GSSS BINCHAWA

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राजस्थान इतिहास के स्रोत : प्राचीन सिक्के

राजस्थान के प्राचीन सिक्के 

सिक्कों के अध्ययन को ‘न्यूमेसमेटिक’ (मुद्राशास्त्र/Numismatics) कहा जाता है।

1835 ई. में जेम्स प्रिसेप ने निर्माण सैली के आधार पर इन पंचमार्क सिक्कों को आहत सिक्के कहा है।

सिक्कों का सर्वप्रथम अध्ययन ‘कैब’ नामक विदेशी यात्री द्वारा अपनी पुस्तक ‘The Currencies of the Hindu States of Rajputana’ (1893 A.D.) में प्रस्तुत किया गया 

 ब्रिटिश भारत का राजस्थान में सर्वाधिक प्राचीन चाँदी का सिक्का 'कलदार’ था 

आहत सिक्के/पंचमार्क सिक्के

आहत सिक्के मुख्य रूप से चाँदी तथा आंशिक रूप से तांबे से निर्मित होते थे 

ये सिक्के ठप्पा मारकर बनाये जाते थे इस कारण इन्हें आहत सिक्के कहते है 

ये राजस्थान में पाए गए प्राचीनतम सिक्के हैं जिनकी आयु लगभग छठी शताब्दी ई.पू. मानी गयी है 

चांदी से निर्मित आहत सिक्कों को पंचमार्क सिक्के कहा जाता है

पंचमार्क सिक्को पर पांच प्रमुख चित्र पेड़, हाथी, मछली, अर्द्धचन्द्र, वृषभ इत्यादि है। 

राजस्थान में पंचमार्क सिक्के निम्न स्थानों पर मिले 

1. रैढ (टोंक)

रेढ ( टोंक ) के उत्खनन से 3075 चाँदी के पंचमार्क सिक्के मिले है जो देश के उत्खनन में एक स्थान से प्राप्त सबसे बडी निधि मानी जाती है । 

 रैढ़ को प्राचीन भारत की टाटानगरी के नाम से भी जाना जाता है।

इन सिक्कों को धरण या पण कहा जाता था ।

रेढ ( टोंक ) से ताँबे के सिक्के भी मिले है, जिन्हें गण मुद्राएं कहा जाता है ।

अपोलोडोट्स का सिक्का रैढ़ से प्राप्त हुआ है ।

इन सिक्को का तौल 32 रत्ती अथवा 57 ग्रेन अथवा 33/4 ग्राम है

इन सिक्को का समय छठी शताब्दी ई. पूर्व है |

सेनापति मुद्रा : रैढ से छह सेनापति मुद्राएँ मिली हैं जिनमे से पांच चौकोर व एक गोल है  इन पर नदी का चित्र बना है तथा ‘ वच्छ्घोष ‘ अंकित है 

3. गुरारा  (सीकर) -  गुरारा  से लगभग 2744 सिक्के प्राप्त हुए हैं  इन सिक्को पर तीन मानव आकृतिया मिली है | जिसमे से दो पुरुष व एक महिला की है |

2. बैराठ/विराटनगर, (जयपुर )

बैराठ के उत्खनन में प्रात एक कपड़े की थैली जिसमें 8 पंचमार्क चाँदी की मुद्राएँ तथा 28 इण्डोग्रीक़ तथा युनानी शासकों की मुद्राएं प्राप्त हुई है । इनमे से 16 सिक्के राजा मिनांडर के हैं

आहड़ के सिक्के :आहड़ के उत्खनन में 6 तांबे के सिक्के मिले है, जिनमे एक चौकोर तथा पांच गोल है।एक सिक्के पर त्रिशूल का अंकन है। आहड़ के उत्खनन में कुछ हिन्द-यवन मुदाए भी प्राप्त हुई है।

गुप्तकालीन  सिक्के

राजस्थान मे बुन्दावली का टीबा(जयपुर), बयाना( भरतपुर)मोरोली (जयपुर), नलियासर (सांभर), रैढ.(टोंक), अहेडा.(अजमेर) तथा सायला (सुखपुरा), देवली (टोंक) से गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएं मिली हैं

1948 ईस्वी में राजस्थान से गुप्तकालीन सर्वाधिक सोने के सिक्के भरतपुर के बयाना के पास नगलाछेला ग्राम से मिले है, जिनकी संख्या लगभग 2000 है। गोपीनाथ शर्मा के अनुसार इन सिक्कों की संख्या 1800 हैं। इन सिक्को में सर्वाधिक सिक्के चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के है। 

ग्राम सायला (जालौर) से मिली 13 स्वर्ण मुद्राएं समुद्रगुप्त की है।ये सिक्के ध्वज शैली के हैं।इनके अग्रभाग पर समुद्रगुप्त बायें हाथ मे ध्वज लिए खडा़ हैं।राजा के बायें हाथ के नीचे लम्बवत् ‘ समुद्र’ अथवा ‘ समुद्रगुप्त’ ब्राह्मी लिपी मे खुदा हुआ हैं।सिक्के के अग्रभाग पर ही ‘समर- शतवितत विजयो जित – रिपुरजितों दिवं जयति’ (सवँत्र विजयी राजा जिसने सैकड़ों युद्धों मे सफलता प्राप्त की और शत्रु को पराजित किया, स्वर्ग श्री प्राप्त करता हैं) ब्राह्मी लिपि मे अंकित हैं। इनके पृष्ठ भाग पर सिंहासनासीन लक्ष्मी का चित्र हैं।इसी प्रकार की ‘ध्वज शैली’ के सिक्के यहां से काचगुप्त के भी मिले हैं।

चन्द्रगुप्त द्रितीय व्रिकमादित्य के ‘छत्रशैली’ के स्वणँ सिक्कों के अग्रभाग मे आहुति देता हुआ राजा खडा़ हैं।उसके बायें हाथ मे तलवार की मूंठ हैं।राजा के पीछे एक बोना सेवक राजा के सिर पर छत्र लिए हुए खडा़ हैं।व्रिकमादित्य के यहां से ‘धनुर्धर शैली’ प्रकार के भी सिक्के मिले हैं 

टोंक  जिले के रैढ से भी गुप्तकालीन सिक्के की छ: मुद्राए मिली है |

नगर (टोंक) :

नगर मुद्राएं टोंक जिले में उनियारा के निकट नगर में लगभग 6000 तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं जिनका भार कम एवं आकार छोटा है  इन सिक्कों पर चालीस मालव सरदारों के नाम अंकित हैं I

गुर्जर प्रतिहार कालीन  सिक्के :– राजस्थान के मारवाड क्षेत्र में इन सिक्को की प्राप्ति हुई जिन पर यज्ञवेदी एवं रक्षक चिन्हों की प्रधानता है। ये सिक्के सेसेनियन शैली से प्रभावित है। इनमें सोनेताम्बे व सीसे के सिक्के प्रचलित हुए।आदिवारह के सिक्के गुर्जर -प्रतिहार शासक मिहिर भोज ने चलाये  प्रतिहारों के आदिवराहवराहनामद्रम और देवी की मूर्ति वालेमत्स्यवृषभ और अश्वारोही अंकन वाले बहुत से सिक्के मिले है। ‘आदि वराह’ शैली के इन सिक्को पर नागरी में ‘श्रीमदादिवराह’ उत्कीर्ण है।

रंगमहल (हनुमानगढ़) - रंगमहल ( हनुमानगढ ) यहाँ पर कुषाण कालीन 105 तांबे सिक्के मिले है जिन्हें 'मुरण्डा' कहा गया है ।

राजस्थान की  प्रमुख रियासतों के सिक्के

1. बीकानेर - बीकानेर रियासत में गजशाही तथा आलमशाही सिक्के चलते थे 

राजपूताना की बीकानेर रियासत के सिक्कों पर एक ओर साम्राज्ञी विक्टोरिया का चेहरा और अंग्रेजी में ‘विक्टोरिया एम्प्रैस’ लिखा होता था और दूसरी ओर नगरी तथा उर्दू लिपि में महाराजा का नाम लिखा होता था 

2. कोटा -कोटा रियासत में मदनशाहीगुमानशाही सिक्के चलते थे

3. झालावाड़ -झालावाड़ रियासत में मदनशाही सिक्के चलते थे

4. जैसलमेर- जैसलमेर रियासत में अखैशाहीमुहम्मदशाही व डोडिया सिक्के चलते थे

मुगलकाल में जैसलमेर में चाँदी का " मुहम्मदशाही ' सिक्का चलता था ।

जैसलमेर का ताँबे का सिक्का ' डोडिया' कहलाता था ।

जेसलमेर के महाराजा अखैसिंह ने अखैशाही सिक्का चलाया

5. बांसवाड़ा- बांसवाड़ा में सालिमशाही  लक्ष्मणशाही  रूपये का प्रचलन था ।

बांसवाडा रियासत में महारावल लक्ष्मण सिंह ने लक्ष्मणशाही सिक्के चलाए

6.बूंदी-  बूंदी रियासत में रामशाहीकटारशाहीचेहरेशाही व ग्यारह-सना सिक्के चलते थे 

'ग्यारह-सना' रूपया मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के शासन के ग्यारहवें वर्ष को चालू होने का सूचक था । 

7. अलवर-अलवर रियासत में रावशाही सिक्का चलता था ।

अलवर राज्य की टकसाल राजगढ में थी यहाँ 1772 से 1856 ईं. तक बनने वाले सिक्के रावशाही रूपया कहलाते थे ।यहा के ताँबे के सिके रावशाही टक्का कहलाते थे, जिस पर आलमशाह, मुहम्मद बहादुर शाह, मलका विक्टोरिया, शिवदान सिंह, आदि के नाम अंकित रहते थे

8. धौलपुर- धौलपुर के सिक्के को ' तमंचाशाही ' कहा जाता था, क्योंकि उन पर तमंचे का चिह्न अंकित होता था

9. प्रतापगढ़- प्रतापगढ में सालिमशाही सिक्का चलता था 

प्रतापगढ में मुगल सम्राट शाह आलम की आज्ञा से महारावल सालिम सिंह ने चाँदी का सालिमशाही सिक्का चलाया जिसके एक तरफ ' सिक्कह मुबारक बादशाहा गाजी शाआलम 1199 ' और दूसरी तरफ 'जर्ब 25 जुलूस मैमनत मानुस ' फारसी में अंकित होता था । 

10. डूंगरपुरडूंगरपुर मे उदयशाही व  त्रिसूलिया सिक्के चलते थे 

11. करौली- करौली में कटार झाड़शाही व माणकशाही सिक्के चलते थे

करौली में महाराजा माणकपाल ने सर्वप्रथम 1780 ईं. में चाँदी और ताँबे के सिक्के ढलवाये जिन पर कटार और झाड़ के चिह्न तथा संवत्  अंकित होते थे

12. मेवाड़ /उदयपुरउदयपुर में गधिया/गधैय्याचांदोडीस्वरूपशाही व सिक्का एलची का प्रचलन था

अकबर की चितौड़ विजय के उपलक्ष में मेवाड़ में एलची सिक्का चलने लगा

मेवाड़ रियासत में चलने वाले चांदी के सिक्के द्रम्म, रूपक तथा तांबे के सिक्के कर्षापण कहलाते है।

इतिहासकार वेब के अनुसार ये सिक्के ‘इंडो-सेसेनियन’ शैली के बने थे।  महाराणा रूपसिंह के काल में ही चांदौड़ी नामक स्वर्ण मुद्रा का प्रचलन था। महाराजा संग्राम सिंह द्वारा चलाये गए तांबे के सिक्के पर स्वस्तिक तथा त्रिशूल अंकित मिले है। 

मेवाड़ में हूण शासकों द्वारा चलाये गए सिक्को पर गधे के समान आकृति का अंकन मिलता हैं इसलिए इन्हें गधिया /गधैय्या सिक्के कहा जाता है

सलुम्बर ठिकाने की तांबे की मुद्रा को पदमशाही कहते है।

13. जयपुर/ आमेर - जयपुर रियासत में झाड़शाहीहाली व 

जयपुर में तांबे के सिक्के का प्रचलन 1760 ईं. से माना जाता है । इसे झाड़शाही सिक्के कहते थे ।

झाड़शाही सिक्के जयपुर में कच्छवाहावंश द्वारा प्रचलित सिक्के थे 

झाड़शाही सिक्कों पर कचनार के वृक्ष की ‘छह टहनियों का एक गुच्छ’ अंकित होने के कारण इन्हें झाड़शाही सिक्के कहा गया 

हाली सिक्का महाराजा माधोसिंह द्वारा चलाया गया (सोने का सिक्का)

सवाई जयसिंह द्वितीय ने सन् 1728 ईं. में जयपुर नगर में टकसाल की स्थापना की । जयपुर की सिरहड्योढी बाजार ' चांदी की टकसाल ' के नाम मे प्रसिद्ध है ।

14. मारवाड़ (जोधपुर) रियासत - मारवाड़ रियासत में विजयशाही, भीमशाही, फदिया व ढब्बूशाही सिक्कों का प्रचलन था
मारवाड़ रियासत में भी सेसेनियन सिक्के प्रचलन में आए जो कालांतर में गधिया मुद्रा कहलाई गई |

विजयशाही सिक्के  18वीं एवं 19वीं शताब्दी में महाराजा विजय सिंह द्वारा चलाए गये  

मारवाड़ के सिक्को के लिए जोधपुर , नागौर , पाली तथा सोजत में टकसाले थी 

जोधपुर टकसाल में बनने वाले सोने के सिक्को को मोहर कहते थे

सोजत में लल्लुलिया रुपया चलता था |

सोजत की टकसाल से बनने वाले सिक्को पर श्री माताजी एवं श्री महादेव शब्द भी उत्कीर्ण होने लगा था |

15. भरतपुर   - भारतपुर में डीग तथा भरतपुर में टकसाल थी  भरतपुर रियासत में 1763 में महाराजा सूरजमल ने शाहआलम के नाम के चांदी के सिक्के ढलवाये थे| 

16.शाहपुरा - शाहपुरा के शासकों ने 1760 ईं. में जो सिक्का चलाया उसे 'ग्यारसंदिया' कहते थे । 

17. सिरोही - सिरोही का स्वतंत्र रुप से कोई सिक्का नहीं था और ना ही यहां कोई टकसाल थी|

यहां मेवाड़ का चांदी का भिलाड़ी रुपया और मारवाड़ का तांबे का ढब्बू शाही रुपया चलता था|


राजस्थान के प्राचीन कालीन सिक्के प्रश्नोत्तरी
राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोत
राजस्थान के प्रमुख अभिलेख (शिलालेख) एवं प्रशस्तियां
राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोत 

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REET EXAM 2022 Rajasthan GK

राजस्थान इतिहास के स्त्रोत प्रश्नोत्तरी


  1. राजस्थान राज्य अभिलेखागार कहाँ स्थित हैं ?
    बीकानेर
  2. अभिलेखों का अध्ययन क्या कहलाता है 
    एपिग्राफी
  3. जिन अभिलेखों में मात्र किसी शासक की उपलब्धियों का यशोगान होता है उसे क्या कहते हैं
    प्रशस्ति  
  4. किस शिलालेख में चौहानों को वत्सगौत्रीय ब्राह्मण कहा गया है ? 
    बिजौलिया शिलालेख में
  5. बिजौलिया शिलालेख के रचयिता कौन थे ?
    गुणभद्र
  6. चौहान वंश के बारे में जानकारी किस शिलालेख से मिलती है ?
    बिजौलिया शिलालेख
  7. वह कौनसा शिलालेख है जिससे ज्ञात होता है की विग्रहराज चतुर्थ ने दिल्ली को अपने अधीन किया था?
    बिजौलिया शिलालेख
  8. किस शिलालेख में विभिन्न नगरो के प्राचीन नाम वर्णित है ?
    बिजौलिया शिलालेख में
  9. बिजौलिया शिलालेख की स्थापना किसके द्वारा की गई ?
    जैन श्रावक लोलाक द्वा
    रा
  10. बिजौलिया शिलालेख कहाँ मिला ?
  11. बिजौलिया (भीलवाड़ा) के पार्श्वनाथ मंदिर के पास
  12. बिजौलिया अभिलेख के अनुसार सांभर झील का निर्माण चौहान वंश के किस शासक ने करवाया था?
  13. वासुदेव चौहान ने
  14. राज प्रशस्ति के रचयिता कौन थे ?
    रणछोड़ भट्ट तैलंग 
  15. राजसिंह प्रशस्ति /राज प्रशस्ति (1676 ई. ) कहॉं पर स्थित है ? 
    राजसमंद जिले की राजसमंद झील की नौ चौकी पाल पर 
  16. राजप्रशस्ति शिलालेख कब एवं किसके द्वारा स्थापित किया गया ?
    राजसिंह द्वारा -1676 ई .
  17. महाराजा अमरसिंह व जहाँगीर मध्य की गयी मेवाड़ - मुगल संधि का वर्णन किस अभिलेख में है ? 
    राजसिंह प्रशस्ति (राज प्रशस्ति)
  18. विश्व की सबसे बडी प्रशस्ति ( अभिलेख ) कौन सी है ? 
    राजसिंह प्रशस्ति (राज प्रशस्ति ) 
  19. किस प्रशस्ति में गुहिल को बप्पा रावल का पुत्र बताया गया है ?
    रणकपुर प्रशस्ति में 
  20. किस प्रशस्ति में कुंभा की विजय व उपाधियों का वर्णन मिलता है ? 
    रणकपुर प्रशस्ति में 
  21. रणकपूर प्रशस्ति का लेख किस मंदिर में लगा हुआ है ? 
    चौमुख मंदिर (पाली)
  22. रणकपुर प्रशस्ति का रचयिता (सूत्रधार) कौन था ?
    देपाक (दीपा या देवाक)
  23. किस प्रशस्ति में बप्पा रावल व कालभोज को अगल-अलग व्यक्ति बताया गया है ?
    रणकपुर प्रशस्ति में
  24. किस प्रशस्ति में मेवाड़ के राजवंश एवं धरणक सेठ के वंश का वर्णन मिलता है ?
    रणकपुर प्रशस्ति 
  25. किस शिलालेख में गजवंश के पाराशरी के पुत्र सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ कराने का उल्लेख है ?
    घोसुंडी शिलालेख 
  26. राजस्थान में वैष्णव (भागवत) संप्रदाय का सबसे प्राचीन अभिलेख कौनसा है ?
    घोसुंडी शिलालेख
  27. घोसुण्डी  शिलालेख कहाँ से प्राप्त हुआ है ?
    घोसुण्डी ( चित्तौड़गढ़ )
  28. घोसुंडी शिलालेख में किस लिपि का प्रयोग किया गया है ? 
    ब्राह्मी लिपि
  29. घोसुंडी का शिलालेख सर्वप्रथम किसके द्वारा पढ़ा गया ?
    डॉक्टर डी आर भंडारकर द्वारा
  30. किस प्रशस्ति में कुम्भा को " महाराजाधिराज , अभिनव भरताचार्य , हिन्दु सुरताण , रायरायन , राणो रासो " आदि नामों से सम्बोधित किया गया है ?
    कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति।  
  31. चण्डीशतक , गीतगोविन्द की टीका , संगीतराज , आदि ग्रंथ किस प्रशस्ति में है ? 
    कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति।
  32. कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति का प्रशस्तिकार कौन है ? 
    महेश भट्ट। 
  33. वह कौनसा अभिलेख हैं जो महाराणा कुम्भा के लेखन पर प्रकाश डालता हैं ?
    कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति (1460 ई.)
  34. कुंभलगढ़ प्रशस्ति का रचियता कौन है ? 
    कान्हा व्यास (डाॅ. गौरीशंकर ओझा के अनुसार - कवि महेश "x" )
  35. मेवाड़ के महाराजाओं की वशांवली का सबसे विश्वसनीय स्रोत कौनसा अभिलेख है ?
    कुंभलगढ प्रशस्ति 
  36. किस प्रशस्ति  में बप्पा रावल को ब्राह्मण वंशीय/विप्र वंशीय बताया गया है ?
    कुंभलगढ़ प्रशस्ति 
  37. किस शिलालेख में हम्मीरदेव चौहान को ‘विषम घाटी पंचानन’ कहा है ?
    कुंभलगढ़ प्रशस्ति में
  38. कुंभलगढ़ शिलालेख कहाँ मिला ?
    कुम्भलगढ़ दुर्ग (राजसमन्द) में स्थित कुंभश्याम मंदिर में 
  39. किस शिलालेख में अमृत मंथन का उल्लेख है ।
    बड़ली शिलालेख
  40. बड़ली शिलालेख कहाँ से प्राप्त हुआ था ?
    भीलोत माता मंदिर, बड़ली (अजमेर)
  41. राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख कौन सा है ?
    बड़ली शिलालेख
  42. श्रृंगी ऋषि शिलालेख के रचनाकार कौन थे ? 
    विलास योगेश्वर
  43. किस शिलालेख में भीलों के सामाजिक जीवन का भी वर्णन किया गया है ?
    श्रंगी ऋषि शिलालेख में
  44. शृंगी ऋषि का लेख किस शासक के काल से संबंधित है ?
    महाराणा मोकल
  45. मानमोरी शिलालेख के रचियता कौन थे ?
    पुष्य 
  46. मानमोरी शिलालेख कहाँ से प्राप्त हुआ  ?
    पूठोली गांव (चित्तौड़गढ़) के समीप मानसरोवर झील के तट पर
  47. किस शिलालेख को कर्नल जेम्स टॉड ने समुद्र में फेंक दिया था ?
    मानमोरी शिलालेख
  48. किस शिलालेख में अमृत मंथन का उल्लेख मिलता  है ?
    मानमोरी शिलालेख में
  49. किस शिलालेख में परमारो की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के आबू यज्ञ से बताई गई है ?
    किराडू शिलालेख में 
  50. राजस्थन में अशोक के अभिलेख  कहाँ से प्राप्त हुआ  ?
    विराट नगर /बैराठ (जयपुर)
  51. भाब्रू शिलालेख किसके द्वारा खोजा गया था 
    1837 ई. में  कैप्टन बर्ट द्वारा
  52. किस शिलालेख से सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म का अनुयायी होना सिद्ध होता है
    भाब्रू शिलालेख
  53. किस शिलालेख के अनुसार कच्छवाह शासकों को “रघुवंश तिलक” कहा जाता है ? 
    आमेर के 
  54. कौनसा शिलालेख नगरी का सम्बन्ध विष्णु की पूजा से बताता है।
    नगरी शिलालेख 
  55. बसंतगढ़ शिलालेख कहां स्थित है ?
    सिरोही
  56. बसंतगढ का शिलालेख किस वंश  सम्बन्धित है?
    चावड़ा वंश से
  57. प्रतिहार नरेश कुक्कक का वर्णन कहां मिलता है?
     घटियाला के शिलालेख से
  58. जगन्नाथराय प्रशस्ति 1652 ई . के रचयिता कौन है 
    कृष्णभट्ट 
  59. आबू के परमार वंशीय शासकों की वंशावली निम्न में से किस प्रशस्ति में दी गई है-
    लूणवसही व नेमिनाथ मंदिर की प्रशस्ति
  60. चीरवा शिलालेख की रचना किसने की-
    रत्नप्रभसूरि ने
  61. राजस्थान में फ़ारसी भाषा का सबसे प्राचीन अभिलेख कौनसा है 
    अजमेर का अभिलेख (अजमेर के ढ़ाई दिन के झोंपड़े के गुम्बज की दीवार के पीछे लगा हुआ )
  62. बडवा ग्राम (कोटा) से कितने मोखरी यूप अभिलेख प्राप्त हुए है?
    तीन

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राजस्थान के प्रमुख शिलालेख एवं प्रशस्तियां


1. बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.)- 

यह शिलालेख बिजौलिया (भीलवाड़ा) के पार्श्वनाथ मंदिर के पास एक चट्टान पर उत्कीर्ण किया गया है
यह शिलालेख संस्कृत भाषा में लिखा हुआ है
बिजौलिया शिलालेख से सांभर और अजमेर के चौहान वंश के बारे में जानकारी मिलती है।
इस शिलालेख के रचयिता गुणभद्र तथा लेखक कायस्थ केशव थे।
इस शिलालेख के अनुसार चौहानों की उत्पत्ति वत्सगौत्रीय ब्राह्मण से हुई है।
बिजौलिया शिलालेख में विभिन्न नगरो के प्राचीन नाम वर्णित है
बिजौलिया शिलालेख की स्थापना 1170 ईं. में जैन श्रावक लोलाक ने की थी
बिजौलिया शिलालेख उत्कीर्णकर्ता गोविन्द थे
इस शिलालेख के अनुसार वासुदेव चौहान ने अहिछात्रपुर (नागौर) को चौहान साम्राज्य की राजधानी बनाया।

इस शिलालेख में बिजौलिया के आस-पास के पठारी भाग को उत्तमाद्री कहा गया है जिसे वर्तमान में उपरमाल के नाम से जाना जाता है।

इस लेख में कई क्षेत्रों के प्राचीन नाम दिए गये है – जैसे –जाबालिपुर (जालौर), श्रीमाल (भीनमाल), शाकम्भरी (सांभर), नड्‌डुल (नाडौल), ढ़िल्लिका (दिल्ली), नागह्रद (नागदा), मांडलकर (मांडलगढ़), विंध्यवल्ली (बिजौलिया), उत्तमाद्री (उपरमाल) आदि।

यह मूलत: दिगम्बर लेख है।

बिजौलिया शिलालेख में महाराज वासुदेव चौहान द्वारा चौहान वंश की स्थापना तथा सांभर झील बनवाने का उल्लेख है।  

बिजौलिया शिलालेख से ज्ञात होता है की विग्रहराज चतुर्थ ने दिल्ली को अपने अधीन किया था

2. घोसुंडी शिलालेख (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व)
यह शिलालेख घोसुण्डी गाँव ( चित्तौड़गढ़ ) में प्राप्त हुआ है

इस शिलालेख पर संस्कृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया है।
इस शिलालेख में गजवंश के पाराशरी के पुत्र सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ कराने एवं विष्णु मन्दिर की चार दिवारी बनवाने का उल्लेख मिलता है।
यह राजस्थान में वैष्णव (भागवत) संप्रदाय का सबसे प्राचीन अभिलेख है।
घोसुंडी का शिलालेख सर्वप्रथम डॉक्टर डी आर भंडारकर द्वारा पढ़ा गया

3. अशोक के शिलालेख/विराट नगर अभिलेख  

अशोक के शिलालेख विराट नगर / बैराठ (जयपुर) में मिले । 

जयपुर में स्थित विराट नगर की बीजक पहाड़ी पर दो शिलालेख मिले । 

1. भाब्रू अभिलेख-भाब्रू शिलालेख 1837 ई. में  कैप्टन बर्ट द्वारा खोजा गया था  जिसे 1840 ई. कलकत्ता के सग्रहालय में रखवा दिया गया

भाब्रू शिलालेख में अशोक ने अपने आपको मगध का राजा कहा है। यहां से प्राप्त स्तंभ लेखों में बुद्ध , धम्म , तथा संघ नामक 3 शब्द  ब्राह्मी लिपि में  लिखे हुए मिले हैं। 

भाब्रू शिलालेख से सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म का अनुयायी होना सिद्ध होता है

2. बैराठ शिलालेख- यह शिलालेख 1877 ई. में कालाईल द्वारा खोजा गया 

4. बड़ली शिलालेख (443 ई० पू०)
बड़ली शिलालेख बडली (अजमेर ) गांव में भिलोत माता के मंदिर से स्तंभ के टुकडो से प्राप्त हुआ। 
यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ है|
राजस्थान तथा ब्राह्मी लिपि का सबसे प्राचीन शिलालेख है
यह शिलालेख गौरीशंकर हीराचंद ओझा के द्वारा खोजा गया था
यह राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख है जो वर्तमान में राजपुताना संग्रहालय (अजमेर) में सुरक्षित है
 

5. मानमोरी शिलालेख (713 ई.)
यह शिलालेख पूठोली गांव (चित्तौड़गढ़) के समीप मानसरोवर झील के तट पर मिला।
इस शिलालेख में अमृत मंथन का उल्लेख है ।
इस शिलालेख का लेखक पुष्य तथा उत्कीर्णकर्ता शिवादित्य था।
कर्नल जेम्स टॉड ने इंग्लैण्ड जाते समय इसे समुद्र में फेंक दिया था ।
यह शिलालेख मौर्य वंश की जानकारी देता है।

इस शिलालेख की प्रतिलिपि कर्नल जेम्स टॉड के ग्रंथ एनल्स एंड एंटिक्विटीज ऑफ राजस्थान के प्रथम भाग में प्रकाशित है।

6. नांदसा युप-स्तम्भ लेख (225 ई. पू.)

यह शिलालेख  भीलवाड़ा के निकट नांदसा स्थान (भीलवाड़ा) पर एक सरोवर में प्राप्त गोल स्तंभ पर उत्कीर्ण है। 

इस स्तम्भ लेख की स्थापना सोम द्वारा की गई थी ।

इस लेख से उत्तरी भारत में प्रचलित पौराणिक यज्ञों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त होती है 

यह स्तम्भ लेख तालाब के मध्य में स्थित होने के कारण वर्ष के उन्हीं दिनों में पढ़ा जा सकता है, जब तालाब सूख जाता है

इस अभिलेख में शक्ति गुणगुरु नामक व्यक्ति द्वारा षष्ठिरात्र यज्ञ किए जाने का वर्णन है।

7. नगरी शिलालेख

यह शिलालेख चितौड़गढ़ के नगरी नामक स्थान से प्राप्त हुआ

इस अभिलेख की भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है 

यह शिलालेख नगरी का सम्बन्ध विष्णु की पूजा से बताता है।

8. चीरवा का शिलालेख (1273 ई.)
यह शिलालेख चीरवा गाँव(उदयपुर) में एक मंदिर के बाहरी द्वार पर लगा हुआ है
 यह 36 पंक्तियों और 51 श्लोकों का शिलालेख है जिसकी भाषा संस्कृत  लिपि देवनागरी लिपि है 

यह शिलालेख मेवाड़ के गुहिलवंशी राणाओं की समरसिंह के काल तक की जानकारी प्रदान करता है।

इस शिलालेख से सामाजिक कुरीतियों जैसे सती प्रथा की जानकारी मिलाती है 

यह शिलालेख बाप्पा के  रावल के वंशजों की उप‍लब्धियों का वर्णन हैं।

 रत्नप्रभसुरी ने चिरावा शिलालेख की रचना की और पार्शवचंद इसके लेखक थे

9. किराडू का शिलालेख (1161ई.)
किराडू शिलालेख किराडू (बाड़मेर) के शिव मंदिर में संस्कृत में 1161 ई. का उत्कीर्ण लेख है
किराडू शिलालेख में परमार शाखा की वंशावली का वर्णन है। जिसमें परमारो की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के आबू यज्ञ से बताई गई है।

10. सांमोली शिलालेख (646 ई.)

सांमोली (भोमट तहसील-उदयपुर) में प्राप्त हुआ

सांमोली शिलालेख में प्रयुक्त भाषा संस्कृत और लिपि कुटिल है

इससे  यह भी संकेत मिलता है कि जावर के निकट के अरण्यगिरि में तांबे और जस्ते की खानों का काम भी इसी युग से आरम्भ हुआ हो। 

यह शिलालेख गुहिलवंश के शासक शिलादित्य के समय का हैं, तथा यह शिलालेख शिलादित्य के समय की आर्थिक व राजनीतिक जानकारी देता हैं।

डॉ. ओझा ने इसको अजमेर संग्रहालय में रखवा दिया था,

गुहिलादित्य के समय के इस शिलालेख में लिखा गया है कि ‘‘वह शत्रुओं को जीतने वाला, देव ब्राह्मण और गुरूजनों को आनन्द देने वाला और अपने कुलरूपी आकाश का चन्द्रमा राजा शिलादित्य पृथ्वी पर विजयी हो रहा है।’’

जेंतक मेहतर ने अरण्यवासिनी देवी का मन्दिर बनवाया था, जिसे जावर माता का मन्दिर भी कहते हैं।

उदयपुर से प्राप्त यह शिलालेख गुहिल शासक शिलादित्य के समय का है।

11. श्रृंगी ऋषि शिलालेख (1428 ई.)
यह एकलिंगजी/कैलाशपुरी (उदयपुर) के पास श्रृंगी ऋषि नामक स्थान से खंडित अवस्था में मिला है। 
श्रृंगी ऋषि शिलालेख के रचनाकार वाणी विलास योगेश्वर थे
यह लेख राणा मोकल के समकालीन है
यह शिलालेख मेवाड़ के महाराणाओं के बारे में विस्तृत वर्णन करता है I
इसमें उल्लेख है की राणा लाखा ने काशीगया एवं प्रयाग जाने वाले हिन्दुओं से कर हटवाकर इन तीनो स्थानों पर शिव मंदिर का निर्माण कराया था 

यह संस्कृत भाषा उत्कीर्ण लेख है और इसमें 30 श्लोक हैं।
इस शिलालेख में भीलों के सामाजिक जीवन का भी वर्णन किया गया है 
यह लेख मोकल के समय का हैजिसने अपने धार्मिक गुरु के आदेश सेअपनी पत्नी गौरम्बिका की मुक्ति के लिए श्रृंगी ऋषि के पवित्र स्थान पर एक कुंड बनवाया था।
इस लेख में लक्ष्मण सिंह और क्षेत्र सिंह की त्रिस्तरीय यात्रा का वर्णन मिलता है। जहां उन्होंने दान में विपुल धनराशि दी और गया में मंदिरों का निर्माण करवाया।

12.बसंतगढ़ शिलालेख (625 ई.)

यह शिलालेख चावडा वंश के शासक वर्मलात के समय का माना जाता है।

यह शिलालेख बसंतगढ़ (सिरोही) से प्राप्त हुआ है।

इस अभिलेख में सामन्त प्रथा का उल्लेख मिलता है।

इसकी भाषा संस्कृत और लिपि कुटिल है।

13. कणसवा का अभिलेख-(738 ई.)

यह अभिलेख कोटा के निकट कणसवा गाँव में उत्कीर्ण है

इस शिलालेख में  मौर्य वंश के राजा धवल का उल्लेख मिलता है।

कणसवा व मानमोरी शिलालेख पुठोली (चित्तौड़) के शिलालेखों से ज्ञात होता है कि मौर्य का राजस्थान से संबंध था।

14. आमेर का शिलालेख (1612 ईं) 

आमेर का शिलालेख आमेर दुर्ग (जयपुर) में है

आमेर का शिलालेख संस्कृत भाषा एवं नागरी लिपि में है

इस शिलालेख में आमेर के कछवाहा राजवंश के बारे में जानकारी मिलती है

आमेर के लेख में कछवाहा राजवंश को रघुवंश तिलक कहा गया है। 

इसमें आमेर के कछवाहा राजवंश के शासक - पृथ्वीराज ,भारमल,भगवंतदास, और मानसिंह का उल्लेख किया गया है  इस लेख में मानसिंह को भगवन्तदास का पुत्र बताया गया है। 

इस शिलालेख में मानसिंह द्वारा जमुआ रामगढ़ के दुर्ग के निर्माण का उल्लेख है । 

इस शिलालेख में में जहाँगीर की प्रशंसा की गई 

15. घटियाला के शिलालेख (861 ई.)-

जोधपुर के पास घटियाला में एक स्तंभ पर उत्कीर्ण हैं।

यह लेख संस्कृत भाषा में हैं

यह शिलालेख कुक्कुक प्रतिहार की जानकारी देता हैं। 

इस शिलालेख का लेखक मग हैं।

इसमें मग जाति के ब्रह्माणों का उल्लेख मिलता है 

इनमें प्रतिहार नरेश कुक्कुक का वर्णन है इस अभिलेख को क्क्कुक प्रतिहार ने बनवाया था ।

16. अपराजित का शिलालेख (661 ई.)

यह शिलालेख नागदा गाँव के निकटवर्ती कुंडेश्वर के मन्दिर की दिवार पर उत्कीर्ण था।

इसकी रचना ‘दामोदर’ ने की 

अपराजित के शिलालेख में 7वीं सदी के मेवाड़ के इतिहास की जानकारी मिलती है।

यह शिलालेख वर्तमान में उदयपुर में विक्टोरिया हॉल के संग्रहालय में स्थित है।

इस शिलालेख की भाषा संस्कृत है।

17. समिधेश्वर मंदिर का शिलालेख ( 1485 ई. )

यह अभिलेख चित्तौड़ दुर्ग में समिधेश्वर मंदिर में स्थित है 

इस लेख से मेवाड़ के शिल्पियों की जानकारी है 

इसमें मोकल द्वारा निर्मित विष्णु मंदिर निर्माण का उल्लेख मिलता है।

18. बड़वा यूप (स्तम्भ) अभिलेख (238 -39 ई. ):-

यह अभिलेख बड़वा ग्राम कोटा में है। इसकी भाषा संस्कृत एवं लिपि ब्राह्मी है

यह अभिलेख मौखरी राजाओं का सबसे पुराना और पहला अभिलेख है।

यह तीन यूप पर खुदा है। यूप एक प्रकार का स्तम्भ है।

इस शिलालेख में बलवर्धन, सोमदेव और बलसिंह द्वारा त्रिरात्र यज्ञों के आयोजन के उपरांत मौखरी धनत्रात द्वारा अप्तोयाम यज्ञ को संपादित किए जाने का उल्लेख मिलता है।

1. राज प्रशस्ति (1676 ई.)

राज प्रशस्ति मेवाड़ के शासक राजसिंह के द्वारा 1676 ई. में राजस्थान के राजसमंद जिले की राजसमंद झील की नौ चौकी पाल पर महाकाव्य के रूप में संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण किया गया थी। 
राज प्रशस्ति विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति या विश्व का सबसे बड़ा अभिलेख है।
राज प्रशस्ति के रचयिता रणछोड़ भट्ट तैलंग थे। 
राज प्रशस्ति  में महाराणा अमरसिंह (मेवाड़) व जहाँगीर (मुगल) के मध्य संधि उल्लेख है। 
राज प्रशस्ति को राजसिंह प्रशस्ति भी कहा जाता है।
राज प्रशस्ति 25 काली पाषाणों की शिलाओं पर उत्कीर्ण है।
राज प्रशस्ति में मेंवाड़ के सिसोदिया वंश (गुहिल वंश) की जानकारी मिलती है।
राज प्रशस्ति से जानकारी मिलती है कि राजसमंद झील का निर्माण अकाल राहत कार्यों के लिये करवाया गया था। 

2. कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति/विजय स्तम्भ प्रशस्ति/विष्णु स्तम्भ प्रशस्ति (1460 ई.)

यह प्रशस्ति चित्तौड़गढ़ किले के कीर्ति स्तंभ में कई शिलाओं पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है। 
इस प्रशस्ति की रचना अत्रि भट्ट ने आरम्भ की तथा इसके पुत्र महेश भट्ट ने पूर्ण की थी।

यह राणा कुम्भा की प्रशस्ति है।

कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में महाराणा कुम्भा की विजयों के बारे में जानकारी मिलती है
कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में 
कुंभा द्वारा रचित ग्रंथों चंडी शतक, गीत गोविंद की टीका, संगीत राज,सगीत रत्नाकर, संगीत मीमांसा, सूद प्रबंध आदि  का उल्लेख है

कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में कुंभा की प्रमुख उपाधियों  की जानकारी मिलती है इस प्रशस्ति में कुंभा को महाराजाधिराज, अभिनव भरताचार्य, हिंदु सुरतान, राय रायन, राणो रासौ, गुरु दान गुरु, राजगुरु, हाल गुरु और सेल गुरु आदि नामों से सम्बोधित किया गया है 
कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में गुहिल (सिसोदिया) वंश की सम्पूर्ण जानकारी  है 

3. कुंभलगढ़  प्रशस्ति (1460 ई.)
यह प्रशस्ति कुम्भलगढ़ दुर्ग (राजसमन्द) में स्थित कुंभश्याम मंदिर ( इसे वर्तमान में मामादेव का मन्दिर कहते हैं) में मिला है यह शिलाओं पर उत्कीर्ण है
इस प्रशस्ति के वास्तविक रचयिता कान्हा व्यास है।
डाॅ. गौरीशंकर ओझा के अनुसार कुंभलगढ़ अभिलेख के रचयिता कवि महेश था।
यह राजस्थान का एकमात्र अभिलेख हैं जो महाराणा कुंभा के लेखन पर प्रकाश डालता हैं!
कुंभलगढ़ के अभिलेख से महाराणा कुंभा की उपलब्धियों की जानकारी मिलती है।
वर्तमान में यह शिलालेख उदयपुर संग्रहालय में संरक्षित है 
यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली को विशुद्ध रूप से जानने के लिए बड़ा एवं 
विश्वसनीय स्रोत है।

इसमें बप्पा रावल को ब्राह्मण वंशीय/विप्र वंशीय बताया गया है 
इस प्रशस्ति में हम्मीरदेव चौहान को ‘विषम घाटी पंचानन’ कहा है।  
यह  शिलालेख संस्कृत भाषा में तथा नागरी लिपि में लिखा है। 

4. रणकपुर प्रशस्ति (1439 ई.)

रणकपुर प्रशस्ति राजस्थान के पाली जिले के रणकपुर गाँव में चौमुखा मंदिर के स्तम्भ पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण की गई है। 

रणकपुर प्रशस्ति में मेवाड़ के राजवंश एवं धरणक सेठ के वंश का वर्णन मिलता है

रणकपुर प्रशस्ति का रचयिता देपाक (दीपा या देवाक) था।

रणकपुर प्रशस्ति में गुहिल को बप्पा रावल का पुत्र बताया गया है।

रणकपुर प्रशस्ति में बप्पा रावल एवं कालभोज को अगल-अलग व्यक्ति बताया गया है। 

रणकपुर प्रशस्ति में कुंभा की विजय व उपाधियों का वर्णन मिलता है। 

इस लेख में नाणक शब्द का प्रयोग मुद्रा के लिए किया गया है। 

5. जगन्नाथराय प्रशस्ति- (1652 ई.)

यह प्रशस्ति उदयपुर के जगदीश मन्दिर/सपनो से बना मन्दिर में लगी हुई हैं

इस प्रशस्ति में हल्दीघाटी के युद्ध का उल्लेख हैं।

इसके रचयिता कृष्णभट्ट थे

इसमें  महाराणा जगतसिंह के युद्धों एवं पुण्य कार्यों का विस्तृत विवेचन है।

यह शिलालेख काले पत्थरों पर नक्काशी द्वारा बनाया गया है जो मंदिर के सभा-भवन में स्थापित किए गए हैं

6. नेमिनाथ प्रशस्ति (1230 ई.)

नेमिनाथ प्रशस्ति को लूणवसही प्रशस्ति भी कहा जाता है।

नेमिनाथ  प्रशस्ति  देलवाड़ा जैन मंदिर, माउण्ट आबू (सिरोही) के एक मंदिर लूणवसही जैन मंदिर/नेमिनाथ मंदिर/तेजपाल व वास्तुपाल मंदिर में है

इसकी भाषा संस्कृत है और इसे  गद्य में लिखा गया है।

आबू के शासक धारावर्ष का वर्णन इसी शिलालेख में हैं

यह प्रशस्ति वस्तुपाल व तेजपाल द्वारा बनवायी गई है 

इसमें आबू के परमार शासकों तथा वस्तुपाल व तेजपाल के वंश का उल्लेख है। 

नेमिनाथ मंदिर प्रशस्ति से परमार वेशीय शासकों की जानकारी मिलती है। 

इसकी रचना सोमेश्वर ने की थी जबकि उत्कीर्ण चण्डेश्वइर ने किया था।



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