GSSS BINCHAWA

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राजस्थान का साहित्य

   राजस्थानी साहित्य की प्रमुख विधाएँ

प्रकाश -  किसी वंश अथवा व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों या घटना विशेष पर प्रकाश डालने वाली कृतियां प्रकाश कहलाती है
वचनिका - यह एक गद्य-पद्य तुकान्त रचना होती है। यह  साहित्य की वह विद्या जिसमें कथा सूत्र को पद्य और गद्य के साथ पिरोया  जाता है कथा ना तो पूर्ण रुपेन पद्य में होती है और ना ही पूर्ण रुपेन  गद्य  में, लेकिन इसमें पद्य  की प्रधानता होती है इसमें गद्य पद्य का मिश्रण( चंपू साहित्य )होता है  वचनिका मुख्यत अपभ्रंश मिश्रित राजस्थानी में लिखी हुई है ।
मरस्या - यह राजा या किसी व्यक्ति विशेष को मृत्योपरांत शोक व्यक्त करने के लिए रचित काव्य शैली है ।
दवावैत - यह उर्दू-फारसी की शब्दावली से युक्त राजस्थानी कलात्मक लेखन-शैली है, जिसमें किसी की प्रशंसा दोहों के रूप में की जाती है।
रासो - राजाओं की प्रशंसा में लिखे गए काव्य ग्रन्थ, जिनमें उनके युद्ध अभियानों व वीरतापूर्ण कृत्यों के विवरण के साथ-साथ उनके राजवंश का विवरण भी मिलता है। 
वेलि - राजस्थानी वेलि साहित्य में यहाँ के शासकों एवं सामन्तों की वीरता,
इतिहास, विद्वता, उदारता, प्रेम-भावना, स्वामिभक्ति आदि घटनाओं का उल्लेख होता है। 
ख्यात - ऐसा ग्रन्थ, जिनकी रचना तत्कालीन शासकों ने अपनी मान-मर्यादा एवं वंशावली के चित्रण हेतु करवाई, ख्यात कहलाती हैं।

वंशावली - इसमें राजवंशों की वंशावलियाँ विस्तृत विवरण सहित लिखी गई हैं
वात - वात का अर्थ कथा या कहानी से है। 
विगत - यह भी इतिहास परक ग्रन्थ लेखन की शैली है। मारवाड़ रा परगना री
विगत इस शैली की प्रमुख रचना है।
राजस्थानी साहित्य की शैलियाँ
डिंगल - पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी) के साहित्यिक स्वरूप को 'डिंगल' कहा जाता है। 
डिंगल वीर रसात्मक साहित्य है।
राजस्थान साहित्य की डिंगल शैली का अधिकांश साहित्य चारण-साहित्यकारों ने लिखा है।
पिंगल पिंगल ब्रज भाषा एवं पूर्वी राजस्थान का साहित्यिक रूप है।
पिंगल श्रृंगार साहित्य है।
पिंगल भाषा के अधिकांश साहित्य भाट जाति के कवियों द्वारा लिखे गये है।

राजस्थान का रासो साहित्य
1. खुमाण रासो - यह ग्रंथ दलपत विजय द्वारा राजस्थानी भाषा मे लिखा गया है।
इसमें मेवाड़ के बप्पा रावल से लेकर राजसिंह तक के इतिहास की जानकारी मिलती है।

इसमें मेवाड़ के बप्पा रावल से लेकर राजसिंह तक के इतिहास की जानकारी मिलती है।
2. बीसलदेव रासो - ह ग्रंथ संवत् 1212 में नरपति नाल्ह द्वारा राजस्थानी (डिंगल) में लिखा गया हैं यह श्रृंगार रस का काव्य है
इस ग्रंथ में अजमेर के बीसलदेव चौहान तथा परमार राजा भोज की पुत्री राजमती की प्रेम कहानी का वर्णन मिलता है।
हिंदी में बारहमासा का सर्वप्रथम वर्णन इसी ग्रंथ में हुआ
बीसलदेव रासो का नायक बीसलदेव व नायिका राजमती है
यह विरह प्रधान काव्य है बीसलदेव रासो के चार खण्ड है-
प्रथम खण्ड :- मालवा के परमार भोज की पुत्री राजमती से शाकम्भरी नरेश बीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ ) के विवाह का वर्णन,
द्वितीय खण्ड :- बीसलदेव का राजमती से रूठकर उड़ीसा जाना,
तृतीय खण्ड खण्ड :- राजमती का विरह-वर्णन
चतुर्थ :- भोजराज द्वारा अपनी पुत्री को वापस ले आना; बीसलदेव को वहाँ से चित्तौड़ लाने का प्रसंग।

3. हम्मीर रासो (संस्कृत)- इसकी रचना शारंगधर ने 13 वीं शताब्दी में की  
यह रणथम्भोर के राव हमीर देव की शौर्य गाथा है 
4. परमाल रासो - परमाल रासो के रचयिता चंदेल वंशी राजा परमर्दिदेव के दरबारी कवि जगनिक थे।
परमाल रासो में आल्हा व ऊदल नामक दो क्षत्रिय सामंतो की वीरता का वर्णन किया गया है।
परमाल रासो को आल्हाखण्ड़ के नाम से भी जाना जाता है।
5. विजयपाल रासो- विजयपाल रासौ  विजयगढ (करौली) नरेश विजयपाल के कवि नल्लसिंह भट्ट द्वारा रचित पिंगल भाषा का काव्य है 
यह वीर रसात्मक ग्रंथ है जिसमें विजयगढ (करौली) के शासक विजयपाल यादव की दिग्विजयों का वर्णन है।
6. पृथ्वीराज रासो - यह ग्रंथ पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चन्द्रबरदाई द्वारा डिंगल व पिंगल का मिश्रित ग्रन्थ  है
पृथ्वीराज रासो, पृथ्वीराज चौहान के जीवन और चरित्र का वर्णन करता हिंदी भाषा पहला महाकाव्य हैं
इसमें 4 राजपुत वंशों - गुर्जर-प्रतिहार , परमार , सोलंकी ( चालुक्य ) व चौहानों की उत्पत्ति गुरु वशिष्ठ विश्वामित्र आदि के अग्निकुण्ड से बताई गयी है।
प्रसिद्ध उक्ति 'चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ठ प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान' इसी ग्रंथ की है।
पृथ्वीराज रासो में 69 सर्ग हैं।
पृथ्वीराज रासो वीर रस प्रधान काव्य है परन्तु इसमे श्रृंगार रस का भी प्रयोग हुआ है
पृथ्वीराज रासो को चंदबरदाई का पुत्र जल्हण ने पुर्ण किसने कियाइसमें कयमास /कैमास वध, संयोगिता हरण एवं तराईन युध्द का विस्तृत वर्णन किया गया है।
7. सगत रासो - गिरधर आसिया द्वारा रचित इस डिंगल ग्रंथ में महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्तिसिंह का वर्णन है। यह डिंगल भाषा में लिखा गया प्रमुख रासौ ग्रंथ है।
राजस्थान का ख्यात  साहित्य
1. मुहणौत नैणसी री ख्यात - यह मुहणौत नैणसी द्वारा संवत् 1709 में  राजस्थानी (ड़िंगल) भाषा मे लिखी गई ख्यात है।
मुंशी देवी प्रसाद ने नैणसी क़ो ' राजपुताने का अबुल फजल ' कहा है।
इस ख्यात मे समस्त राजपुताने के साथ ही जोधपुर के राठौड़ौं का विस्तृत इतिहास लिखा गया है।
इस ख्यात मे राजपुतो की 36 शाखाओं का वर्णन किया गया है
मुहणौत नैणसी री ख्यात राजस्थान की सबसे प्राचीन ख्यात है।
इस ख्यात की तुलना बाबरनामा से की जाती है।
इस ग्रंथ को जनगणना का अग्रज माना जाता है क्योंकि इस ग्रंथ ने सर्वप्रथम जनगणना के आंकडे प्रस्तुत किये थे।
2. मारवाड़ रा परगना री विगत ' ( गावां री ख्यात ) - नैणसी की दुसरी कृति ' मारवाड़ रा परगना री विगत ' ( गावां री ख्यात ) है जो ख्यात जितनी ही बड़ी है इसे ' सर्वसंग्रह ' भी कहते है। इसमें जोधपुर राज्य की सामाजिक, आर्थिक व प्रशासनिक स्थिति का उल्लेख मिलाता है इसलिये इसे ' राजस्थान का गजट ' भी कहा जाता है।
इसमे जनगणना का उल्लेख मिलाता है 
3. बांकीदास री ख्यात - इस ख्यात के लेखक जोधपुर के महाराजा मानसिंह राठौड़ के दरबारी बांकीदास थे
इसे ' जोधपुर राज्य की ख्यात भी कहा जाता है।
यह मारवाड़ी एवं डिंगल भाषा (राजस्थानी गद्य) में लिखी गई है।
बांकीदास री ख्यात में राजस्थान में कन्या वध रोकने के बारे में वर्णन किया गया है।
बांकीदास ने ' आयो अंगरेज मुलक रे ऊपर ' शीर्षक गीत से राजपुत राजाओं को अंग्रेजों के खिलाफ ललकारा।
बांकीदास की ख्यात में जोधपुर के राठौड़ौं के साथ अन्य वंशो का भी इतिहास दिया गया है।
इस ख्यात में जयपुर व जोधपुर की स्थापना के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। प्रामाणितकर्ता की दृष्टि से यह राजस्थान की अन्य ख्यातों की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय है।
4. बीकानेर रा राठौड़ा री ख्यात /दयालदास री ख्यात - इस ख्यात के लेखक बीकानेर के शासक रतनसिंह का दरबारी दयालदास है । बीकानेर रा राठौड़ा री ख्यात में बीकानेर के राठौड़ शासकों की जानकारी मिलती है।
बीकानेर रा राठौड़ा री ख्यात को बीकानेर के दयालदास री ख्यात भी कहा जाता है।
ख्यात में यह भी जानकारी प्राप्त होती है कि गया के तीर्थ स्थान पर बीकानेर के राजा रतन सिंह ने अपने सामन्तों को भविष्य में कन्याओं का वध नहीं की शपथ दिलवाई थी
यह मारवाडी ( डिंगल ) भाषा मे लिखी गयी एक विस्तृत ख्यात है।
इसमें बीकानेर के महाराजा सुजानसिंह  से लेकर महाराजा रतनसिंह तक का इतिहास लिखा गया है।
5. मुण्डियार री ख्यात - राव सीहा के द्वारा मारवाड में राठौड़ राज्य की स्थापना से लेकर महाराजा जसवंत सिंह प्रथम तक का वृत्तांत मिलता है।
यह ख्यात मारवाड़ के राठोड़ों का इतिहास बताती है 
इस ख्यात में प्रत्येक राजा के जन्म , राज्याभिषेक , मृत्यु तक की तारीखें दी गयी है।
यह ख्यात महाराजा जसवंतसिंह प्रथम के काल में लिखी गयी है।
प्रत्येक राजा के कितनी रानीयां थी और उनके कौन- कौनसी संतानें हुई इसका भी उल्लेख इस ख्यात में है।
इस ख्यात मे यह भी लिखा है कि अकबर के पुत्र सलीम की मां जोधाबाई मोटाराजा उदयसिंह की दत्तक बहिन थी , जिनकी माता मालदेव की दासी थी।
राजस्थानी साहित्य की वाचनिकाएं
1 . अचलदास खींची री वचनिका - अचलदास खींची री वचनिका के रचयिता शिवदास गाडण है। यह गद्य और पद्य की मिश्रित रचना है 
इस ग्रंथ से मांडू के सुल्तान हौशंगशाह व गागरौन के शासन अचलदास खींची के मध्य हुए युद्ध का वर्णन मिलता है इसके दो भाग है प्रथम भाग में सुल्तान हौशंगशाह द्वारा किले पर हमला एवं दूसरे भाग में राजपूत नारियों के जौहर का वर्णन है 
2. राठौड़ रतनसिंह महेसदासोत री वचनिका- जग्गा खिडि़या ने इस ग्रन्थ की रचना डिंगल भाषा में की । इसे रतन रासो भी कहते है 
इस ग्रंथ में जोधपुर शासक जसवंतसिंह के नेतृत्व में मुगल सेना एवं औरंगजेव व मुराद की संयुक्त सेना के बीच हुए धरमत (उज्जैन) के युद्ध में राठौड़ रतनसिंह के वीरतापुर्ण युद्ध एवं बलिदान का वर्णन है।
राजस्थान के संस्कृत साहित्य 
1. हमीर महाकाव्य - नयनचंद्र सूरी द्वारा रचित इस महाकाव्य में रणथंभौर के चैहान शासकों विशेषकर राव हमीर देव चैहान की वीरता एवं उसका अलाउद्धीन खिलजी के साथ हुए युद्ध का वर्णन है।
2. पृथ्वीराज विजय - पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के रचयिता पृथ्वीराज के दरबारी जयनायक है
पृथ्वीराज विजय एक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ है
इसमें अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान तृतीय के गुणों व पराक्रम का वर्णन किया गया है
सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समकालीन कवि जयानक ने 'पृथ्वीराज विजय' में अजमेर नगर के सौंदर्य और वैभव का सुंदर वर्णन किया है।
इसमें पृथ्वीराज चौहान के पूर्वजों की वंशावली दी गई है:
3. राजवल्लभ - राजवल्लभ की रचना महाराणा कुंभा के प्रधान सूत्रधार (सुथार) तथा मूर्तिशास्त्री शिल्पी मंडन ने संस्कृत भाषा में की
इस ग्रंथ में तात्कालिन समय की वास्तुकला व शिल्पकला का पता चलता है।
4. सुर्जन चरित्र- कवि चंद्रशेखर द्वारा रचित इस ग्रंथ मं बूदी रियासत के शासक राव सुर्जन हाड़ा के चरित्र का वर्णन किया गया है।
5. प्रबन्ध चिन्तामणि- प्रबन्ध चिन्तामणि की रचना आचार्य मेरुतुंगाचार्य ने संस्कृत भाषा में की
'प्रबन्ध चिन्तामणि' जैन साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
6. अमरकाव्य वंशावली - इसकी रचना रणछोड़दास भट्ट ने की
इस ग्रंथ में मेवाड़ सिसोदिया शासकों की उपलब्धियों का वर्णन मिलता है।
राजस्थान की अन्य साहित्यक रचना 
1. ढोला मारू रा दूहा - ‘ढोला मारू रा दूहा’ के रचियता कवि कल्लोल है
श्रृंगार रस से परिपूर्ण इस ग्रंथ में गागरोन के शासक ढोला व मारवण के प्रेम प्रसंग का वर्णन है।
2. वेलि क्रिसन रूकमणी री - बेलि किसन रुकमणी री की रचना पृथ्वीराज राठौड़ ने डिंगल शैली में की
इस ग्रंथ में श्रीकृष्ण एवं रूकमणि के विवाह की कथा का वर्णन किया गया है।दुरसा आढा ने इस ग्रंथ को 5 वां वेद एवं 19 वां पुराण कहा है। यह राजस्थान में श्रृंगार रस की सर्वश्रेष्ठ रचना है।
कर्नल जैम्स टॉड ने इसे अस सहस्त्र घोड़ो का बल कहा 
3. वंश भास्कर - वंश भास्कर उन्नीसवीं शताब्दी (संवत् 1840) में रचित एक प्रसिद्ध काव्य है।
वंश भास्कर की रचना बूँदी के हाड़ा शासक महाराव रामसिंह के दरबारी चारण कवि सूर्यमल्ल मिश्रण द्वारा की गई इस ग्रन्थ को सूर्यमल मिश्रण के दत्तक मुरारीदान ने पूर्ण किया
इस ग्रंथ में बूंदी का पद्यात्मक इतिहास मिलता है  
इसे विश्वकोषीय ऐतिहासिक ग्रन्थ कहा जाता है
4. वीरसतसई - वीरसतसई की रचना सूर्यमल मिश्रण ने डिंगल भाषा में की थी
इस ग्रंथ से बूंदी के हाड़ा शासकों के इतिहास, उनकी उपलब्धियों व अंग्रेज विरेाधी भावना की जानकारी मिलती है। 
वीरसतसई अंग्रेजी दासता के विरुद्ध लिखा गया ग्रन्थ है 
इस ग्रन्थ में 1857 की क्रांति की घटनाओं का वर्णन किया गया है 
इस ग्रन्थ को सूर्यमल मिश्रण के दत्तक मुरारीदान ने पूर्ण किया
5. सूरज प्रकाश- जोधपुर महाराजा अभयसिंह के दरबारी कवि करणीदान कविया द्वारा रचित इस ग्रंथ में जोधपुर के राठौड़ वंश के प्रारंभ से लेकर महाराजा अभयसिंह के समय तक की घटनाओं का वर्णन है।
6. राव जैतसी रो छंद - राव जैतसी रो छन्द के रचयिता वीठू सूजा हैं
इस ग्रंथ से बीकानेर पर बाबर के पुत्र कामरान द्वारा किए गए आक्रमण एवं बीकानेर के शासक राव जैतसी (जेत्रसिंह) द्वारा उसे हराये जाने का महत्वपूर्ण वर्णन मिलता हैं।
7. ढोला मारवणी री चैपाई (चड़पही) - ढोला मारवणी री चौपाई ग्रंथ की रचना कवि हरराज ने की थी। इस ग्रंथ की रचना जैसलमेर के यादवी वंशी शासको के मनोरंजन के लिए की गई थी।
8. कान्हड़दे प्रबंध - कान्हड़देव प्रबंध’ ग्रंथ की रचना संवत् 1512 में पद्मनाभ ने की थी।
समें कान्हड़देवे व अलाउद्धीन खिल्जी के मध्य हुए युद्ध का वर्णन है। संभवत: यही एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जो हमें ऐतिहासिक घटनाओं की सच्ची जानकारी देता है
9. राजविनोद - भट्ट सदाशिव द्वारा बीकानेर के राव कल्याणमल के समय रचित इस ग्रंथ में 16वीं शताब्दी के बीकानेर राज्य के सामाजिक, राजनीति व आर्थिक जीवन का वर्णन मिलता है।
10. एकलिंग महात्म्य - इसकी रचना कान्हा व्यास ने की
यह मेवाड़ के सिसोदिया वंश की वंशावलि बताता है
11. कर्मचंद वंशोत्कीतर्न काव्यम- इसकी रचना जयसोम ने की
इस ग्रंथ में बीकानेर रियासत के शासकों का वर्णन है।
12. कुवलयमाला- इस प्राकृत ग्रंथ की रचना उद्योतन सूरी ने की थी। 
इस ग्रंथ में 18 देशी भाषाओं का उल्लेख किया गया है , जिसमें पश्चिमी राजस्थान की मरू भाषा का भी उल्लेख मिलता है ।
13. वीर विनोद- "वीर विनोद ग्रंथ के लेखक कविराज श्यामलदास " थे
चार खंडों में रचित इस ग्रंथ पर कविराज श्यामलदास को ब्रिटिश सरकार द्वारा केसर-ए-हिंद की उपाधि प्रदान की गई।
इस ग्रंथ में मेवाड़ के विस्तृत इतिहास सहित अन्य संबंधित रियासतों का भी वर्णन है।
मेवाड़ महाराणा सज्जनसिंह ने श्यामलदास को कविराज व महामहोपाध्याय की उपाधि से विभूषित किया था।
14. बातां री फुलवारी - बातां री फुलवारी राजस्थानी भाषा के विख्यात साहित्यकार विजयदान देथा द्वारा रचित एक लोककथा है
इस रचना में राजस्थानी लोक कलाओं का संग्रह किया गया।
बाता री फुलवारी 14 खंडों में उपलब्ध है 
इसका अंग्रेजी में टाइमलैस टेल्स फ्रॉम मारवाड़ के नाम से अनुवाद किया गया 
15. चेतावनी रा चूंगट्या - चेतावनी रा चुंग्ट्या ” नामक तेरह सौरठों की रचना केसरी सिह बारहट ने की थी
इन दोहों के माध्यम से मेवाड़ा महाराणा फतेहसिंह को वर्ष 1903 के लार्ड कर्जन के दिल्ली दरबार में जाने से रोका था।
16. पदमावत - इसके रचनाकार मलिक मोहम्मद जायसी हैं
इस रचना में नायक रतनसेन और नायिका पद्मिनी की प्रेमकथा का विस्तारपूर्वक वर्णन है।
इस महाकाव्य में अलाउद्धीन खिलजी एवं मेवाड़ शासक रावल रतनसिंह के मध्य 1301 ई में हुए युद्ध का वर्णन है।
17.भरतेश्वर बाहुबली घोर - इसकी रचना संवत् 1125  वज्रसेन सूरी ने  की
यह राजस्थान साहित्य की प्रथम (पुरानी) रचना है
18. भरतेश्वर बाहुबली रास  - इसकी रचना संवत् 1241 में शालिभद्र शूरी ने की  ! 
इस ग्रन्थ में भरतेश्वर और बाहुबली का चरित्र वर्णन है 
यह जैन साहित्य की रास परम्परा का प्रथम ग्रंथ हैं।
संवतोल्लेख वाली राजस्थान साहित्य की प्रथम रचना है
19 विरुद छतहरी -इसकी रचना  अकबर के दरबारी कवि  दुरसा आढ़ा ने की 
विरुद छहतरी महाराणा प्रताप की शौर्य गाथा है 
20. किरतार बावनी- इसकी रचना  अकबर के दरबारी कवि  दुरसा आढ़ा ने की किरतार बावनी में उस समय की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का वर्णन मिलता हैं। 
21. केरी विलास - इसके लेखक शिवचंद्र भरतीया है 
राजस्थानी भाषा का प्रथम नाटक  है 
22. विश्रांत प्रवास - इसके लेखक शिवचंद्र भरतीया है 
राजस्थानी भाषा का प्रथम कहानी है 
23. कनक सुन्दर - इसके लेखक शिवचंद्र भरतीया है 
राजस्थानी भाषा का प्रथम उपन्यास है 
24. राजस्थानी भाषा  का शब्दकोष - सीताराम लालस 
यह राजस्थानी भाषा का सबसे बड़ा शब्दकोश  है ।
25. आभैपटकी - इसके लेखक नथमल जोशी है 
यह स्वतंत्र्योत्तर( स्वतंत्रता के बाद) राजस्थानी भाषा का प्रथम उपन्यास है   
26. बादली - इसकी रचना चन्द्रसिंह बिरकाली ने की 
यह आधुनिक राजस्थानी भाषा की प्रथम काव्यकृति  है 
इसकी तुलना कालिदास के मेघदूत से की गई है 
27. अबलाओं का इंसाफ -  इसकी रचना अंबिका दत्त ने की 
यह राजस्थान का हिंदी भाषा का प्रथम उपन्यास  है 
28. बलवंत विलास - इसके लेखक सूर्यमल मिश्रण थे 
इसमे सतिप्रथा का विस्तार से उल्लेख किया गया है 
इसे सतीरासौ भी कहते है 
29. राजरूपक - इसके लेखक वीर भान है यह डिंगल भाषा का ग्रन्थ है  इसमे महाराजा अभयसिंह और गुजरात के सूबेदार शेर बुलंद खा के बीच लड़े गये युद्ध  का वर्णन है 
30. प्रबंध कोष - इसके लेखक राजशेखर है 
यह संस्कृत भाषा का ग्रंथ है । राजशेखर प्रतिहार शासक महेंद्र पाल प्रथम व महिपाल का दरबारी कवि था
31. रणमल छंद - इसके रचियता श्रीधर व्यास थे
इनमें से पाटन के सूबेदार जफर खाॅ एवं इडर के राठौड़ राजा रणमल के युद्ध का वर्णन है
अकबरनामा - अबुल फजल
हुमायूनामा - गुलबदन बेगम
टाबरा री बाता -  कुमारी चुंडावत
आईने- अकबरी” -  अब्दुल अफजल
तुजुके बाबरी/ बाबरनामा - बाबर
पोपा बाई की पोलजय नारायण व्यास
ए हिस्ट्री ऑफ राजस्थान- रीमा हूजा 
कृपाराम खिडिया - रजिया रा सौरठा
जैसलमेर राज्य का गुंडाराज - सागरमल गोपा
पार्श्वनाथ चरित्र - श्रीधर
फटका जंजाल - शिवचंद्र भरतीया
रुक्मणी हरण- विट्ठलदास
राम रासो- माधोदास
हम्मीर मद मर्दन - जयसिंह सूरी       
गंगा लहरी - पृथ्वीराज राठौड़
हरिकेली नाटक - विग्रहराज चतुर्थ
आईने अकबरी -अबुल फजल
पाथल पीथल -कन्हैयालाल सेठिया
धरती धोरा री -कन्हैयालाल सेठिया
लीलटांस -कन्हैयालाल सेठिया
हमीर हठ -कवि चंद्रशेखर
रसिक रत्नावली’ - नरहरिदास
ट्रेवल्स इन वेस्टर्न इंडिया -जेम्स टॉड
संगीत रत्नाकर -शारंगधर
भारतीय प्राचीन लिपि माला - गौरीशंकर हीराचंद ओझा
बुद्धि रासो  - जनकवि
श्रृंगार हार - हम्मीर
ललित विग्रहराज सोमदेव
बिहारी सतसई बिहारी
दुविधा - विजयदान देथा
पगफेरो -मणि मधुकर
हम्मीर रासो  -जोधराज (अहिरवाटी)
हमीरायण - भांडउ व्यास
हंसावली  - असाइत
हालां झालां री कुण्डलियां  - ईसरदास बाहरठ


राजस्थान इतिहास के स्रोत : प्रमुख ताम्र-पत्र


राजस्थान के प्रमुख ताम्र-पत्र 

जब कोई राजा या महाराजा किसी भी अधिकारी, दरबारी, साधु-संत से खुश होकर उन्हें भूमि दान करता था। तो उन्हें साक्ष्य के रूप में ताम्रपत्र दिया जाता था।

1. चीकली ताम्रपत्र ( 1483 ई. )- किसानों से वसूल की जाने वाली विविध लाग-बागों एवं कर वसूलनें का उल्लेख मिलाता है

2. आहड़ ताम्र-पत्र (1206 ईस्वी)  यह ताम्र पत्र गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव (द्वितीय) का है। यह गुजरात के मूलराज से भीमदेव द्वितीय तक सोलंकी राजाओं की वंशावली डी गई है इससे यह भी पता चलता है कि भीमदेव के समय में मेवाड़ पर गुजरात का प्रभुत्व था। 

3. खेरादा ताम्र-पत्र (1437 ई.) - यह ताम्र-पत्र महाराणा कुंभा के समय का है। इसमें शंभू को 400 टके (मुद्रा) के दान का भी उल्लेख है। इसमें एकलिंगजी में राणा कुंभा द्वारा किए गए प्रायश्चित, उस समय दान किए गए खेत व  धार्मिक स्थिति की जानकारी मिलती है।

4. पुर का ताम्र-पत्र (1535 ई.) - यह ताम्र पत्र  विक्रमादित्य के समय का है। इसमें हाड़ी रानी कर्मवती द्वारा जौहर में प्रवेश करते समय दिए गए भूमि अनुदान के बारे में जानकारी दी गई है। यह ताम्रपात्र जौहर की प्रथा पर प्रकाश डालता है और इस ताम्रपत्र से चित्तौड़ के दूसरे साके का सटीक समय निर्धारण होता है।

5. धुलेव(उदयपुर) के दान पत्र (679 ई.) - इस दानपत्र में किष्किंधा के शासक भेटी द्वारा उब्बरक नामक गाँव को भट्टिनाग नामक ब्राह्मण को अनुदान के रूप में देने का उल्लेख है। इसका समय 23वां वर्ष अर्थात् हर्ष संवत है। इसमें संवत को अश्वाभुज संवत्सर कहा गया है।

6. ब्रोच गुर्जर ताम्रपात्र (978 ई.) -इस ताम्रपत्र के आधार पर कनिंघम ने राजपूतों की उत्पत्ति यू-ची जाति से मानी है। इस ताम्रपत्र में गुर्जर जाति के कबीले का सप्तसैंधव भारत से गंगा कावेरी तक के अभियान का उल्लेख है।

7. बेगूं का ताम्रपत्र (1715 ई.) - यह ताम्रपत्र महाराणा संग्राम सिंह के समय का है। इसमें प्रहलाद नामक व्यक्ति को बेगूं से एक गाँव दान में देने का उल्लेख मिलता है यह अनुदान भूमि के सभी वृक्ष, कुएँ तथा नींवाण सहित किया गया था।

8. सखेड़ी का ताम्रपत्र (1716 ई.) - यह ताम्रपत्र महारावत गोपाल सिंह का है।

इस ताम्रपत्र में कथकावल नामक कर का उल्लेख लागत-विलगत के साथ दिया गया है।

9. पाटण्या गाँव का दानपत्र (1677 ई.) - यह दानपत्र प्रतापगढ़ के महारावत प्रतापसिंह के समय का है। इसमें प्रतापसिंह द्वारा महता जयदेव को पाटण्या गाँव अनुदान में देने का उल्लेख है इस दानपत्र में प्रारंभिक गुहिल शासकों के नाम तथा प्रतापगढ़ के क्षेमकर्ण से हरिसिंह तक शासकों का उल्लेख मिलता है।

10. वरखेड़ी ताम्रपत्र (1739 ई.) - यह ताम्रपत्र प्रतापगढ़ के महारावल गोपाल सिंह के समय का है जिससें कान्हा को लाख पसाव में वरखेड़ी गाँव तथा लखणा की लागत देने की जानकारी प्राप्त होती है।

11. रंगीली ग्राम का ताम्रपत्र (1656 ई.) - यह ताम्रपत्र मेवाड़ महाराणा राजसिंह के समय का है। इसमें गाँव में लगने वाली खड़, लाकड़ और टका की लागत को भी छोड़े जाने की जानकारी मिलती है। इसमें गंधर्व मोहन को रंगीला नामक गाँव दान में देने का उल्लेख है। 

12. प्रतापगढ़ का ताम्रपत्र (1817 ई.) - यह ताम्रपात्र महारावत सामंत सिंह के समय की है। इस तामप्रत्र में महारावल सामंतसिंह के समय के ब्राह्मणों पर लगने वाले कर ‘टंकी’ (एक कर था जो प्रति रुपया एक आना लिया जाता था।) को समाप्त करने का उल्लेख है।

13. बाँसवाड़ा के दानपत्र (1747 ई. तथा 1750 ई.) -

यह दानपत्र महारावल पृथ्वीसिंह के शासनकाल का है।

इस दानपत्र में पृथ्वीसिंह द्वारा उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर जानी वसीहा को रहँट दान देने का उल्लेख मिलता है।

14. डीगरोल गाँव का ताम्रपत्र (1648 ई.) - यह ताम्रपत्र महाराणा जगतसिंह के समय का है। इस ताम्रपत्र में गढ़वी मोहनदास को आंगरिया परगने का डोगरोल गाँव अनुदान में देने का उल्लेख मिलता है। इसमें महाराणा द्वारा प्रतिवर्ष स्वर्ण तुलादान करने तथा भूमिदान करने की व्यवस्था का भी उल्लेख है।

15. पारसोली का ताम्रपत्र (1473 ई.) - यह ताम्रपत्र महाराणा रायमल के समय का है। इसमें भूमि की विभिन्न किस्मों-पीवल, गोरमो, मगरा, माल आदि का उल्लेख मिलता है।

16. राजसिंह का ताम्रपत्र (1678 ई.) - इस ताम्रपत्र में महाराणा राजसिंह के समय राजसमुद्र झील के किनारे रानी बड़ी पँवार द्वारा वेणा नागदा को दो गाँवों में तीन हल की भूमि दान करने का उल्लेख है

17. पारणपुर ताम्रपत्र (1676 ई.) - यह ताम्रपत्र रावत प्रतापसिंह के समय का है।

इसमें उस समय के पठित वर्ग तथा शासक वर्ग के नामों एवं धार्मिक अनुष्ठान करने की परम्परा का उल्लेख मिलता है।

इस ताम्रपत्र में लाग, टकी तथा रखवाली आदि करों का उल्लेख किया गया है।

18. लावा गाँव का ताम्रपत्र (1558 ई.) - इस ताम्रपत्र में महाराणा उदयसिंह द्वारा भोला ब्राह्मण को कन्याओं के विवाह के अवसर पर लिये जाने वाले ‘मापा’ नामक कर लेने की मनाही करने का उल्लेख है। बल्कि उस क्षेत्र की लड़कियों का विवाह कराने का उसका अधिकार पूर्ववत रहेगा।

19. कीटखेड़ी (प्रतापगढ़) का ताम्रपत्र (1650 ई.) - यह दान-पत्र गोवर्धन नाथ जी के मंदिर की प्रतिष्ठा का समय भट‌्ट विश्वनाथ को कीटखेड़ी गाँव दान देने के संबंध है। इस ताम्रपत्र के अंत में दो श्लोक दिए गए हैं जिसमें विश्वनाथ को ‘दीक्षागुरु’ कहा गया है।

20. कड़ियावद (प्रतापगढ़) का ताम्रपत्र (1663 ई.) - इस ताम्रपत्र में रावत हरिसिंह द्वारा बाटीराम को ‘नेग’ वसूल करने का अधिकार दिये जाने का उल्लेख है। इस ताम्रपत्र से यह प्रमाणित होता है कि ‘नेग’ वसूल करने का अधिकार चारणों को सूरजमल के समय से था।

21. गडबोड गाँव का ताम्रपत्र (1719 ई.) - यह ताम्रपत्र महाराणा संग्रामसिंह के समय का है। इसमें बाईजीराज तथा कुंवर जगतसिंह द्वारा चारभुजा मंदिर के लिए गाँव अनुदान में देने का उल्लेख किया गया है।

22. मथनदेव का ताम्रपत्र (959 ई.) - इस ताम्रपत्र में मथनदेव द्वारा देवालय के लिए भूमिदान देने का उल्लेख है।

23. बेड़वास का ताम्रपत्र (1599 ई.) -  इस ताम्रपत्र में उदयपुर बसाने के संवत् 1616 का उल्लेख मिलता है यह दानपत्र समरसिंह (बांसवाड़ा) के काल का है। इसमें एक हल भूमि दान का उल्लेख है।

24. वीरपुर का ताम्रपत्र (1185 ई.) - यह दान-पत्र के निकटवर्ती वीरपुर गाँव से प्राप्त हुआ था। इस ताम्रपत्र में गुजरात के चालुक्यों द्वारा सामंतसिंह से वागड़ का क्षेत्र छीनकर गुहिल वंश के अमृतपाल को देने का उल्लेख है। इस ताम्रपत्र में गुजरात राजा भीमदेव के सामंत वागड़ के गुहिल वंशीय राजा अमृतपालदेव के सूर्य पर्व पर भूमिदान का उल्लेख है।

25. ढोल का ताम्रपत्र (1574 ई.) - यह ताम्रपत्र महाराणा प्रताप के समय का है। इस ताम्रपत्र में प्रताप द्वारा ढोल नामक गाँव के प्रबंधक को भूमि अनुदान देने का उल्लेख मिलता है।

26. गांव पीपली (मेवाड़) का ताम्रपात्र (1576 ई.) - यह ताम्रपत्र महाराणा प्रतापसिंह के समय का है। इससे हमें जानकारी मिलाती है कि हल्दीघाटी के युद्ध के बाद, महाराणा ने मध्य मेवाड़ के क्षेत्र में लोगों को बसाने का काम शुरू किया। युद्ध के समय में जिन लोगों को नुकसान उठाना पड़ता था, उन्हें कभी-कभार मदद दी जाती थी।

27. ठीकरा गाँव की ताम्र-पत्र - इस ताम्रपत्र में  गाँव के लिए यहाँ ‘मौंजा’ शब्द का प्रयोग किया है।

28. कोघाखेड़ी (मेवाड़) का ताम्रपत्र - इस ताम्रपत्र में महाराणा संग्राम सिंह (II) द्वारा कोघाखेड़ी गाँव को दिनकर भट्ट को हिरण्याशवदान में देने का उल्लेख है

  1. गांव के लिये 'मौंजा' शब्द का प्रयोग कौनसे ताम्र पत्र में किया गया है  ? 
    ठीकरा गांव का ताम्र पत्र
  2. बेड़वास गांव का दान पत्र किस शासक से संबंधित है ? 
    समर सिंह ( बांसवाडा )
  3. उदयपुर बसाने की पुष्टि कौनसे ताम्र पत्र से होती है ?
    बेड़वास
  4. गांव गडबोड का ताम्र पत्र किसके समयाकाल का है ? 
    महाराणा श्री संग्रामसिंह
  5. किस ताम्र पत्र से पता चलता है कि बाटीराम को ' नेग ' वसुलने की अधिकार रावत हरिसिंहजी ने दिया था ? 
    कडियावद ताम्र पत्र 
  6. कड़ियावद ताम्रपत्र  के अनुसार नेग वसुलने का अधिकार चारणों को किसके समय से था
    सूरजमल  
  7. गोवर्धननाथजी के मंदिर की प्रतिष्ठा के समय दिया गया दान (कीटखेड़ी गाँव) कौनसे ताम्र पत्र में है ? 
    कीटखेडी ( प्रतापगढ़ ) का ताम्र पत्र
  8. विश्वनाथ को ' दीक्षागुरु ' कौनसे ताम्र पत्र में कहा गया है? 
    कीटखेडी ( प्रतापगढ़ ) का ताम्र पत्र
  9. महाराणा उदयसिंह द्वारा ब्राह्मण भोला को ' मापा ' कर नही लेने तथा कन्याओं का विवाह कराने का अधिकार बरकरार रखा ये बात कौनसे ताम्र से पता चलती है ? 
    लावा गाँव के ताम्र पत्र से
  10. पारणपुर दानपत्र किसके  समय का है ? 
    रावत प्रतापसिंह
  11. राजसमुद्र झील के किनारे रानी बड़ी पँवार द्वारा वेणा नागदा को दो गाँवों में तीन हल भूमि दान करने का उल्लेख किस ताम्रपत्र में है?
    राजसिंह ताम्र पत्र
  12. महाराणा जगतसिंह के काल का कौनसा ताम्र पत्र है? 
    डीगरोल गांव का ताम्र पत्र
  13. महाराणा जगतसिंह द्वारा प्रतिवर्ष स्वर्ण तुलादान और भूमिदान करने की व्यवस्था का किस ताम्रपत्रमें उल्लेख है ?
    डीगरोल गांव का ताम्र पत्र
  14. महारावल पृथ्वीसिंह द्वारा उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर जानी वसीहा को १ रहंट दान का उल्लेख किस ताम्र पत्र में है ? 
    बांसवाड़ा का ताम्र पत्र
  15. प्रतापगढ़ का ताम्र पत्र किसके समय का है ? 
    महारावत सामंतसिंह
  16. महाराणा राजसिंह ने किसे रंगीली ग्राम ( मेवाड़ ) दान में दिया था ?
    गंधर्व मोहन
  17. रंगीली ग्राम ( मेवाड़ ) का ताम्रपत्र कौनसे शासक से संबंधित है ? 
    महाराणा राजसिंह
  18. रंगीली ग्राम (मेवाड़ ) का ताम्र कब का है? 
    1656 ई.
  19. वरखेड़ी का ताम्र पत्र कब का है ? 
    1739 ई.
  20. वरखेड़ी का ताम्र पत्र किसके समय का है ? 
    महारावत गोपालसिंह
  21. महारावत गोपालसिंह द्वारा कथकावल नामक कर का उल्लेख लागत - विलगत के साथ कौनसे ताम्र पत्र में किया है ? 
    सखेड़ी का ताम्र पत्र
  22. प्रतापसिंह द्वारा महता जयदेव को पाटण्या गाँव अनुदान में देने का उल्लेख किस ताम्रपत्र में है ?
    पाटण्या ताम्र पत्र
  23. संग्रामसिंह द्वारा प्रहलाद को एक रहंट व भूमि पीवल, मांल  बाग के देने का उल्लेख कौनसे ताम्र पत्र में है ? 
    बेगूं का ताम्र पत्र  
  24. राजस्‍थान के कौन से ताम्रपत्र से रानी कर्मवती द्वारा जौहर के प्रमाण मिलते हैं ?
    पुर ताम्रपत्र
  25. गुजरात के शासक भीमदेव के समय में मेवाड़ पर गुजरात का अधिकार था यह जानकारी हमें किस ताम्रपत्र से मिलती है 
    आहड़ के ताम्रपत्र ( 1206 ) से
  26. किसके अनुसार ब्रोच गुर्जर ताम्रपात्र के आधार पर राजपूतों की उत्पत्ति कुषाणों की यू-ची जाति से मानी है।
    कनिंघम ने
  27. किसानों से वसूल की जाने वाली विविध लाग-बागों (कर) का उल्लेख किसमें प्राप्त होता है?
    चीकली ताम्रपत्र 1483 ई.