GSSS BINCHAWA

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GSSS KATHOUTI

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1.भारत - स्थिति

भारत की स्थिति एवं अवस्थिति –
ग्लोब पर भारत की अवस्थिति दक्षिण एशिया में है। अक्षांशीय दृष्टि से भारत की अवस्थिति उत्तरी गोलार्द्ध में तथा देशान्तरीय दृष्टि से पूर्वी गोलार्द्ध में है।
भारत के अक्षांशीय और देशांतरीय विस्तार लगभग 30° है भारत का अक्षांशीय विस्तार 8°4' उत्तरी अक्षांश से 37°6' उत्तरी अक्षांश तथा देशान्तरीय विस्तार 68°7' पूर्वी देशान्तर से 97°25' पूर्वी देशान्तर तक है
भारत का सबसे उत्तरी बिन्दु 'इन्दिरा-कॉल' को माना जाता है जो लद्दाख में है। भारत की मुख्य भूमि का दक्षिणतम बिन्दु (8° 4' उत्तरी अक्षांश) कन्याकुमारी/ केप कमोरिन अंतरीप (तमिलनाडु) है। भारत का सबसे दक्षिणी बिन्दु 'इन्दिरा-प्वाइन्ट' है जो अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के ग्रेट निकोबार द्वीप का दक्षिणी बिन्दु (6° 45' उत्तरी अक्षांश) है।
भारत का पश्चिमी बिन्दु गौरमोता (गुजरात) और पूर्वी बिन्दु किबिथु (अरूणाचल प्रदेश) है
कर्क रेखा भारत के मध्य भाग से 8 राज्यों गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा एवं मिजोरम से होकर गुजरती है इस कारण भारत का दक्षिणी हिस्सा उष्णकटिबंध में और उत्तरी हिस्सा उपोष्ण कटिबंध अथवा कोष्ण शीतोष्ण कटिबंध में स्थित है। यही स्थिति देश में भूआकृति, जलवायु, मिट्टी के प्रकारों तथा प्राकृतिक वनस्पति में पाई जाने वाली भारी भिन्नता के लिए उत्तरदायी है।
82° 30' पूर्वी देशान्तर रेखा को देश का मानक याम्योत्तर (देशांतर) माना गया है। यह मानक याम्योत्तर उत्तर प्रदेश के (इलाहबाद के निकट) मिर्जापुर से होकर गुजरती है। भारतीय मानक समय (I.S.T.) ग्रीनविच मीन टाइम (G.M.T) से 5 घंटा 30 मिनट आगे है। हमारे देश के सबसे पूर्वी व सबसे पश्चिमी भागों के समय में लगभग 2 घंटों का अंतर है। इसी कारण उत्तर-पूर्वी राज्यों में जैसलमेर की तुलना में सूर्य दो घंटे पहले उदय होता है जबकि पूर्व में डिब्रूगढ़, इम्फाल तथा देश के अन्य भागों में स्थित जैसलमेर, भोपाल अथवा चेन्नई में घड़ियाँ एक जैसा समय दिखाती हैं। कुछ देश ऐसे हैं जिनमें अधिक पूर्व-पश्चिम विस्तार के कारण एक से अधिक मानक देशांतर रेखाएँ हैं। उदाहरणतः संयुक्त राज्य अमेरिका में छह समय कटिबंध हैं।
भारत : आकार
भारत की आकृति पूर्णतः त्रिभुजाकार न होकर चतुष्कोणीय है।
भारत की उत्तर से दक्षिण तक दूरी 3214 किलोमीटर और पूर्व से पश्चिम तक दूरी 2933 किलोमीटर है
भारत का कुल 32,87,263 (32.8 लाख) वर्ग किमी. है। जो विश्व के स्थलीय धरातल का 2.4 प्रतिशत भाग है। इस प्रकार क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत विश्व का सातवाँ बड़ा देश है
भारत की स्थलीय सीमा की लम्बाई 15200 कि.मी. है स्थलीय सीमा भारत के 16 राज्यों एवं 2 केन्द्रशासित प्रदेशों को छूती है।
भारत की समुद्र तटीय सीमा की कुल लम्बाई (लक्षद्वीप समूह, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की तटीय लम्बाई सहित) 7516.6 किमी. है । मुख्य भूमि की तटीय लम्बाई 5422.6 किमी. है।' तटीय सीमा 9 राज्यों एवं 4 केन्द्रशासित प्रदेशों को छूती है।
भारत की 'प्रादेशिक जल सीमा' तट रेखा से 12 समुद्री मील (लगभग 21.9 किलोमीटर) की दूरी तक है।
1 मानक मील: लगभग 1.6 कि.मी. (1.584 कि.मी.)
1 समुद्री मील: लगभग 1.8 कि.मी. (1.824 कि.मी.)
आकार - भारत के आकार ने इसे विशिष्ट भौतिक विविधता प्रदान की है। उत्तर में ऊँचे पर्वत, गंगा, ब्रह्मपुत्रा, महानदी, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी जैसी बड़ी नदियाँ हैं उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी भारत में वनाच्छादित पहाड़ियाँ हैं, जबकि मरुस्थली में रेत के विस्तृत फैलाव हैं। उत्तर में हिमालय पर्वत, उत्तर-पश्चिम में हिंदूकुश व सुलेमान श्रेणियों, उत्तर-पूर्व में पूर्वांचल पहाड़ियों तथा दक्षिण में विशाल हिंद महासागर से सीमांकित एक बृहत भौगोलिक इकाई है, जिसे भारतीय उपमहाद्वीप कहा जाता है। इसमें पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और भारत आते हैं। भूतकाल में हिमालय अपनी अन्य श्रेणियों के साथ एक मजबूत भौतिक अवरोधक की भूमिका निभाता रहा है। खैबर, बोलन, शिपकीला, नाथुला तथा बोमडीला जैसे कुछ पहाड़ी दर्रों को छोड़कर इसे पार करना मुश्किल था। हिमालय पर्वत ने भारतीय उपमहाद्वीप को एक अद्वितीय क्षेत्रीय पहचान स्थापित करने में सहायता की है। भारत का प्रायद्वीप भाग हिंद महासागर की ओर उभरा हुआ है। भारत की संपूर्ण तट रेखा द्वीप समूहों समेत 7517 किलोमीटर पर विस्तृत है। अतः एक देश के रूप में भारत भौतिक दृष्टि से विविधतापूर्ण भूभाग है, जिससे यहाँ विभिन्न प्रकार के संसाधन पाए जाते हैं।
भारत : पड़ोसी देश 
भारत, एशिया महाद्वीप के दक्षिण-मध्य भाग में स्थित है और बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के रूप में विस्तृत इसकी दोनों भुजाएँ हिंद महासागर के साथ सीमा बनाती हैं। प्रायद्वीपीय भारत की इस सामुद्रिक स्थिति की वजह से ही भारत समुद्री व वायुमार्गों द्वारा अपने पड़ोसी क्षेत्रों से जुड़ा है। श्रीलंका और मालदीव, हिंद महासागर में स्थित दो द्वीपीय देश हैं जो भारत के पड़ोसी हैं। श्रीलंका भारत से मनार की खाड़ी और पाक जलसंधि द्वारा अलग हुआ है। भारतीय उपमहाद्वीप में पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और भारत आते हैं। भारत की सीमाओं से लगे कुल सात पड़ोसी देश हैं। पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान, म्यांमार, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश। भारत एवं बांग्लादेश सीमासबसे लम्बी अन्तर्राष्ट्रीय स्थलीय सीमा तथा भारत एवं अफगानिस्तान की सीमा रेखा सबसे छोटी अन्तेर्राष्ट्रीय सीमा है

NCERT Solutions for Class 11th
पाठ 1 - भारत - स्थिति
       पाठ्य पुस्तक के प्रश्न      

  1. निम्नलिखित में से कौन-सा अक्षांशीय विस्तार भारत की संपूर्ण भूमि के विस्तार के सन्दर्भ में प्रासंगिक है?
    (क) 8°41' उ. से 35°7' उ.
    (ख) 8°4' उ. से 37°6' उ.
    (ग) 8°4' उ. से 35°6' उ.
    (घ) 6°45' उ. से 37°6' उ.                                 (ख) 
  2. निम्नलिखित में से कौन-सा देश क्षेत्रफल में भारत से बड़ा है?
    (क) चीन                 
    (ख) फ्रांस
    (ग) मिस्र                 
    (घ) ईरान                                                      (क)
  3. निम्नलिखित याम्योत्तर में से कौन-सा भारत का मानक याम्योत्तर है?
    (क) 69°30' पूर्व        
    (ख) 82°30' पूर्व
    (ग) 75°30' पूर्व        
    (घ) 90°30' पूर्व                                              (ख)
  4. अगर आप एक सीधी रेखा में राजस्थान से नागालैंड की यात्रा करें तो निम्नलिखित नदियों में से किस एक को आप पार नहीं करेंगे?
    (क) यमुना              
    (ख) सिंधु
    (ग) ब्रह्मपुत्र             
    (घ) गंगा                                                       (ख)
  5. निम्नलिखित में से किस देश की भारत के साथ सबसे लंबी स्थलीय सीमा है?
    (क) बांग्लादेश         
    (ख) पाकिस्तान
    (ग) चीन                 
    (घ) म्यांमार                                                  (क)
  6. क्या भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है? यदि हाँ, तो आप ऐसा क्यों सोचते हैं?
    हाँ, भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है, क्योंकि भारत के देशांतर रेखाओं के मानों में 30° का अंतर है| जिस कारण देश के सबसे पूर्वी व सबसे पश्चिमी भागों के समय में लगभग 2 घंटों का अंतर होता है| 
  7. भारत की लंबी तटरेखा के क्या प्रभाव हैं?
    भारत की लंबी तटरेखा के निम्न प्रभाव है 
    1. भारत की लंबी तटरेखा भारत की जलवायु को सैम बनाये रखने में महत्वपूर्ण निभाती है 
    2.  भारत की लंबी तटरेखा भारत को सस्ते जल यातायात की सुविधा उपलब्ध कराती है 
    3. भारत की लंबी तटरेखा भारत को महत्वपूर्ण सागरीय संसाधन उपलब्ध कराती है 
    4. भारत की लंबी तटरेखा सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है 
  8. भारत का देशांतरीय फैलाव इसके लिए किस प्रकार लाभप्रद है?
    भारत का देशांतरीय विस्तार 30° है इतने कम देशान्तरीय विस्तार के कारण ही भारत की एक मानक समय रेखा (82°30’ पूर्व) है। यह देशान्तर रेखा देश के मध्य से गुजरती है, इसलिए इस रेखा को देश को मानक समय माना जाता है। वास्तव में, यदि देश का देशान्तरीय विस्तार बहुत अधिक होता तब हमें कई मानक कटिबन्धों की आवश्यकता होती। अत: देश का वर्तमान देशान्तरीय फैलाव मानक समय की दृष्टि से लाभप्रद है।
  9. जबकि पूर्व में, उदाहरणत: नागालैण्ड में, सूर्य पहले उदय होता है और पहले ही अस्त होता है, फिर कोहिमा और नई दिल्ली में घड़ियाँ एक ही समय क्यों दिखाती हैं?
    भारत के पूर्व में सूर्य पहले उदय होता है और पहले ही अस्त होता है किन्तु देश की घड़ियाँ समय एक ही दिखाती हैं, क्योंकि घड़ियों के समय का निर्धारण एक ही केन्द्रीय देशान्तर या 82°30' पूर्व मानक याम्योत्तर द्वारा होता है। यही कारण है कि कोहिमा और नई दिल्ली में घड़ियाँ एक ही समय दिखाती हैं।

        अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न         
  1. हिमालय पर्वत के किन्ही  चार दरों के नाम लिखिए।
    (1) काराकोरम, (2) शिपकीला, (3) नाथुला, (4) बोमडिला।
  2. भारतीय उपमहाद्वीप में  कौन-कौन से देश शामिल है?
    भारतीय उपमहाद्वीप में मुख्यतः ये 6 देश भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका शामिल हैं।
  3. भारत के अक्षांशीय एवं वेशान्तरीय विस्तार को लिखिए।
    भारत 8°4′ उत्तर से 37°6′ उत्तरी अक्षांश और 68°7′ से 97°25′ पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है।
  4. भारत की सीमाओं पर स्थित पडोसी देशों के नाम लिखिए।
    भारत की सीमाओं से लगे कुल सात पड़ोसी देश हैं। पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान, म्यांमार, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश।
  5. भारत की तट रेखा की कुल लम्बाई कितनी है ?
    उत्तर-भारत की तट रेखा की कुल लम्बाई 7,516.6 किमी है।
  6. भारत का कुल क्षेत्रफल कितना है ?
    32,87,263 (32.8 लाख) वर्ग किमी. 
  7. क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है?
    सातवाँ
  8. भारत के दक्षिण में कौन-से दो द्वीपीय देश स्थित हैं?
    भारत के दक्षिण में मालदीव व श्रीलंका दो द्वीपीय देश स्थित हैं।
  9. भारत किस गोलार्द्ध में स्थित है?
    उत्तरी गोलार्द्ध में
  10. भारत का विस्तार कितने अक्षांश और देशांतरों के बीच है?
    30°
  11. भारत का भौगोलिक क्षेत्रफल विश्व के भौगोलिक क्षेत्रफल का कितना प्रतिशत भाग है?
    2.4%
  12. भारत का सबसे पूर्वी देशांतर कौन-सा है?
    97°25' पू○
  13. भारत का मानक किस याम्योत्तर (देशांतर) से लिया गया है ?
    82°30′ पूर्वी देशांतर
  14. भारत की मुख्य भूमि की दक्षिणी सीमा किस अक्षांश तक है ?
    8°4’ उत्तरी अक्षांश
  15. भारतीय मानक समय (I.S.T.) ग्रीनविच मीन टाइम (G.M.T) से कितना आगे है?
    भारतीय मानक समय (I.S.T.) ग्रीनविच मीन टाइम (G.M.T) से 5 घंटा 30 मिनट आगे है।

संरचना तथा भूआकृति विज्ञान

पृथ्वी की आयु लगभग 46 करोड़ वर्ष है। इस दौरान पृथवी के भूपृष्ट पर अनेक अंतर्जात व बहिर्जात बलों से अनेक परिवर्तन हएु हैं करोड़ों वर्ष पहले ‘इंडियन प्लेट’ भूमध्य रेखा से दक्षिण में स्थित थी। करोड़ों वर्षों के दौरान, यह प्लेट कई हिस्सों में टूट गई आस्ट्रेलियन प्लेट दक्षिण-पूर्व तथा इंडियन प्लेट उत्तर दिशा में खिसकने लगी। इंडियन प्लेट का खिसकना अब भी जारी है और इसका भारतीय उपमहाद्वीप के भौतिक पर्यावरण पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव है। भारतीय उपमहाद्वीप की वर्तमान भूवैज्ञानिक संरचना व इसके क्रियाशील भूआकृतिक प्रक्रम मुख्यतः अंतर्जनित व बहिर्जनिक बलों व प्लेट के क्षैतिज संचरण की अंतः क्रिया के परिणामस्वरुप अस्तित्व में आए हैं। 
भूवैज्ञानिक संरचना व शैल समूह की भिन्नता के आधार पर भारत को तीन भूवैज्ञानिक खंडों में विभाजित किया जाता है जो भौतिक लक्षणों पर आधरित हैं 
(क) प्रायद्वीपीय खंड
(ख) हिमालय और अन्य अतिरिक्त प्रायद्वीपीय पर्वतमालाएँ
(ग) सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान
(क) प्रायद्वीपीय खंड
प्रायद्वीपीय भारत प्राचीन गोण्डवानालैंड का विखण्डित पठारी भाग है जिसका अधिकांश भाग की चटूटानें प्राचीन होने के साथ-साथ कठोर भी हैं प्रायद्वीपीय पठार के अन्तर्गत दक्षिणी भारत के पठारी भाग के अतिरिक्त उत्तर-पूर्व में मेघालय का पठारकर्बी एंगलॉग पठार तथा पश्चिम में राजस्थानकच्छ-काठियावाड़ क्षेत्र भी सम्मिलित हैं। प्रायद्वीप खंड की उत्तरी सीमा कटी-फटी है, जो कच्छ से आरंभ होकर अरावली पहाड़ियों के पश्चिम से गुजरती हुई दिल्ली तक और फिर यमुना व गंगा नदी के  समानांतर राजमहल की पहाड़ियों व गंगा डेल्टा तक जाती है। इसके अतिरिक्त उत्तर-पूर्व में कर्बी एंगलॉग व मेघालय का पठार तथा पश्चिम में राजस्थान भी इसी खंड के विस्तार हैं। प्रायद्वीपीय पठार प्रमुख रूप से नाइस ग्रेनाइट नामक चट्टानों से निर्मित है। कैम्ब्रियन युग से यह प्रायद्वीपीय पठार एक कठोर भूखण्ड के रूप में अस्तित्व में है। यह इण्डो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट का एक हिस्सा है तथा यह भूगर्भ की उर्ध्वाधर हलचलों व खण्ड भ्रंश से प्रभावित मिलता है। नर्मदा, तापी और महानदी की रिफ्ट(दरार) घाटियाँ और सतपुड़ा पर्वत इसके उदाहरण हैं। इस प्रायद्वीपीय भाग में अरावली, नल्लामाला, जावादी, वेलीकोण्डा, पालकोण्डा तथा महेन्द्रगिरी नामक अवशिष्ट पहाड़ियाँ भी विस्तृत मिलती हैं। 
(ख) हिमालय और अन्य अतिरिक्त प्रायद्वीपीय पर्वतमालाएँ
हिमालय एक नवीन वलित पर्वतमाला है जिनकी उत्पत्ति आज से लगभग 20 करोड़ वर्ष पूर्व मिसोजोइक कल्प में प्रारम्भ हुई। इससे पूर्व इस स्थान पर टेथिस सागर नाम की एक विशाल भूसन्मति का स्तित्त्व था। टिथीज सागर के उत्तर में अंगारालैण्ड तथा दक्षिण में गोण्डवानालैण्ड नामक विशाल भूखण्ड स्थित थे। मिसोजोइक कल्प के अन्तिम चरण में कुछ भूगर्भिक हलचलों के कारण गोण्डवानालैण्ड तथा अंगारालैण्ड के एक-दूसरे के निकट आने लगे जिससे टेथिस सागर में निक्षेपित अवसादों में दबाव पड़ने लगा। इस दबाव से उत्पन्न अन्तर्जनित व बहिर्जनिक बलों के परिणामस्वरूप टेथिस के अवसादों में वलन, भ्रंश, तथा क्षेपों का निर्माण होने लगा। वर्तमान में इस नवीन उत्पत्ति की वलित हिमालय पर्वतमाला पर तीव्र प्रवाह वाली नदियाँ प्रवाहित मिलती हैं जिन्होंने अनेक स्थानों पर गॉर्ज, वी आकार की घाटियाँ क्षिप्रिकाएँ तथा जल प्रपातों का निर्माण किया है।
(ग) सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान
मूलत: सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (जिसे भारत का उत्तरी मैदान भी कहा जाता है।) एक भू-अभिनति गर्त है जिसे लगभग 6.4 करोड़ वर्ष पूर्व से हिमालय और प्रायद्वीप से निकलने वाली नदियाँ अपने साथ लाये अवसादों से सतत रूप से भर रही हैं। इस मैदान में जलोढ़ 1000 से 2000 मीटर गहराई के साथ मिलते हैं। इस मैदानी भाग का निर्माण हिमालय पर्वत निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में प्रारम्भ हुआ। इस मैदान के अधिकांश भाग पर तलछटी चट्टानें बिछी मिलती हैं।
 भूआकृति 
किसी स्थान की भूआकृति, उसकी संरचना, प्रक्रिया और विकास की अवस्था का परिणाम है। भारत में धरातलीय विभिन्नताएँ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इसके उत्तर में हिमालय पर्वत शृंखलाएँ हैं, और दक्षिण भारत एक स्थिर परंतु कटा-फटा पठार है इन दोनों के बीच उत्तर भारत का विशाल मैदान है।
मोटे तौर पर भारत को निम्नलिखित भूआकृतिक खंडों में बाँटा जा सकता है।
(1) उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला
(2) उत्तरी भारत का मैदान
(3) प्रायद्वीपीय पठार
(4) भारतीय मरुस्थल
(5) तटीय मैदान
(6) द्वीप समूह
(1) उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला
इस भू-आकृतिक खंड में हिमालय पर्वत और उत्तरी-पूर्वी पहाड़ियाँ शामिल हैं। हिमालय का पर्वतीय भाग में कई समानांतर पर्वत श्रृंखलाओं से बना हैं। जिन्हें चार भागों में बांटा जा सकता है (i) वृहत हिमालय, (ii) पार हिमालय (iii) मध्य हिमालय (iv) शिवालिक 
हिमालय, भारतीय उपमहाद्वीप तथा मध्य एवं पूर्वी एशिया के देशों के बीच एक मजबूत लंबी दीवार के रूप में खड़ा है। हिमालय एक प्राकृतिक रोधक ही नहीं अपितु जलवायु, अपवाह और सांस्कृतिक विभाजक भी है। हिमालय पर्वतमाला में भी अनेक क्षेत्राीय विभिन्नताएँ हैं। उच्चावच, पर्वत श्रेणियों के संरेखण और दूसरी भूआकृतियों के आधार पर हिमालय को निम्नलिखित उपखंडों में विभाजित किया जा सकता है।
(i) कश्मीर या उत्तरी-पश्चिमी हिमालय
(ii) हिमाचल और उत्तरांचल हिमालय
(iii) दाखजलिंग और सिक्किम हिमालय
(iv) अरुणाचल हिमालय
(v) पूर्वी पहाड़ियाँ और पर्वत
(i) कश्मीर या उत्तरी-पश्चिमी हिमालय - सिंधु और सतलुज नदियों के बीच का हिमालय क्षेत्र कश्मीर हिमालय के नाम से जाना जाता है कश्मीर हिमालय में वृहत्‌ हिमालय के अलावा चार प्रमुख पर्वत श्रेणियाँ मिलती हैं जिन्हें काराकोरम, लद्दाख, जास्कर तथा पीरपंजाल के नाम से जाना जाता है। वृहत्‌ हिमालय तथा काराकोरम श्रेणियों के मध्य में लद्दाख का ठण्डा मरुस्थलीय भाग है जबकि वृहत्‌ हिमालय तथा पीरपंजाल श्रेणियों के मध्य कश्मीर की घाटी और डल झील है।  काराकोरम श्रेणी में भारत की सबसे ऊँची चोटी K-2 या गॉडविन ऑस्टिन स्थित है।  वृहत्‌ हिमालय में जोजीला, पीरपंजाल में बानिहाल , जास्कर में फोटुला तथा लद्दाख श्रेणी में खार्दुंगला नामक पर्वतीय दर्रे मिलते हैं।  दक्षिण एशिया के महत्वपूर्ण ग्लेशियर जैसे बलटोरो व सियाचिन ग्लेशियर इसी हिमालय में पाए जाते हैं। कश्मीर हिमालय के दक्षिणी भागों में कुछ अनुदैर्ध्य घाटियाँ (दून घाटियाँ) भी मिलती हैं। जिनमें जम्मू-दून तथा पठानकोट दून प्रमुख हैं। काश्मीर हिमालय करेवा के लिए प्रसिद्ध है। हिमोढ़ पर मोटी परत के रूप में हिमनद चिकनी मिट्टी तथा दूसरे पदार्थों का जमाव करेवा कहलाता है। जिस पर प्रमुख रूप से देशी केसर (जाफरान) की खेती की जाती है। प्रसिद्ध अलवणीय झीलें डल झील व वुलर झील और पाँगॉगसो व सोमुरीरी  लवणीय झीलें  कश्मीर हिमालय में स्थित है डल झील व वुलर झील अलवणीय झीलें हैं जबकि पाँगॉगसो तथा सोमुरीरी (Tsomuriri) लवणीय झीलें हैं।  वैष्णोदेवी का मंदिर व अमरनाथ गुफा कश्मीर हिमालय के अन्तर्गत महत्वपूर्ण तीर्थ हैं सिंधु तथा इसकी सहायक नदियाँ, झेलम और चेनाब, इस क्षेत्र को अपवाहित करती है जम्मू और कश्मीर की राजधानी श्रीनगर झेलम नदी के किनारे स्थित है। श्रीनगर में डल झील एक रोचक प्राकृतिक स्थल है। 
(ii) हिमाचल और उत्तरांचल हिमालय - हिमालय का यह हिस्सा पश्चिम में रावी नदी और पूर्व में काली (घाघरा की सहायक नदी) के बीच स्थित है। इस प्रदेश में सिंधु की सहायक नदियाँ (रावी, ब्यास और सतलुज) और गंगा की सहायक नदियाँ (यमुना और घाघरा) बहती हैं। हिमालय की तीनों मुख्य पर्वत शृंखलाएँ, वृहत हिमालय, लघु हिमालय (जिन्हें हिमाचल में धौलाधर और उत्तराखण्ड में नागटिबा कहा जाता है) और शिवालिक श्रेणी इस हिमालय खंड में स्थित हैं। वृहत्‌ हिमालय की घाटियों में ग्रीष्म-ऋतु में घास के मैदान मिलते हैं जिन्हें बुग्याल कहा जाता है। वृहत हिमालय की घाटियों में भोटिया प्रजाति के लोग रहते है जो ग्रीष्म ऋतु में बुगयाल में चले जाते हैं और शरद ऋतु में घाटियों में लौट आते हैं। गंगोत्री , यमुनोत्री , बद्रीनाथ तथा हेमकुण्ड साहिब के अतिरिक्त फूलों की घाटी भी इसी पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है। इस क्षेत्र में पाँच प्रसिद्ध प्रयाग (नदी संगम) हैं, शिवालिक श्रेणियों में अनेक दून घाटियाँ मिलती हैं। इनमें चण्डीगढ़-कालका दून, नालागढ़ दून, देहरादून, हरीके दून तथा कोटा दून सामिल हैं। इनमें देहरादून सबसे बड़ी घाटी है
(iii) दार्जिलिंग तथा सिक्किम हिमालय - पश्चिम में नेपाल हिमालय तथा पूर्व में भूटान हिमालय के मध्य में हिमालय का यह भाग स्थित है। भारत का दूसरा सर्वोच्च शिखर कंचनजंगा व तीव्रगामिनी तिस्ता नदी इसी पर्वतीय भाग में स्थित है।यहाँ दुआर नामक स्थलाकृतियाँ मिलती हैं जिनका उपयोग चाय बागान लगाने के लिए किया जाता है। इन पर्वतों के ऊँचे शिखरों पर लेपचा जनजाति पाई जाती है।
(iv) अरुणाचल हिमालय -  यह पर्वत क्षेत्र भूटान हिमालय से लेकर पूर्व में डिफू दर्रे तक फैला है।काँगतु तथा नामचा बरवा इस पर्वत श्रेणी के प्रमुख पर्वतीय शिखर हैं। अरुणाचल हिमालय पर्वत श्रेणियों को उत्तर से दक्षिण दिशा से प्रवाहित नदियों ने अनेक स्थानों पर कटा-फटा बना दिया है। नामचा बरूआ को पार करने के बाद ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी दिहांग एक गहरा गॉर्ज निर्मित करती है। अरुणाचल हिमालय में बहुत-सी जनजातियाँ जैसे मोनपा, अबोर, मिशमी, निशी और नागा निवास करती हैं। ज्यादातर जनजातियाँ झूम खेती करती हैं, जिसे स्थानांतरी कृषि या स्लैश और बर्न कृषि भी कहा जाता है।
(v) पूर्वी पहाड़ियाँ और पर्वत- ये भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में उत्तर-दक्षिण दिशा में फैली हैं। ये पहाड़ियाँ विभिन्न स्थानीय नामों से जानी जाती है। उत्तर में ये पटकाई बूम, नागा पहाड़ियाँ, मणिपुर पहाड़ियाँ और दक्षिण में मिशो या लुसाई पहाड़ियों के नाम से जानी जाती हैं। मणिपुर घाटी के मध्य एक झील स्थित है जिसे ‘लोकताक’ झील कहा जाता है
(2) उत्तरी भारत का मैदान
उत्तरी भारत का मैदान सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा बहाकर लाए गए जलोढ़ निक्षेप से बना है। इस मैदान की पूर्व से पश्चिम लंबाई लगभग 3200 किलो मीटर है। इसकी औसत चौड़ाई 150 से 300 किलोमीटर है। जलोढ़ निक्षेप की अधिकतम गहराई 1000 से 2000 मीटर है। उत्तर से दक्षिण दिशा में इन मैदानों को तीन भागों में बाँट सकते हैं भाभर, तराई और जलोढ़ मैदान। 
(i) भाभर -भाभर 8 से 10 किलोमीटर चौड़ाई की पतली पट्टी है जो शिवालिक गिरिपाद के समानांतर फैली हुई है। हिमालय पर्वत श्रेणियों से बाहर निकलती नदियाँ यहाँ बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े तथा गोलाश्म जमा कर देती हैं। और कभी-कभी स्वयं इसी में लुप्त हो जाती हैं। 
(ii) तराई - भाभर के दक्षिण में तराई क्षेत्र है जिसकी चौड़ाई 10 से 20 किलोमीटर है। भाभर क्षेत्र में लुप्त नदियाँ इस प्रदेश में धरातल पर निकल कर प्रकट होती हैं इन नदियों का कोई निश्चित प्रवाह क्षेत्र न होने के कारण यह एक अनूप या दलदली क्षेत्र बन जाता है, इसी कारण इसे तराई क्षेत्र कहा जाता है।
(iii) जलोढ़ मैदान - तराई से दक्षिण में जलोढ़ मैदान मैदान है जो आगे दो भागों में बाँटा जाता है- खादर और बाँगर।
खादर - नए जलोढ़ मैदान जहाँ बाढ़ का जल प्रतिवर्ष पहुँचकर नयी मिट्टी की परत जमा कर देता है, खादर कहलाता हैं।
बाँगर - पुराने जलोढ़ मैदान जहाँ सामान्य रूप से नदियों की बाढ़ का जल नहीं पहुँच पाता है, बाँगर कहलाते  हैं। 
डेल्टा : डेल्टा नदी के मुहाने पर उसके द्वारा बहाकर लाए गए अवसादों के निक्षेपण से बनी त्रिभुजाकार आकृति होती है| उत्तर भारत के मैदान में बहने वाली विशाल नदियाँ अपने मुहाने पर विश्व बड़े-बड़े डेल्टाओँ का निर्माण करती हैं, जैसे- सुंदर वन डेल्टा
(3) प्रायद्वीपीय पठार
भारत का प्रायद्वीपीय पठार सतलज और गंगा के मैदान के दक्षिण में फैले हुए उस भू-भाग का नाम है जो तीन ओर समुद्र से घिरा है। उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल और सतपुड़ा की पहाड़ियाँ, पूर्व में राजमहल पहाड़ियाँ, पश्चिम में गिर पहाड़ियाँ और दक्षिण में इलायची (कार्डामम) पहाड़ियाँ प्रायद्वीप पठार की सीमाएँ निर्धारित करती हैं।  इस प्रायद्वीप की औसत ऊँचाई 600 से 900 मीटर है। यह भारत का सबसे बड़ा पठार है प्रायद्वीपीय पठार तिकोने आकार वाला कटा-फटा भूखंड है प्रायद्वीपीय पठार भारत का एक प्राचीनतम एवं स्थिर भू-भाग है जिसकी ऊँचाई सामान्यतया पश्चिम से पूर्व की ओर क्रमश: कम होती जाती है। इसी कारण इस प्रायद्वीपीय भाग पर प्रवाहित अधिकांश नदियाँ पश्चिम से पूर्व दिशा में प्रवाहित होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। टॉर, ब्लॉक पर्वत, भ्रंश घाटियाँ, पर्वत स्कंध, नग्न चट्टान संरचना, टेकरी पहाड़ी शृंखलाएँ और क्वार्ट्जाइट भित्तियाँ प्रायट्वीपीय पठार की मुख्य प्राकृतिक स्थलाकृतियों हैं जो प्राकृतिक जल संग्रह के स्थल हैं।
मुख्य उच्चावच लक्षणों के अनुसार प्रायद्वीपीय पठार को तीन भागों में बाँटा जा सकता है।
(i) दक्कन का पठार
(ii) मध्य उच्च भूभाग
(iii) उत्तरी-पूर्वी पठार
(i) दक्कन का पठार - इसे दक्‍कन ट्रैप या लावा का पठार कहते हैं। दक्कन पठार प्राचीन काल में धरातल पर लम्बे दरार या भ्रंश पड़ने और ज्वालामुखी क्रिया से वहाँ से तरल या गाढ़े लावा की परतों के रूप में जमाव से बने हैं। दक्कन पठार में पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, तथा सतपुड़ा, मैकाल तथा महादेव श्रेणियाँ सम्मिलित हैं। पश्चिमी घाट पश्चिमी तट के सहारे विस्तृत हैं जिन्हें महाराष्ट्र में सहयाद्रि, कर्नाटक व तमिलनाडु में नीलगिरि तथा केरल में अन्नामलाई और इलायची (कार्डामम) पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है। पश्चिमी घाट पूर्वी घाट की तुलना में ऊँचे और सतत हैं। पश्चिमी घाट की औसत ऊँचाई 1500 मीटर है जो उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर क्रमश: अधिक होती जाती है। प्रायद्वीपीय पठार की सबसे उँची चोटी अनाईमुडी (2695 मीटर) है, जो पश्चिमी घाट की अनामलाई पहाड़ियों में स्थित है। दूसरी सबसे उँची चोटी डोडाबेटा है और यह नीलगिरी पहाड़ियों में है। पश्चिमी घाट अरब सागर की ओर तीव्र ढाल वाले तथा पूर्व की ओर मन्द ढाल वाले हैं पश्चिमी घाट में थालघाट, भोरघाट, पालघाट, शेनकोटा गैप चार दर्रे हैं
पूर्वी घाट पश्चिमी घाट की भाँति न तो अधिक ऊँचे ही हैं और न श्रृंखलाबद्ध हैं पूर्वी घाट महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा अपरदित हैं। पूर्वी घाटकी प्रमुख श्रेणियाँ जावादी पहाड़ियाँ, पालकोण्डा श्रेणी, नल्लामाला पहाड़ियाँ और महेंद्रगिरि पहाड़ियाँ हैं। ओडिशा के गंजाम जिले में स्थित महेन्द्रगिरि (50 मीटर) पूर्वी घाट की सर्वोच्च चोटी है। पूर्वी तथा पश्चिमी घाट नीलगिरी पहाड़ियों में आपस में मिलते हैं।
(ii) मध्य उच्च भूभाग भारत के लगभग मध्यवर्ती भाग में विस्तृत उच्च भूमि को मध्य उच्च भूमि कहा जाता है। समुद्र तल से मध्य उच्च भू-भाग की औसत ऊँचाई 700 से 1000 मीटर के मध्य है। उत्तर तथा उत्तर-पूर्व की ओर यह ऊँचाई क्रमश: कम होती जाती है। मध्य उच्च भू-भाग का पश्चिमी भाग अरावली पर्वत के रूप में विस्तृत मिलता है जिसके दक्षिण में सतपुड़ा (600 से 900 मीटर) के अवशिष्ट पर्वत मिलते हैं। मध्य उच्च भूभाग का पूर्वी विस्तार राजमहल की पहाड़ियों तक है
(iii) उत्तर-पूर्व पठार - उत्तर-पूर्व पठार प्रायद्वीपीय पठार का ही एक विस्तारित भाग है। जो इंडियन प्लेट के उत्तर-पूर्व दिशा में खिसकने के कारण, राजमहल की पहाड़ियों और मेघालय के पठार के बीच भ्रंश घाटी बनने से अलग हो गया था। बाद में यह नदी द्वारा जमा किए जलोढ़ द्वारा पाट दिया गया। आज मेघालय और कार्बी ऐंगलोंग पठार इसी कारण से मुख्य प्रायद्वीपीय पठार से अलग-थलग हैं। इसमें आवास करने वाली जनजातियों के नाम के आधार पर मेघालय के पठार को तीन भागों में बाँटा गया है (i) गारो पहाड़ियाँ (ii) खासी पहाड़ियाँ (iii) जयंतिया पहाड़ियाँ। असम की कार्बी ऐंगलोंग पहाड़ियाँ भी इसी का विस्तार है। छोटा नागपुर के पठार की तरह मेघालय के पठार भी कोयला, लोहा, सिलीमेनाइट, चूने के पत्थर और यूरेनियम जैसे खनिज पदार्थों का भंडार है। इस क्षेत्र में अधिकतर वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसून से होती है। परिणामस्वरूप, मेघालय का पठार एक अति अपरदित भतूल है चेरापूंज नग्न चट्टानों से ढका स्थल है आरै यहाँ वनस्पति लगभग नहीं के बराबर है।
(4) भारतीय मरुस्थल
अरावली पहाड़िओं के उत्तरी-पूर्वी भाग में रेतीले टीलों का एक शुष्क व वनस्पति रहित क्षेत्र विस्तृत है जिसे भारतीय मरुस्थल या थार का रेगिस्तान कहा जाता है। पश्चिमी राजस्थान में विस्तृत इस मरुस्थलीय भाग में 15 सेमी. से कम वार्षिक वर्षा होती है। स्थानान्तरी रेतीले टीले, छत्रक चट्टानें तथा मरुद्यान यहाँ के प्रमुख भूदृश्य हैं। मरुस्थल को दो भागों में विभक्त किया जाता है-
(i) सिन्धु नदी की ओर ढाल वाला उत्तरी भाग, (ii) कच्छ के रन की ओर ढाल वाला दक्षिणी भाग
मरुस्थलीय भाग में प्रवाहित सभी नदियाँ मौसमी हैं। मरुस्थल के दक्षिणी भाग में प्रवाहित लूनी नदी महत्त्वपूर्ण है। यहाँ का अपवाह अन्त:स्थलीय है, जहाँ नदियाँ मरुस्थल में ही स्थित किसी झील या प्लाया में मिल जाती हैं। इन प्लाया झीलों में खारा जल भरा होता है जिनसे नमक बनाया जाता है।
(5) तटीय मैदान
दक्षिण के पठार के पूर्वी और पश्चिमी घाटों और तटीय समुद्र के बीच में जो मैदान विस्तृत हैं, उन्हें समुद्रतटीय मैदान कहा जाता है। ये मैदान या तो सागरीय लहरों की अपरदन क्रिया द्वारा बने हैं या नदियों द्वारा बहाकर लायी गयी मिट्टी से निर्मित हैं। इन मैदानों को क्रमश: 'पश्चिमी समुद्र तटीय मैदान' और “पूर्वी समुद्रतटीय मैदान' कहा जाता है।
(i) पश्चिमी तटीय मैदान- पश्चिमी तटीय मैदान जलमग्न तटीय मैदानों के उदाहरण हैं।  प्रायद्वीपीय भारत के पश्चिम तट के सहारे-सहारे पश्चिमी तटीय मैदान एक संकीर्ण पट्टी में उत्तर से दक्षिण दिशा में विस्तृत मिलता है। यह तटीय मैदान पत्तनों तथा बन्दरगाहों के विकास के लिए उपयुक्त प्राकृतिक दशाएँ प्रदान करता है। उत्तर में गुजरात तट से दक्षिण में केरल तट तक विस्तृत इस पश्चिमी तटीय मैदान को निम्नलिखित भागों में विभक्त किया जाता है-
➤गुजरात में कच्छ व काठियावाड़ तट
महाराष्ट्र में कोंकण तट
कर्नाटक व केरल में मालाबार तट
मालाबार तट पर विशेष स्थलाकृति कयाल मिलती है। इसका उपयोग मछली पकड़ने तथा अन्तःस्थलीय नौकायन के लिए किया जाता है। और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। केरल में हर वर्ष प्रसिद्ध ‘नेहरू ट्राफी वलामकाली’ (नौका दौड़) का आयोजन ‘पुन्नामदा कयाल’ में किया जाता है। 
पूर्वी तटीय मैदान- भारत का पूर्वी तटीय मैदान स्वर्ण रेखा नदी के मुहाने से कन्याकुमारी तक विस्तृत है। और उभरे हुए तट का उदाहरण है। यह पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में अधिक चौड़ा है बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ यहाँ लम्बे-चौड़े डेल्टा बनाती हैं। इसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी का डेल्टा शामिल है।
(6) द्वीप समूह
भारत में दो प्रमुख द्वीप समूह हैं- एक बंगाल की खाड़ी में और दूसरा अरब सागर में। बंगाल की खाड़ी के द्वीप समूह में लगभग 572 द्वीप हैं। बंगाल की खाड़ी के द्वीपों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है- उत्तर में अंडमान और दक्षिण में निकोबार। ये द्वीप, समुद्र में जलमग्न पवर्तों का हिस्सा है। उक्त दोनों द्वीप समूहों को 10° चैनल अलग करती है। निकोबार द्वीप समूह में स्थित बैरन आइलैंड नामक द्वीप भारत एक एकमात्र जीवित ज्वालामुखी है। इस द्वीप समूह की मुख्य पर्वत चोटियों में सैडल चोटी (उत्तरी अंडमान - 738 मीटर), माउंट डियोवोली (मध्य अंडमान - 515 मीटर), माउंट कोयोब (दक्षिणी अंडमान - 460 मीटर) और माउंट थुईल्लर (ग्रेट निकोबार - 642 मीटर) शामिल हैं।अरब सागर के द्वीपों में लक्षद्वीप तथा मिनिकॉय द्वीप समूह के 36 द्वीप सम्मिलित हैं ये केरल तट से 280 किलोमीटर से 480 किलोमीटर दूर स्थित है। पूरा द्वीप समूह प्रवाल निक्षेप से बना है। और इनमें से 11 पर मानव आवास है। मिनिकॉय सबसे बड़ा द्वीप है

पाठ्य पुस्तक के प्रश्न      

  1. करेवा भूआकृति कहाँ पाई जाती है?
    (क) उत्तरी-पूर्वी हिमालय
    (ख) पूर्वी हिमालय
    (ग) हिमाचल-उत्तराखंड हिमालय
    (घ) कश्मीर हिमालय                (घ) 
  2. निम्नलिखित में से किस राज्य में ’लोकताल’ झील स्थित है?
    (क) केरल
    (ख) मणिपुर
    (ग) उत्तराखंड
    (घ) राजस्थान                       (ख)
  3. अंडमान और निकोबार को कौन-सा जल क्षेत्र अलग करता है?
    (क) 11° चैनल
    (ख) 10° चैनल
    (ग) मन्नार की खाड़ी
    (घ) अंडमान सागर (ख)
  4. डोडाबेटा चोटी निम्नलिखित में से कौन-सी पहाड़ी श्रृंखला में स्थित है?
    (क) नीलगिरी
    (ख) कार्डामम
    (ग) अनामलाई
    (घ) नल्लामाला (क)
  5. यदि एक व्यक्ति को लक्षद्वीप जाना हो तो वह कौन-से तटीय मैदान से होकर जाएगा और क्‍यों ?
    वह केरल के तटीय मैदान होकर जाएगा क्योंकि लक्षद्वीप केरल तट से 280 किमी.से 480 किमी. दूर अरब सागर में स्थित है।
  6. भारत में ठंडा मरूस्थल कहाँ स्थित है? इस क्षेत्र की मुख्य श्रेणियों के नाम बताएँ|
    वृहत्‌ हिमालय तथा काराकोरम श्रेणियों के मध्य में लद्दाख का ठण्डा मरुस्थलीय भाग है इनमें मुख्य श्रेणियाँ कराकोरम, लद्दाख, जास्कर और पीरपंजाल हैं।
  7. पश्चिमी तटीय मैदान पर डेल्टा क्यों नहीं है ?
    पश्चिमी तटीय मैदान संकीर्ण तथा उनमें सीधी ढाल हैं| इस तटीय मैदान की अधिकांश नदियाँ समीपवर्ती उच्च पश्चिमी घाट से उद्गमित होने के कारण तीव्र वेग से बहती हैं तथा इनकी लम्बाई कम है इसलिए ये डेल्टा का निर्माण नहीं करती हैं 
  8. अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूहों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करें|
    1. अरब सागर में स्थित द्वीप समूह  प्रवाल निक्षेप से बना है। जबकि बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूह समुद्र में जलमग्न पवर्तों का हिस्सा है।
    2. अरब सागर के द्वीपों में लक्षद्वीप तथा मिनिकॉय द्वीप समूह के 36 द्वीप सम्मिलित हैं जबकि बंगाल की खाड़ी के द्वीप समूह में लगभग 572 द्वीप हैं।
    3. अरब सागर में स्थित द्वीप समूह 8° उत्तर से 12° उत्तर और 71° पूर्व से 74° पूर्व के बीच स्थित हैं| जबकि बंगाल की खाड़ी के द्वीप समूह  6° उत्तर से 14° उत्तर और 92° पूर्व से 94° पूर्व के बीच स्थित हैं|
  9. नदी घाटी मैदान में पाए जाने वाली महत्वपूर्ण स्थलाकृतियाँ कौन-सी हैं? इनका विवरण दें|
    उत्तरी भारत का मैदान नदी घाटी मैदान भी कहलाता है नदी घाटी मैदान में निम्नलिखित महत्वपूर्ण स्थलाकृतियाँ पाई जाती  हैं
    1. भाभर - भाभर 8 से 10 किलोमीटर चौड़ाई की पतली पट्टी है जो शिवालिक गिरिपाद के समानांतर फैली हुई है। हिमालय पर्वत श्रेणियों से बाहर निकलती नदियाँ यहाँ बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े तथा गोलाश्म जमा कर देती हैं। और कभी-कभी स्वयं इसी में लुप्त हो जाती हैं। 
    2. तराई - भाभर के दक्षिण में तराई क्षेत्र है जिसकी चौड़ाई 10 से 20 किलोमीटर है। भाभर क्षेत्र में लुप्त नदियाँ इस प्रदेश में धरातल पर निकल कर प्रकट होती हैं इन नदियों का कोई निश्चित प्रवाह क्षेत्र न होने के कारण यह एक अनूप या दलदली क्षेत्र बन जाता है, इसी कारण इसे तराई क्षेत्र कहा जाता है।
    3. जलोढ़ मैदान - तराई से दक्षिण में जलोढ़ मैदान मैदान है जो आगे दो भागों में बाँटा जाता है- खादर और बाँगर।
    (i) खादर - नए जलोढ़ मैदान जहाँ बाढ़ का जल प्रतिवर्ष पहुँचकर नयी मिट्टी की परत जमा कर देता है, खादर कहलाता हैं।
    (ii) बाँगर - पुराने जलोढ़ मैदान जहाँ सामान्य रूप से नदियों की बाढ़ का जल नहीं पहुँच पाता है, बाँगर कहलाते हैं। 
          अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न         
  1. प्रायद्वीपीय पठार की सबसे ऊँची चोटी कौन सी है?
    अनाईमुडी (2695 मीटर
  2. नीलगिरी पहाड़ियों की सबसे ऊंची चोटी कौन सी है?
    डोडाबेटा (2637 मी.)
  3. पूर्वी तथा पश्चिमी घाट कहां आपस में मिलते है?
    नीलगिरी पहाड़ियों में
  4. दक्कन का पठार कौन सी चट्टानो से बना है?
    प्राचीन नाइस और ग्रेनाइट से
  5. दुआर स्थलाकृतियों का उपयोग किस के लिए किया जाता है?
    चाय बागान लगाने के लिए
  6. लोकताक झील कहा/किस राज्य में स्थित है?
    मणिपुर में
  7. ‘मालेसिस बेसिन’ किस राज्य को कहा जाता है?
    मिजोरम में।
  8. मणिपुर और मिजोरम की एक मुख्य नदी कौन सी है?
    बराक नदी
  9. नेहरू ट्राफी वलामकाली (नौका दौड़) का आयोजन कहाँ किया जाता है?
     ‘पुन्नामदा कयाल’ में जो केरल मे स्थित है।
  10. जम्मू व कश्मीर की दो अलवणीय झीलें तथा दो लवणीय झीलें कौन सी हैं?
    डल झील व वुलर झील अलवणीय झीलें हैं जबकि पाँगॉगसो तथा सोमुरीरी लवणीय झीलें हैं। 
  11. जम्मू काश्मीर की राजधानी (श्रीनगर) कौन सी नदी के किनारे स्थित है?
    झेलम नदी के किनारे
  12. पृथ्वी की आयु कितनी करोड़ वर्ष है ?
    46 करोड़ों वर्ष
  13. भारत में प्रवाल द्वीपों का एक समूह कौन सा द्वीप है?
    लक्षद्वीप समूह। 
  14. भारत का एक मात्र जीवंत ज्वालामुखी कहाँ स्थिति है?
     बैरन द्वीप एकमात्र जीवंत ज्वालामुखी है जो निकोबार द्वीपसमूह में स्थित है।
  15. अंडमान -निकोबार द्वीप समूह की सबसे ऊंची चोटी कौन सी है?
    उत्तर- सैडल चोटी (738 मीटर) जो उतरी अंडमान में स्थित है।
  16. लक्षद्वीप द्वीपसमूह का सबसे बड़ा द्वीप कौन सा है?
    मिनिकॉय सबसे बड़ा द्वीप है
  17. भारत की सबसे ऊँची चोटी कौन सी है तथा यह किस पर्वत शृंखला में स्थित है  
     काराकोरम श्रेणी में भारत की सबसे ऊँची चोटी K-2 या गॉडविन ऑस्टिन स्थित है।
  18. करेवा किसे कहते है?
    हिमोढ़ पर मोटी परत के रूप में हिमनद चिकनी मिट्टी तथा दूसरे पदार्थों का जमाव करेवा कहलाता है। जिस पर प्रमुख रूप से देशी केसर (जाफरान) की खेती की जाती है
  19. भाभर क्षेत्र से क्या अभिप्राय  है 
    भाभर 8 से 10 किलोमीटर चौड़ाई की पतली पट्टी है जो शिवालिक गिरिपाद के समानांतर फैली हुई है। हिमालय पर्वत श्रेणियों से बाहर निकलती नदियाँ यहाँ बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े तथा गोलाश्म जमा कर देती हैं। और कभी-कभी स्वयं इसी में लुप्त हो जाती हैं। 
  20. तराई क्षेत्र से क्या अभिप्राय है 
    भाभर के दक्षिण में तराई क्षेत्र है जिसकी चौड़ाई 10 से 20 किलोमीटर है। भाभर क्षेत्र में लुप्त नदियाँ इस प्रदेश में धरातल पर निकल कर प्रकट होती हैं इन नदियों का कोई निश्चित प्रवाह क्षेत्र न होने के कारण यह एक अनूप या दलदली क्षेत्र बन जाता है, इसी कारण इसे तराई क्षेत्र कहा जाता है।
  21. डेल्टा किसे कहते है
    डेल्टा नदी के मुहाने पर उसके द्वारा बहाकर लाए गए अवसादों के निक्षेपण से बनी त्रिभुजाकार आकृति होती है| उत्तर भारत के मैदान में बहने वाली विशाल नदियाँ अपने मुहाने पर विश्व बड़े-बड़े डेल्टाओँ का निर्माण करती हैं, जैसे- सुंदर वन डेल्टा
  22. खादर व बाँगर को परिभाषित कीजिए 
    खादर - नए जलोढ़ मैदान जहाँ बाढ़ का जल प्रतिवर्ष पहुँचकर नयी मिट्टी की परत जमा कर देता है, खादर कहलाता हैं।
    बाँगर - पुराने जलोढ़ मैदान जहाँ सामान्य रूप से नदियों की बाढ़ का जल नहीं पहुँच पाता है, बाँगर कहलाते हैं। 
  23. भारत को कितने भूआकृतिक खंडों में बाँटा गया  है। नाम लिखिए 
    भारत को छः भूआकृतिक खंडों में बाँटा जा सकता है।
    (1) उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला
    (2) उत्तरी भारत का मैदान
    (3) प्रायद्वीपीय पठार
    (4) भारतीय मरुस्थल
    (5) तटीय मैदान
    (6) द्वीप समूह
  24. दक्कन का पठार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए 
    इसे दक्‍कन ट्रैप या लावा का पठार कहते हैं। दक्कन पठार प्राचीन काल में धरातल पर लम्बे दरार या भ्रंश पड़ने और ज्वालामुखी क्रिया से वहाँ से तरल या गाढ़े लावा की परतों के रूप में जमाव से बने हैं। दक्कन पठार में पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, तथा सतपुड़ा, मैकाल तथा महादेव श्रेणियाँ सम्मिलित हैं। पश्चिमी घाट पश्चिमी तट के सहारे विस्तृत हैं जिन्हें महाराष्ट्र में सहयाद्रि, कर्नाटक व तमिलनाडु में नीलगिरि तथा केरल में अन्नामलाई और इलायची (कार्डामम) पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है। पश्चिमी घाट पूर्वी घाट की तुलना में ऊँचे और सतत हैं। पश्चिमी घाट की औसत ऊँचाई 1500 मीटर है जो उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर क्रमश: अधिक होती जाती है। प्रायद्वीपीय पठार की सबसे उँची चोटी अनाईमुडी (2695 मीटर) है, जो पश्चिमी घाट की अनामलाई पहाड़ियों में स्थित है। दूसरी सबसे उँची चोटी डोडाबेटा है और यह नीलगिरी पहाड़ियों में है। पश्चिमी घाट अरब सागर की ओर तीव्र ढाल वाले तथा पूर्व की ओर मन्द ढाल वाले हैं पश्चिमी घाट में थालघाट, भोरघाट, पालघाट, शेनकोटा गैप चार दर्रे हैं
    पूर्वी घाट पश्चिमी घाट की भाँति न तो अधिक ऊँचे ही हैं और न श्रृंखलाबद्ध हैं पूर्वी घाट महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा अपरदित हैं। पूर्वी घाटकी प्रमुख श्रेणियाँ जावादी पहाड़ियाँ, पालकोण्डा श्रेणी, नल्लामाला पहाड़ियाँ और महेंद्रगिरि पहाड़ियाँ हैं। ओडिशा के गंजाम जिले में स्थित महेन्द्रगिरि (50 मीटर) पूर्वी घाट की सर्वोच्च चोटी है। पूर्वी तथा पश्चिमी घाट नीलगिरी पहाड़ियों में आपस में मिलते हैं।
  25. भारत के प्रायद्वीपीय पठार का विस्तृत वर्णन कीजिए 
    भारत का प्रायद्वीपीय पठार सतलज और गंगा के मैदान के दक्षिण में फैले हुए उस भू-भाग का नाम है जो तीन ओर समुद्र से घिरा है। उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल और सतपुड़ा की पहाड़ियाँ, पूर्व में राजमहल पहाड़ियाँ, पश्चिम में गिर पहाड़ियाँ और दक्षिण में इलायची (कार्डामम) पहाड़ियाँ प्रायद्वीप पठार की सीमाएँ निर्धारित करती हैं। इस प्रायद्वीप की औसत ऊँचाई 600 से 900 मीटर है। यह भारत का सबसे बड़ा पठार है प्रायद्वीपीय पठार तिकोने आकार वाला कटा-फटा भूखंड है प्रायद्वीपीय पठार भारत का एक प्राचीनतम एवं स्थिर भू-भाग है जिसकी ऊँचाई सामान्यतया पश्चिम से पूर्व की ओर क्रमश: कम होती जाती है। इसी कारण इस प्रायद्वीपीय भाग पर प्रवाहित अधिकांश नदियाँ पश्चिम से पूर्व दिशा में प्रवाहित होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। 
    मुख्य उच्चावच लक्षणों के अनुसार प्रायद्वीपीय पठार को तीन भागों में बाँटा जा सकता है।
    (i) दक्कन का पठार
    (ii) मध्य उच्च भूभाग
    (iii) उत्तरी-पूर्वी पठार
    (i) दक्कन का पठार - इसे दक्‍कन ट्रैप या लावा का पठार कहते हैं। दक्कन पठार प्राचीन काल में धरातल पर लम्बे दरार या भ्रंश पड़ने और ज्वालामुखी क्रिया से वहाँ से तरल या गाढ़े लावा की परतों के रूप में जमाव से बने हैं। दक्कन पठार में पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट तथा सतपुड़ा, मैकाल तथा महादेव श्रेणियाँ सम्मिलित हैं।प
    (ii) मध्य उच्च भूभाग - भारत के लगभग मध्यवर्ती भाग में विस्तृत उच्च भूमि को मध्य उच्च भूमि कहा जाता है। समुद्र तल से मध्य उच्च भू-भाग की औसत ऊँचाई 700 से 1000 मीटर के मध्य है। 
    (iii) उत्तर-पूर्व पठार - उत्तर-पूर्व पठार प्रायद्वीपीय पठार का ही एक विस्तारित भाग है। जो इंडियन प्लेट के उत्तर-पूर्व दिशा में खिसकने के कारण, राजमहल की पहाड़ियों और मेघालय के पठार के बीच भ्रंश घाटी बनने से अलग हो गया था। बाद में यह नदी द्वारा जमा किए जलोढ़ द्वारा पाट दिया गया। आज मेघालय और कार्बी ऐंगलोंग पठार इसी कारण से मुख्य प्रायद्वीपीय पठार से अलग-थलग हैं। 

16. प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन


प्राकृतिक संसाधन - प्रकृति से प्राप्त हर वस्तु जिसका उपयोग मनुष्य अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए सीधा अर्थात उसमें बिना कोई बदलाव किये  करता है प्राकृतिक संसाधन कहलाता है जैसे वन, वन्य जीव, जल और कोयला व पेंट्रोलियम 

गंगा का प्रदूषण  गंगा अपने उदगम स्थान गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी में गंगा सागर तक 2500 किलोमीटर तक की दूरी तय करती है इसके किनारे स्थित उत्तर प्रदेश, बिहार तथा बंगाल के 100 से भी अधिक नगरों ने इसे एक नाले में बदल दिया है। इसका मुख्य कारण इन नगरों द्वारा उत्सर्जित कचरा एवं मल का इसमें प्रवाहित किया जाना है। इसके अतिरिक्त मानव के अन्य क्रियाकलाप हैं नहाना, कपड़े धोना, मृत व्यक्तियों की राख एवं शवों को बहाना। इस कारण गंगा के जल की गुणवत्ता बहुत कम हो गई थी इसलिए 1985 में गंगा सफाई योजना शुरू की गई प्रदूषण संरक्षण और राष्ट्रीय नदी गंगा के कायाकल्प के प्रभावी न्यूनीकरण के दो उद्देश्यों को पूरा करने के लिए जून 2014 केंद्र सरकार द्वारा एक प्रमुख कार्यक्रम नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया गया स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्रीय मिशन कार्यान्वयन विंग है, जिसे अक्टूबर 2016 में स्थापित किया गया था।

पर्यावरण को बचाने वाले पाँच R 
1. Refuse (इनकार)  - Refuse का अर्थ है इनकार या मना करना अतः जो वस्तुएं आपको, आपके परिवार और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। उन्हें खरीदने से इनकार करना। जैसे प्लास्टिक के थैलों को लेने के लिए इनकार करना
2. Reduse कम उपयोग - Reduce का अर्थ है वस्तुओं का कम से कम उपयोग करना। जैसे जब आपको आवश्यकता नहीं तब बिजली के पंखे एवं बल्ब का स्विच बंद कर बिजली बचाना एवं टपकने वाले नल की मरम्मत का जल बचाना 
3. Reuse पुनः उपयोग- Reuse का अर्थ है  किसी वस्तु को उपयोग के बाद फेंकने के बजाय उसका पुनः उसी रूप में बार-बार उपयोग करना। यह पुनःचक्रण से भी अच्छा तरीका है क्योंकि पुनःचक्रण में कुछ ऊर्जा खर्च होती है। जबकि पुनः उपयोग  किसी प्रकार की ऊर्जा खर्च नहीं होती है जैसे लिफाफों को फेंकने के बजाय से उनका पुनः उपयोग किया जा सकता हैं। 
4. Repurpose पुनः प्रयोजन: Repurpose का अर्थ है कि जो वस्तु जिस उपयोग के लिए बनी है यदि उसका उपयोग उस कार्य में नहीं किया जा सकता है तो उसे किसी अन्य उपयोगी कार्य में प्रयोग करना जैसे टूटे-पफूटे चीनी मिट्टी के बर्तनों में पौधे उगाना।
5 .Recycle पुनः चक्रण : Recycle का अर्थ है अपशिष्ट पदार्थों में से उपयोगी वस्तुओं या संसाधनों को निकालकर पुनः नये उत्पाद बनाना जैसे प्लास्टिक, कागज, धातु की वस्तुओं आदि का पुनःचक्रण कर इनसे पुनः उपयोगी वस्तुएँ बनाना। इससे जल्द समाप्त होने वाली संसाधनों को बचाया जा सके और पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है
प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण 
प्राकृतिक संसाधनों का योजनाबद्ध, समुचित व विवेकपूर्ण उपयोग ही प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण कहलाता है
वे सारी वस्तुएँ जिनका हम उपयोग करते हैं हमें पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त होती हैं। हमें अपने संसाधनों की सावधानीपूर्वक (विवेकपूर्ण ढंग से) उपयोग की आवश्यकता है क्योंकि
1. प्राकृतिक संसाधन सीमित है  
2. जनसंख्या वृद्धि के कारण सभी संसाधनों की माँग तेजी से बढ रही है। 
प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करते समय निम्न बातें ध्यान रखनी चाहिए
(i) प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करते समय दीर्घकालिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखना होगा ताकि ये अगली कई पीढ़ियों तक उपलब्ध हो सकें । 
(ii) प्राकृतिक संसाधनों का वितरण सभी वर्गों में समान रूप से हो, न कि मात्र मुट्ठी भर अमीर और शक्तिशाली लोगों को इनका लाभ मिले।
(iii) जब प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करते हैं तो हम पर्यावरण को क्षति पहुँचाते हैं। अतःसंपोषित प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में अपशिष्टों के सुरक्षित निपटान की भी व्यवस्था होनी चाहिए।
वन एवं वन्य जीवन
वन ‘जैव विविधता के विशिष्ट स्थल’ हैं। किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न स्पीशीज की संख्या जैव विविधता का आधार है। वंशागत जैव विविधता को संरक्षित करने का प्रयास प्राकृतिक संरक्षण के मुख्य उद्देश्यों में से एक है। जैव विविधता के नष्ट होने से पारिस्थितिक स्थायित्व भी नष्ट हो सकता है।
स्टेकहोल्डर (दावेदार)
जब हम वन एवं वन्य जीवों की बात करते हैं तो चार मुख्य दावेदार सामने आते हैं। 
(i) वन के अंदर एवं इसके निकट रहने वाले लोग अपनी अनेक आवश्यकताओं के लिए वन पर निर्भर रहते हैं।
(ii) वन विभाग जिनके पास वनों का स्वामित्व है तथा वे वनों से प्राप्त संसाधनों का नियंत्रण करते हैं।
(iii) उद्योगपति जो तेंदु पत्ती का उपयोग बीड़ी बनाने से लेकर कागज मिल तक विभिन्न वन उत्पादों का उपयोग करते हैं, 
(iv) वन्य जीवन एवं प्रकृति प्रेमी जो प्रकृति का संरक्षण इसकी आद्य अवस्था में करना चाहते हैं।
हमारे विचार से इनमें से वन उत्पाद प्रबंधन हेतु निर्णय लेने का अधिकार स्थानीय निवासियों को मिलना चाहिए। यह विकेंद्रीकरण की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें आर्थिक विकास एवं पारिस्थितिक संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं ।
वनों से स्थानीय लोगों को ईंधन के लिए जलाऊ लकड़ी एवं छाजन प्राप्त होती है। इसके अलावा वन मछली पकड़ने एवं शिकार-स्थल भी होते हैं। विभिन्न व्यक्ति फल, नट्स तथा औषधि एकत्र करने के साथ-साथ अपने पशुओं को वन में चराते हैं अथवा उनका चारा वनों से एकत्र करते हैं। अंग्रेजों के भारत आने से पहले लोग इन्हीं वनों में शताब्दियों से रह रहे थे। यहाँ के मूल निवासियों ने ऐसी विधियों का विकास किया जिससे वनों का संपोषण भी होता रहे। अंग्रेजों ने वनों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। अंग्रेजों ने न केवल वनों पर आधिपत्य जमाया वरन् अपने स्वार्थ के लिए उनका निर्ममता से दोहन भी किया। यहाँ के मूलनिवासियों को एक सीमित क्षेत्र में रहने के लिए मजबूर किया गया तथा वन संसाधनों का किसी सीमा तक अत्यधिक दोहन भी प्रारंभ हो गया। स्वतंत्राता के बाद वन विभाग ने अंग्रेजों से वनों का नियंत्राण तो अपने हाथ में ले लिया, परंतु प्रबंधन व्यवहार में स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं एवं ज्ञान की उपेक्षा होती रही। अतः वनों के बहुत बड़े क्षेत्र एक ही प्रकार के वृक्षों जैसे कि पाइन (चीड़), टीक अथवा यूक्लिप्टस के वनों में परिवर्तित हो गए। इन वृक्षों को उगाने के लिए सर्वप्रथम सारे क्षेत्र से अन्य सभी पौधों को हटा दिया गया जिससे क्षेत्र की जैवविविधता बड़े स्तर पर नष्ट हो गई। यही नहीं स्थानीय लोगों की विभिन्न आवश्यकताओं जैसे कि पशुओं के लिए चारा, औषधि हेतु वनस्पति, फल एवं नट इत्यादि की आपूर्ति भी नहीं हो सकी। इस प्रकार के रोपण से उद्योगों को लाभ मिला जो वन विभाग के लिए भी राजस्व का मुख्य स्रोत बन गया। उद्योग इन वनों को अपनी फैक्टरी के लिए कच्चे माल का स्रोत मात्र ही मानते हैं। 
स्थानीय निवासी परंपरानुसार वनों के संरक्षण का प्रयास कर रहे हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान के विश्नोई समुदाय के लिए वन एवं वन्य प्राणि संरक्षण उनके धार्मिक अनुष्ठान का भाग बन गया है। भारत सरकार ने पिछले दिनों जीवसंरक्षण हेतु अमृता देवी विश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार की व्यवस्था की है। यह पुरस्कार अमृता देवी विश्नोई की स्मृति में दिया जाता है जिन्होंने 1731 में राजस्थान के जोधपुर के पास खेजडली गाँव में ‘खेजरी वृक्षों’ को बचाने हेतु 363 लोगों के साथ अपने आपको बलिदान कर दिया था। 
वनों के परंपरागत उपयोग के तरीकों के विरुद्ध पूर्वाग्रह का कोई ठोस आधार नहीं है। उदाहरण के लिए विशाल हिमालय राष्ट्रीय उद्यान के सुरक्षित क्षेत्र में एल्पाइन के वन हैं जो भेड़ों के चरागाह थे। घुमंतु चरवाहे प्रत्येक वर्ष ग्रीष्मकाल में अपनी भेडें घाटी से इस क्षेत्र में चराने के लिए ले जाते थे। जिससे इन चरागाहों में से घास भेड़ों द्वारा खा ली जाती थी तथा नई घास पनप जाती थी  परंतु इस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के बाद इस परंपरा को रोक दिया गया। पहले तो यह घास बहुत लंबी हो जाती है, फिर लंबाई के कारण जमीन पर गिर जाती है जिससे नयी घास की वृद्धि रुक जाती है। अतः वनों के परंपरागत उपयोग के तरीकों को गलत नहीं ठराया जा सकता है 
वनों को होने वाली क्षति के लिए केवल स्थानीय निवासियों को ही उत्तरदायी ठहराना ठीक नहीं है। औद्योगिक आवश्यकताओं एवं विकास परियोजनाओं जैसे कि सड़क एवं बाँध निर्माण से वनों का विनाश होता है। संरक्षित क्षेत्रों में पर्यटकों के द्वारा अथवा उनकी सुविधा के लिए की गई व्यवस्था से भी वनों को क्षति होती है अतः वनों की प्राकृतिक छवि में मनुष्य का हस्तक्षेप बहुत अधिक है। हमें इस हस्तक्षेप की प्रकृति एवं सीमा को नियंत्रित करना होगा। वन संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करना होगा जो पर्यावरण एवं विकास दोनों के हित में हो। 
संपोषित प्रबंधन 
प्राकृतिक संसधानों का ऐसा प्रबंधन जिसमें वर्तमान पीढ़ी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति को बिना नुकसान पहुंचाए करती है 
वन प्रबंधन में लोगों की भागीदारी का  उदाहरण
चिपको आंदोलन”
1970 में हिमालय की ऊँची पर्वत श्रंखला में गढवाल के ‘रेनी’ नामक गाँव में चिपको आंदोलन’ हुआ था। यह विवाद लकड़ी के ठेकेदार एवं स्थानीय लोगों के बीच प्रारंभ हआ गाँव के समीप के वृक्ष काटने का अधिकार ठेकेदार को दे दिया गया था । जब एक दिन ठेकेदार के आदमी वृक्ष काटने के लिए आए जबकि वहाँ के निवासी पुरुष वहाँ नहीं थे। बिना किसी डर के वहाँ की महिलाएँ फौरन वहाँ पहुँच गईं तथा उन्होंने पेड़ों को अपनी बाँहों में भरकर (चिपक कर) ठेकेदार के आदमियों को वृक्ष काटने से रोका। अंतत: ठेकेदार को अपना काम बंद करना पड़ा।
अराबाड़ी सालवन
वन एवं वन्य जंतु स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना वनों का प्रबंधन संभव नहीं है। इसका एक सुंदर उदाहरण अराबारी वन क्षेत्र है मिदनापुर के अराबाड़ी सालवन में वन विभाग के एक अधिकारी ए.के. बनर्जी ने ग्रामीणों के सहयोग से एक योजना प्रारंभ की। तथा ग्रामीणों के सहयोग से बुरी तरह से क्षतिग्रस्त साल के वन के 1272 हेक्टेयर क्षेत्र का संरक्षण किया। इसके बदले में निवासियों को क्षेत्र की देखभाल की जिम्मेदारी के लिए रोजगार मिला साथ ही उन्हें वहाँ से उपज की 25 प्रतिशत के उपयोग का अधिकार भी मिला और बहुत कम मूल्य पर र्ईंधन के लिए लकड़ी और पशुओं को चराने की अनुमति भी दी गई। स्थानीय समुदाय की सहमति एवं सक्रिय भागीदारी से 1983 तक अराबाड़ी का सालवन समृद्ध हो गया 
सभी के लिए जल
धरती पर रहने वाले सभी जीवों की मूल आवश्यकता जल है। जल की कमी वाले क्षेत्रों एवं अत्यधिक निर्धनता वाले क्षेत्रों में घनिष्ट संबंध है। भारत में वर्षा जल का महत्वपूर्ण स्रोत है जो मुख्यतः मानसून पर निर्भर करती है। अतः वर्षा की अवधि वर्ष के कुछ महीनों तक ही सीमित रहती है। प्रकृति में वनस्पति आच्छादन कम होने के कारण भूजल स्तर की उपलब्धता में काफी कमी आई है फसलों के लिए जल की अधिक मात्रा की माँग, उद्योगों से प्रवाहित प्रदूषक एवं नगरों के कूड़ा-कचरे ने जल को प्रदूषित कर उसकी उपलब्धता की समस्या को और अधिक जटिल बना दिया है। बाँध, जलाशय एवं नहरों का उपयोग भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सिंचाई के लिए प्राचीन समय से किया जाता रहा है। पहले स्थानीय निवासी इनका प्रबंधन कृषि एवं दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते थे जिससे जल पूरे वर्ष उपलब्ध रह सके। इस भंडारित जल का नियंत्रण भली प्रकार से किया जाता था तथा जल की उपलब्धता और दशकों एवं सदियों के अनुभव के आधार पर इष्टतम फसल प्रतिरूप अपनाए जाते थे। सिंचाई के इन संसाधनों का प्रबंधन भी स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता था।
अंग्रेजों ने भारत आकर अन्य बातों के साथ-साथ इस पद्धति को भी बदल दिया। बड़ी परियोजनाओं जैसे कि विशाल बाँध तथा दूर तक जाने वाली बड़ी-बड़ी नहरों की सर्वप्रथम संकल्पना कर उन्हें क्रियान्वित करने का कार्य भी अंग्रेजों द्वारा ही किया गया जिसे हमारे स्वतंत्र होने पर हमारी सरकार ने भी पूरे जोश के साथ अपनाया। इन विशाल परियोजनाओं से सिंचाई के स्थानीय तरीके उपेक्षित होते गए तथा सरकार धीरे-धीरे इनका प्रबंधन एवं प्रशासन अपने हाथ में लेती चली गई जिससे जल के स्थानीय स्रोतों पर स्थानीय निवासियों का नियंत्राण समाप्त हो गया।
हिमाचल प्रदेश में कुल्ह
हिमाचल प्रदेश में नहर सिंचाई की स्थानीय प्रणाली को ‘कुल्ह’ कहा जाता है। इसका विकास लगभग 400 वर्ष पूर्व हुआ इस प्रणाली में झरनों से बहने वाले जल को मानव-निर्मित छोटी-छोटी नालियों से पहाड़ी पर स्थित निचले गाँवों तक ले जाया जाता है। कृषि के मौसम में जल सर्वप्रथम दूरस्थ गाँव को दिया जाता था फिर उत्तरोतर ऊँचाई पर स्थित गाँव उस जल का उपयोग करते थे। सिंचाई के अतिरिक्त इन कुल्ह से जल का भूमि में अंतःस्रवण भी होता रहता था जो विभिन्न स्थानों पर झरने को भी जल प्रदान करता रहता था। इस प्रणाली में जल का प्रबंधन क्षेत्र के सभी गाँवों की सहमति से किया जाता था। कुल्ह की देख-रेख एवं प्रबंधन के लिए दो अथवा तीन लोग रखे जाते थे जिन्हें गाँव वाले वेतन देते थे। सरकार द्वारा इन कुल्ह के अधिग्रहण के बाद इनमें से अधिकतर निष्क्रिय हो गए तथा जल के वितरण की आपस की भागीदारी की पहले जैसी व्यवस्था समाप्त हो गई।
बाँध
बड़े बाँध में जल संग्रहण पर्याप्त मात्रा में किया जा सकता है जिसका उपयोग केवल सिंचाई के लिए ही नहीं वरन् विद्युत उत्पादन के लिए भी किया जाता है इनसे निकलने वाली नहरें जल की बड़ी मात्रा को दूरस्थ स्थानों तक ले जाती हैं। परंतु जल के खराब प्रबंधन के कारण बड़े बाँधों के बनाने कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है 
बड़े बाँध के विरोध में मुख्यतः तीन समस्याओं की चर्चा विशेष रूप से होती है
(i) सामाजिक समस्याएँ- बड़े बाँध बनाने पर बड़ी संख्या में किसान और आदिवासी विस्थापित होते हैं इन्हें इन परियोजनाओं से कोई लाभ नहीं होता है तथा उन्हें अपनी भूमि एवं जंगलों से भी हाथ धोना पड़ता है और इन्हें मुआवजा भी नहीं मिलता है 
(ii) आर्थिक समस्याएँ-  बड़े बाँध बनाने में जनता का बहुत अधिक धन लगता है और उस अनुपात में लाभ नहीं मिलता है।
(iii) पर्यावरणीय समस्याएँ -  बड़े बाँध बनाने में बहुत बड़े स्तर पर वनों का विनाश होता है तथा जैव विविधता की क्षति होती है।
जल संग्रहण  
जल संभर प्रबंधन में मिट्टी एवं जल संरक्षण पर जोर दिया जाता है भौम जल के संचयन व पुनर्भरण द्वारा  धरातलीय और भौम जल संसाधनों का दक्ष प्रबंधन जल संभर प्रबंधन कहलाता है। इसका प्रमुख उद्देश्य भूमि एवं जल के प्राथमिक स्रोतों का विकास करना है  जल संभर प्रबंधन न केवल जल संभर समुदाय का उत्पादन एवं आय बढ़ता है वरन् सूखे एवं बाढ़ को भी शांत करता है तथा निचले बाँध एवं जलाशयों का सेवा काल भी बढ़ाता है। भारत में प्राचीन कालीन जल संरक्षण प्रणालियों द्वारा धरती पर पड़ने वाली प्रत्येक बूँद का संरक्षण किया जा सकता है । जैसे  छोटे-छोटे गड्ढे खोदना, झीलों का निर्माण, साधारण जल संभर व्यवस्था की स्थापना, मिट्टी के छोटे बाँध बनाना, रेत तथा चूने के पत्थर के संग्रहक बनाना तथा घर की छतों से जल एकत्रा करना। इससे भूजल स्तर बढ़ जाता है जल संग्रहण भारत में बहुत पुरानी संकल्पना है। राजस्थान में खादिन, बड़े पात्र एवं नाड़ी, महाराष्ट्र के बंधारस एवं ताल, मध्यप्रदेश एवं उत्तर प्रदेशमें बंधिस, बिहार में अहार तथा पाइन, हिमाचल प्रदेश में कुल्ह, जम्मू के काँदी क्षेत्र में तालाब तथा तमिलनाडु में एरिस (Tank) केरल में सुरंगम, कर्नाटक में कट्टा आदि प्राचीन जल संग्रहण संरचनाएं है 
डॉ. राजेन्द्र सिंह ने एक पारंपरिक प्रौद्योगिकी द्वारा भारत के सबसे शुष्क क्षेत्र के सूखाग्रस्त गाँवों के हज़ारों ग्रामीणों की ज़िंदगी बदल दी। डॉ. राजेन्द्र सिंह ने राजस्थान में पानी इकट्ठा करने के लिए 8600 जोहेड और अन्य संरचनाओं का निर्माण किया तथा राज्य भर के 1000 गाँवों में पानी वापस लाया गया। डॉ. राजेन्द्र सिंह को ‘वाटर मैन’ के नाम से जाना जाता है  2015 में उन्होंने स्टॉकहोम पुरस्कार जीता। यह पुरस्कार ग्रह और इसके निवासियों की भलाई के लिए जल संसाधनों के सुरक्षित संरक्षण में योगदान करने वाले व्यक्ति का सम्मान करता है। 
प्राचीन जल संग्रहण तथा जल परिवहन संरचनाएँ आज भी उपयोग में हैं। जल संग्रहण तकनीक, स्थानीय होती हैं तथा इसका लाभ भी सीमित क्षेत्र को होता है। स्थानीय निवासियों को जल-संरक्षण का नियंत्रण देने से इन संसाधनों के अकुशल प्रबंधन एवं अतिदोहन कम होते हैं अथवा पूर्णतः समाप्त हो सकते हैं। बड़े समतल भूभाग में जल संग्रहण स्थल मुख्यतः अर्धचंद्राकार मिट्टी के गड्ढे अथवा निचले स्थान, वर्षा ऋतु में पूरी तरह भर जाने वाली नालियों  या प्राकृतिक जल मार्ग पर बनाए गए ‘चेक डैम’ जो कंक्रीट अथवा छोटे कंकड़ पत्थरों द्वारा बनाए जाते हैं। इन छोटे बाँधों के अवरोध के कारण इनके पीछे मानसून का जल तालाबों में भर जाता है। केवल बड़े जलाशयों में जल पूरे वर्ष रहता है। परंतु छोटे जलाशयों में यह जल 6 महीने या उससे भी कम समय तक रहता है उसके बाद यह सूख जाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य जल संग्रहण नहीं है परंतु जल-भौम स्तर में सुधार करना है। 
भौम जल संरक्षण के लाभ
(i) भौम जल वाष्प बन कर उड़ता नहीं है  और आस-पास में फैल कर  बड़े क्षेत्र में वनस्पति को नमी प्रदान करता है।
(ii) भौम जल संग्रहण से मच्छरों उत्पन्न होने की समस्या नहीं रहती है। 
(iii) भौम जल मानव व जंतु अपशिष्टों से संदूषित नहीं होता है।
कोयला एवं पेट्रोलियम
कोयला एवं पेट्रोलियम (जीवाश्म ईंधन) ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं। पेट्रोलियम एवं कोयला लाखों वर्ष पूर्व जीवों की जैव-मात्रा के अपघटन से प्राप्त होते हैं। अतः इनका अत्यधिक उपयोग करने से ये स्रोत भविष्य में समाप्त हो जाएँगे। यदि वर्तमान दर इन संसाधनों का उपयोग होता रहा तो पेट्रोलियम लगभग 40 वर्ष तथा कोयला 200 वर्ष तक ही उपलब्ध रहेंगे कोयला एवं पेट्रोलियम जैव-मात्रा से बनते हैं जिनमें कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन एवं सल्फर (गंधक) पाए जाते हैं। जब इन्हें जलाया जाता है तो कार्बन डाइऑक्साइड, जल, नाइट्रोजन के ऑक्साइड तथा सल्फर के ऑक्साइड बनते हैं। जब इन्हें अपर्याप्त वायु में जलाया जाता है तो कार्बन मोनोऑक्साइड बनती है। इनमें से नाइट्रोजन एवं सल्पफर के ऑक्साइड तथा कार्बन मोनोऑक्साइड विषैली गैसें हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड एक ग्रीन हाउस गैस है। कोयला एवं पेट्रोलियम कार्बन के विशाल भंडार हैं, यदि इनकी संपूर्ण मात्रा का कार्बन जलाने पर कार्बनडाइऑक्साइड में परिवर्तित हो गया तो वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अत्यधिक हो जाएगी जिससे तीव्र वैश्विक ऊष्मण होने की संभावना है। अतः इनसंसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता है।
कोयला एवं पेट्रोलियम का उपयोग हमारी मशीनों की दक्षता पर भी निर्भर करता हैं। यातायात के साधनों में मुख्यतः आंतरिक दहन-इंजन का उपयोग होता है। आजकल अनुसंधान इस विषय पर केंद्रित है कि इनमें ईंधन का पूर्ण दहन किस प्रकार सुनिश्चित किया जा सकता है
जीवाश्म ईंधन के प्रयोग को सीमित करने के उपाय
1. निजी वाहन की बजाय सार्वजनिक वाहन का प्रयोग या पैदल अथवा साइकिल से चलाना
2. लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करके।
3. अपने घरों में बल्ब की जगह  फ्रलोरोसेंट ट्यूब का प्रयोग करना।
4. सर्दी में हीटर की जगह एक अतिरिक्त स्वेटर पहनना 

  1. गंगा सफाई योजना कब प्रारंभ हुई थी?
    1985 
  2. महाराष्ट्र की  प्राचीन जल संग्रहण (water harwesting) संरचनाओं के नाम लिखो 
    बंधारस एवं ताल
  3. दो जीवाश्म ईधनों के नाम लिखिए ।
    कोयला और पेट्रोलियम
  4. किस जीवाणु की उपस्थिति गंगा नदी के जल का संदूषित होना दर्शाता हैं ?
    मानव की आंत्र में पाये जाने वला कोलीफार्म जीवाणु 
  5. अमृता देवी विश्नोई पुरस्कार किस कार्य के लिए दिया जाता है?
    जीव संरक्षण हेतु 
  6. विशाल हिमालय राष्ट्रीय उद्यान के सुरक्षित क्षेत्र में किस प्रकार  के वन हैं 
    एल्पाइन के वन
  7. हिमाचल प्रदेश में नहर सिंचाई की पुरानी प्रणाली क्या कहलाती है?
     कुल्ह
  8. Reuse (पुनः उपयोग) Recycle (पुनःचक्रण) से  अच्छा तरीका है क्यों ?
    पुनःचक्रण में कुछ ऊर्जा खर्च होती है। जबकि पुनः उपयोग  किसी प्रकार की ऊर्जा खर्च नहीं होती है 
  9. बीड़ी बनाने में किस वृक्ष का पत्ता कम में लिया जाता है 
    तेंदू का पत्ता 
  10. मध्यप्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में  प्राचीन जल संग्रहण (water harwesting) संरचना को किस नाम से जाना जाता  है
    बंधिस
  11. राजस्थान में जल संग्रहण के लिए ‘वाटर मैन’ के नाम से किसे  जाना जाता है
    डॉ. राजेन्द्र सिंह को 
  12. जैव विविधता के विशिष्ट (Hotspots) स्थल क्या है।
    वन
  13. तमिलनाडु में  प्राचीन जल संग्रहण (water harwesting) संरचना को किस नाम से जाना जाता  है
    एरिस में
  14. राजस्थान की  प्राचीन जल संग्रहण (water harwesting) संरचनाओं के नाम लिखो 
    खादिन, बड़े पात्र एवं नाड़ी
  15. केरल में  प्राचीन जल संग्रहण (water harwesting) संरचना को किस नाम से जाना जाता  है
    सुरंगम
  16. 2015 में स्टॉकहोम जल  पुरस्कार किसे दिया गया 
    डॉ. राजेन्द्र सिंह को 
  17. बंगाल के अराबाड़ी वन क्षेत्र में किसकी बहुलता पाई जाती है  
    साल की 
  18. टिहरी बाँध किस नदी पर बनाया गया  है। 
    गंगा नदी पर (उत्तराखंड)
  19. कर्नाटक में कट्टा किसे कहते हैं ?
    कर्नाटक में प्राचीन जल संग्रहण संरचना को कट्टा  कहते हैं
  20. प्राकृतिक जल मार्गों पर कंक्रीट या छोटे पत्थरों से बने डैम को क्या कहते हैं।
     चेक डैम
  21. गंगोत्री से गंगा सागर तक गंगा की कुल लम्बाई कितनी है ?
    2500 कि.मी.
  22. चिपको आंदोलन किस वर्ष में प्रारंभ हुआ?
    1970
  23. गंगा नदी का उद्गम स्थल कौन है 
    गंगोत्री
  24. चिपको आन्दोलन कहाँ हुआ था ?
    चिपको आन्दोलन गढ़वाल के “रैनी” नामक गाँव में हुआ था |
  25. कोयला तथा पेट्रोलियम के दहन से कौन – कौन सी विषैली गैसें निकलती हैं ?
    नाइट्रोज एवं सल्फर के ऑक्साइड तथा कार्बन मोनो ऑक्साइड विषैली गैसें हैं |
  26. बड़े समतल भू-भाग में जल-संग्रहण स्थल की परंपरागत पद्धतियां कौन सी  है ?
    अर्धचंद्राकार मिट्टी के गड्ढे अथवा निचले स्थान व ‘चेक डैम’
  27. वन संरक्षण हेतु सबसे उपयोगी विधि क्या हो सकती है?
    स्थानीय नागरिकों को वन संरक्षण का प्रबन्धन दिया जाना चाहिए, क्योंकि ये वन का संपोषित तरीके से उपयोग करते हैं।
  28.  स्टॉकहोम पुरस्कार किसे दिया जाता है 
    स्टॉकहोम पुरस्कार पृथ्वी  और इसके निवासियों की भलाई के लिए जल संसाधनों के सुरक्षित संरक्षण में योगदान करने वाले व्यक्ति को दिया जाता  है। 
  29. प्राकृतिक संसाधन किसे कहते हैं ?
    प्रकृति से प्राप्त हर वस्तु जिसका उपयोग मनुष्य अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए सीधा अर्थात उसमें बिना कोई बदलाव किये  करता है प्राकृतिक संसाधन कहलाता है
  30. पर्यावरण को बचाने वाले पाँच R कौनसे है 
    1. Refuse (इनकार)             2. Reduse कम उपयोग 
    3. Reuse पुनः उपयोग         4. Repurpose पुनः प्रयोजन
    5 .Recycle पुनः चक्रण
  31. जीवाश्म इंधनों का विवेकपूर्ण ढंग से उपयोग करना क्यों आवश्यक हैं ?
    जीवाश्म इंधन सीमित एवं अनविकरणीय प्राकृतिक संसाधन हैं अतः इनका अत्यधिक उपयोग करने से ये स्रोत भविष्य में समाप्त हो जाएँगे। 
    जीवाश्म इंधनों के दहन से विषैली गैसें उत्पन्न होती  हैं 
  32. किन्हीं चार वन उत्पाद आधारित उद्योगों के नाम लिखिए
    टिम्बर (इमारती लकड़ी) उद्योग
     कागज  उद्योग
    लाख उद्योग 
    खेल का समान 
  33. वनों से हमें क्या लाभ है ?
    वनों से  ईंधन के लिए जलाऊ लकड़ी  प्राप्त होती है। 
    वन मछली पकड़ने एवं शिकार-स्थल  होते हैं।
    वनों से हमें  फल, नट्स तथा औषधि प्राप्त होती है। 
    वनों में हम पशुओं को  चराते हैं अथवा उनका चारा वनों से एकत्र करते हैं। 
  34. निम्न राज्यों में  प्राचीन जल संग्रहण संरचनाओं के नाम लिखिए 
    राजस्थान   ➡खादिन, बड़े पात्र, नाड़ी
    महाराष्ट्र     ➡बंधारस एवं ताल 
    मध्य प्रदेश ➡बंधिस
    बिहार        ➡आहर तथा पाइन 
    जम्मू          ➡तालाब 
    तमिलनाडू   ➡एरिस 
    उत्तर प्रदेश  ➡बंधिस
  35. बड़े बाँधों के निर्माण में मुख्य समस्याएँ कौन-कौन सी हैं?
    बड़े बाँध के विरोध में मुख्यतः तीन समस्याओं की चर्चा विशेष रूप से होती है
    (i) सामाजिक समस्याएँ- बड़े बाँध बनाने पर बड़ी संख्या में किसान और आदिवासी विस्थापित होते हैं इन्हें इन परियोजनाओं से कोई लाभ नहीं होता है तथा उन्हें अपनी भूमि एवं जंगलों से भी हाथ धोना पड़ता है और इन्हें मुआवजा भी नहीं मिलता है 
    (ii) आर्थिक समस्याएँ-  बड़े बाँध बनाने में जनता का बहुत अधिक धन लगता है और उस अनुपात में लाभ नहीं मिलता है।
    (iii) पर्यावरणीय समस्याएँ -  बड़े बाँध बनाने में बहुत बड़े स्तर पर वनों का विनाश होता है तथा जैव विविधता की क्षति होती है।