रा में शुद्ध धातु विद्युत अपघट्य से कैथोड पर निक्षेपित हो जाती है। विलेय अशुद्धियाँ विलयन में घुल जाती हैं तथा अविलेय अशुद्धियाँ ऐनोड तली पर निक्षेपित हो जाती हैं जिसे ऐनोड पंक कहते हैं। कॉपर, जिंक, सिल्वर, गोल्ड आदि धातुओं का परिष्करण विद्युत अपघटन द्वारा किया जाता है। 
ताँबे का विद्युत अपघटनी परिष्करण
अशुद्ध ताम्बे को ऐनोड तथा शुद्ध ताम्बे की पतली परत को कैथोड बनाया जाता है। कॉपर सल्पेफट का विलयन विद्युत अपघट्य का उपयोग इसमे विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो ऐनोड पर स्थित अशुद्ध ताम्बा कॉपर सल्पेफट में घुल जाता है। तथा इतनी ही मात्रा में शुद्ध ताम्बा कॉपर सल्पेफट से कैथोड पर निक्षेपित हो जाती है। 
चित्र
संक्षारण
जब धातुएँ वायु के संपर्क में आती है तो वायु में उपस्थित गैसों व नमी से अभिक्रिया कर संक्षारित (खराब) हो जाती है इस प्रक्रिया को संक्षारण कहते हैं। 
सिल्वर की वस्तुओं को खुली हवा में छोड़ देने पर काली पड़ जाती है क्योंकि सिल्वर वायु में उपस्थित सल्फर से अभिक्रिया कर अपने ऊपर सिल्वर सल्फाइड की परत बना लेता है। 
कॉपर को वायु छोड़ देने पर इसकी सतह से भूरे रंग की चमक धीरे-धीरे खत्म हो जाती है क्योंकि कॉपर वायु में उपस्थित आर्द्र कार्बन डाइऑक्साइड के साथ अभिक्रिया कर अपनी सतह पर हरे रंग की कॉपर कार्बोनेट की परत बना लेता है  जिससे इसकी सतह से भूरे रंग की चमक धीरे-धीरे खत्म हो जाती है 
यदि लोहे को लंबे समय तक आर्द्र वायु में रखा जाए तो लोहा वायु में उपस्थिति ऑक्सीजन व जल से क्रिया कर फैरिक ऑक्साइड बनता है और लोहे पर फैरिक ऑक्साइड की भूरे रंग की परत चढ़ जाती है जिसे जंग कहते हैं।
संक्षारण से सुरक्षा
1.पेंट करके, तेल लगाकर, ग्रीज़ लगाकर 
2. यशदलेपन द्वारा 
3. क्रोमियम लेपन
4. ऐनोडीकरण
5. मिश्रधातु बनाकर 
यशदलेपन - लोहे एवं इस्पात को जंग से सुरक्षित रखने के लिए उनपर जस्ते की पतली परत चढ़ाने की विधि को यशदलेपन कहते हैं। जस्ते की परत नष्ट हो जाने के बाद भी यशदलेपित वस्तु जंग से सुरक्षित रहती है।
मिश्रधातु
दो या दो से अधिक धातुओं के समांगी मिश्रण को मिश्रातु/ मिश्रधातु कहते हैं। मिश्रधातु के गुण धातु के गुणधर्मों को बेहतर होते है  शुद्ध धातु की अपेक्षा उसके मिश्रातु की विद्युत चालकता तथा गलनांक कम होता है।
Example
1. लोहा का शुद्ध अवस्था में उपयोग नहीं किया जा सकता है । क्योंकि शुद्ध लोहा अत्यन्त नर्म होता है एवं गर्म करने पर सुगमतापूर्वक खिंच जाता है। यदि इसमें थोड़ा कार्बन (0.05 %) मिला दिया जाता है तो यह कठोर तथा प्रबल हो जाता है। वास्तव में, कोई अन्य पदार्थ (धातु या अधातु) मिला कर किसी भी धातु के गुणधर्म बदले जा सकते हैं। 
2. शुद्ध सोने को 24 कैरट कहते हैं तथा यह काफी नर्म होता है। इसलिए आभूषण बनाने के लिए यह उपयुक्त नहीं होता है। इसे कठोर बनाने के लिए इसमे चाँदी या ताँबा मिलाया जाता है। भारत में अधिकांशतः आभूषण बनाने के लिए 22 कैरट सोने का उपयोग होता है।
कांसा- कांसा ताँबा व टिन की मिश्रधातु है। काँसा विद्युत का कुचालक होता हैं
पीतल - पीतल ताँबा व  जस्ते की मिश्र धातु है  
सोल्डर- सोल्डर लेड व टिन की मिश्र धातु  हैं। सोल्डर मिश्रातु का गलनांक बहुत कम होता है इसका उपयोग विद्युत तारों की वेल्डिंग के योग्य बनाता है।
स्टेनलेस इस्पात - स्टेनलेस इस्पात लोहा, निकिल व क्रोमियम की मिश्र धातु है जो कठोर होता है तथा उसमें जंग नहीं लगता है।
अमलगम - पारा तथा अन्य किसी धातु की मिलावट से बनी मिश्रधातु  को अमलगम) कहते हैं 

  1. सबसे अधिक तन्य धातु कौनसी है ?
    सोना
  2. कौनसी धातु विद्युत की सबसे अच्छी चालक होती है
    सिल्वर(चांदी)
  3. कौन अधातु होते हुए भी चमकीला होता है ?
    आयोडीन अधातु होते हुए भी चमकीला होता है।
  4. कौनसी धातु कमरे के ताप पर तरल अवस्था में में पाई जाती हैं ?
    मर्करी (पारा) कमरे के ताप पर तरल अवस्था में में पाई जाती हैं।
  5. कौन अधातु विद्युत व उष्मा का सुचालक होता हैं ?
    ग्रेफाइट विद्युत व उष्मा का सुचालक होता हैं।
  6. खाद्य पदार्थ के डिब्बों पर जिंक की बजाय टिन की परत क्यों होती है ?
    जिंक की अपेक्षा टिन कम अभिक्रियाशील है।
  7. कौनसी अधातु द्रव अवस्था में पाई जाती है ?
    ब्रोमीन एक ऐसी अधातु है जो द्रव अवस्था में पाई जाती है
  8. अमलगम क्या होता है ?
    पारा तथा अन्य किसी धातु की मिलावट से बनी मिश्रधातु को अमलगम कहते हैं
  9. किन धातुओं को चाकू से कटा जा सकता है ?
    क्षारीय धातु (लीथियम, सोडियम, पोटैशियम) इतनी मुलायम होती हैं कि उनको चाकू से भी काटा जा सकता है।
  10. दो सबसे अधिक आघत्वार्ध्य धातुओं के नाम लिखिए 
    सोना और चांदी 
  11. सबसे कठोर प्राकृतिक पदार्थ कौनसा है ?
    हीरा
  12. दो धातुओं के नाम बताएँ जो प्रकृति में मुक्त अवस्था में पाई जाती हैं।
    सोना (Au), प्लैटिनम (Pt)
  13. धातु को उसके ऑक्साइड से प्राप्त करने के लिए किस रासायनिक प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है ?
    अपचयन की प्रक्रिया 
  14. चांदी की वस्तुओं को खुली हवा में छोड़ देने पर काली क्यों पड़ जाती है ?
    चांदी (सिल्वर) की वस्तुओं को खुली हवा में छोड़ देने पर काली पड़ जाती है क्योंकि सिल्वर वायु में उपस्थित सल्फर से अभिक्रिया कर अपने ऊपर सिल्वर सल्फाइड की काली परत बना लेता है।
  15. ताम्बे को वायु छोड़ देने पर इसकी सतह से भूरे रंग की चमक खत्म क्यों हो जाती है ?
    कॉपर वायु में उपस्थित आर्द्र कार्बन डाइऑक्साइड के साथ अभिक्रिया कर अपनी सतह पर हरे रंग की कॉपर कार्बोनेट की परत बना लेता है जिससे इसकी सतह से भूरे रंग की चमक धीरे-धीरे खत्म हो जाती है
  16. स्टेनलेस इस्पात (स्टील) कैसे बनाया जाता है
    लोहे के साथ निकल एवं क्रोमियम मिलकर स्टेनलेस इस्पात बनाया जाता है जो कठोर होता है तथा उसमें जंग नहीं लगता है।
  17. लोहा का शुद्ध अवस्था में उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता है ।लोहे को कठोर बनाने के लिए इसमें में क्या मिलाया जाता है
    शुद्ध लोहा अत्यन्त नर्म होता है एवं गर्म करने पर सुगमतापूर्वक खिंच जाता है। इसलिए लोहा का शुद्ध अवस्था में उपयोग नहीं किया जा सकता है लोहे को कठोर बनाने के लिए इसमें में कार्बन (0.05 %) मिलाया जाता है
  18. पारद (मर्करी) के  अयस्क का नाम एवं रासायनिक सूत्र लिखें।
    अयस्क - सिनेबार
    सूत्र - HgS
  19. अयस्कों के समृद्धीकरण से क्या तात्पर्य है ?
    पृथ्वी से निकलने वाले अयस्कों में मिट्टी, रेत आदि जैसी कई अशुद्धिया हटाना अयस्कों का समृद्धीकरण कहा जाता है।
  20. यशदलेपन से क्या अभिप्राय है ?
    लोहे एवं इस्पात को जंग से सुरक्षित रखने के लिए उनपर जस्ते की पतली परत चढ़ाने की विधि को यशदलेपन कहते हैं। जस्ते की परत नष्ट हो जाने के बाद भी यशदलेपित वस्तु जंग से सुरक्षित रहती है।
  21. ऐनोड पंक किसे कहते है ?
    जब धातुओं को विद्युत अपघटनी परिष्करण विधि से शुद्ध किया जाता है तो विलेय अशुद्धियाँ विलयन में घुल जाती हैं तथा अविलेय अशुद्धियाँ ऐनोड तली पर निक्षेपित हो जाती हैं जिसे ऐनोड पंक कहते हैं।
  22. प्लैटिनम, सोना एवं चाँदी का उपयोग आभूषण बनाने के लिए क्यों किया जाता है।
    प्लैटिनम, सोना एवं चाँदी धातुएँ अघातवर्धनीय तथा तन्य होते हैं, जिसके कारण इन्हें पीटकर पतले शीट तथा खींचकर तार का रूप दिया जा सकता है। साथ ही ये धातुएँ बहुत ही कम अभिक्रियाशील हैं अतः ये वायुमंडल में उपस्थित ऑक्सीजन, नमी एवं अम्ल के साथ आसानी से अभिक्रिया नहीं कराती है 
  23. सोडियम को केरोसीन में डुबोकर क्यों रखा जाता है ?
    सोडियम ऑक्सीजन के साथ इतनी तेज़ी से अभिक्रिया करती हैं कि खुले में रखने पर ये आग पकड़ लेती हैं। इसलिए इसे सुरक्षित रखने तथा आकस्मिक आग को रोकने के लिए किरोसिन तेल में डुबो कर रखा जाता है।
  24. एक्वारेजिया से क्या समझते हैं? इसके क्या उपयोग हैं ?
    सांद्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा सांद्र नाइट्रिक अम्ल के 3:1 के अनुपात के ताजा मिश्रण को एक्वा रेजिया कहते है ऐक्वा रेजिया भभकता द्रव होने के साथ प्रबल संक्षारक है। ऐक्वा रेजिया गोल्ड एवं प्लैटिनम को गलाने में समर्थ होता है।
  25. आघातवर्ध्यता व तन्यता को परिभाषित कीजिए
    धातुओं को पीटकर पतली चादर बनाया जा सकता है। धातुओं के इस गुणधर्म को आघातवर्ध्यता कहते हैं धातु के पतले तार के रूप में खींचने की क्षमता को तन्यता कहा जाता है। सोना सबसे अधिक तन्य धातु है।
  26. ध्वानिक (सोनोरस) किसे कहते हैं ?
    जब धातुएँ किसी कठोर सतह से टकराती है तो उनसे एक विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। जो धातुएँ कठोर सतह से टकराने पर आवाज़ उत्पन्न करती हैं उन्हें ध्वानिक (सोनोरस) कहते हैं।
  27. खनिज व अयस्क को परिभाषित कीजिए 
    खनिज - पृथ्वी की भूपर्पटी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले तत्वों या यौगिकों को खनिज कहते हैं।
    अयस्क - ऐसे खनिज जिनसें धातुएँ आसानी से कम लागत में प्राप्त की जा सकती है अयस्क कहलाते है।
  28. आयनिक यौगिकों के गलनांक उच्च क्यों होते हैं ?
    आयनिक यौगिकों का गलनांक एवं क्वथनांक बहुत अधिक होता है क्योंकि मजबूत अंतर-आयनिक आकर्षण को तोड़ने के लिए ऊर्जा की पर्याप्त मात्रा की आवश्यकता होती है।
  29. गैंग किसे कहते है ?
    पृथ्वी से प्राप्त खनिज अयस्कों में मिट्टी, रेत आदि कई अशुद्धियाँ होती हैं। धातुओं के निष्कर्षण से पहले अयस्क से अशुद्धियों को हटाना आवश्यक होता है। ये अशुद्धियाँ गैंग कहलाती हैं।
  30. सक्रियता श्रेणी क्या है ?
    इसका अभिक्रिया का उपयोग रेल की पटरी व मशीनी पुर्जों की दरारों को जोड़ने में किया जाता है।
    सक्रियता श्रेणी वह सूची है जिसमें धातुओं को उनकी क्रियाशीलता के अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाता है।
  31. सोल्डर मिश्रातु के अवयव (घटक) कौन – कौन से हैं? सोल्डर का कौन – सा गुण इसे बिजली के तारों की वेल्डिंग करने के योग्य बनाता है?
    सोल्डर मिश्रातु के घटक लेड एवं टिन हैं। सोल्डर मिश्रातु का निम्न गलनांक इसे इलेक्ट्रिक तार की वेल्डिंग के योग्य बनाता है।
  32. उभयधर्मी ऑक्साइड किसे कहते है दो उभयधर्मी ऑक्साइड के नाम लिखिए 
    ऐसे धातु ऑक्साइड जो अम्ल तथा क्षारक दोनों से अभिक्रिया करके लवण तथा जल प्रदान करते हैं, उभयधर्मी ऑक्साइड कहलाते हैं। उभयधर्मी ऑक्साइड अम्लीय तथा क्षारकीय दोनों प्रकार के व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। जैसे ऐलुमिनियम ऑक्साइड(Al₂O₃) व जिंक ऑक्साइड(ZnO)
  33. जंग क्या होता है ? लोहे को जंग से बचने के तरीके लिखिए
    यदि लोहे को लंबे समय तक आर्द्र वायु में रखा जाए तो लोहा वायु में उपस्थिति ऑक्सीजन व जल से क्रिया कर फैरिक ऑक्साइड बनता है और लोहे पर फैरिक ऑक्साइड की भूरे रंग की परत चढ़ जाती है जिसे जंग कहते हैं।
    1.पेंट करके
    2.तेल लगाकर
    3.ग्रीज़ लगाकर 
  34. संक्षारण से बचने की विधियों के नाम लिखिए ।
    1.पेंट करके, तेल लगाकर, ग्रीज़ लगाकर
    2. यशदलेपन द्वारा
    3. क्रोमियम लेपन
    4. ऐनोडीकरण
    5. मिश्रधातु बनाकर
  35. कैल्सियम या मैग्नीशियम धातु की जल के साथ अभिक्रिया करने पर ये तैरने क्यों लगते है ?
    जब कैल्सियम या मैग्नीशियम धातु जल के साथ अभिक्रिया करते है तो हाइड्रोजन उत्पन्न होती है यह हाइड्रोजन गैस के बुलबुले कैल्सियम या मैग्नीशियम धातु की सतह पर चिपक जाते हैं। जिससे कैल्सियमया मैग्नीशियम धातु तैरना प्रारंभ कर देता है।
  36. ऐनोडीकरण किसे कहते है इसके क्या उपयोग है ?
    ऐलुमिनियम पर मोटी ऑक्साइड की परत बनाने की प्रक्रिया ऐनोडीकरण कहलाती है। वायु के संपर्क में आने पर ऐलुमिनियम पर ऑक्साइड की पतली परत का निर्माण होता है। ऐलुमिनियम ऑक्साइड की यह परत इसे संक्षारण से बचाती है। इस परत को मोटा करके इसे संक्षारण से अधिक सुरक्षित किया जा सकता है।
  37. मिश्रधातु किसे कहते है दो मिश्र धातुओं का उदहारण दीजिए
    दो या दो से अधिक धातुओं के समांगी मिश्रण को मिश्रातु/ मिश्रधातु कहते हैं। मिश्रधातु के गुण धातु के गुणधर्मों को बेहतर होते है शुद्ध धातु की अपेक्षा उसके मिश्रातु की विद्युत चालकता तथा गलनांक कम होता है।
    कांसा- कांसा ताँबा व टिन की मिश्रधातु है। काँसा विद्युत का कुचालक होता हैं
    पीतल - पीतल ताँबा व जस्ते की मिश्र धातु है
  38. धातुएं अम्ल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोजन गैस उत्पन्न कराती है परन्तु धातुएँ नाइट्रिक अम्ल के साथ अभिक्रिया करती हैं तब हाइड्रोजन गैस उत्सर्जित नहीं होती है। क्यों
    जब धातुएँ नाइट्रिक अम्ल के साथ अभिक्रिया करती हैं तब हाइड्रोजन गैस उत्सर्जित नहीं होती है। क्योंकि HNO₃ एक प्रबल ऑक्सीकारक होता है जो उत्पन्न H₂ को ऑक्सीकृत करके जल में परिवर्तित कर देता है एवं स्वयं नाइट्रोजन के किसी ऑक्साइड में अपचयित हो जाता है।
  39. भर्जन व निस्तापन को परिभाषित कीजिए
    भर्जन - सल्फाइड अयस्क को वायु की उपस्थिति में अधिक ताप पर गर्म करने से यह ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती है। इस प्रक्रिया को भर्जन कहते हैं”।
    2ZnS + 3O₂ ---तापन → 2ZnO+ 2SO₂
    निस्तापन - कार्बोनेट अयस्क को वायु की सीमित मात्र में अधिक ताप पर गर्म करने से यह ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रक्रिया को निस्तापन कहा जाता है।
    ZnCO₃ ----तापन → ZnO + CO₂
  40. शुद्ध सोना कितने कैरट  होता है इसे कठोर बनाने के लिए इसमे क्या मिलाया जाता है
    शुद्ध सोने को 24 कैरट होता हैं तथा यह काफी नर्म होता है। इसलिए आभूषण बनाने के लिए यह उपयुक्त नहीं होता है। इसे कठोर बनाने के लिए इसमे चाँदी या ताँबा मिलाया जाता है। भारत में अधिकांशतः आभूषण बनाने के लिए 22 कैरट सोने का उपयोग होता है।
  41. निम्नलिखित अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए
    (i) आयरन की भाप के साथ अभिक्रिया
    3Fe + 4H₂0 → Fe₃0₄ +4H₂
    (ii) जल की कैल्शियम/पोटेशियम के साथ अभिक्रिया
    Ca + 2H₂0 → Ca(OH)₂ + H₂
    2K + 2H₂0 → 2KOH + H₂
  42. थर्मिट अभिक्रिया क्या है?
    आयरन ऑवसाइड ( Fe₂O₃ ) की एल्युमीनियम साथ अभिक्रिया करवाई जाती है तो अत्यधिक मात्रा में ऊष्मा निकलती है जिससे लोहा धातु गलित अवस्था में प्राप्त होती है इस अभिक्रिया को थर्मिट अभिक्रिया कहते है
    Fe₂O₃ + Al → Fe + Al₂O₃ + ऊष्मा
  43. अपररूपता किसे कहते हैं कार्बन के अपरूपो के नाम लिखिए
    जब कोई तत्व प्रकृति में विभिन्न रूपों में मिलता है जिनके भौतिक गुणधर्म भिन्न-भिन्न हो , लेकिन रासायनिक गुण समान होते हैं, तो उनको उस तत्व के अपररूप एवं उनके इस गुण को अपररूपता कहते हैं। हीरा, ग्रेफाइट, फ्लोरीन, कोक, काष्ट चारकोल, जंतु चारकोल, काजल आदि कार्बन के अपररूप है
  44. धातु व अधातु के भौतिक गुणों की तुलन कीजिये
    (1) धातुएं सामान्य ताप पर ठोस अवस्था में पाई जाती है परन्तु मर्करी (पारा) एक ऐसी धातु है जो कमरे के ताप पर तरल अवस्था में में पाई जाती हैं। जबकि सभी अधातुएं ठोस या गैसीय अवस्था में पाई जाती है ब्रोमीन एक ऐसी अधातु है जो द्रव अवस्था में पाई जाती है
    (2) धातुएँ तन्य तथा आधातवर्ध्य होती हैं। जबकि अधातुएं प्रायः भंगुर होती हैं।
    (3) धातु की सतह चमकदार होती है। धातु के इस गुणधर्म को धात्विक चमक कहते हैं। जबकि अधातुओं में चमक नहीं पाई जाता है आयोडीन अधातु होते हुए भी चमकीला होता है।
    (4) धातुएँ विद्युत व उष्मा की सुचालक होती हैं जबकि ग्रेफाइट को छोड़कर सभी अधातुएँ विद्युत व उष्मा की कुचालक हैं।
    (5) धातुओं के गलनांक बहुत अधिक होते हैं। जबकि अधातुओं के गलनांक धातुओं की अपेक्षा कम होते हैं।
    लोहा,तम्बा, चांदी, सोना ,पारा, एल्युमिनियम, जस्ता आदि धातुओं के उदहारण है जबकि कार्बन, सल्फर, आयोडीन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन आदि अधतुओं के उदहारण है
  45. सक्रियता श्रेणी में नीचे आने वाली धातुओं का निष्कर्षण कैसे किया जाता है ?
    सक्रियता श्रेणी में नीचे आने वाली धातुएँ प्रकृति में ये धातुएँ स्वतंत्र अवस्था में पाई जाती हैं। इन धातुओं के ऑक्साइड को केवल गर्म करने से ही धातु प्राप्त की जा सकता है।
    Example
    मर्करी के अयस्क सिनाबार से मर्करी का निष्कर्षण
    मर्करी का अयस्क सिनाबार(HgS) है। सिनाबार(HgS) को वायु में गर्म करने पर यह मर्क्यूरिक ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है मर्क्यूरिक ऑक्साइड को अधिक गर्म करने पर यह मर्करी (पारद) में अपचयित हो जाता है।
    2HgS + 3O₂ --तापन→ 2HgO + 2SO₂
    मर्क्यूरिक ऑक्साइड मर्क्यूरिक ऑक्साइड
    2HgO --- -तापन→ 2Hg + O₂
    मर्क्यूरिक ऑक्साइड